श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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“व्रजे स्थितौ गायकौ यौ मधुकण्ठ-मधुव्रतौ। मुकुन्द-वासुदेवौ तौ दत्तौ गौराङ्ग-गायकौ॥” “व्रजके मधुकण्ठ नामक गायक अब श्रीगौराङ्गदेवके गायक श्रीमुकुन्द दत्त हैं।” विद्या-शिक्षाके समय निमाइ अपने सहपाठी मुकुन्दके साथ न्यायशास्त्रकी पहेलियोंको लेकर झगड़ा किया करते थे (चैःभाः आदिखण्ड, सातवाँ और आठवाँ अध्याय)। गयासे लौटनेके पश्चात् श्रीकृष्णप्रेममें मत्त महाप्रभुको मुकुन्द भागवतके श्लोक पढ़कर आनन्द प्रदान करते थे। इनकी ही चेष्टासे सङ्गी श्रीगदाधर पण्डितने श्रीपुण्डरीक विद्यानिधिसे दीक्षा प्राप्त की (चैःचः मध्यलीला सातवाँ अध्याय)। श्रीवास-अङ्गनमें जब ये कीर्तन करते थे, तब महाप्रभु नृत्य करते थे। और महाप्रभुके ‘सातप्रहरिया’ भावकालमें इन्होंने ‘अभिषेक’ नामक गीत गाया था। मुकुन्दके प्रति दण्ड और कृपा (चैःभाः मध्यखण्ड, दसवाँ अध्याय द्रष्टव्य है)। श्रीचन्द्रशेखर-भवनमें महाप्रभुके द्वारा लक्ष्मी-वेषमें नृत्यके समय इन्होंने कीर्तन आरम्भ किया था। संन्यास ग्रहण करनेका निर्णय श्रीनित्यानन्द प्रभुको बतलानेके पश्चात् महाप्रभु मुकुन्दके घरमें उपस्थित हुए थे। सब बातोंसे अवगत होकर इन्होंने महाप्रभुसे कुछ और दिन तक नवद्वीपमें कीर्तनलीला करनेका अनुरोध किया था (चैःभाः मध्यखण्ड, पच्चीसवाँ अध्याय)। श्रीनित्यानन्द प्रभुके द्वारा महाप्रभुके संन्यास लेनेका समाचार श्रीगदाधर, चन्द्रशेखरके साथ मुकुन्दको भी मिला और वे उनके साथ कटोआ गये। वहाँ मुकुन्द कीर्तन और संन्यासोचित क्रियाओंको सम्पादनकर महाप्रभुके संन्यासके उपरान्त उनके पीछे-पीछे श्रीनिताइ, श्रीगदाधर और श्रीगोविन्दके साथ गये (चैःचः मध्यलीला, छब्बीसवाँ अध्याय; अन्त्य, प्रथम अध्याय) और इस प्रकार महाप्रभुके पीछे-पीछे पुरुषोत्तम तक गमन किया (चैःचः अन्त्यलीला, द्वितीय अध्याय)। जलेश्वर जाते समय श्रीनित्यानन्द प्रभुके द्वारा महाप्रभुका दण्डभङ्ग करनेके समय मुकुन्द भी उपस्थित थे, कुछ समय बाद महाप्रभु भी जलेश्वरमें उपस्थित हुए। मुकुन्द प्रतिवर्ष भक्तोंके साथ नवद्वीपसे प्रभुके दर्शनोंके लिये नीलाचल आते थे॥40॥ अमृतानुकणिका—महाप्रभुने महा-प्रकाश-लीलामें सभी भक्तोंको मनोवाञ्छित वर प्रदान किये। उस समय मुकुन्द बाहर ही खड़े थे। श्रीवासने जब मुकुन्दके लिये कृपाकी भिक्षा माँगी, तब महाप्रभुने कहा,—“मुकुन्द उनके दर्शनका अधिकारी नहीं है, क्योंकि मुकुन्द प्रत्येक सम्प्रदायसे मिलकर विभिन्न सम्प्रदायोंके भावोंको ग्रहण किया करता है। उसकी मति अभी अस्थिर है एवं भक्तिके प्रति उसकी निष्ठा नहीं है। वह ‘खड़-जठिया’ है,—कभी दाँतोंमें ‘खड़’ (तृण) धारण करता है, तो कभी ‘जाठि’ (लाठी) भी उठा लेता है। भक्ति ही सर्वश्रेष्ठ है,—इस बातको न मानना ही भगवान्के अङ्गमें ‘जाठि’ (लाठी) मारना है।” यह बात सुनकर मुकुन्दने उसी दिन अपने देह त्याग देनेका सङ्कल्प कर लिया और श्रीवाससे कहा कि आप महाप्रभुसे पूछकर आओ कि क्या मैं कभी उनका दर्शन कर पाऊँगा या नहीं? श्रीवासने आकर उत्तर दिया कि कोटि जन्मके पश्चात् दर्शन मिलेगा। यह सुनकर मुकुन्द आनन्दपूर्वक स्वयंको भूलकर नृत्य करने लगे कि कोटि जन्मके पश्चात् तो मुझे महाप्रभुका दर्शन मिलेगा। तब महाप्रभुने उसे अपने पास बुलाकर उसके सभी अपराध क्षमा कर दिये एवं अपनी पराजय स्वीकार करते हुए कहा,—“मुकुन्द, तुम्हारी जिह्वामें मेरा नित्य अधिष्ठान है।” यह सुनकर मुकुन्दने भक्तिहीनताके लिये अपनेको धिक्कारते हुए भक्तियोगके प्रभाव एवं भक्तिहीनताके भयानक परिणामके बारेमें दृष्टान्त सहित वर्णन किया। मुकुन्दके खेद-दर्शनसे लज्जित विश्वम्भरने अपनी भक्तिका श्रेष्ठत्व बतलाते हुए वेदोंमें उल्लिखित कर्मकाण्डके फलस्वरूप सभी प्रकारके कर्म-बन्धनोंसे मुक्ति दिलानेके लिये केवल अपनी भक्तिका ही प्रभुत्व स्थापित किया एवं मथुरावासी अभक्त धोबीकी भाग्यहीनताकी कथाका उल्लेख करते हुए मुकुन्दको यह वर दिया कि उनके सभी अवतारोंमें मुकुन्द उनके गायक बनेंगे॥40॥
52 | श्रीचैतन्यचरितामृत