श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 587, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें10/37-40 ] अनुवाद—एक और शाखा श्रीमान् पण्डित श्रीचैतन्य महाप्रभुके निज दास हैं। महाप्रभुके नृत्यके समय ये हाथमें जलती हुई मशाल धारण करते थे॥ ३७॥ अनुभाष्य—नवद्वीपवासी 'श्रीमान् पण्डित' महाप्रभुके प्रथम कीर्तनके सङ्गी थे। वेषसज्जाके दिन महाप्रभुके देवीभावमें और सर्वत्र महाप्रभुके नृत्यकालमें ये जलती हुई मशाल धारण करते थे। (चैःभाः मध्यखण्ड, 18/154,157 संख्यामें)— “आद्याशक्ति-वेशे नाचे प्रभु गौरसिंह। सुखे देखे ताँर यत चरणेर भृङ्ग॥ 154॥ सम्मुखे देउटी धरे पण्डित श्रीमान्॥ 157॥” “आद्याशक्तिके वेशमें प्रभु गौरसिंह नृत्य कर रहे थे। उनके चरणकमलोंके भ्रमररूपी भक्त बड़े आनन्दसे उस नृत्यको देख रहे थे। सामने हाथमें मशाल लेकर श्रीमान् पण्डित खड़े थे॥” 37॥ (16) श्रीशुक्लाम्बर ब्रह्मचारी :— शुक्लाम्बर-ब्रह्मचारी बड़ भाग्यवान्। याँर अन्न मागि' काड़ि' खाइला भगवान्॥ 38॥ अनुवाद—श्रीशुक्लाम्बर ब्रह्मचारी बड़े भाग्यवान् हैं, जिनकी भिक्षा-झोलीमेंसे प्रभुने अन्न निकालकर खाया था॥ 38॥ अनुभाष्य—'श्रीशुक्लाम्बर ब्रह्मचारी'—श्रीनवद्वीपवासी थे और महाप्रभुके प्रथम कीर्तनके सङ्गी थे। (चैःभाः मध्यखण्ड, प्रथम अध्याय)—गयासे लौटनेके पश्चात् महाप्रभुने इनके घरमें सभी भक्तोंको मिलकर इनसे श्रीकृष्ण-कथा सुनानेका अनुरोध किया था। (चैःभाः मध्यखण्ड, सोहलवाँ और पच्चीसवाँ अध्याय)— नवद्वीपलीलामें महाप्रभु इनको भिक्षामें मिले चावलको छीनकर परमानन्दसे खाते थे। श्रीगौरगणोद्देश-दीपिकाके 191वें श्लोकमें— “शुक्लाम्बरो ब्रह्मचारी पुरासीद् यज्ञपत्निका। प्रार्थयित्वा यदन्नं श्रीगौराङ्गो भुक्तवान् प्रभुः। केचिदाहुर्ब्रह्मचारी याज्ञिकब्राह्मणः पुरा॥” 191॥ “जो पहले यज्ञपत्नी थीं, वे ही अब श्रीशुक्लाम्बर ब्रह्मचारी हैं। श्रीगौराङ्ग महाप्रभु इन्हींसे अन्नकी प्रार्थनाकर भोजन करते थे। कोई-कोई कहते हैं कि ये पहले याज्ञिक ब्राह्मण थे॥” 38॥ (17) श्रीनन्दन-आचार्य-शाखा :— नन्दन-आचार्य-शाखा जगते विदित। लुकाइया दुइ प्रभुर याँर घरे स्थित॥ 39॥ अनुवाद—श्रीनन्दनाचार्य-शाखाको सारा जगत् जानता है। इन्हींके घरमें दोनों प्रभु (श्रीचैतन्य-श्रीनित्यानन्द) छिपकर रहे थे॥ 39॥ अनुभाष्य—'श्रीनन्दन आचार्य'—श्रीनवद्वीपवासी थे और महाप्रभुके कीर्तनके सङ्गी थे। श्रीनित्यानन्द प्रभु अवधूत वेशमें अनेक तीर्थ-भ्रमणके उपरान्त सर्वप्रथम इन्हींके घरमें आये थे। वहींपर ही उनका महाप्रभु और भक्तोंसे मिलन हुआ था। महाप्रकाशके दिन महाप्रभुने श्रीअद्वैताचार्यको लानेके लिये श्रीरामार्इ पण्डितको भेजा था। श्रीअद्वैताचार्य श्रीनन्दनाचार्यके घरमें आकर छिपे थे और सर्वान्तर्यामी श्रीगौरसुन्दर यह जान गये थे। महाप्रभु भी एक दिन इनके घरमें छिपे थे। (चैःभाः मध्यखण्ड, छठा और सतरहवाँ अध्याय द्रष्टव्य है)॥ 39॥ (18) श्रीमुकुन्द दत्त-शाखा :— श्रीमुकुन्द-दत्त शाखा—प्रभुर समाध्यायी। याँहार कीर्त्तने नाचे चैतन्य-गोसाञि॥ 40॥ अनुवाद—श्रीमुकुन्द दत्त नामक शाखा महाप्रभुके सहपाठी हैं, जिनके कीर्तनमें महाप्रभु स्वयं नृत्य करते थे॥ 40॥ अनुभाष्य—श्रीमुकुन्द दत्त चट्टग्राम जिलेके पाटिया थानेके अन्तर्गत 'छनहरा' ग्राममें आविर्भूत हुए थे। यह स्थान श्रीविद्यानिधिके श्रीपाट 'मेखला ग्राम' से दस कोसकी दूरी पर है। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिकाके 140वें श्लोकमें)— दसवाँ अध्याय | 51