श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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[ 10/34-37 (12) श्रीसदाशिव पण्डित :- सदाशिव-पण्डित याँर प्रभु strip: सदाशिव-पण्डित याँर प्रभुदे आश। प्रथमेइ नित्यानन्देर याँर घरे वास ॥ 34 ॥ अनुवाद-श्रीसदाशिव पण्डित सदा श्रीमन्महाप्रभुके चरणोंकी सेवाकी अभिलाषा करते थे। नवद्वीपमें आकर श्रीनित्यानन्द प्रभु सबसे पहले इनके घरमें रहे थे॥34॥ अनुभाष्य-(चैःभाः अन्त्यखण्ड, 8/19-श्रीरथयात्राके समय)- “सदाशिव पण्डित चलिला शुद्धमति। याँर घरे पूर्वे नित्यानन्देर वसति॥” “पहले श्रीनित्यानन्द प्रभु जिनके घरमें रहे थे, वे शुद्धमति श्रीसदाशिव पण्डित रथयात्राके लिये नीलाचलकी ओर अग्रसर हुए।” ये नवद्वीपमें महाप्रभुके कीर्त्तनके सङ्गी थे। गयासे लौटनेके पश्चात् महाप्रभुने इन्हें और अन्य भक्तोंको शुक्लाम्बरके घरमें अपने श्रीकृष्ण-भजनके विषयमें बतलाया था। श्रीचन्द्रशेखर-भवनमें लक्ष्मीके वेषमें नृत्य करनेके समय महाप्रभुने इनको वेषभूषादि तैयार करनेके लिये कहा था (चैःभाः मध्यखण्ड, 18वाँ अध्याय द्रष्टव्य है)॥ 34॥ (13) श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारी :- श्रीनृसिंह-उपासक-प्रद्युम्न ब्रह्मचारी। प्रभु ताँर नाम कैला 'नृसिंहानन्द' करि' ॥ 35 ॥ अनुवाद-श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारी श्रीनृसिंह भगवान्के उपासक थे, इसलिये महाप्रभुने इनका नाम 'श्रीनृसिंहानन्द' रखा था॥ 35 ॥ अनुभाष्य-(चैःचः अन्त्यलीला 2/53)- “प्रद्युम्न ब्रह्मचारी ताँर निजनाम। 'नृसिंहानन्द' नाम ताँर कैल गौरधाम॥” “प्रद्युम्न ब्रह्मचारी उनका अपना नाम था, [नृसिंह भगवान्के प्रति उनकी निष्ठा देखकर] महाप्रभुने उनको 'नृसिंहानन्द' नाम दिया।” पाणिहाटीमें श्रीराघव पण्डितके घरसे लौटकर कुमारहट्टमें श्रीशिवानन्दसेनके घरमें महाप्रभुने श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारीके हृदयमें आविर्भूत होकर श्रीजगन्नाथ, श्रीनृसिंह और अपना-तीनोंका भोग ग्रहण किया था (चैःचः अन्त्यलीला 2/48-78 संख्या द्रष्टव्य है)। कुलियासे महाप्रभुका वृन्दावन जानेका समाचार सुनकर ये ध्यानमग्न चित्तमें कुलियासे वृन्दावन तकके मार्गको रत्नादिके द्वारा सजाने लगे, किन्तु बीचमें ही ध्यान भङ्ग होनेके कारण वे भक्तोंसे बोले-“महाप्रभु इस बार कानाई-नाटशाला तक ही जायेंगे, वृन्दावन नहीं जायेंगे।”-(चैःचः मध्यलीला संख्या 1/55-62)। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 74वाँ श्लोक)- “आवेशश्च तथा ज्ञेयो मिश्रे प्रद्युम्नसञ्ज्ञके ॥”74(क)॥ “श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारीमें श्रीगौरहरिका आवेश जानना चाहिये।” (चैःभाः अन्त्यखण्ड, 3/186 संख्यामें)- “याँहार शरीरे नृसिंहेर परकाश।” “जिनके शरीरमें श्रीनृसिंहदेवका प्रकाश था।” और (चैःभाः अन्त्यखण्ड, 9वें अध्यायमें)- “साक्षात् नृसिंह याँर सने कथा कय।” “साक्षात् श्रीनृसिंहदेव इनके साथ बात करते थे॥”35॥ (14) श्रीनारायण पण्डित :- नारायण-पण्डित एक बड़इ उदार। चैतन्यचरण बिनु नाहि जाने आर ॥ 36 ॥ अनुवाद-श्रीनारायण पण्डित बड़े ही उदार थे। वे श्रीचैतन्य-चरणोंके अतिरिक्त और कुछ नहीं जानते थे॥ 36 ॥ अनुभाष्य-(चैःभाः अन्त्यखण्ड, 9/93 संख्यामें)- श्रीवास पण्डितके भ्राता श्रीराम पण्डितके साथ श्रीनारायण पण्डित महाप्रभुके दर्शनके लिये नीलाचल गये थे॥36॥ (15) श्रीमान् पण्डित-शाखा :- श्रीमान्पण्डित शाखा-प्रभुर निज भृत्य। देउटि धरेन, यबे प्रभु करेन नृत्य ॥ 37 ॥ 50 | श्रीचैतन्यचरितामृत