भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 585, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 585

10/31-33 ] अनुवाद—एक अन्य शाखा श्रीदामोदर पण्डित हैं, जिनकी महाप्रभुमें प्रचण्ड प्रीति है। इन्होंने वाक्यके द्वारा महाप्रभुको भी शासन किया था, जिसका आगे विस्तारसे वर्णन करूँगा। इनके इस वाक्य-दण्डसे प्रसन्न होकर महाप्रभुने इन्हें नवद्वीपमें भेजा था॥31-32॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'आगे' अर्थात् चैःचः अन्त्यलीलाका तीसरा अध्याय द्रष्टव्य है॥32॥ अनुभाष्य—श्रीगौरगणोद्देश-दीपिकाके 159वें श्लोकमें इस प्रकार वर्णन आता है— “शैव्या यासीत् व्रजे चण्डी सा दामोदरपण्डितः। कुतश्चित् कार्यतो देवी प्राविशत्तं सरस्वती॥”159॥ “व्रजमें जो प्रखरा शैव्या थीं, वे ही श्रीदामोदर पण्डित हैं। किसी कार्यवशतः श्रीसरस्वतीदेवी भी इनमें प्रविष्ट हुई हैं।” महाप्रभुकी आज्ञासे श्रीदामोदर शचीमाताके दर्शनके लिये गौड़देश आते और रथयात्रासे पहले भक्तोंके साथ पुरुषोत्तम धाम जाते थे। महाप्रभुके द्वारा शचीदेवीकी श्रीकृष्णभक्तिके विषयमें जिज्ञासा सुनकर श्रीदामोदरने जो कहा—वह चैःभाः अन्त्यखण्ड, नौवें अध्यायमें वर्णित है। चैःचः अन्त्यलीला, तीसरे अध्यायमें महाप्रभुके प्रति दामोदर पण्डितके वाक्य-दण्डका वृत्तान्त द्रष्टव्य है॥31-32॥ अमृतानुकणिका—दामोदर पण्डित आइ (शचीमाता) को देखनेके लिये नवद्वीप गये थे, वे आइको देखकर शीघ्र चले आये। दामोदरको देखकर महाप्रभुने उन्हें एकान्तमें बुलाया और आइका वृत्तान्त पूछने लगे। महाप्रभुने कहा,–“तुम तो उनके (आइके) पास थे। सत्य कहना, क्या आइकी विष्णुमें भक्ति है?” यह सुनकर परम तपस्वी निरपेक्ष दामोदर क्रोधित होकर कहने लगे,–“क्या कहा गोसाईं, आइकी विष्णुमें भक्ति है? आप किस प्रयोजनसे यह पूछ रहे हैं? आइकी कृपासे ही आपमें विष्णुभक्ति है। आपका जो कुछ भी है, वह सब उन्हींकी शक्ति है। आपमें जितनी विष्णुभक्ति उदित हुई है, निश्चय ही जान लीजिये, यह सब आइकी कृपासे ही है। अश्रु, कम्प, स्वेद, मूर्च्छा, पुलक, हुँकार आदि विष्णुभक्तिके जितने भी विकार समूह हैं, आइके श्रीअङ्गोंमें उन सबका एक क्षणके लिये भी विराम नहीं है। आइके श्रीमुखमें निरन्तर कृष्णनाम स्फुरित होता रहता है। आप आइकी भक्तिकी कथा पूछ रहे हैं! आइको देखनेसे ही पता चलता है कि 'विष्णुभक्ति' किसे कहते हैं। मैं आपसे कह रहा हूँ कि आइ मूर्तिमती भक्तिस्वरूपा हैं। आप यह जानकर भी माया विस्तारपूर्वक मुझसे पूछ रहे हैं। प्राकृत-शब्दके रूपमें भी जो ‘आइ' कहेगा, आइ-शब्दके प्रभावसे उसे कोई दुःख नहीं रहेगा।” पुत्र-सङ्गसे वञ्चित होकर आइकी भक्ति कैसी है, इसलिये महाप्रभुने यह प्रश्न किया था और दामोदरके मुखसे आइकी महिमा सुनकर महाप्रभुको असीम आनन्द हुआ॥32॥ (11) श्रीशङ्कर पण्डित-माहात्म्य और शाखा :- ताँहार अनुज शाखा—शङ्कर पण्डित। 'प्रभु-पादोपाधान' याँर नाम विदित॥33॥ अनुवाद—श्रीदामोदर पण्डितके छोटे भाई श्रीशङ्कर पण्डित एक अन्य शाखा हैं। ये महाप्रभुके 'चरणोंके तकिया'के नामसे प्रसिद्ध थे॥33॥ अनुभाष्य—श्रीगौरगणोद्देश-दीपिकाके 157वें श्लोकमें इस प्रकार वर्णन आता है— “यस्या वक्षसि सुष्वाप कृष्णो वृन्दावने पुरा। सा श्रीभद्राद्य गौराङ्गप्रियः शङ्करपण्डितः॥”157॥ “वृन्दावनमें श्रीकृष्ण जिनके वक्षःस्थलपर शयन करते थे, वे श्रीभद्रा सखी ही अब श्रीशङ्कर पण्डित हैं।” (चैःचः अन्त्यलीला 19/67-74 संख्या द्रष्टव्य है)। महाप्रभु श्रीदामोदर पण्डितके प्रति गौरव बुद्धिके साथ प्रीति रखते थे और उनके छोटे भाई श्रीशङ्कर पण्डितसे उनका केवल शुद्ध प्रेम था (चैःचः मध्यलीला 11/146-148 संख्या द्रष्टव्य है)॥33॥ दसवाँ अध्याय | 49

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