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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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“व्रजे स्थितौ गायकौ यौ मधुकण्ठ-मधुव्रतौ। मुकुन्द-वासुदेवौ तौ दत्तौ गौराङ्ग-गायकौ॥” “व्रजके मधुकण्ठ नामक गायक अब श्रीगौराङ्गदेवके गायक श्रीमुकुन्द दत्त हैं।” विद्या-शिक्षाके समय निमाइ अपने सहपाठी मुकुन्दके साथ न्यायशास्त्रकी पहेलियोंको लेकर झगड़ा किया करते थे (चैःभाः आदिखण्ड, सातवाँ और आठवाँ अध्याय)। गयासे लौटनेके पश्चात् श्रीकृष्णप्रेममें मत्त महाप्रभुको मुकुन्द भागवतके श्लोक पढ़कर आनन्द प्रदान करते थे। इनकी ही चेष्टासे सङ्गी श्रीगदाधर पण्डितने श्रीपुण्डरीक विद्यानिधिसे दीक्षा प्राप्त की (चैःचः मध्यलीला सातवाँ अध्याय)। श्रीवास-अङ्गनमें जब ये कीर्तन करते थे, तब महाप्रभु नृत्य करते थे। और महाप्रभुके ‘सातप्रहरिया’ भावकालमें इन्होंने ‘अभिषेक’ नामक गीत गाया था। मुकुन्दके प्रति दण्ड और कृपा (चैःभाः मध्यखण्ड, दसवाँ अध्याय द्रष्टव्य है)। श्रीचन्द्रशेखर-भवनमें महाप्रभुके द्वारा लक्ष्मी-वेषमें नृत्यके समय इन्होंने कीर्तन आरम्भ किया था। संन्यास ग्रहण करनेका निर्णय श्रीनित्यानन्द प्रभुको बतलानेके पश्चात् महाप्रभु मुकुन्दके घरमें उपस्थित हुए थे। सब बातोंसे अवगत होकर इन्होंने महाप्रभुसे कुछ और दिन तक नवद्वीपमें कीर्तनलीला करनेका अनुरोध किया था (चैःभाः मध्यखण्ड, पच्चीसवाँ अध्याय)। श्रीनित्यानन्द प्रभुके द्वारा महाप्रभुके संन्यास लेनेका समाचार श्रीगदाधर, चन्द्रशेखरके साथ मुकुन्दको भी मिला और वे उनके साथ कटोआ गये। वहाँ मुकुन्द कीर्तन और संन्यासोचित क्रियाओंको सम्पादनकर महाप्रभुके संन्यासके उपरान्त उनके पीछे-पीछे श्रीनिताइ, श्रीगदाधर और श्रीगोविन्दके साथ गये (चैःचः मध्यलीला, छब्बीसवाँ अध्याय; अन्त्य, प्रथम अध्याय) और इस प्रकार महाप्रभुके पीछे-पीछे पुरुषोत्तम तक गमन किया (चैःचः अन्त्यलीला, द्वितीय अध्याय)। जलेश्वर जाते समय श्रीनित्यानन्द प्रभुके द्वारा महाप्रभुका दण्डभङ्ग करनेके समय मुकुन्द भी उपस्थित थे, कुछ समय बाद महाप्रभु भी जलेश्वरमें उपस्थित हुए। मुकुन्द प्रतिवर्ष भक्तोंके साथ नवद्वीपसे प्रभुके दर्शनोंके लिये नीलाचल आते थे॥40॥ अमृतानुकणिका—महाप्रभुने महा-प्रकाश-लीलामें सभी भक्तोंको मनोवाञ्छित वर प्रदान किये। उस समय मुकुन्द बाहर ही खड़े थे। श्रीवासने जब मुकुन्दके लिये कृपाकी भिक्षा माँगी, तब महाप्रभुने कहा,—“मुकुन्द उनके दर्शनका अधिकारी नहीं है, क्योंकि मुकुन्द प्रत्येक सम्प्रदायसे मिलकर विभिन्न सम्प्रदायोंके भावोंको ग्रहण किया करता है। उसकी मति अभी अस्थिर है एवं भक्तिके प्रति उसकी निष्ठा नहीं है। वह ‘खड़-जठिया’ है,—कभी दाँतोंमें ‘खड़’ (तृण) धारण करता है, तो कभी ‘जाठि’ (लाठी) भी उठा लेता है। भक्ति ही सर्वश्रेष्ठ है,—इस बातको न मानना ही भगवान्के अङ्गमें ‘जाठि’ (लाठी) मारना है।” यह बात सुनकर मुकुन्दने उसी दिन अपने देह त्याग देनेका सङ्कल्प कर लिया और श्रीवाससे कहा कि आप महाप्रभुसे पूछकर आओ कि क्या मैं कभी उनका दर्शन कर पाऊँगा या नहीं? श्रीवासने आकर उत्तर दिया कि कोटि जन्मके पश्चात् दर्शन मिलेगा। यह सुनकर मुकुन्द आनन्दपूर्वक स्वयंको भूलकर नृत्य करने लगे कि कोटि जन्मके पश्चात् तो मुझे महाप्रभुका दर्शन मिलेगा। तब महाप्रभुने उसे अपने पास बुलाकर उसके सभी अपराध क्षमा कर दिये एवं अपनी पराजय स्वीकार करते हुए कहा,—“मुकुन्द, तुम्हारी जिह्वामें मेरा नित्य अधिष्ठान है।” यह सुनकर मुकुन्दने भक्तिहीनताके लिये अपनेको धिक्कारते हुए भक्तियोगके प्रभाव एवं भक्तिहीनताके भयानक परिणामके बारेमें दृष्टान्त सहित वर्णन किया। मुकुन्दके खेद-दर्शनसे लज्जित विश्वम्भरने अपनी भक्तिका श्रेष्ठत्व बतलाते हुए वेदोंमें उल्लिखित कर्मकाण्डके फलस्वरूप सभी प्रकारके कर्म-बन्धनोंसे मुक्ति दिलानेके लिये केवल अपनी भक्तिका ही प्रभुत्व स्थापित किया एवं मथुरावासी अभक्त धोबीकी भाग्यहीनताकी कथाका उल्लेख करते हुए मुकुन्दको यह वर दिया कि उनके सभी अवतारोंमें मुकुन्द उनके गायक बनेंगे॥40॥

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10/41-47 ] (19) श्रीवासुदेवदत्त ठाकुरकी गुणराशि :- वासुदेव दत्त—प्रभुर भृत्य महाशय। सहस्र-मुखे याँर गुण कहिले ना हय॥ 41 ॥ अनुवाद—श्रीवासुदेव दत्त महाप्रभुके सेवक हैं। हजार मुखोंके द्वारा भी उनके गुणोंको कहा नहीं जा सकता॥ 41 ॥ अनुभाष्य—श्रीवासुदेव दत्तका जन्म चट्टग्राममें हुआ था और ये श्रीमुकुन्द दत्तके भाई हैं। (चैःभाः अन्त्यखण्ड, 8/14)— “याँर स्थाने कृष्ण हय आपने विक्रय।” “जिनके प्रेमके कारण श्रीकृष्ण उनके हाथों बिक गये हैं।” (चैःभाः अन्त्यखण्ड, 5वाँ अः)— “हेन से प्रभुर प्रीति दत्तेर विषय। प्रभु बले,—“आमि वासुदेवेर निश्चय॥” 26 ॥ आपने श्रीगौरचन्द्र बले बार बार। “ए शरीर वासुदेव दत्तेर आमार॥ 27 ॥ दत्त आमा' यथा बेचे, तथाइ बिकाइ। सत्य, सत्य, इहाते अन्यथा किछु नाइ॥ 28 ॥ सत्य आमि कहि, शुन, वैष्णवमण्डल। ए देह आमार वासुदेवेरे केवल॥” “वासुदेव दत्तसे महाप्रभुकी इतनी प्रीति थी कि महाप्रभु कहने लगे—“मैं निश्चित रूपसे वासुदेवका हूँ। मेरा यह शरीर वासुदेवका है। दत्त मुझे जहाँ बेचता है, मैं वहीं बिक जाता हूँ। यही सत्य है, सत्य है, इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं है। हे वैष्णव मण्डली! सुनिये, मैं सत्य कह रहा हूँ कि मेरा यह शरीर केवल वासुदेवका है।” इनके ही अनुगृहीत श्रीरघुनाथदास गोस्वामीके दीक्षा गुरु श्रीयदुनन्दन आचार्य थे (चैःचः अन्त्यलीला, 6/161)। इनमें प्रचुर धन व्यय करनेकी प्रवृत्तिको देखकर महाप्रभुने श्रीशिवानन्द सेनको इनका 'सरखेल' (प्रबन्धक) बनाकर व्ययके समाधानके लिये आदेश दिया (चैःचः मध्यलीला, 15/93-96)। जीवोंके दुःखोंको देखकर महाप्रभुसे इनकी प्रार्थनाके लिये (चैःचः मध्यलीला, 15/159-180) द्रष्टव्य है॥ 41 ॥ जगते यतेक जीव, तार पाप लञा। नरक भुञ्जिते चाहे जीव छाड़ाइया॥ 42 ॥ अनुवाद—(वासुदेव दत्तने महाप्रभुसे प्रार्थना की)— “जगत्के समस्त लोगोंके पापोंको लेकर मैं स्वयं नरक भोग करूँ और वे सब पाप-बन्धनसे मुक्त होकर सुखको प्राप्त करें॥” 42 ॥ (20) नामाचार्य ठाकुर हरिदासकी गुणराशि और उनकी शाखा :- हरिदास ठाकुर—शाखार अद्भुत चरित। तिनलक्ष नाम तेंहो लयेन अप्रतित॥ 43 ॥ ताँहार अनन्त गुण,—करि दिङ्मात्र। आचार्य गोसाञि याँरे भुआय श्राद्धपात्र॥ 44 ॥ प्रह्लाद-समान ताँर गुणेर तरङ्ग। यवन-ताड़नेओ याँर नाहिक भ्रूभङ्ग॥ 45 ॥ तेंहो सिद्धि पाइले ताँर देह लञा कोले। नाचिल चैतन्यप्रभु महाकुतूहले॥ 46 ॥ ताँर लीला वर्णियाछेन वृन्दावनदास। येबा अवशिष्ट, आगे करिब प्रकाश॥ 47 ॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुर नामक शाखाका अद्भुत चरित्र है। वे नित्य ही नियमपूर्वक तीन लाख नाम करते थे। इनके अनन्त गुण हैं, किन्तु मैं उनका केवल दिग्दर्शन करा रहा हूँ। श्रीअद्वैताचार्यने सर्वप्रथम इन्हें अपने पिताके श्राद्धपात्रका अन्न भोजन कराया। इनमें प्रह्लादके समान गुण हैं, यवनोंके द्वारा अत्याचार किये जानेपर भी इनकी भृकुटि जरा भी टेढ़ी नहीं हुई। इनके तिरोभावपर महाप्रभुने स्वयं इनकी चिन्मय देहको गोदमें लेकर महा-आनन्द सहित नृत्य किया था। श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने इनकी लीलाओंका वर्णन अपने ग्रन्थ श्रीचैतन्यभागवतमें किया है। जो कुछ शेष रह गया है, उसका आगे विस्तारपूर्वक वर्णन करूँगा॥ 43-47 ॥ दसवाँ अध्याय | 53

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अमृतप्रवाह भाष्य—'अपतित' अर्थात् विधिभङ्ग किये बिना॥ 43 ॥ अनुभाष्य—(चैःभाः आदिखण्ड, द्वितीय अध्याय)— “बूढ़ने हइला अवतीर्ण हरिदास॥” 37॥ (चैःभाः आदिखण्ड, सोलहवाँ अध्याय)— “कतदिन थाकि' आइला गङ्गातीरे। आसिया रहिल फुलियाय शान्तिपुरे॥” 19॥ “इनका आविर्भाव 'बूढ़ने' ग्राममें हुआ था। कुछ समयके बाद वे शान्तिपुरमें गङ्गातटपर फुलिया ग्राममें रहने लगे।” यवनोंके द्वारा अत्याचारका प्रसङ्ग (चैःभाः आदिखण्ड 16वें अध्याय) में वर्णित है। श्रीहरिदासकी दैन्योक्ति और महाप्रभुकी कृपा (चैःभाः मध्यखण्ड, 10वाँ अध्याय); द्वार-द्वारपर नाम प्रचार (चैःचः मध्यलीला, 13वाँ अध्याय); चन्द्रशेखर-भवनमें अभिनयके समय श्रीहरिदासका कोतवालवेष (चैःभाः मध्यखण्ड, 18वाँ अध्याय); बेनोपोलमें हरिनाम-भजन और परीक्षा (चैःचः अन्त्यलीला, 3रा अध्याय) और श्रीहरिदास ठाकुरका निर्याण—(चैःचः अन्त्यलीला, 11वाँ अध्याय) द्रष्टव्य हैं॥ 43-47 ॥ (20क) हरिदास-शिष्य सत्यराज खाँ (बसु) आदि :- ताँर उपशाखा,—यत कुलीनग्रामी जन। सत्यराज आदि—ताँर कृपार भाजन॥ 48 ॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरकी एक उपशाखा सभी कुलीन ग्रामके निवासी हैं, जिनमें सत्यराज खान आदि उनके कृपाके विशेष पात्र हैं॥ 48॥ अनुभाष्य—सत्यराज खान कुलीन ग्रामके गुणराज खानके पुत्र और रामानन्द बसुके पिता हैं। एक समय श्रीहरिदास ठाकुरने चातुर्मास्यके समय कुलीन ग्राममें रहकर भजन किया था और बसु-वंशजनोंको कृपा प्रदान की थी। कुलीन ग्रामवासियोंको श्रीमन्महाप्रभुने प्रतिवर्ष रथयात्राके समय श्रीजगन्नाथदेवके लिये रेशमी डोरी लानेके लिये आदेश दिया था (चैःचः मध्यलीला, 14वाँ अध्याय)। इन्होंने श्रीमन्महाप्रभुसे गृहस्थ-भक्तोंके कर्त्तव्यके विषयमें जिज्ञासा की और उनसे वैष्णव (कनिष्ठ), वैष्णवतर (मध्यम) और वैष्णवतम (उत्तम) के अधिकार-तारतम्य और उनके लक्षणोंका श्रवण किया था (चैःचः मध्यलीला 15/102-109, 16/67-75 संख्या द्रष्टव्य है)। इनकी भजनस्थलीपर आज भी श्रीमन्महाप्रभुका विग्रह विराजमान है। कुलीनग्रामके माहात्म्यके सम्बन्धमें महाप्रभुकी उक्तिके लिये चैःचः आदिलीला 10/82-83, मध्यलीला 10/100-101 संख्या द्रष्टव्य है॥ 48॥ (21) श्रीमुरारि गुप्त-महिमा और शाखा :- श्रीमुरारि गुप्त-शाखा—प्रेमेर भाण्डार। प्रभुर हृदय द्रवे शुनि' दैन्य याँर॥ 49 ॥ प्रतिग्रह नाहि करे, ना लय कार धन। आत्मवृत्ति करि' करे कुटुम्ब भरण॥ 50 ॥ चिकित्सा करेन यारे हइया सदय। देहरोग, भवरोग,—दुइ तार क्षय॥ 51 ॥ अनुवाद—श्रीमुरारी गुप्त नामक शाखा प्रेमका भण्डार है। इनकी दीनताको सुनकर महाप्रभुका हृदय द्रवित हो जाता था। वे किसीसे भी दान ग्रहण नहीं करते थे और न ही किसीसे धन लेते थे। केवल चिकित्सा व्यवसायसे अपने कुटुम्बका पालन करते। वे दयापूर्वक जिसकी भी चिकित्सा करते, उसका शरीरका रोग और भवरोग (संसार-बन्धन) दोनों ही दूर हो जाते थे॥ 49-51 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'आत्मवृत्ति'—स्व-वर्णवृत्ति, श्रीमुरारीगुप्तका व्यवसाय कविराजी (चिकित्सा) था॥ 50॥ अनुभाष्य—श्रीमुरारीगुप्त 'श्रीचैतन्यचरित' ग्रन्थके लेखक हैं। इनका जन्म श्रीहट्टके वैद्यवंशमें हुआ था और बादमें ये नवद्वीपमें आकर रहने लगे। वे आयुमें महाप्रभुसे बड़े थे। इनके घरमें महाप्रभुने अपना वराह रूप दिखाया था (चैःभाः मध्यखण्ड, तीसरा अध्याय) और महाप्रकाशके समय महाप्रभुने इन्हें श्रीरामरूपके

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10/49-53 ] दर्शन कराये थे (चैःभाः मध्यखण्ड, दसवाँ अध्याय)। श्रीवासके घरमें श्रीनित्यानन्द प्रभुके साथ बैठे हुए श्रीगौरसुन्दरको देखकर इन्होंने सर्वप्रथम श्रीगौरको प्रणाम निवेदन किया और तत्पश्चात् श्रीनित्यानन्द प्रभुको दण्डवत् किया। यह देखकर महाप्रभुने मुरारीगुप्तसे कहा- “तुमने व्यवहारका व्यतिक्रम करके नमस्कार किया है" और महाप्रभुने रातमें स्वप्नमें इनको श्रीनित्यानन्द-तत्त्वकी महिमा बतलायी। तब अगले दिन प्रातःकाल इन्होंने पहले श्रीनित्यानन्द प्रभुके और उसके बाद महाप्रभुके चरणोंकी वन्दना की। यह देखकर महाप्रभुने प्रसन्न होकर अपना चर्वित ताम्बुल इन्हें प्रदान किया। एक दिन इन्होंने महाप्रभुको अधिक घीमें निर्मित अन्न खिलाया। अधिक मात्रामें अन्न खाकर महाप्रभुको अगले दिन अपच हो गया और चिकित्साके लिये वे इनके पास आये। 'मुरारीके जलपात्रका जल ही उसकी औषधि है', यह कहकर इन्होंने महाप्रभुको जल पीनेके लिये दिया, जिससे महाप्रभु स्वस्थ हो गये। एक दिन श्रीवास-भवनमें महाप्रभुने चतुर्भुज रूप धारण किया, तब इन्होंने गरुड़ भावका प्रदर्शन करते हुए महाप्रभुको अपने कन्धोंपर चढ़ाया। 'महाप्रभुके अप्रकटका विरह असहनीय होगा', ऐसा सोचकर महाप्रभुके प्रकटकालमें ही इन्होंने देहत्यागका सङ्कल्प किया और अन्तर्यामी महाप्रभुने उनके सङ्कल्पका निवारण किया (चैःभाः मध्यखण्ड, 20वाँ अः)। एक दिन इनके घरपर महाप्रभुने भावावेशमें अपनी वराह-मूर्ति प्रकट की और उसे देखकर इन्होंने उनकी स्तुति की (चैःभाः मध्यखण्ड, 3रा अः)। इनकी दैन्योक्ति (चैःचः मध्यलीला 11/152-158) और इनकी श्रीरामनिष्ठा (चैःचः मध्यलीला 15/137-157 द्रष्टव्य है) ॥ 49 ॥ (22) श्रीमान् सेन :- श्रीमान् सेन प्रभुर सेवक प्रधान। चैतन्य-चरण बिनु नाहि जाने आन ॥ 52 ॥ अनुवाद-श्रीमान् सेन महाप्रभुके एक और प्रधान सेवक हैं, जो श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणकमलोंके अतिरिक्त और कुछ नहीं जानते हैं॥ 52 ॥ अनुभाष्य-श्रीमान् सेन नवद्वीपवासी और महाप्रभुके सङ्गी थे॥ 52 ॥ (23) श्रीगदाधरदास-शाखा :- श्रीगदाधरदास-शाखा सर्वोपरि। काजीगणेर मुखे येंह बोलाइल हरि ॥ 53 ॥ अनुवाद-श्रीगदाधरदास नामक शाखा सर्वप्रधान है। इन्होंने काजीके मुखसे भी हरिनाम उच्चारण कराया था॥ 53 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीगदाधरदास ऐँड़ियादहवासी थे ॥ 53 ॥ अनुभाष्य-कोलकातासे चार कोस उत्तरमें 'ऐँड़ियादह' ग्राम है। श्रीगदाधरदास महाप्रभुके अप्रकट होनेके पश्चात् नवद्वीपसे कटोआमें आ गये (भक्तिरत्नाकर 7वीं तरङ्ग) और उसके बाद ऐँड़ियादह ग्राममें रहने लगे। जिस प्रकार श्रीगदाधर पण्डित श्रीमती वृषभानुनन्दिनीरूपा हैं, श्रीगदाधरदास भी उसी प्रकार ही श्रीमतीकी अङ्गशोभा हैं। ये 'श्रीराधाभावद्युति-सुवलित' श्रीगौराङ्गकी द्युति स्वरूप हैं। श्रीगौरगणोद्देश-दीपिकामें इन्हें श्रीवृषभानुनन्दिनीकी विभूतिरूप कहकर निर्देश किया है। इनकी श्रीगौर और श्रीनित्यानन्द, दोनोंके परिकरोंमें गणना होती है। श्रीगौराङ्ग महाप्रभुके जन सभी व्रजके मधुररसके रसिक हैं और श्रीनित्यानन्द प्रभुके जन शुद्ध-भक्ति प्रधान सख्यादि रसके रसिक हैं। श्रीगदाधर दास श्रीनित्यानन्दके जन होते हुए भी सख्यभाव गोपाल न होकर मधुर रसिक हैं। कटोआमें इनके पास श्रीगौरसुन्दरका अर्चा-विग्रह था। 1434 शकाब्दमें जब श्रीनित्यानन्द प्रभु महाप्रभुके अनुरोधपर भक्ति-प्रचारके लिये नीलाचलसे गौड़देश गये, तब श्रीगदाधर दास उनके प्रचार कार्यमें एक प्रधान दसवाँ अध्याय | 55

[ 10/53-55 सहायक बने (चैःचः आदिलीला 11/13-14)। ये सबको हरिनाम करनेका उपदेश देते थे, किन्तु वहाँका काजी कीर्तन-विरोधी था। एक दिन रातके समय कीर्तन करते-करते ये काजीके घर उसके उद्धारके उद्देश्यसे जा पहुँचे और उससे हरिनामका उच्चारण करनेके लिये अनुरोध करने लगे। यह सुनकर काजी कहने लगा—“मैं कल हरि बोलूँगा।” ऐसा सुनकर श्रीगदाधरदास प्रेमसुखपूर्ण होकर बोले-“कल क्यों? अभी तो तुमने अपने मुखसे हरि कहा है।” (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 154-155वें श्लोकमें)— “राधाविभूतिरूपा या चन्द्रकान्तिः पुरा व्रजे। सः श्रीगौराङ्ग-निकटे दासवंशयो-गदाधरः ॥ 154 ॥ पूर्णानन्दा सद्य व्रजे यासीत् बलदेवप्रियाग्रणीः। सापि कार्यवशादेव प्राविशत्तं गदाधरम् ॥ ”155 ॥ “जो पहले राधिकाकी विभूति स्वरूपा अर्थात् श्रीमतीकी अङ्गशोभा चन्द्रकान्ति थीं, वे अब श्रीगौराङ्गके निकट दासवंशके गदाधर अर्थात् श्रीगदाधर दास हैं। व्रजमें श्रीबलरामकी प्रियाओंमें श्रेष्ठ पूर्णानन्दा भी किसी कारणवश इन्हीं श्रीगदाधर दासमें प्रविष्ट हुई हैं।” नीलाचलसे गौड़देश आते हुए श्रीनित्यानन्द प्रभुने देखा कि श्रीगदाधरदास श्रीराधाभावमें जोरसे अट्टहास करते हुए स्वयंको दही बेचनेवाली समझकर अपना बाहिरी परिचय भूल गये। कभी ये गोपीभावमें विभोर होकर गङ्गाजलसे भरे घड़ेको सिरपर लेकर दूध बेचने लगते। (चैःभाः अन्त्यखण्ड 5वाँ अः)—श्रीमन्महाप्रभु गौड़देशसे वृन्दावन जाते हुए जब पाणिहाटीमें श्रीराघव-भवनमें आये थे— “राघव-मन्दिरे शुनि’ श्रीगौरसुन्दर। गदाधरदास धाइ’ आइला सत्वर ॥ 92 ॥ प्रभुओ देखिया गदाधर सुकृतिरे। श्रीचरण तुलिया दिलेन ताँर शिरे ॥ ”94 ॥ “तब उनके आगमनका समाचार सुनकर श्रीगदाधर दास भागकर वहाँ पहुँचे। महाप्रभुने इनकी सुकृतिको देखकर अपने चरणकमल इनके मस्तकपर स्थापित किये थे।” ऐँड़ियादहमें इनके घरमें इनके प्रकटकालमें ‘बाल-गोपाल’ की मूर्ति थी। श्रीमाधव घोषने गोपाल-विग्रहके सामने श्रीनित्यानन्द प्रभु और श्रीदास गदाधरके साथ ‘दानखण्ड’ (दानकेलि-लीलाके) अभिनयके द्वारा नृत्य किया था (चैःभाः अन्त्यखण्ड 5/378)। श्रीगदाधरके तिरोभावके पश्चात् उनको उसी गाँवमें समाधि दी गयी। यह समाधि संयोगि-वैष्णवोंके अधिकारमें थी। कालनाके सिद्ध श्रीभगवान् दास बाबाजीने कोलकाताके नारिकेलडाङ्गाके निवासी मधुसूदन मल्लिकके द्वारा सिंहासन-भवन स्थापित करवाकर 1256 सालमें ‘श्रीराधाकान्त’की विग्रह-सेवाकी व्यवस्था की और उनके पुत्र बलाइ मल्लिकने 1312 सालमें ‘श्रीगौर-नित्यानन्द’की एक सेवा प्रतिष्ठित की। मन्दिरके सिंहासनपर श्रीगौर-नित्यानन्द-विग्रह और श्रीराधाकृष्णकी मूर्ति विराजमान है, सिंहासनके नीचे एक संस्कृत श्लोक खुदा है। एक गोपेश्वर शिवलिङ्ग भी वहाँ प्रतिष्ठित है। मन्दिरके द्वारके पास एक पत्थरके पटलपर उपरोक्त कथा खुदी है। वैष्णव- मञ्जूषा-समाहृति (प्रथम संख्या) द्रष्टव्य है॥ 53 ॥ (24) श्रीशिवानन्द सेन-शाखा :— शिवानन्द सेन—प्रभुर भृत्य अन्तरङ्ग। प्रभुस्थाने याइते सबे लयेन याँर सङ्ग ॥ 54 ॥ प्रति वर्षे प्रभुर गण सङ्गेते लइया। नीलाचले चलेन पथे पालन करिया ॥ 55 ॥ अनुवाद—श्रीशिवानन्दसेन महाप्रभुके अन्तरङ्ग सेवक हैं। ये महाप्रभुसे मिलनेके लिये उनके स्थान नीलाचल सब भक्तोंको साथ लेकर जाते थे। प्रत्येक वर्ष भक्तोंको साथ लेकर गौड़देशसे नीलाचल जाते समय मार्गमें उन सबके भोजन-निवासादिका प्रबन्ध अपने धनके द्वारा करते थे ॥ 54-55 ॥ 56 | श्रीचैतन्यचरितामृत

10/56-60 ] महाप्रभुकी तीन रूपोंमें अवतीर्ण होकर कृपा :- भक्ते कृपा करेन प्रभु ए तिन स्वरूपे। 'साक्षात्', 'आवेश' आर 'आविर्भाव'-रूपे॥ ५६॥ अनुवाद—भगवान् तीन स्वरूपोंसे अपने भक्तोंपर कृपा करते हैं, 'साक्षात्' रूपसे, 'आवेश' रूपसे और 'आविर्भाव' रूपसे॥ ५६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—सभी भक्तोंके समक्ष एक रूपका दर्शन देकर भगवान् 'साक्षात्' कृपा करते हैं, किन्तु श्रीनकुल ब्रह्मचारीकी देहमें समय-समयपर आविष्ट होते हैं; प्रद्युम्न ब्रह्मचारीकी देहमें श्रीचैतन्यका आविर्भाव होता है॥ ५६॥ अनुभाष्य—'साक्षात्'—स्वयंरूप श्रीगौरसुन्दर; 'आवेश'—नकुल और प्रद्युम्न ब्रह्मचारीमें। 'आविर्भाव'—(चैःचः अन्त्यलीला 2/34-35)— “शचीर मन्दिरे आर नित्यानन्द-नर्त्तने। श्रीवास-कीर्त्तने, आर राघव-भवने॥ एइ चारि ठाँइ प्रभुर सदा 'आविर्भाव'। प्रेमाविष्ट हय प्रभुर सहज स्वभाव॥” “शची माताके गृहके मन्दिरमें, जहाँ श्रीनित्यानन्द प्रभु नृत्य करते हैं, श्रीवास पण्डितके गृहमें सङ्कीर्त्तनमें और श्रीराघव पण्डितके गृहमें श्रीगौरसुन्दरका सदा आविर्भाव होता है।” (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 73-74वें श्लोकोंमें)— “आविर्भावो गौरहरेर्नकुल-ब्रह्मचारिणि॥ 73(ख)॥ आवेशश्च तथा ज्ञेयो मिश्रे प्रद्युम्नसञ्ज्ञके॥ 74(क)॥ “श्रीनकुल ब्रह्मचारीमें श्रीगौरहरिका आविर्भाव और श्रीप्रद्युम्न मिश्रमें उनका आवेश जानना चाहिये॥” 56॥ 'साक्षाते' सकल भक्ते देखे निर्विशेष। नकुल ब्रह्मचारी-देहे प्रभुर 'आवेश'॥ ५७॥ अनुवाद—सभी भक्त अपने समक्ष प्रकट महाप्रभुको जब देखते हैं, तब उसे 'साक्षात्' कहा जाता है। नकुल ब्रह्मचारीके शरीरमें महाप्रभुकी शक्ति-विशेष सञ्चारित होनेपर उसे 'आवेश' कहते हैं॥ ५७॥ अनुभाष्य—प्रत्यक्ष रूपसे सभी भक्तोंको परस्पर वैशिष्ट्य-विहीन अर्थात् एक ही प्रकारके सेवक अथवा अभिन्न रूपमें देखा जाता है, किन्तु नकुल ब्रह्मचारीमें महाप्रभुका आवेश होनेपर उनको श्रीगौरसुन्दरके समान, अन्य सभी भक्तोंसे अधिक अलौकिक ईश्वर-चेष्टायुक्त श्रीकृष्णप्रेममय-रूपमें श्रीशिवानन्द सेन आदि भक्तोंने दर्शन किया। नकुल ब्रह्मचारीका पूर्व निवास कालनाके निकट 'पियारीगञ्ज' नामक पल्लीमें था। चैःचः अन्त्यलीला 2/3-83 संख्यामें इस प्रसङ्गका उल्लेख है॥ ५७॥ 'प्रद्युम्न ब्रह्मचारी' ताँर आगे नाम छिल। 'नृसिंहानन्द' नाम प्रभु पाछे त' राखिल॥ ५८॥ अनुवाद—पहले उनका नाम श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारी था, परन्तु बादमें महाप्रभुने उनका नाम 'नृसिंहानन्द' रख दिया॥ ५८॥ अनुभाष्य—चैःचः आदिलीला 10/35 और चैःभाः अन्त्यखण्ड 3रा तथा 8वाँ अध्याय द्रष्टव्य है॥ ५८॥ ताँहाते हइल चैतन्येर 'आविर्भाव'। अलौकिक ऐछे प्रभुर अनेक स्वभाव॥ ५९॥ अनुवाद—इनकी देहमें श्रीचैतन्यदेवके आविर्भावके लक्षण दिखलायी देते थे। महाप्रभु इस प्रकार अनेक अलौकिक लीलाएँ करते हैं॥ ५९॥ आस्वादिल एसब रस सेन शिवानन्द। विस्तारि' कहिब आगे एसब आनन्द॥ ६०॥ अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेनने इन सभी रसों (साक्षात्, आवेश और आविर्भाव) का आस्वादन किया। इन सब आनन्दमयी लीलाओंका आगे विस्तारपूर्वक वर्णन करूँगा॥ ६०॥ दसवाँ अध्याय | 57

[ 10/61 (24क) शिवानन्दके पुत्र-सेवकादि-शाखा :- शिवानन्देर उपशाखा—ताँर परिकर। पुत्र-भृत्य-आदि करि' चैतन्य-किङ्कर ॥ 61 ॥ अनुवाद—श्रीशिवानन्दकी उपशाखा उनके परिकर हैं। इनके पुत्र-सेवकादि सभी श्रीचैतन्यदेवके दास हैं॥ 61 ॥ अनुभाष्य—श्रीशिवानन्दसेन कुमारहट्ट या हालिसहरके निवासी और महाप्रभुके भक्त थे। वहाँसे डेढ़ मील दूर काँचड़ापाड़ामें इनके द्वारा प्रतिष्ठित श्रीगौरगोपालके विग्रह हैं और ये श्रीकृष्णरायके मन्दिरमें अभी वर्तमान हैं। इनके पुत्र श्रीपरमानन्द (पुरीदास) ने श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका (176 श्लोक) में लिखा है— “पुरा वृन्दावने वीरादूती सर्वाश्च गोपिकाः। निनाय कृष्णनिकटं सेदानीं जनको मम।” “पहले जो वृन्दावनमें गोपियोंको श्रीकृष्णके निकट ले जाती थीं, वे वीरा दूती ही अब मेरे पिता श्रीशिवानन्द हैं।” ये प्रतिवर्ष गौड़देशसे भक्तोंका पथप्रदर्शन करके यातायातका सारा व्यय स्वयं वहन करते हुए और उनके रहनेकी व्यवस्था करते हुए उन्हें महाप्रभुके पास नीलाचल ले जाते थे (चैःचः मध्यलीला 16/19-26)। इनके तीन पुत्र—श्रीचैतन्यदास, श्रीरामदास और श्रीपरमानन्द (कविकर्णपूर) थे। कविकर्णपूरके दीक्षा गुरुदेव (इनके गुरु-पुरोहित) श्रीनाथ पण्डितके सम्बन्धमें इसी अध्यायकी 107 संख्या द्रष्टव्य है। वासुदेव दत्तकी अधिक व्यय करनेकी प्रवृत्तिको देखकर महाप्रभुने इनको उनका सरखेल (प्रबन्धक) के रूपमें बने रहनेके लिये आदेश दिया था (चैःचः मध्यलीला 15/93-97)। महाप्रभु ‘साक्षात्’, ‘आवेश’ और ‘आविर्भाव’—इन तीन उपायोंसे अपने भक्तोंपर कृपा करते हैं, इन तीनों रसोंको श्रीशिवानन्दसेनने परीक्षा करके आस्वादन किया (चैःचः अन्त्यलीला, 2रा अः)। इनके श्रीगौरचरण-दर्शन पिपासु कुत्तेका विवरण चैःचः अन्त्यलीलाके प्रथम अध्यायमें वर्णित है। श्रीरघुनाथदास गोस्वामी जब गृह त्यागकर महाप्रभुके दर्शनके लिये नीलाचलमें भागकर आ गये थे, तब उनके पिता श्रीगोवर्धन मजूमदारने अपने पुत्रके कुशल-मङ्गलका संवाद जाननेके लिये पत्र भेजा। इनसे श्रीरघुनाथका समाचार पाकर प्रति वर्ष इनके द्वारा वे अपने पुत्रकी सुख-सुविधाके लिये रसोइया, सेवक और बहुतसा धन नीलाचल भिजवाते थे (चैःचः अन्त्यलीला 6/245-267)। एक बार नीलाचलमें इन्होंने महाप्रभुको निमन्त्रितकर गरिष्ठ (कठिनतासे पचनेवाला भारी) भोजन खिलाया, जिस कारण महाप्रभुका चित्त प्रसन्न नहीं हुआ। अगले दिन इनके पुत्र श्रीचैतन्यदासने महाप्रभुको पाचक औषधि देकर उनके सन्तोषका विधान किया (चैःचः अन्त्यलीला 10/124-151)। एक बार नीलाचल जाते हुए घाटका ‘कर’ आदि देनेमें इनके व्यस्त हो जानेसे श्रीनित्यानन्द प्रभु और अन्य भक्तोंको गङ्गा पार करनेके उपरान्त ठहरनेका स्थान न मिलनेके कारण वहीं पासमें स्थित गाँवके एक वृक्षके नीचे रहना पड़ा। श्रीनित्यानन्द प्रभुने भूखसे पीड़ित और क्रोधित होनेका अभिनय करते हुए अभिशाप दिया—“शिवानन्दके तीनों पुत्र मर जाँय।” यह सुनकर इनकी पत्नी अमङ्गलकी आशङ्काकर विलाप करने लगी। इन्होंने घाटसे लौटकर जब सारा वृत्तान्त सुना, तो वे अपने अपूर्व भाग्यकी प्रशंसा करते हुए श्रीनित्यानन्द प्रभुके पास आये और उनसे लात खानेका सौभाग्य प्राप्त किया। इनके भाज्जे श्रीकान्त यह देखकर अभिमानी होकर अकेले ही महाप्रभुके पास पहुँचे। अन्तर्यामी महाप्रभु सब जान गये और उन्हें क्षमाकर सान्त्वना प्रदान की। उसी यात्राके समय ही महाप्रभुने इनके छोटे पुत्र श्रीपुरीदासके मुखमें अपने पाँवका अंगूठा दिया, तब वे मौन रहे, परन्तु बादमें किसी दिन महाप्रभुकी आज्ञासे उन्होंने श्लोककी रचना 58 | श्रीचैतन्यचरितामृत

10/61–64 ] की (चैःचः अन्त्यलीला, 13/15-74)। उसी समय महाप्रभुने गोविन्दको आज्ञा दी— “शिवानन्देर प्रकृति, पुत्र यावत् हेथाय। आमार अवशेष-पात्र तारा येन पाय॥” “शिवानन्दसेन और उनके स्त्री-पुत्र जब तक यहाँ रहें, मेरा उच्छिष्ट भोजन उनको प्रतिदिन प्रदान करना (चैःचः अन्त्यलीला, 12/15-53)॥61॥ उनके तीन पुत्र :— चैतन्यदास, रामदास, आर कर्णपूर। तिन पुत्र शिवानन्देर प्रभुर भक्तशूर॥62॥ अनुवाद—श्रीशिवानन्दके तीन पुत्र—श्रीचैतन्यदास, श्रीरामदास और श्रीपरमानन्द महाप्रभुके भक्तोंमें प्रधान हैं॥62॥ अनुभाष्य—'श्रीचैतन्यदास'—शिवानन्दके ज्येष्ठ पुत्र हैं। इनके द्वारा रचित 'श्रीकृष्णकर्णामृत' की टीका सहित श्रील भक्तिविनोद ठाकुरका अनुवाद 'श्रीसज्जनतोषणी' पत्रिकामें प्रकाशित हुआ है। जानकार व्यक्तियोंके अनुसार ये ही संस्कृत भाषामें रचित महाकाव्य 'श्रीचैतन्यचरित' के प्रणेता हैं, कविकर्णपूर नहीं। 'श्रीरामदास'—शिवानन्दसेनके मंझले पुत्र हैं। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 145वाँ श्लोक)— “वृन्दावने यौ विख्यातौ शुकौ दक्ष-विचक्षणौ। तावद्य जातौ मज्ज्येष्ठौ चैतन्य-रामदासकौ॥” 145॥ “वृन्दावनके दक्ष और विचक्षण नामक दो शुकपक्षी अब मेरे ज्येष्ठ भ्राता श्रीचैतन्य और श्रीरामदास हुए हैं।” 'कर्णपूर'—परमानन्ददास अथवा पुरीदास अथवा कविकर्णपूर। ये श्रीअद्वैतशाखामें श्रीनाथ पण्डितके शिष्य हैं। इन्होंने 'आनन्दवृन्दावन'-चम्पू, 'अलङ्कार-कौस्तुभ', 'श्रीचैतन्यचरित' (?) महाकाव्य, 'श्रीचैतन्य-चन्द्रोदय'-नाटक, 'श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका' आदि ग्रन्थोंकी रचना की है। इनका जन्म 1448 शकाब्दमें हुआ था और इन्होंने 1498 शकाब्द तक ग्रन्थोंकी रचना की थी॥62॥ (24ख) शिवानन्दसेनके दो भाञ्जे :— श्रीवल्लभसेन, आर सेन श्रीकान्त। शिवानन्द-सम्बन्धे प्रभुर भक्त एकान्त॥63॥ अनुवाद—श्रीवल्लभसेन और श्रीकान्तसेन, श्रीशिवानन्दके सम्बन्धसे महाप्रभुके एकान्त भक्त हैं॥63॥ अनुभाष्य—'श्रीवल्लभसेन और श्रीकान्तसेन'— श्रीशिवानन्दके भाञ्जे थे। पुरी आते हुए अपने मामा श्रीशिवानन्दको श्रीनित्यानन्द प्रभुकी गाली, शाप और लात खाते देखकर वे सहन नहीं कर सके और उस दलको त्यागकर पहले ही महाप्रभुके पास पहुँचे। सर्वज्ञ महाप्रभुने यह पहले ही जान लिया था और उसका समाधान किया। महाप्रभुने उनके नीलाचलमें वास करनेके समय तक सेवक गोविन्दको उन्हें अपना महाप्रसाद देनेकी अनुमति दी। रथ-यात्राके समय सात सम्प्रदायोंमेंसे श्रीमुकुन्द दत्तके सम्प्रदायमें ये दोनों भाई कीर्तनीया थे (चैःचः मध्यलीला, 13/41)। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 174वाँ श्लोक)— “व्रजे कात्यायनी यासीदद्य श्रीकान्तसेनकः॥” 174॥ “व्रजकी कात्यायनी अब श्रीकान्तसेन हैं॥” 63॥ (25) श्रीगोविन्दानन्द और (26) श्रीगोविन्द दत्त :— प्रभुप्रिय गोविन्दानन्द—महाभागवत। प्रभुर कीर्त्तनीया आदि—श्रीगोविन्द दत्त॥64॥ अनुवाद—महाभागवत श्रीगोविन्दानन्द महाप्रभुके प्रिय हैं और श्रीगोविन्ददत्त महाप्रभुके मूल कीर्तनीया हैं॥64॥ अनुभाष्य—'श्रीगोविन्दानन्द'—प्रथम कीर्तनके समय महाप्रभुके कीर्तनके सङ्गी थे। श्रीधरके घर जलपानके दिन इन्होंने क्रन्दन किया था। रथयात्राके समय ये श्रीजगन्नाथ पुरी जाते थे। 'श्रीगोविन्ददत्त'—नवद्वीपमें महाप्रभुके कीर्तनके सङ्गी थे, मूल गायक होकर महाप्रभुके सङ्गमें दसवाँ अध्याय | 59

[ 10/64-69

कीर्तन करते थे (चैःभाः अन्त्यखण्ड 9वाँ अः) — “मूल हजा ये कीर्तन करे प्रभुसने।” इनका घर खड़दहके दक्षिण सीमापर स्थित 'सुखचर' ग्राममें था ॥ 64 ॥

(27) श्रीविजयदास और (28) अकिञ्चन कृष्णदास :— श्रीविजयदास-नाम प्रभुर आखरिया। प्रभुरे अनेक ग्रन्थ दियाछे लिखिया ॥ 65 ॥ 'रत्नबाहु' बलि' प्रभु थुइल ताँर नाम। अकिञ्चन प्रभुर प्रिय कृष्णदास-नाम ॥ 66 ॥

अनुवाद—श्रीविजयदास महाप्रभुके ग्रन्थ-लेखक थे। इन्होंने महाप्रभुको अनेक ग्रन्थ लिखकर दिये। महाप्रभुने 'रत्नबाहु' कहकर इनको यह नाम प्रदान किया था। अकिञ्चन श्रीकृष्णदास भी महाप्रभुके परमप्रिय हैं ॥ 65-66 ॥

अनुभाष्य—'श्रीविजयदास'—नवद्वीपवासी लिपिकार हैं; ये नवनिधिमें एक मुख्य हैं। इन्होंने महाप्रभुको अनेक ग्रन्थ लिखकर दिये। इसलिये श्रीगौरहरिने इनको 'रत्नबाहु' नाम दिया था। श्रीशुक्लाम्बरके घरमें महाप्रभुने इनपर कृपा की—चैःभाः मध्यखण्ड, 25वाँ अः द्रष्टव्य है। 'अकिञ्चन श्रीकृष्णदास'—नवद्वीपवासी और प्रभुके सङ्गी थे। ये रथयात्रामें श्रीजगन्नाथ पुरी आते थे। चैःभाः अन्त्यखण्ड, 9वाँ अः द्रष्टव्य है ॥ 65-66 ॥

(29) श्रीधरकी गुणराशि :— खोला-बेचा श्रीधर प्रभुर प्रियदास। याँहा-सने प्रभु करे नित्य परिहास ॥ 67 ॥ प्रभु याँर नित्य लय थोड़-मोचा-फल। याँर फुटा-लोहपात्रे प्रभु पिला जल ॥ 68 ॥

अनुवाद—केलेके तनेको बेचने वाले श्रीधर महाप्रभुके प्रिय दास हैं, जिनके साथ महाप्रभु नित्य परिहास करते थे। महाप्रभु उनसे नित्य थोड़-मोचा-फल (केलेके वृक्षका गूदा, फूल, फल) लेते थे और जिनके लोहेके टूटे हुए बरतनमें महाप्रभुने जलपान किया था ॥ 67-68 ॥

अनुभाष्य—'श्रीधर'—नवद्वीपवासी, केलेके बागानमें उत्पन्न वस्तुओंसे ही अपना जीवन चलाने वाले एक दरिद्र ब्राह्मण थे। (चैःभाः आदिखण्ड, 8वें अः) में महाप्रभुकी इनके साथ खींचातानी, (चैःभाः मध्यखण्ड, 9वें अः) में महाप्रभुकी 'सात-पहरिया' भावमें इनके प्रति कृपा और (चैःभाः मध्यखण्ड, 23वें अः) काजीदलनके समय कीर्तन सुनकर श्रीधरके द्वारा नृत्यमें इनके छिद्रयुक्त जीर्ण लोहेके पात्रसे महाप्रभुका परमानन्दसे जल पीना तथा (चैःभाः मध्यखण्ड, 28वें अः)में महाप्रभुके संन्यास ग्रहण करनेकी पूर्व रात्रिमें इनके द्वारा दी हुई लौकी शचीमाताके द्वारा बनवाकर भोजनका प्रसङ्ग द्रष्टव्य हैं। ये रथयात्राके उपलक्ष्यमें पुरुषोत्तम धाममें गये थे। कवि कर्णपूरके मतमें ये बारह गोपालोंमें अन्यतम सखा कुसुमासव गोपाल हैं। श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 133वाँ श्लोक— “खोलाबेचातया ख्यातः पण्डितः श्रीधरो द्विजः। आसीद्व्रजे हास्यकरो यो नाम्ना कुसुमासवः ॥ 133 ॥ “व्रजमें हँसने-हँसानेवाले कुसुमासव नामक सखा अब ब्राह्मणवंशमें उत्पन्न केले बेचनेवाले श्रीधरके नामसे विख्यात हैं”॥ 67 ॥

(30) श्रीभगवान् पण्डित :— प्रभुर अतिप्रिय दास भगवान् पण्डित। याँर देहे कृष्ण पूर्वे हैल अधिष्ठित ॥ 69 ॥

अनुवाद—भगवान् पण्डित महाप्रभुके अतिप्रिय दास हैं। इनके शरीरमें पूर्वकालमें श्रीकृष्णका अधिष्ठान हुआ था ॥ 69 ॥

अनुभाष्य—'भगवान् पण्डित'—चैःभाः अन्त्यखण्ड, 9वाँ अः— “चलिलेन लेखक पण्डित भगवान्। याँर देहे कृष्ण हइयाछिला अधिष्ठान॥”

60 | श्रीचैतन्यचरितामृत

10/69-72 ] “जिनके शरीरमें श्रीकृष्णका अधिष्ठान हुआ था, वे लेखक श्रीभगवान् पण्डित चले॥” ६९॥ (31) श्रीजगदीश पण्डित और (32) हिरण्य :— जगदीश पण्डित, आर हिरण्य महाशय। यारे कृपा कैल बाल्ये प्रभु दयामय॥ ७०॥ एइ दुइ-घरे प्रभु एकादशी-दिने। विष्णुर नैवेद्य मागि' खाइल आपने॥ ७१॥ अनुवाद—जगदीश पण्डित और हिरण्य महाशय, इन दोनोंपर महाप्रभुमें अपने बाल्यकालमें कृपा की थी। इन दोनोंके घर महाप्रभुने एकादशीके दिन विष्णुके नैवेद्यको माँगकर खाया था॥ ७०-७१॥ अनुभाष्य—'जगदीश पण्डित'—श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 192वाँ श्लोक— “अपरे यज्ञपत्न्यौ श्रीजगदीश-हिरण्यकौ। एकादश्यां ययोरन्नं प्रार्थयित्वाऽघसत् प्रभुः॥” 192॥ “अन्य दो यज्ञपत्नियोंने श्रीजगदीश और श्रीहिरण्यक नाम धारणकर जन्म ग्रहण किया है, श्रीमन्महाप्रभुने एकादशीके दिन इन्हींसे अन्न माँगकर भोजन किया था।” (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 143वाँ श्लोक)— “आसीद्व्रजे चन्द्रहासो नर्त्तको रसकोविदः। सोऽयं नृत्यविनोदी श्रीजगदीशाख्य-पण्डितः॥ 143॥ “व्रजके चन्द्रहास नामक विख्यात रसज्ञ नर्त्तक अब नृत्यविनोदी श्रीजगदीश पण्डित हैं।” (चैःचः आदिलीला, 11/30, 14/39 और चैःभाः आदिखण्ड, 4था अः)—एकादशी तिथिपर महाप्रभुके द्वारा हिरण्य-जगदीशके गृहमें स्थित विष्णु भगवान्के नैवेद्यके भोजनका वर्णन है। (चैःभाः अन्त्यखण्ड, 6ठा अः)— “जगदीश पण्डित परम ज्योतिर्धाम। सपार্ষदे नित्यानन्द याँर धनप्राण॥” “जगदीश पण्डित परम ज्योतिके धाम हैं। परिकर सहित श्रीनित्यानन्द प्रभु इनके प्राणधन हैं।” 'हिरण्यपण्डित'—(चैःभाः अन्त्यखण्ड, 5वाँ अः)—नवद्वीपमें हिरण्य पण्डित नामक एक सुब्राह्मणके घरमें श्रीनित्यानन्द प्रभु एक बार बहुमूल्य अलङ्कार पहनकर विराजमान थे। एक डाकुओंके सरदारने उनके श्रीअङ्गसे उन सब अलङ्कारोंको अपहरण करनेकी बार-बार चेष्टा की, परन्तु वह इसमें सफल नहीं हुआ। तब श्रीनित्यानन्द प्रभुकी महिमाको जानकर वह उनके शरणागत हुआ॥ ७०-७१॥ (33) श्रीपुरुषोत्तम और (34) श्रीसञ्जय :— प्रभुर पड़ुया दुइ,—पुरुषोत्तम, सञ्जय। व्याकरणे दुइ शिष्य—दुइ महाशय॥ ७२॥ अनुवाद—महाप्रभुके दो व्याकरणके छात्र पुरुषोत्तम और सञ्जय थे। ये दोनों महान् व्यक्ति हैं॥ ७२॥ अनुभाष्य—'पुरुषोत्तम और सञ्जय'—ये दोनों नवद्वीपके वासी थे; पहले ये महाप्रभुके छात्र थे तथा बादमें वे महाप्रभुके कीर्त्तनके आरम्भसे उनके सङ्गी बने। (चैःभाः आदिखण्ड, 15/5-7)— “अनेक जन्मेरे भृत्य मुकुन्द सञ्जय। पुरुषोत्तम दास हेन (हन) याँहार तनय॥ ५॥ प्रतिदिन सेइ भाग्यवन्तेरे आलय। पड़ाइते गौरचन्द्र करेन विजय॥ ६॥ चण्डीगृहे गिया प्रभु वसेन प्रथमे। तबे शेषे शिष्यगण आइसेन क्रमे॥ ७॥” “मुकुन्द सञ्जय महाप्रभुके अनेक जन्मोंके सेवक हैं और पुरुषोत्तमदास उनके पुत्र हैं। प्रतिदिन महाप्रभु उनके घर पढ़ानेके लिये जाया करते थे। पहले महाप्रभु चण्डीमण्डपमें जाकर विराजमान होते, तब धीरे-धीरे उनके शिष्य वहाँ आते।” (चैःभाः अन्त्यखण्ड 8वाँ अः)— “पुरुषोत्तम सञ्जय चलिला हर्षमने। ये प्रभुर मुख्य शिष्य पूर्व अध्ययने॥” “पहले अध्ययनमें जो महाप्रभुके मुख्य शिष्य थे, वे पुरुषोत्तम सञ्जय हर्षित मनसे चले।” इसलिये श्रीचैतन्यभागवतके वर्णनके अनुसार मुकुन्द-सञ्जयके दसवाँ अध्याय | 61

[ 10/72-76 पुत्र पुरुषोत्तम सञ्जय हैं, किन्तु श्रीकविराज गोस्वामीने 'पुरुषोत्तम' और 'सञ्जय'को अलग-अलग दो व्यक्ति बतलानेके लिये इस पयारमें 'दुइ' शब्दका तीन बार प्रयोग करके श्रीचैतन्यभागवतकी धारणाको शुद्ध किया है॥ 72॥ (35) श्रीवनमाली पण्डित-शाखा :- वनमाली पण्डित शाखा विख्यात जगते। सोनार मुषल हल ये देखिल प्रभुर हाते॥ 73॥ अनुवाद-वनमाली शाखा जगत्में विख्यात है। इन्होंने महाप्रभुके हाथमें सोनेका मूसल और हल देखा था॥ 73॥ अनुभाष्य-'वनमाली पण्डित'- (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 144वाँ श्लोक)— “वेणुञ्च मुरलीं योऽधात्राग्ना मालाधरो व्रजे। सोऽधुना वनमाल्याख्यः पण्डितो गौरवल्लभः॥"144॥ “व्रजमें जो मालाधर नामक दास वेणु और मुरली धारण करते थे, वे अब गौरप्रिय श्रीवनमाली पण्डित हैं।” (चैःचः आदिलीला, 17/119) और (चैःभाः अन्त्यखण्ड 8वाँ अः)— “चलिलेन वनमाली पण्डित मङ्गल। ये देखिल सुवर्णेर श्रीहलमुषल॥” “मङ्गलमय वनमाली पण्डित चले। इन्होंने महाप्रभुके (बलदेवभावमें) उनके हाथोंमें श्रीहल और मूसलके दर्शन किये थे।” (चैःभाः मध्यखण्ड, 5वाँ अः)—परन्तु श्रीवास पण्डितके घरमें जब महाप्रभुने विष्णु सिंहासनपर चढ़कर बलदेवभाव प्रकट करते हुए श्रीनित्यानन्द प्रभुसे हल-मूसल लेकर जिस लीलाका प्रदर्शन किया था, वहाँपर श्रीवनमालीने उस दिन महाप्रभुके हाथोंमें स्वर्णके हल-मूसलको देखा था, ऐसा वर्णन नहीं है॥ 73॥ (36) श्रीबुद्धिमन्त खान :- श्रीचैतन्येर अति प्रिय बुद्धिमन्त खान। आजन्म आज्ञाकारी तैँहो सेवक-प्रधान॥ 74॥ अनुवाद-बुद्धिमन्त खान श्रीचैतन्य महाप्रभुके अति प्रिय हैं, उन्होंने जीवन पर्यन्त उनकी आज्ञाका पालन किया और वे महाप्रभुके सेवकोंमें प्रधान हैं॥ 74॥ अनुभाष्य-'बुद्धिमन्त खान'-ये नवद्वीपके एक धनवान् भक्त थे। इन्होंने राजपण्डित सनातनमिश्रकी कन्या विष्णुप्रियादेवीके साथ महाप्रभुके दूसरे विवाहका समस्त व्यय वहन किया था। महाप्रभुको वायुव्याधि होनेपर इन्होंने चिकित्सा की थी। ये महाप्रभुकी जलक्रीड़ा और कीर्तनके सङ्गी थे। श्रीचन्द्रशेखरके घरपर महाप्रभुके महालक्ष्मीके अभिनयके लिये ये वस्त्र और भूषण लाये थे। ये रथयात्राके समय नीलाचल जाते थे॥ 74॥ (37) श्रीगरुड़ पण्डित :- गरुड़ पण्डित लय श्रीनाम-मङ्गल। नाम-बले विष याँरे ना करिल बल॥ 75॥ अनुवाद-गरुड़ पण्डित सदा मङ्गलमय हरिनाम करते रहते थे। नामके प्रभावसे उनपर सर्पके विषका भी प्रभाव नहीं हुआ था॥ 75॥ अनुभाष्य-'गरुड़ पण्डित'-ये नवद्वीपमें महाप्रभुके सङ्गी थे। (चैःभाः अन्त्यखण्ड आठवाँ अध्याय)— “चलिलेन श्रीगरुड़ पण्डित हरिषे। नामबले याँरे ना लङ्घिल सर्पविषे॥ 34॥” “नामके बलपर जिनपर सर्पविषने भी प्रभाव नहीं दिखाया, वे श्रीगरुड़ पण्डित हर्षसे (रथयात्राके उपलक्ष्यमें नीलाचलकी ओर) चल पड़े।” (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 117वाँ श्लोक)— “गरुड़ः पण्डितः सोऽद्यो गरुड़ो यः पुरा श्रुतः।” “पूर्वकालके गरुड़ ही अब गरुड़ पण्डित हैं॥” 75॥ (38) श्रीगोपीनाथ सिंह :- गोपीनाथ सिंह-एक चैतन्येर दास। अक्रूर बलि' प्रभु याँरे कैला परिहास॥ 76॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुके एक दास श्रीगोपीनाथ सिंह हैं, जिन्हें महाप्रभु परिहासमें अक्रूर कहते थे॥ 76॥ 62 | श्रीचैतन्यचरितामृत

10/76-79 ] अनुभाष्य–'गोपीनाथ सिंह'-(चैःभाः अन्त्यखण्ड आठवाँ अध्याय)– “चलिलेन गोपीनाथ सिंह महाशय। 'अक्रूर' करिया याँरे गौरचन्द्र कय॥35॥” “[रथयात्रामें] गोपीनाथ सिंह महाशयने प्रस्थान किया जिन्हें महाप्रभु 'अक्रूर' कहकर बुलाते थे।” (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 117वाँ श्लोक)– “पुरा योऽक्रूरनामासीत् स गोपीनाथसिंहकः।” “पूर्वकालमें जो अक्रूर थे, वे अब गोपीनाथ सिंह हैं॥” 76॥ (5क) देवानन्द पण्डित शाखा :- भागवती देवानन्द वक्रेश्वर-कृपाते। भागवतेर भक्ति-अर्थ पाइल प्रभु हैते॥77॥ अनुवाद-भागवत वाचक देवानन्द पण्डित श्रीवक्रेश्वरकी कृपासे महाप्रभुके द्वारा भागवतके भक्ति-परक अर्थको जान पाये॥77॥ अनुभाष्य-'देवानन्द'-(चैःभाः मध्यखण्ड, 21वाँ अः)- “सार्वभौम-पिता विशारद महेश्वर। ताँहार जाङ्गाले गेला प्रभु विश्वम्भर॥6॥ सेइखाने देवानन्दपण्डितेर वास।7।” “[एक दिन] भ्रमण करते-करते महाप्रभु विश्वम्भर सार्वभौमके पिता महेश्वर विशारदके घरके सामने पहुँचे। वहाँ बाढ़से घरको बचानेके लिये एक बाँध था। वहीं देवानन्द पण्डित भी रहा करते थे।” (चैःचः मध्यलीला, 1/153)- “कुलिया-ग्रामे कैल देवानन्देर प्रसाद।” “उन्होंने कुलिया ग्राममें देवानन्दपर कृपा की।” (चैःभाः मध्यखण्ड, 21वाँ अः)-ये मोक्षकी अभिलाषासे भागवतका पाठ करते थे। एक दिन इनके पाठको सुनकर भावावेशमें श्रीवास पण्डित रोने लगे। यह देखकर इनके पाषण्डी छात्रोंने श्रीवासको डाँटकर वहाँसे निकाल दिया। इसके बहुत समय बाद, एक दिन महाप्रभुने मार्गमें जाते हुए इन्हें भागवतकी व्याख्या करते देखा, तो उन्होंने क्रोधित होकर वैष्णवमें श्रद्धाहीन देवानन्दकी तीव्र भर्त्सना की। इनका महाप्रभुमें भी विश्वास नहीं था। इनके परम सौभाग्यसे एक बार वक्रेश्वर पण्डितने इनके घरमें रहते हुए श्रीकृष्ण-कीर्तन किया था। तब उनकी कृपासे ये महाप्रभुकी महिमासे अवगत हुए। तब महाप्रभुने इन्हें भविष्यमें भागवतकी भक्ति-परक व्याख्या करनेके लिये कहा। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 106ठा श्लोक)– “पुराणानामर्थवेत्ता श्रीदेवानन्दपण्डितः। पुरासीन्द्रपरिषत्पण्डितो भागुरिर्मुनिः॥” 106॥ “श्रीनन्दकी सभाके पण्डित भागुरि मुनि नामक पुरोहित अब पुराणोंके अर्थज्ञाता श्रीदेवानन्द पण्डित हैं॥” 77॥ श्रीखण्डवासी-(39) मुकुन्द, (39क) रघुनन्दन, (40) नरहरि, (41) चिरञ्जीव, (42) सुलोचन :- खण्डवासी मुकुन्ददास, श्रीरघुनन्दन। नरहरि दास, चिरञ्जीव, सुलोचन॥78॥ एइ सब महाशाखा-चैतन्य-कृपाधाम। प्रेम-फल-फूल करे याँहा ताँहा दान॥79॥ अनुवाद-खण्डवासी मुकुन्ददास, श्रीरघुनन्दन, नरहरि दास, चिरञ्जीव और सुलोचन, ये सब कृपाके धाम श्रीचैतन्य महाप्रभुकी महाशाखा हैं। ये श्रीकृष्णप्रेमके फल-फूलको जहाँ-तहाँ, सर्वत्र ही दान करते थे॥78-79॥ अनुभाष्य-'मुकुन्ददास'-ये नारायणदासके पुत्र और नरहरि सरकार ठाकुरके बड़े भाई थे। इनके मंझले भाईका नाम माधवदास था। रघुनन्दन इनके पुत्र थे। रघुनन्दनकी वंशावली आज भी कटोआसे चार मील पश्चिममें श्रीखण्ड-ग्राममें वास करती है। रघुनन्दनके पुत्र कानाइ और उनके दो पुत्र-मदनराय (नरहरि ठाकुरके शिष्य) एवं वंशीवदन थे। टीका लिखनेके समय इनके वंशके चार सौसे अधिक व्यक्ति जीवित दसवाँ अध्याय | 63

[ 10/78-83 थे। उनकी धारावाहिक वंशप्रणाली श्रीखण्डमें है। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 175वाँ श्लोक)— “व्रजाधिकारिणी यासीद्वृन्दा देवी तु नामतः। सा श्रीमुकुन्ददासोऽद्य खण्डवासः प्रभुप्रियः॥175॥” “व्रजकी अधिकारिणी वृन्दादेवी अब श्रीमन्महाप्रभुके प्रिय खण्डग्राम-वासी श्रीमुकुन्द दास हैं।” इनके अति आश्चर्यमय श्रीकृष्णप्रेमका वर्णन (चैःचः मध्यलीला, 15/113-131)में द्रष्टव्य है। ‘रघुनन्दन’—ये श्रीगौरविग्रहकी सेवा करते थे (भक्तिरत्नाकर आठवीं तरङ्ग)। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 70वाँ श्लोक)— “व्यूहस्तृतीयः प्रद्युम्नः प्रियनर्मोसखोऽभवन्। चक्रे लीलासहायं यो राधा-माधवयोर्व्रजे। श्रीचैतन्याद्वैततनुः स एव रघुनन्दनः॥70॥” “व्रजमें जो श्रीकृष्णके प्रियनर्म सखा होकर श्रीराधा- माधवकी लीलामें सहायता करते थे तथा जो चतुर्व्यूहमें तृतीय श्रीप्रद्युम्न हैं, वे ही अब श्रीचैतन्यकी अभिन्न देह-स्वरूप श्रीरघुनन्दन हैं।” भक्तिरत्नाकर ग्रन्थकी नौवीं तरङ्गमें श्रीखण्डके महोत्सवका विवरण द्रष्टव्य है। ‘नरहरिदास सरकार ठाकुर’—(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 177वाँ श्लोक)— “पुरा मधुमती प्राणसखी वृन्दावने स्थिता। अधुना नरहर्याख्यः सरकारः प्रभोः प्रियः॥177॥ “पहले वृन्दावनमें मधुमती नामक जो प्राणसखी थीं, वे अब महाप्रभुके प्रियपात्र श्रीनरहरि सरकार हैं।” झामटपुरके निकट कोग्रामके निवासी श्रीचैतन्यमङ्गलके प्रणेता श्रीलोचनदास ठाकुर इनके शिष्य हैं। इस ग्रन्थमें श्रीगदाधर और श्रीनरहरिको महाप्रभुका अत्यन्त प्रिय बतलाया गया है। चैतन्यभागवतमें खण्डवासिसियोंका उस प्रकारसे विशेष उल्लेख नहीं मिलता। ‘चिरञ्जीव और सुलोचन’—ये दोनों खण्डवासी थे। उनका स्थान आज भी श्रीखण्डमें देखा जाता है। इनका वंश भी अभी विद्यमान है। चिरञ्जीव सेनके दो पुत्र थे। श्रीनिवासाचार्यके शिष्य और श्रीनरोत्तम ठाकुरके सङ्गी, श्रीरामचन्द्र कविराज इनके ज्येष्ठ पुत्र थे और पदकर्त्ता श्रीगोविन्ददास कविराज इनके कनिष्ठ पुत्र थे। चिरञ्जीवकी पत्नी सुनन्दा और ससुर दामोदर सेन कविराज खण्डवासी थे। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 209वाँ श्लोक)— “खण्डवासौ नरहरेः साहचर्यान्महत्तरौ। गौराङ्गैकान्तशरणौ चिरञ्जीव-सुलोचनौ॥209॥” “खण्डवासी श्रीनरहरिके सङ्ग हेतु श्रीचिरञ्जीव और सुलोचन महत्तर हैं तथा वे श्रीगौराङ्ग महाप्रभुके एकान्त आश्रित हैं॥” 78॥ कुलीनग्रामवासी—(20ख) रामानन्द, (20ग) यदुनाथ, (20घ) पुरुषोत्तम, (20ङ) शङ्कर, (20च) विद्यानन्द :— कुलीनग्रामवासी सत्यराज, रामानन्द। यदुनाथ, पुरुषोत्तम, शङ्कर, विद्यानन्द॥80॥ (20छ) वाणीनाथ बसु आदि कुलीन- ग्रामवासियोंका माहात्म्य :— वाणीनाथ बसु आदि यत ग्रामी जन। सबेइ चैतन्यभृत्य, —चैतन्य-प्राणधन॥81॥ प्रभु कहे, —‘कुलीनग्रामेर ये हय कुक्कुर। सेइ मोर प्रिय, अन्य जन बहु दूर॥82॥ कुलीनग्रामीर भाग्य कहेन ना याय। शूकर चराय डोम, सेइ कृष्ण गाय’॥83॥ अनुवाद—श्रीसत्यराज, श्रीरामानन्द, श्रीयदुनाथ, श्रीपुरुषोत्तम, श्रीशङ्कर, श्रीविद्यानन्द और श्रीवाणीनाथ बसु आदि कुलीनग्रामके वासी हैं। ये श्रीचैतन्य महाप्रभुके सेवक हैं और महाप्रभु इनके प्राणधन हैं। महाप्रभुका कहना है कि औरोंकी बात तो दूर की है, कुलीनग्रामका कुत्ता भी मुझे प्रिय है। कुलीनग्रामवासियोंके भाग्यका वर्णन नहीं किया जा सकता, वहाँके सूअर चरानेवाले डोम भी श्रीकृष्णनामका कीर्तन करते हैं॥80-83॥ अनुभाष्य—‘रामानन्द वसु’—(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 173वाँ श्लोक)— 64 | श्रीचैतन्यचरितामृत

10/80-84 ]

“कलकण्ठी-सुकण्ठ्यौ ये व्रजे गान्धर्वनाटिके। रामानन्दवसुः सत्यराजश्चापि यथायथम्॥173॥ “व्रजमें जो कलकण्ठी (कलाकण्ठी) और सुकण्ठी नामक गान्धर्व नाटिका अर्थात् नृत्य, गीत-वाद्यादि कलाओंमें निपुण थीं, वे दोनों अब यथाक्रमसे श्रीरामानन्द बसु और श्रीसत्यराज (खाँ) हैं।” श्रीयदुनाथ, श्रीपुरुषोत्तम, श्रीशङ्कर, श्रीविद्यानन्द आदि सभी बसुवंशमें ही जन्में थे। इस बसुवंशमें सभी लोग ही श्रीकृष्णभक्त और श्रीकृष्णलीलाके अभिनयमें सुदक्ष थे। अभी भी श्रीकृष्णलीला अभिनयकी स्मृति रक्षित है। ये श्रीहरिदास ठाकुरके अनुगत शुद्धभक्त थे। पूर्वोल्लिखित 48 संख्या द्रष्टव्य है ॥ 80 ॥ (43) श्रीसनातन, (44) श्रीरूप और (45) श्रीअनुपम-शाखा :- अनुपम वल्लभ, श्रीरूप, सनातन। एइ तिन शाखा वृक्षेरे पश्चिमे गणन॥84॥ अनुवाद-श्रीअनुपम वल्लभ, श्रीरूप और श्रीसनातन-इन तीन शाखाओंकी वृक्षकी पश्चिम दिशामें गणना होती है॥84॥ अनुभाष्य-‘श्रीअनुपम’-श्रीजीव गोस्वामीके पिता और श्रीसनातन एवं श्रीरूप गोस्वामीके छोटे भाई थे। पहले इनका नाम ‘श्रीवल्लभ’ था और महाप्रभुने इनको ‘अनुपम’ नाम दिया था। गौड़देशके बादशाहकी नौकरी करनेके कारण इनकी ‘मल्लिक’ उपाधि थी। चैःचः मध्यलीला 19/36- “अनुपम मल्लिक,-ताँर नाम श्रीवल्लभ। श्रीरूप गोसाञिर छोट भाई परम वैष्णव॥” भरद्वाज-गोत्रीय जगद्गुरु ‘सर्वज्ञ’-नामक एक महात्मा बारहवीं शक-शताब्दीमें कर्णाटक देशमें ब्राह्मण राजवंशमें उत्पन्न हुए। उनके पुत्र अनिरुद्धके रूपेश्वर और हरिहर नामक दो पुत्र जन्में। किन्तु ये दोनों ही राज्यसे वञ्चित हो गये और ज्येष्ठ रूपेश्वरने शिखरभूमिमें वास स्थान स्थापित किया। रूपेश्वरके पुत्र पद्मनाभके गङ्गातटपर ‘नैहाटी’ नामक ग्राममें वास करते हुए पाँच पुत्र हुए। उनमेंसे सबसे छोटे मुकुन्दके पुत्र परम सदाचारी कुमारदेव हुए। कुमारदेव-सनातन, रूप और अनुपमके पिता हैं। कुमारदेव वाक्ला-चन्द्रद्वीपमें रहते थे। उस समयके ‘यशोहर’ प्रदेशके अन्तर्गत ‘फतेहाबाद’ नामक स्थानमें उनका घर था। उनके कई पुत्रोंमेंसे तीन पुत्रोंने वैष्णव-धर्मको ग्रहण किया। बादशाहके राजपदपर कार्य करनेके कारण श्रीवल्लभ अपने ज्येष्ठ भ्राता श्रीरूप और श्रीसनातनके साथ चन्द्रद्वीपसे आकर ‘रामकेलि’ ग्राममें वास करने लगे। यहींपर ही जीव गोस्वामीका जन्म हुआ था। नवाब सरकारका कार्य करनेके कारण तीनोंको ही ‘मल्लिक’ उपाधि मिली थी। महाप्रभु जब रामकेलि ग्राममें गये थे, तब अनुपमका उनके साथ पहला साक्षात्कार हुआ। श्रीरूप गोस्वामी जब विषय-कार्योंका त्यागकर महाप्रभुके चरणाश्रय ग्रहण करनेके लिये वृन्दावन गये, तब अनुपम भी उनके साथ थे। प्रयागमें महाप्रभुसे इनके मिलनका प्रसङ्ग चैःचः मध्यलीलाके 19वें अध्यायमें द्रष्टव्य है। महाप्रभुसे भेंट करनेके बाद श्रीरूप और अनुपम वृन्दावन गये। यह महाप्रभुकी सनातन गोस्वामीके प्रति उक्तिसे जाना जाता है,-“रूप-अनुपम दुँहे वृन्दावन गेला।” उस समय सुबुद्धि राय मथुरा-नगरीमें सूखी लकड़ियाँ बेचकर अपना पोषण और अन्य वैष्णवोंकी सेवा करते थे। श्रीरूप और अनुपमके वहाँ पहुँचनेपर वे अति प्रसन्न हुए और उनको साथ लेकर वृन्दावनके बारह वनोंका भ्रमण किया। दोनों भाई वृन्दावनमें एक मास तक रहे और श्रीसनातन गोस्वामीको ढूँढनेके लिये ये गङ्गाके किनारे चलते-चलते प्रयाग पहुँचे, किन्तु श्रीसनातन राजपथसे मथुरा आ गये थे, इस कारण उनकी भेंट नहीं हो सकी। मथुरामें सुबुद्धि रायने श्रीसनातन गोस्वामीको अनुपम और श्रीरूपका समाचार दिया। श्रीरूप और अनुपम, दोनों तब काशी पहुँचे और महाप्रभुसे सारा वृत्तान्त सुनकर दस दिन बाद गौड़देशकी यात्रा की। वहाँ पहुँचकर अपनी सम्पत्तिकी व्यवस्थाका

दसवाँ अध्याय | 65

[ 10/84 समाधान करके महाप्रभुकी आज्ञानुसार वे दोनों नीलाचलमें आये। 1436 शकाब्दमें मार्गमें गङ्गातटपर अनुपमने श्रीरामचन्द्रके धामको प्राप्त किया। यह समाचार श्रीरूप गोस्वामीने नीलाचलमें महाप्रभुको दिया। श्रीवल्लभ श्रीरामचन्द्रके उपासक थे और महाप्रभुके द्वारा प्रदर्शित व्रजभजनके मार्गको वे पूर्णरूपसे ग्रहण नहीं कर पाये। वे महाप्रभुको साक्षात् श्रीरामचन्द्रके रूपमें ही जानते थे। भक्तिरत्नाकर ग्रन्थमें अनुपमके विषयमें इस प्रकार लिखा है— “अनुपम नाम थुइल श्रीगौरसुन्दर। सदा मत्त रघुनाथ-विग्रह-सेवन॥ रघुनाथ बिना येंइ अन्य नाहि जाने। साक्षात् श्रीरघुनाथ-चैतन्य गोसाञि॥” “श्रीगौरसुन्दरने उन्हें अनुपम नाम दिया। वे सदा श्रीरघुनाथके विग्रहकी सेवामें मत्त रहते थे। श्रीरघुनाथके अतिरिक्त वे किसीको नहीं जानते थे। श्रीचैतन्य गोसाञिको वे साक्षात् श्रीरघुनाथके रूपमें देखते थे।” ‘श्रीरूप गोस्वामी’—(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 180वाँ श्लोक)— “श्रीरूपमञ्जरी ख्याता यासीद् वृन्दावने पुरा। साद्य रूपाख्य-गोस्वामी भूत्वा प्रकटतामियात्॥180॥” “पहले वृन्दावनमें जो श्रीरूपमञ्जरीके नामसे विख्यात थीं, वे ही अब श्रीरूप गोस्वामीके रूपमें प्रकट हुई हैं।” भक्तिरत्नाकरकी प्रथम तरङ्गमें— “श्रीरूप गोस्वामी ग्रन्थ षोड़श करिल। (1) काव्य ‘हंसदूत’, आर (2) ‘उद्धवसन्देश’। (3) ‘कृष्णजन्मतिथिविधि’ विधान अशेष॥ (4-5) ‘गणोद्देशदीपिका’ बृहत्-लघुद्वय। (6) ‘स्तवमाला’, (7) ‘विदग्धमाधव’—रसमय॥ (8) ‘ललितमाधव’ विप्रलम्भेर अवधि। ‘दानलीला कौमुदी’ आनन्द-महोदधि॥ (9) ‘दानकेलिकौमुदी’ विदित एइ नाम। (10) ‘भक्तिरसामृतसिन्धु’ ग्रन्थ अनुपम॥ (11) ‘श्रीउज्ज्वलनीलमणि’ ग्रन्थ रसपूर। प्रयुक्ता (12) ‘आख्यातचन्द्रिका’ ग्रन्थ सुमधुर॥ (13) ‘मथुरा-महिमा’, (14) ‘पद्यावली’ ए विदित। (15) ‘नाटकचन्द्रिका’, (16) ‘लघुभागवतामृत’॥ वैष्णव-इच्छाय एकादश श्लोक कैल। कृष्णदास कविराजे विस्तारिते दिल॥ पृथक् पृथक् स्तव गोस्वामी वर्णिल। श्रीजीव-संग्रहे ‘स्तवमाला’ नाम हैल॥ संक्षेपे करिल आर विरुदलक्षण। ‘गोविन्द-विरुदावली’ ताहार लक्षण॥” “श्रीलरूप गोस्वामीने सोलह ग्रन्थोंकी रचना की। ये इस प्रकार हैं— (1) ‘हंसदूत’ (काव्य), (2) ‘उद्धवसन्देश’, (3) ‘कृष्णजन्मतिथिविधि’ (विधान), (4-5) ‘गणोद्देशदीपिका’ बृहद् और लघु, (6) ‘स्तवमाला’, (7) ‘विदग्धमाधव’ (रसमय), (8) ‘ललितमाधव’ (विप्रलम्भकी सीमा), (9) ‘दानकेलिकौमुदी’ (आनन्दका महासमुद्र), (10) ‘भक्तिरसामृतसिन्धु’ (एक अनुपम ग्रन्थ), (11) ‘श्रीउज्ज्वलनीलमणि’ (रसपूर्ण ग्रन्थ), (12) ‘आख्यातचन्द्रिका’ (सुमधुर ग्रन्थ), (13) ‘मथुरा-महिमा’, (14) ‘पद्यावली’, (15) ‘नाटकचन्द्रिका’ और (16) ‘लघुभागवतामृत’। वैष्णवोंकी इच्छासे उन्होंने ग्यारह श्लोक रचे। श्रीकृष्णदास कविराजने उनका विस्तार किया। श्रीरूप गोस्वामीने अलग-अलग स्तव लिखे, जिन्हें श्रीजीव गोस्वामीने संग्रह करके ‘स्तवमाला’ नाम दिया। संक्षेपमें विरुदलक्षणको ‘गोविन्द-विरुदावली’में लिखा।” (चैःचः मध्यलीला, 1/35-44 एवं अन्त्य, 4/219-231 संख्या द्रष्टव्य है)। चैःचः मध्यलीलाके 19वें अध्यायमें श्रीरूपका विषय-त्याग, धनका विभाग, प्रयागमें महाप्रभुसे मिलन, अनुपमके साथ वल्लभभट्टके घर प्रसाद-सेवा, प्रयागमें 66 | श्रीचैतन्यचरितामृत

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महाप्रभुसे शिक्षा ग्रहण, महाप्रभुके द्वारा उन्हें वृन्दावन जानेका आदेश वर्णित हुआ है। चैःचः अन्त्यलीलाके प्रथम अध्यायमें श्रीरूपका पुनः गौड़देशमें आगमन, अनुपमकी गङ्गा प्राप्ति, श्रीक्षेत्रमें हरिदास ठाकुरकी कुटीमें आगमन, सपरिकर महाप्रभुसे मिलन, महाप्रभुके द्वारा श्रीरूपके हस्ताक्षरकी प्रशंसा, महाप्रभुके हृदयके भावोंके अनुरूप श्लोककी रचना, ललितमाधव और विदग्धमाधवकी रचना आरम्भ, श्रीरायरामानन्दके द्वारा प्रशंसा, महाप्रभुकी भक्तिशास्त्रोंके प्रकाशकी इच्छा एवं श्रीरूपको वृन्दावन जानेकी आज्ञा, श्रीरूपका वृन्दावन गमनका वर्णन है। चैःचः अन्त्यलीला चौथे अध्यायमें सनातन गोस्वामीका वृन्दावनमें जाकर श्रीरूपके साथ मिलन, महाप्रभुकी आज्ञा पालनका वर्णन है। 'श्रीसनातन गोस्वामी'-(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 181वाँ श्लोक)- “या रूपमञ्जरीप्रेष्ठा पुरासीद्रतिमञ्जरी। सोच्यते नामभेदेन लवङ्गमञ्जरी बुधैः॥ 181 ॥ साद्य गौराभिन्नतनुः सर्वाराध्यः सनातनः। तमेव प्राविशत् कार्यान्मुनिरत्नः सनातनः॥ 182॥” “पहले जो श्रीरूपमञ्जरीकी प्रिय रतिमञ्जरी थीं और पण्डितगणोंके द्वारा नामभेदसे लवङ्गमञ्जरी कहलाती थीं, वे ही अब श्रीगौराङ्गके अभिन्न तनु, सबके आराध्य श्रीसनातन गोस्वामी हैं। मुनिरत्न सनातन भी कार्यवशतः इनमें प्रविष्ट हुए हैं।” भक्तिरत्नाकरकी प्रथम तरङ्गमें- “श्रीसनातनेर गुरु विद्यावाचस्पति। मध्ये मध्ये रामकेलि-ग्रामे ताँर स्थिति॥ सर्वशास्त्र अध्ययन करिला याँर ठाँइ। यैछे गुरुभक्ति कहि, -ऐछे साध्य नाइ॥ यवन देखिले पिता प्रायश्चित करय। हेन यवनेर सङ्ग निरन्तर हय॥ करि' मुखापेक्षा यवनेरे गृहे यान। एहेतु आपना माने म्लेच्छेरे समान॥ इथे अति दीनहीन आपना मानय॥ यबे मग्न हन दैन्य-समुद्र मझारे। म्लेच्छादिक हइते नीच माने आपनारे॥ नीचजाति-सङ्गे सदा नीच व्यवहार। एइ हेतु “नीचजात्यादिक” उक्ति ताँर॥ विप्रराज हइया महाखेदयुक्त अन्तरे। आपनाके विप्रज्ञान कभु नाहि करे॥” भक्तिरत्नाकर प्रथम तरङ्गमें- “सनातन गोस्वामीर ग्रन्थ-चतुष्टय। टीकासह 'भागवतामृत'-खण्डद्वय॥ हरिभक्तिविलास-टीका 'दिक्प्रदर्शिनी'। 'वैष्णव-तोषणी'-नाम दशम-टिप्पणी॥ 'लीलास्तव' दशम-चरित यारे कय। सनातन गोस्वामीर एइ चतुष्टय॥” “चौद्दशत सप्त छये सम्पूर्ण वृहत्। पन्नरशत चारिशके लघुतोषणी सुसम्मत॥ (महाप्रभु) रामानन्दद्वारे कन्दर्पेर दर्प नाशे। दामोदर-द्वारे नैरपेक्ष्य परकाशे॥ हरिदास-द्वारे सहिष्णुता जानाइल। सनातन-रूप-द्वारे दैन्य प्रकाशिल॥” “श्रीसनातनके गुरु विद्यावाचस्पति थे और वे कभी-कभी रामकेलि ग्राममें ठहरते थे। इन्होंने (श्रीसनातनने) उनसे सभी शास्त्रोंका अध्ययन किया था। इनकी गुरुभक्तिका वर्णन नहीं किया जा सकता है। यवनके दर्शन होनेपर प्रायश्चित करना होता है, परन्तु ये तो सदा उनका सङ्ग करते थे। ये इन नियमोंका उल्लङ्घन करके यवनोंके घर जाते थे, इस कारण वे स्वयंको मलेच्छके समान मानते थे। ये अपनेको अति दीन-हीन मानते थे और इस प्रकार ये दैन्य-समुद्रमें डूब जाते थे। इनका कहना था कि मैं म्लेच्छादिसे भी नीच हूँ, नीच जातिका सङ्ग करता हूँ और मेरा व्यवहार भी सदा नीच है। इस प्रकार ये स्वयंको नीच-जातिका कहते थे। ब्राह्मणोंमें सर्वश्रेष्ठ होकर भी कभी स्वयंको ब्राह्मण नहीं मानते थे और यवनोंकी सेवा करनेके कारण सदा इनके हृदयमें महाखेद होता था।” तथा “सनातन गोस्वामीने चार ग्रन्थोंकी रचना की। टीकासहित वृहद्भागवतामृत, हरिभक्तिविलास-टीका 'दिक्दर्शिनी', 'वैष्णव-तोषणी' नामक

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दशम स्कन्धकी टीका और 'लीलास्तव' जिसमें दशम-चरित (श्रीकृष्ण-चरित) कहा है।" 1476में वैष्णव-तोषणी और 1504में लघुतोषणी पूर्ण की। महाप्रभुने श्रीरायरामानन्दके द्वारा कामदेवके अभिमानको तोड़ा, श्रीदामोदर पण्डितके द्वारा निरपेक्षता प्रकाश की, श्रीहरिदासके द्वारा सहिष्णुता दिखलायी और श्रीसनातन-श्रीरूपके द्वारा दैन्यका प्रकाश किया।" चैःचः मध्यलीला उन्नीसवें अध्यायमें इनका विषय त्यागका चिन्तन, रोगी होनेके बहानेसे घरमें भागवत आलोचना, बादशाहका इन्हें देखने आना, बादशाहके द्वारा इन्हें बन्दी बनाना, बादशाहके साथ उड़ीसा युद्धमें जाना अस्वीकार करना, गृहत्यागके समय श्रीरूपका इनके पास कारागारमें पत्र भेजनेका वर्णन है। चैःचः मध्यलीलाके बीसवें अध्यायमें इनकी कारागार रक्षकको धन देकर मुक्ति, केवल एक सेवक ईशानके राज्यसे पलायन और आठ स्वर्ण मुद्राएँ देकर डाकुओंसे रक्षा और उनकी सहायतासे पर्वतको पार करना, ईशानको विदाकर अकेले यात्रा, हाजिपुरमें बहनोई श्रीकान्तके साथ मिलन और वहाँ रहना अस्वीकारकर केवल उनसे एक कम्बल ग्रहण करना, वाराणसीमें आगमन और चन्द्रशेखरके घर महाप्रभुसे मिलन, मुण्डन करवाकर तपनमिश्रके द्वारा प्रदत्त पुराने वस्त्रका बहिर्वास और कौपीन ग्रहण करना, महाराष्ट्र ग्रहण करना, महाप्रभुसे तत्त्वकी जिज्ञासा और महाप्रभुके द्वारा इन्हें शिक्षा प्रदान करना वर्णित है। (1) 'सम्बन्ध ज्ञान'की शिक्षा चैःचः मध्यलीलाके बीसवें और इक्कीसवें अध्यायमें वर्णित है। (2) अभिधेय-विचार-बाइसवें अध्यायमें और (3) प्रयोजन-विचार-तेइसवें अध्यायमें; महाप्रभुके द्वारा इन्हें भक्तिसिद्धान्तके ग्रन्थोंकी रचना, लुप्ततीर्थोंका उद्धार, वैष्णवस्मृति सङ्कलनके द्वारा वैष्णव-समाजका संस्थापन और भक्तिशास्त्र-प्रचारका आदेश, आशीर्वादका वर्णन है। चौबीसवें अध्यायमें इनको 'आत्माराम' श्लोककी पहले अठारह प्रकारसे और बादमें इकसठ प्रकारसे अर्थ-व्याख्या, इनका राजपयसे मथुरा गमन और सुबुद्धिरायके साथ मिलनका वर्णन है। चैःचः अन्त्यलीलाके चौथे अध्यायमें इनका झारखण्डके जङ्गलोंसे होते हुए पुनः नीलाचल आगमन, रथके पहियेके नीचे अपनी देहत्यागका सङ्कल्प, हरिदास ठाकुरसे मिलन और सपरिकर महाप्रभुके दर्शन, अनुपमकी गङ्गा-प्राप्ति और माहात्म्य श्रवण, इनके देहत्यागके सङ्कल्पमें महाप्रभुकी अस्वीकृति, इनके द्वारा महाप्रभुके प्रयोजनके अनुरूप साधनकी इच्छा, इनके द्वारा हरिदास ठाकुरकी महिमाका वर्णन, मर्यादामार्गीय श्रीजगन्नाथजीके सेवकोंको उनका स्पर्श न हो जाय, इस भयसे तप्तबालूके ऊपरसे होकर महाप्रभुके पास जाना और इनके दर्शनसे महाप्रभुकी प्रसन्नता, महाप्रभुसे जगदानन्दको वृन्दावन जानेकी आज्ञा देनेकी प्रार्थना, महाप्रभुके द्वारा इनकी स्तुति, इनकी अप्राकृत देहमें महाप्रभुकी प्रीति और आलिङ्गन, उसके फलस्वरूप दिव्यदेहकी प्राप्ति, एक वर्ष नीलाचलमें रहनेका महाप्रभुका आदेश, तत्पश्चात् इन्हें वृन्दावन भेजना, श्रीरूपके साथ बहुत समयके बाद वृन्दावनमें मिलन और महाप्रभुकी आज्ञापालनका वर्णन है। श्रीरूप और श्रीसनातन गोस्वामीका श्रीपाट श्रीरामकेलि ('गुप्त वृन्दावन') - वर्तमान शहर इंग्रेंजबाजार (मालदह) से प्राय आठ मील दक्षिणमें अवस्थित है। वहाँ निम्नलिखित देखने योग्य स्थान हैं- (1) श्रीमदनमोहन विग्रह-श्रीसनातन गोस्वामीके द्वारा प्रतिष्ठित विग्रह। (2) केलिकदम्ब वृक्ष-जिसके नीचे श्रीरूप और श्रीसनातनका महाप्रभुके साथ रात्रिमें साक्षात्कार हुआ था और सपार्षद महाप्रभुने भक्तोंको प्रेमामृतका दान किया था, ऐसा कहा जाता है। (3) रूपसागर-श्रीरूप गोस्वामीप्रभुके द्वारा प्रतिष्ठित विशाल सरोवर। इस सरोवरकी सफाई और श्रीरामकेलिपाटकी लुप्तकीर्त्ति उद्धारके लिये मालदहमें 8 जून 1924 ई० में 'रामकेलि-संस्कार-समिति' प्रतिष्ठित हुई थी ॥ 84 ॥

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10/85 ] (44क) श्रीजीव :- ताँर मध्ये रूप-सनातन—बड़ शाखा। अनुपम, जीव, राजेन्द्रादि—उपशाखा॥ 85॥ अनुवाद—इनके मध्य श्रीरूप और श्रीसनातन बड़ी शाखा हैं तथा श्रीअनुपम, श्रीजीव, श्रीराजेन्द्रादि उपशाखा हैं॥ 85॥ अनुभाष्य— 'श्रीजीव गोस्वामी'—(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 204 एवं 195 श्लोक)— "विलासमञ्जरी कामलेखा च मौनमञ्जरी॥ 195ख॥" "सुशीलः पण्डितः श्रीमान् जीवः श्रीवल्लभात्मजः। 204क।" "विलासमञ्जरी श्रीवल्लभके सुशील एवं पण्डित सुपुत्र श्रील जीव गोस्वामी हैं।" श्रीजीव बाल्यकालसे श्रीमद्भागवतके अनुरागी थे। बादमें नवद्वीपमें आकर श्रीनित्यानन्द प्रभुके आनुगत्यमें इन्होंने श्रीनवद्वीप-धामकी परिक्रमा और दर्शन किये। इन्होंने काशीमें जाकर मधुसूदन वाचस्पतिसे सभी शास्त्रोंका अध्ययन किया। उसके बाद वे वृन्दावनमें आकर श्रीरूप और श्रीसनातनके आश्रित हुए। (श्रीभक्तिरत्नाकरकी प्रथम तरङ्गमें)— “श्रीजीवेर ग्रन्थ पञ्चविंशति विदित। (1) 'हरिनाममृत व्याकरण' दिव्यरीत॥ (2) 'सूत्रमालिका' (3) 'धातुसंग्रह' सुप्रकार। (4) 'कृष्णार्च्चादीपिका'-ग्रन्थ अति चमत्कार॥ (5) 'गोपालविरुदावली' (6) 'रसामृतशेष'। (7) 'श्रीमाधव-महोत्सव' सर्वाशे विशेष॥ (8) 'श्रीसङ्कल्पकल्पवृक्ष-ग्रन्थेर प्रचार। (9) 'भावार्थसूचक'-चम्पू अति चमत्कार॥ (10) 'गोपालतापनी-टीका' (11) टीका 'ब्रह्मसंहितार'। (12) 'रसामृत-टीका' (13) 'श्रीउज्ज्वल-टीका' आर॥ (14) 'योगसारस्तवेर टीका'ते सुसङ्गति। (15) 'अग्निपुराणस्थ श्रीगायत्री-भाष्य' तथि॥ (16) पद्मपुराणोक्त 'श्रीकृष्णरे पदचिह्न'। (17) 'श्रीराधिका-कर-पदस्थित चिह्न' भिन्न॥ (18) 'गोपालचम्पू'-पूर्व-उत्तर-विभागेते। (19-25) सप्त-सन्दर्भ विख्यात भागवत-रीति। (क्रम-तत्त्व-भगवत्-परमात्म-कृष्ण-भक्ति-प्रीति)॥" “श्रीजीव गोस्वामीके द्वारा रचित पच्चीस ग्रन्थ विदित हैं। (1) 'हरिनाममृत व्याकरण', (2) 'सूत्रमालिका' (3) 'धातुसंग्रह', (4) 'कृष्णार्च्चादीपिका', (5) 'गोपालविरुदावली', (6) 'रसामृतशेष', (7) 'श्रीमाधव-महोत्सव', (8) 'श्रीसङ्कल्पकल्पवृक्ष', (9) 'भावार्थसूचक'-चम्पू, (10) 'गोपालतापनी-टीका', (11) 'ब्रह्मसंहिताकी टीका', (12) 'भक्तिरसामृतसिन्धु-टीका', (13) 'श्रीउज्ज्वलनीलमणि-टीका', (14) 'योगसार-स्तव-टीका', (15) 'अग्निपुराणके श्रीगायत्रीका भाष्य', (16) पद्मपुराणमें उक्त 'श्रीकृष्ण-पदचिह्न', (17) 'श्रीराधिका-कर-पदस्थित चिह्न', (18) 'गोपालचम्पू' पूर्व एवं उत्तर विभाग, (19-25) सप्त-सन्दर्भ (क्रम-तत्त्व-भगवत्-परमात्म- कृष्ण-भक्ति-प्रीति सन्दर्भ)। इन्होंने श्रीरूप-सनातनादिके अप्रकट होनेके बाद उत्कल-गौड़-माथुर-मण्डलके गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदायके सर्वश्रेष्ठ आचार्यपदपर अधिष्ठित होकर सबको श्रीगौरसुन्दरके द्वारा प्रचारित सत्यका प्रचारकर भजनमें लगाया। बीच-बीचमें ये भक्तोंके साथ व्रजधामकी परिक्रमा करते और मथुरामें विट्ठल-देवके दर्शन करने जाते। श्रीकविराज गोस्वामीने इनके प्रकटकालमें श्रीचैतन्यचरितामृतकी रचना की थी। इन्होंने कुछ समय बाद गौड़देशसे आये श्रीनिवास, नरोत्तम और दुःखी कृष्णदासको क्रमशः दसवाँ अध्याय | 69

[ 10/85 ‘आचार्य’, ‘ठाकुर’ और ‘श्यामानन्द’ नाम देकर सारे गोस्वामी-ग्रन्थोंके साथ गौड़देशमें नामप्रेमके प्रचारके लिये भेजा। इन्हें पहले ग्रन्थोंके अपहरणका समाचार और बादमें उनके प्राप्त होनेका समाचार मिला। इन्होंने श्रीनिवासके शिष्य रामचन्द्र सेनको और उनके छोटे भाई गोविन्दको ‘कविराज’ नाम प्रदान किया। इनके प्रकटकालमें श्रील जाह्नवा देवी कुछ भक्तोंके साथ वृन्दावनमें पधारीं। गौड़देशसे आये हुए भक्तोंके ठहरने और प्रसादकी इन्होंने व्यवस्था की। इनके शिष्य श्रीकृष्णदास अधिकारीने अपने ग्रन्थमें श्रीरूप-सनातन-जीव प्रभुओंके ग्रन्थोंकी तालिका दी है। अनभिज्ञ प्राकृत सहजिया-सम्प्रदायमें श्रीजीव गोस्वामीके विरुद्ध तीन अपवाद प्रचलित हैं, उनके द्वारा श्रीकृष्ण-विमुखताके कारण हरि-गुरु-वैष्णव-विरोध-मूलमें अवश्य ही उनके अपराध ही वर्धित हो रहे हैं। (1) जड़-प्रतिष्ठाका इच्छुक एक दिग्विजयी पण्डित निष्किञ्चन श्रीरूप-सनातनके पास आकर उन्हें शास्त्रार्थ करनेकी चुनौती देने लगा। इस चुनौतीको अपने भजनमें बाधा जानकर और तृणादपि सुनीच, अमानी-मानद व्यवहार करते हुए उन्होंने बिना शास्त्रार्थके पराजय स्वीकारकर उसे जयपत्र लिखकर दे दिया। वह उस जयपत्रको लेकर श्रीजीव गोस्वामीके पास आया और उनके गुरुवर्गको (श्रीरूप-सनातनको) मूर्ख कहकर उनको भी जयपत्र लिखनेके लिये कहने लगा। यह सुनकर जयपत्र लिखकर देनेके बदले श्रीजीव गोस्वामीने उसे शास्त्रार्थमें ललकारकर उसे पराजितकर मौन कर दिया। इस प्रकार गुरुकी निन्दा करनेवालेकी जिह्वाको स्तम्भितकर गुरुदेवके पद-नखकी शोभाकी मर्यादा प्रदर्शित करते हुए ‘गुरु-देवात्मा’के अनुरूप शिष्यके आदर्शका प्रदर्शन किया। इस घटनाके विषयमें सहजिया लोग कहते हैं,– “श्रीजीवके इस प्रकार आचरणसे तृणादपि सुनीचता और मानद-धर्मके विरोधके कारण श्रीरूप गोस्वामी प्रभुने इनकी तीव्र भर्त्सना की और इनका परित्याग कर दिया। बादमें श्रीसनातन गोस्वामी प्रभुके कहनेपर उन्होंने श्रीजीवको पुनः ग्रहण किया।” ये गुरु-वैष्णव विरोधी लोग श्रीकृष्णकी कृपासे जिस दिन अपनेको गुरु-वैष्णवका दास समझेंगे, उस दिन श्रीजीव गोस्वामीकी कृपा लाभकर वास्तविक ‘तृणादपि सुनीच’ और ‘मानद’ होकर हरिनाम-कीर्तनमें अधिकारी होंगे। (2) कोई-कोई अनभिज्ञ व्यक्ति कहते हैं– “श्रीकविराज गोस्वामी प्रभुके ‘श्रीचैतन्यचरितामृत’के रचना-सौन्दर्य और अप्राकृत व्रजरस-माहात्म्य दर्शनसे अपनी प्रतिष्ठाकी हानिकी आशङ्कासे श्रीजीव गोस्वामीके हृदयमें ईर्ष्या उदित हुई और उन्होंने मूल ‘श्रीचैतन्यचरितामृत’को कुँएमें फेंक दिया। इसे सुनकर कविराज गोस्वामीने अपने प्राण त्याग दिये। उनके मुकुन्द नामक एक शिष्यने पहलेसे मूल पाण्डुलिपिकी एक नकल करके रखी थी, इसलिये ‘श्रीचैतन्यचरितामृत’ पुनः प्रकाशित हुई, अन्यथा यह ग्रन्थ जगत्से लुप्त हो जाता।” इस प्रकारकी वैष्णव-विद्वेषमूलक कल्पना-नितान्त मिथ्या और असम्भव है। (3) अन्य कोई-कोई इन्द्रिय-भोगी व्यभिचारी लोग कहते हैं– “श्रीजीव प्रभु श्रीरूपगोस्वामीके मतानुयायी व्रजगोपियोंके ‘पारकीय’ रसको स्वीकार न करके ‘स्वकीय’ रसका अनुमोदन करते हैं। इस कारण वे रसिक भक्त नहीं थे, इसलिये उनका आदर्श ग्रहणीय नहीं है।” प्रकटकालमें अपने अनुगत लोगोंके बीच किसी-किसी भक्तकी ‘स्वकीय रस’ में रुचि देखकर उनके मङ्गलके लिये उनके अधिकारको जानकर और बादमें अनधिकारी व्यक्ति अप्राकृत परम-चमत्कारमय पारकीय-व्रजरसके सौन्दर्य एवं महिमाको न बूझकर उसका अनुकरणकर व्यभिचारमें प्रवृत्त होंगे, इसलिये वैष्णवाचार्य श्रीजीव प्रभुने स्वकीयवादको स्वीकार किया। किन्तु इस कारणसे उन्हें अप्राकृत पारकीय व्रजरसका विरोधी नहीं मानना चाहिये, क्योंकि ये स्वयं श्रीरूपानुगवर हैं और साक्षात् श्रीकविराज गोस्वामीके शिक्षागुरुवर्गके अन्यतम हैं॥85॥ 70 | श्रीचैतन्यचरितामृत

10/85 ] अमृतानुकणिका—जीव गोस्वामीने बारह कारण दिखलाकर श्रीकृष्णके साथ गोपियोंका स्वकीय भावमें सम्बन्ध स्थापित किया। लौकिक रीतिके अनुसार उपपति भाव बहुत ही निन्दनीय और अस्वर्गकर आदि है। शास्त्रोंमें भी उपपतिको घृणित बतलाया गया है। श्रीकृष्णने भी स्वयं कहा है कि कुलीन स्त्रियोंके लिये जार पुरुषकी सेवा सब प्रकारसे निन्दनीय है, उनका लोक-परलोक, दोनों ही बिगड़ता है। यह कुकर्म तो अत्यन्त तुच्छ और क्षणिक है, वर्तमानमें भी कष्टदायक है और नरकका द्वार है। परीक्षित महाराजने भी श्रीशुकदेव गोस्वामीसे प्रश्न किया कि श्रीकृष्ण तो आप्तकाम हैं, तब किसलिये उन्होंने ऐसा निन्दनीय कर्म किया? इसलिये यह निन्दनीय कर्म है। यहाँपर जानना आवश्यक है कि यह श्रीकृष्णके सम्बन्धमें नहीं, अपितु अन्य लोगोंके लिये निन्दनीय कहा गया है। श्रीकृष्णके साथ गोपियोंका नित्य दाम्पत्य सम्बन्ध है, स्त्री-पतिका सम्बन्ध है। जैसे श्रीब्रह्म-संहितामें यह बतलाया है— “आनन्दचिन्मयरसप्रतिभाविताभि- स्ताभिर्य एव निजरूपतया कलाभिः।” ह्लादिनीशक्तिकी वृत्तिरूपा प्रेयसियाँ—श्रीकृष्णके स्वरूपसे अभिन्न उन्हींकी कलाएँ हैं। शक्ति-शक्तिमान् अभेद हैं, इसलिये वे उनकी ही अपनी शक्ति हैं। गौतमीय-तन्त्रके अप्रकट-नित्यलीलाशीलन दशाक्षर मन्त्रकी व्याख्यामें भी ऐसा कहा गया है—'अनेक जन्म सिद्धानां गोपिनां पतिरेव वा' अर्थात् श्रीकृष्ण अनेक जन्मोंमें सिद्ध होनेवाली गोपियोंके पति हैं। वे समस्त विश्व-ब्रह्माण्डके पति हैं, गोपियोंके पतियोंके पति हैं, सबके पति हैं। लक्ष्मियाँ कभी भी परकीया नहीं हैं। ये लक्ष्मियोंकी भी लक्ष्मियाँ हैं, इनके लिये परकीया कैसे सम्भव है? आदि बहुतसी बातें जीव गोस्वामीजीने कही हैं और इसके अन्तमें उन्होंने लिख दिया (उज्ज्वलनीलमणि 1/21 की टीका)— “स्वेच्छया लिखितं किञ्चित् किञ्चदत्र परेच्छया। यत् पूर्वापरसम्बन्धं तत् पूर्वमपरं परम्॥” “मैंने कुछ अपनी इच्छासे लिखा है और कुछ दूसरोंके अनुरोध करनेपर लिखा है। जिसमें पूर्वापर (पहले और पीछेका) सम्बन्ध है, उसे अपनी इच्छासे लिखा है। जिसमें पूर्वापर सम्बन्ध नहीं है, उसको दूसरोंकी इच्छासे लिखा है।” अर्थात् उन्होंने कहीं पति लिखा है और कहीं उपपति—इसमें सङ्गति नहीं है, इसलिये यह उनका विचार नहीं है। यदि श्रीजीव गोस्वामी रूपानुग नहीं होते, तो वे श्रीरूप गोस्वामी रचित श्रीभक्तिरसामृतसिन्धु और उज्ज्वलनीलमणि आदि ग्रन्थोंकी टीकाओंकी रचना क्यों करते? श्रीविश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुरने भी कहा है कि श्रीजीव गोस्वामी कभी भी स्वकीयाके पक्षमें अपनी राय नहीं दे सकते हैं। उन्होंने स्वयंकी इच्छासे नहीं, अपितु दूसरोंकी इच्छासे ही ऐसी व्याख्या की है। इसलिये उन्होंने अपनी व्याख्याके उपसंहारमें स्वयं ही इस बातको स्वीकार किया है। उनकी अपनी इच्छा क्या है? जो श्रीरूप गोस्वामी और जो श्रीसनातन गोस्वामीकी इच्छा है। दूसरोंकी इच्छासे उन्होंने स्वकीयाका प्रतिपादन किया है जिससे लौकिक दृष्टिसे अनाधिकारी व्यक्ति उनमें प्रवेश न करें। विशेषकर महाप्रभुके चरणाश्रित अन्तरङ्ग भक्तोंके लिये स्वकीयाके पक्षमें व्याख्या कदापि ग्राह्य नहीं हो सकती। जीव गोस्वामीके आशयको समझना बहुत कठिन है। श्रीनिवासाचार्य, श्रीनरोत्तम ठाकुर और श्रीश्यामानन्द प्रभु—ये तीनों ही श्रीजीव गोस्वामीके शिक्षा-शिष्य हैं तथा पारकीया भावको माननेवाले हैं। इसलिये इन शिष्योंके विचारोंसे समझा जायेगा कि श्रीजीव गोस्वामीने उन्हें जो शिक्षा दी, उसीका उन्होंने प्रचार किया। श्रीनिवासाचार्य प्रभुकी ज्येष्ठ कन्या हेमलता ठाकुराणी हैं और उनके शिष्य यदुनन्दनदास ठाकुरने अपने ग्रन्थ 'कर्णानन्द'के चतुर्थ निर्यासमें लिखा है— “एइ सब निर्द्धार करि श्रीदासगोसाञि। नियम करि कुण्डतीरे बसिला तथाइ॥ दसवाँ अध्याय | 71