भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 595, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 595

10/61–64 ] की (चैःचः अन्त्यलीला, 13/15-74)। उसी समय महाप्रभुने गोविन्दको आज्ञा दी— “शिवानन्देर प्रकृति, पुत्र यावत् हेथाय। आमार अवशेष-पात्र तारा येन पाय॥” “शिवानन्दसेन और उनके स्त्री-पुत्र जब तक यहाँ रहें, मेरा उच्छिष्ट भोजन उनको प्रतिदिन प्रदान करना (चैःचः अन्त्यलीला, 12/15-53)॥61॥ उनके तीन पुत्र :— चैतन्यदास, रामदास, आर कर्णपूर। तिन पुत्र शिवानन्देर प्रभुर भक्तशूर॥62॥ अनुवाद—श्रीशिवानन्दके तीन पुत्र—श्रीचैतन्यदास, श्रीरामदास और श्रीपरमानन्द महाप्रभुके भक्तोंमें प्रधान हैं॥62॥ अनुभाष्य—'श्रीचैतन्यदास'—शिवानन्दके ज्येष्ठ पुत्र हैं। इनके द्वारा रचित 'श्रीकृष्णकर्णामृत' की टीका सहित श्रील भक्तिविनोद ठाकुरका अनुवाद 'श्रीसज्जनतोषणी' पत्रिकामें प्रकाशित हुआ है। जानकार व्यक्तियोंके अनुसार ये ही संस्कृत भाषामें रचित महाकाव्य 'श्रीचैतन्यचरित' के प्रणेता हैं, कविकर्णपूर नहीं। 'श्रीरामदास'—शिवानन्दसेनके मंझले पुत्र हैं। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 145वाँ श्लोक)— “वृन्दावने यौ विख्यातौ शुकौ दक्ष-विचक्षणौ। तावद्य जातौ मज्ज्येष्ठौ चैतन्य-रामदासकौ॥” 145॥ “वृन्दावनके दक्ष और विचक्षण नामक दो शुकपक्षी अब मेरे ज्येष्ठ भ्राता श्रीचैतन्य और श्रीरामदास हुए हैं।” 'कर्णपूर'—परमानन्ददास अथवा पुरीदास अथवा कविकर्णपूर। ये श्रीअद्वैतशाखामें श्रीनाथ पण्डितके शिष्य हैं। इन्होंने 'आनन्दवृन्दावन'-चम्पू, 'अलङ्कार-कौस्तुभ', 'श्रीचैतन्यचरित' (?) महाकाव्य, 'श्रीचैतन्य-चन्द्रोदय'-नाटक, 'श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका' आदि ग्रन्थोंकी रचना की है। इनका जन्म 1448 शकाब्दमें हुआ था और इन्होंने 1498 शकाब्द तक ग्रन्थोंकी रचना की थी॥62॥ (24ख) शिवानन्दसेनके दो भाञ्जे :— श्रीवल्लभसेन, आर सेन श्रीकान्त। शिवानन्द-सम्बन्धे प्रभुर भक्त एकान्त॥63॥ अनुवाद—श्रीवल्लभसेन और श्रीकान्तसेन, श्रीशिवानन्दके सम्बन्धसे महाप्रभुके एकान्त भक्त हैं॥63॥ अनुभाष्य—'श्रीवल्लभसेन और श्रीकान्तसेन'— श्रीशिवानन्दके भाञ्जे थे। पुरी आते हुए अपने मामा श्रीशिवानन्दको श्रीनित्यानन्द प्रभुकी गाली, शाप और लात खाते देखकर वे सहन नहीं कर सके और उस दलको त्यागकर पहले ही महाप्रभुके पास पहुँचे। सर्वज्ञ महाप्रभुने यह पहले ही जान लिया था और उसका समाधान किया। महाप्रभुने उनके नीलाचलमें वास करनेके समय तक सेवक गोविन्दको उन्हें अपना महाप्रसाद देनेकी अनुमति दी। रथ-यात्राके समय सात सम्प्रदायोंमेंसे श्रीमुकुन्द दत्तके सम्प्रदायमें ये दोनों भाई कीर्तनीया थे (चैःचः मध्यलीला, 13/41)। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 174वाँ श्लोक)— “व्रजे कात्यायनी यासीदद्य श्रीकान्तसेनकः॥” 174॥ “व्रजकी कात्यायनी अब श्रीकान्तसेन हैं॥” 63॥ (25) श्रीगोविन्दानन्द और (26) श्रीगोविन्द दत्त :— प्रभुप्रिय गोविन्दानन्द—महाभागवत। प्रभुर कीर्त्तनीया आदि—श्रीगोविन्द दत्त॥64॥ अनुवाद—महाभागवत श्रीगोविन्दानन्द महाप्रभुके प्रिय हैं और श्रीगोविन्ददत्त महाप्रभुके मूल कीर्तनीया हैं॥64॥ अनुभाष्य—'श्रीगोविन्दानन्द'—प्रथम कीर्तनके समय महाप्रभुके कीर्तनके सङ्गी थे। श्रीधरके घर जलपानके दिन इन्होंने क्रन्दन किया था। रथयात्राके समय ये श्रीजगन्नाथ पुरी जाते थे। 'श्रीगोविन्ददत्त'—नवद्वीपमें महाप्रभुके कीर्तनके सङ्गी थे, मूल गायक होकर महाप्रभुके सङ्गमें दसवाँ अध्याय | 59