भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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[ 10/61 (24क) शिवानन्दके पुत्र-सेवकादि-शाखा :- शिवानन्देर उपशाखा—ताँर परिकर। पुत्र-भृत्य-आदि करि' चैतन्य-किङ्कर ॥ 61 ॥ अनुवाद—श्रीशिवानन्दकी उपशाखा उनके परिकर हैं। इनके पुत्र-सेवकादि सभी श्रीचैतन्यदेवके दास हैं॥ 61 ॥ अनुभाष्य—श्रीशिवानन्दसेन कुमारहट्ट या हालिसहरके निवासी और महाप्रभुके भक्त थे। वहाँसे डेढ़ मील दूर काँचड़ापाड़ामें इनके द्वारा प्रतिष्ठित श्रीगौरगोपालके विग्रह हैं और ये श्रीकृष्णरायके मन्दिरमें अभी वर्तमान हैं। इनके पुत्र श्रीपरमानन्द (पुरीदास) ने श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका (176 श्लोक) में लिखा है— “पुरा वृन्दावने वीरादूती सर्वाश्च गोपिकाः। निनाय कृष्णनिकटं सेदानीं जनको मम।” “पहले जो वृन्दावनमें गोपियोंको श्रीकृष्णके निकट ले जाती थीं, वे वीरा दूती ही अब मेरे पिता श्रीशिवानन्द हैं।” ये प्रतिवर्ष गौड़देशसे भक्तोंका पथप्रदर्शन करके यातायातका सारा व्यय स्वयं वहन करते हुए और उनके रहनेकी व्यवस्था करते हुए उन्हें महाप्रभुके पास नीलाचल ले जाते थे (चैःचः मध्यलीला 16/19-26)। इनके तीन पुत्र—श्रीचैतन्यदास, श्रीरामदास और श्रीपरमानन्द (कविकर्णपूर) थे। कविकर्णपूरके दीक्षा गुरुदेव (इनके गुरु-पुरोहित) श्रीनाथ पण्डितके सम्बन्धमें इसी अध्यायकी 107 संख्या द्रष्टव्य है। वासुदेव दत्तकी अधिक व्यय करनेकी प्रवृत्तिको देखकर महाप्रभुने इनको उनका सरखेल (प्रबन्धक) के रूपमें बने रहनेके लिये आदेश दिया था (चैःचः मध्यलीला 15/93-97)। महाप्रभु ‘साक्षात्’, ‘आवेश’ और ‘आविर्भाव’—इन तीन उपायोंसे अपने भक्तोंपर कृपा करते हैं, इन तीनों रसोंको श्रीशिवानन्दसेनने परीक्षा करके आस्वादन किया (चैःचः अन्त्यलीला, 2रा अः)। इनके श्रीगौरचरण-दर्शन पिपासु कुत्तेका विवरण चैःचः अन्त्यलीलाके प्रथम अध्यायमें वर्णित है। श्रीरघुनाथदास गोस्वामी जब गृह त्यागकर महाप्रभुके दर्शनके लिये नीलाचलमें भागकर आ गये थे, तब उनके पिता श्रीगोवर्धन मजूमदारने अपने पुत्रके कुशल-मङ्गलका संवाद जाननेके लिये पत्र भेजा। इनसे श्रीरघुनाथका समाचार पाकर प्रति वर्ष इनके द्वारा वे अपने पुत्रकी सुख-सुविधाके लिये रसोइया, सेवक और बहुतसा धन नीलाचल भिजवाते थे (चैःचः अन्त्यलीला 6/245-267)। एक बार नीलाचलमें इन्होंने महाप्रभुको निमन्त्रितकर गरिष्ठ (कठिनतासे पचनेवाला भारी) भोजन खिलाया, जिस कारण महाप्रभुका चित्त प्रसन्न नहीं हुआ। अगले दिन इनके पुत्र श्रीचैतन्यदासने महाप्रभुको पाचक औषधि देकर उनके सन्तोषका विधान किया (चैःचः अन्त्यलीला 10/124-151)। एक बार नीलाचल जाते हुए घाटका ‘कर’ आदि देनेमें इनके व्यस्त हो जानेसे श्रीनित्यानन्द प्रभु और अन्य भक्तोंको गङ्गा पार करनेके उपरान्त ठहरनेका स्थान न मिलनेके कारण वहीं पासमें स्थित गाँवके एक वृक्षके नीचे रहना पड़ा। श्रीनित्यानन्द प्रभुने भूखसे पीड़ित और क्रोधित होनेका अभिनय करते हुए अभिशाप दिया—“शिवानन्दके तीनों पुत्र मर जाँय।” यह सुनकर इनकी पत्नी अमङ्गलकी आशङ्काकर विलाप करने लगी। इन्होंने घाटसे लौटकर जब सारा वृत्तान्त सुना, तो वे अपने अपूर्व भाग्यकी प्रशंसा करते हुए श्रीनित्यानन्द प्रभुके पास आये और उनसे लात खानेका सौभाग्य प्राप्त किया। इनके भाज्जे श्रीकान्त यह देखकर अभिमानी होकर अकेले ही महाप्रभुके पास पहुँचे। अन्तर्यामी महाप्रभु सब जान गये और उन्हें क्षमाकर सान्त्वना प्रदान की। उसी यात्राके समय ही महाप्रभुने इनके छोटे पुत्र श्रीपुरीदासके मुखमें अपने पाँवका अंगूठा दिया, तब वे मौन रहे, परन्तु बादमें किसी दिन महाप्रभुकी आज्ञासे उन्होंने श्लोककी रचना 58 | श्रीचैतन्यचरितामृत