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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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कीर्तन करते थे (चैःभाः अन्त्यखण्ड 9वाँ अः) — “मूल हजा ये कीर्तन करे प्रभुसने।” इनका घर खड़दहके दक्षिण सीमापर स्थित 'सुखचर' ग्राममें था ॥ 64 ॥

(27) श्रीविजयदास और (28) अकिञ्चन कृष्णदास :— श्रीविजयदास-नाम प्रभुर आखरिया। प्रभुरे अनेक ग्रन्थ दियाछे लिखिया ॥ 65 ॥ 'रत्नबाहु' बलि' प्रभु थुइल ताँर नाम। अकिञ्चन प्रभुर प्रिय कृष्णदास-नाम ॥ 66 ॥

अनुवाद—श्रीविजयदास महाप्रभुके ग्रन्थ-लेखक थे। इन्होंने महाप्रभुको अनेक ग्रन्थ लिखकर दिये। महाप्रभुने 'रत्नबाहु' कहकर इनको यह नाम प्रदान किया था। अकिञ्चन श्रीकृष्णदास भी महाप्रभुके परमप्रिय हैं ॥ 65-66 ॥

अनुभाष्य—'श्रीविजयदास'—नवद्वीपवासी लिपिकार हैं; ये नवनिधिमें एक मुख्य हैं। इन्होंने महाप्रभुको अनेक ग्रन्थ लिखकर दिये। इसलिये श्रीगौरहरिने इनको 'रत्नबाहु' नाम दिया था। श्रीशुक्लाम्बरके घरमें महाप्रभुने इनपर कृपा की—चैःभाः मध्यखण्ड, 25वाँ अः द्रष्टव्य है। 'अकिञ्चन श्रीकृष्णदास'—नवद्वीपवासी और प्रभुके सङ्गी थे। ये रथयात्रामें श्रीजगन्नाथ पुरी आते थे। चैःभाः अन्त्यखण्ड, 9वाँ अः द्रष्टव्य है ॥ 65-66 ॥

(29) श्रीधरकी गुणराशि :— खोला-बेचा श्रीधर प्रभुर प्रियदास। याँहा-सने प्रभु करे नित्य परिहास ॥ 67 ॥ प्रभु याँर नित्य लय थोड़-मोचा-फल। याँर फुटा-लोहपात्रे प्रभु पिला जल ॥ 68 ॥

अनुवाद—केलेके तनेको बेचने वाले श्रीधर महाप्रभुके प्रिय दास हैं, जिनके साथ महाप्रभु नित्य परिहास करते थे। महाप्रभु उनसे नित्य थोड़-मोचा-फल (केलेके वृक्षका गूदा, फूल, फल) लेते थे और जिनके लोहेके टूटे हुए बरतनमें महाप्रभुने जलपान किया था ॥ 67-68 ॥

अनुभाष्य—'श्रीधर'—नवद्वीपवासी, केलेके बागानमें उत्पन्न वस्तुओंसे ही अपना जीवन चलाने वाले एक दरिद्र ब्राह्मण थे। (चैःभाः आदिखण्ड, 8वें अः) में महाप्रभुकी इनके साथ खींचातानी, (चैःभाः मध्यखण्ड, 9वें अः) में महाप्रभुकी 'सात-पहरिया' भावमें इनके प्रति कृपा और (चैःभाः मध्यखण्ड, 23वें अः) काजीदलनके समय कीर्तन सुनकर श्रीधरके द्वारा नृत्यमें इनके छिद्रयुक्त जीर्ण लोहेके पात्रसे महाप्रभुका परमानन्दसे जल पीना तथा (चैःभाः मध्यखण्ड, 28वें अः)में महाप्रभुके संन्यास ग्रहण करनेकी पूर्व रात्रिमें इनके द्वारा दी हुई लौकी शचीमाताके द्वारा बनवाकर भोजनका प्रसङ्ग द्रष्टव्य हैं। ये रथयात्राके उपलक्ष्यमें पुरुषोत्तम धाममें गये थे। कवि कर्णपूरके मतमें ये बारह गोपालोंमें अन्यतम सखा कुसुमासव गोपाल हैं। श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 133वाँ श्लोक— “खोलाबेचातया ख्यातः पण्डितः श्रीधरो द्विजः। आसीद्व्रजे हास्यकरो यो नाम्ना कुसुमासवः ॥ 133 ॥ “व्रजमें हँसने-हँसानेवाले कुसुमासव नामक सखा अब ब्राह्मणवंशमें उत्पन्न केले बेचनेवाले श्रीधरके नामसे विख्यात हैं”॥ 67 ॥

(30) श्रीभगवान् पण्डित :— प्रभुर अतिप्रिय दास भगवान् पण्डित। याँर देहे कृष्ण पूर्वे हैल अधिष्ठित ॥ 69 ॥

अनुवाद—भगवान् पण्डित महाप्रभुके अतिप्रिय दास हैं। इनके शरीरमें पूर्वकालमें श्रीकृष्णका अधिष्ठान हुआ था ॥ 69 ॥

अनुभाष्य—'भगवान् पण्डित'—चैःभाः अन्त्यखण्ड, 9वाँ अः— “चलिलेन लेखक पण्डित भगवान्। याँर देहे कृष्ण हइयाछिला अधिष्ठान॥”

60 | श्रीचैतन्यचरितामृत