श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 597, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें10/69-72 ] “जिनके शरीरमें श्रीकृष्णका अधिष्ठान हुआ था, वे लेखक श्रीभगवान् पण्डित चले॥” ६९॥ (31) श्रीजगदीश पण्डित और (32) हिरण्य :— जगदीश पण्डित, आर हिरण्य महाशय। यारे कृपा कैल बाल्ये प्रभु दयामय॥ ७०॥ एइ दुइ-घरे प्रभु एकादशी-दिने। विष्णुर नैवेद्य मागि' खाइल आपने॥ ७१॥ अनुवाद—जगदीश पण्डित और हिरण्य महाशय, इन दोनोंपर महाप्रभुमें अपने बाल्यकालमें कृपा की थी। इन दोनोंके घर महाप्रभुने एकादशीके दिन विष्णुके नैवेद्यको माँगकर खाया था॥ ७०-७१॥ अनुभाष्य—'जगदीश पण्डित'—श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 192वाँ श्लोक— “अपरे यज्ञपत्न्यौ श्रीजगदीश-हिरण्यकौ। एकादश्यां ययोरन्नं प्रार्थयित्वाऽघसत् प्रभुः॥” 192॥ “अन्य दो यज्ञपत्नियोंने श्रीजगदीश और श्रीहिरण्यक नाम धारणकर जन्म ग्रहण किया है, श्रीमन्महाप्रभुने एकादशीके दिन इन्हींसे अन्न माँगकर भोजन किया था।” (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 143वाँ श्लोक)— “आसीद्व्रजे चन्द्रहासो नर्त्तको रसकोविदः। सोऽयं नृत्यविनोदी श्रीजगदीशाख्य-पण्डितः॥ 143॥ “व्रजके चन्द्रहास नामक विख्यात रसज्ञ नर्त्तक अब नृत्यविनोदी श्रीजगदीश पण्डित हैं।” (चैःचः आदिलीला, 11/30, 14/39 और चैःभाः आदिखण्ड, 4था अः)—एकादशी तिथिपर महाप्रभुके द्वारा हिरण्य-जगदीशके गृहमें स्थित विष्णु भगवान्के नैवेद्यके भोजनका वर्णन है। (चैःभाः अन्त्यखण्ड, 6ठा अः)— “जगदीश पण्डित परम ज्योतिर्धाम। सपार্ষदे नित्यानन्द याँर धनप्राण॥” “जगदीश पण्डित परम ज्योतिके धाम हैं। परिकर सहित श्रीनित्यानन्द प्रभु इनके प्राणधन हैं।” 'हिरण्यपण्डित'—(चैःभाः अन्त्यखण्ड, 5वाँ अः)—नवद्वीपमें हिरण्य पण्डित नामक एक सुब्राह्मणके घरमें श्रीनित्यानन्द प्रभु एक बार बहुमूल्य अलङ्कार पहनकर विराजमान थे। एक डाकुओंके सरदारने उनके श्रीअङ्गसे उन सब अलङ्कारोंको अपहरण करनेकी बार-बार चेष्टा की, परन्तु वह इसमें सफल नहीं हुआ। तब श्रीनित्यानन्द प्रभुकी महिमाको जानकर वह उनके शरणागत हुआ॥ ७०-७१॥ (33) श्रीपुरुषोत्तम और (34) श्रीसञ्जय :— प्रभुर पड़ुया दुइ,—पुरुषोत्तम, सञ्जय। व्याकरणे दुइ शिष्य—दुइ महाशय॥ ७२॥ अनुवाद—महाप्रभुके दो व्याकरणके छात्र पुरुषोत्तम और सञ्जय थे। ये दोनों महान् व्यक्ति हैं॥ ७२॥ अनुभाष्य—'पुरुषोत्तम और सञ्जय'—ये दोनों नवद्वीपके वासी थे; पहले ये महाप्रभुके छात्र थे तथा बादमें वे महाप्रभुके कीर्त्तनके आरम्भसे उनके सङ्गी बने। (चैःभाः आदिखण्ड, 15/5-7)— “अनेक जन्मेरे भृत्य मुकुन्द सञ्जय। पुरुषोत्तम दास हेन (हन) याँहार तनय॥ ५॥ प्रतिदिन सेइ भाग्यवन्तेरे आलय। पड़ाइते गौरचन्द्र करेन विजय॥ ६॥ चण्डीगृहे गिया प्रभु वसेन प्रथमे। तबे शेषे शिष्यगण आइसेन क्रमे॥ ७॥” “मुकुन्द सञ्जय महाप्रभुके अनेक जन्मोंके सेवक हैं और पुरुषोत्तमदास उनके पुत्र हैं। प्रतिदिन महाप्रभु उनके घर पढ़ानेके लिये जाया करते थे। पहले महाप्रभु चण्डीमण्डपमें जाकर विराजमान होते, तब धीरे-धीरे उनके शिष्य वहाँ आते।” (चैःभाः अन्त्यखण्ड 8वाँ अः)— “पुरुषोत्तम सञ्जय चलिला हर्षमने। ये प्रभुर मुख्य शिष्य पूर्व अध्ययने॥” “पहले अध्ययनमें जो महाप्रभुके मुख्य शिष्य थे, वे पुरुषोत्तम सञ्जय हर्षित मनसे चले।” इसलिये श्रीचैतन्यभागवतके वर्णनके अनुसार मुकुन्द-सञ्जयके दसवाँ अध्याय | 61