श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 10/72-76 पुत्र पुरुषोत्तम सञ्जय हैं, किन्तु श्रीकविराज गोस्वामीने 'पुरुषोत्तम' और 'सञ्जय'को अलग-अलग दो व्यक्ति बतलानेके लिये इस पयारमें 'दुइ' शब्दका तीन बार प्रयोग करके श्रीचैतन्यभागवतकी धारणाको शुद्ध किया है॥ 72॥ (35) श्रीवनमाली पण्डित-शाखा :- वनमाली पण्डित शाखा विख्यात जगते। सोनार मुषल हल ये देखिल प्रभुर हाते॥ 73॥ अनुवाद-वनमाली शाखा जगत्में विख्यात है। इन्होंने महाप्रभुके हाथमें सोनेका मूसल और हल देखा था॥ 73॥ अनुभाष्य-'वनमाली पण्डित'- (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 144वाँ श्लोक)— “वेणुञ्च मुरलीं योऽधात्राग्ना मालाधरो व्रजे। सोऽधुना वनमाल्याख्यः पण्डितो गौरवल्लभः॥"144॥ “व्रजमें जो मालाधर नामक दास वेणु और मुरली धारण करते थे, वे अब गौरप्रिय श्रीवनमाली पण्डित हैं।” (चैःचः आदिलीला, 17/119) और (चैःभाः अन्त्यखण्ड 8वाँ अः)— “चलिलेन वनमाली पण्डित मङ्गल। ये देखिल सुवर्णेर श्रीहलमुषल॥” “मङ्गलमय वनमाली पण्डित चले। इन्होंने महाप्रभुके (बलदेवभावमें) उनके हाथोंमें श्रीहल और मूसलके दर्शन किये थे।” (चैःभाः मध्यखण्ड, 5वाँ अः)—परन्तु श्रीवास पण्डितके घरमें जब महाप्रभुने विष्णु सिंहासनपर चढ़कर बलदेवभाव प्रकट करते हुए श्रीनित्यानन्द प्रभुसे हल-मूसल लेकर जिस लीलाका प्रदर्शन किया था, वहाँपर श्रीवनमालीने उस दिन महाप्रभुके हाथोंमें स्वर्णके हल-मूसलको देखा था, ऐसा वर्णन नहीं है॥ 73॥ (36) श्रीबुद्धिमन्त खान :- श्रीचैतन्येर अति प्रिय बुद्धिमन्त खान। आजन्म आज्ञाकारी तैँहो सेवक-प्रधान॥ 74॥ अनुवाद-बुद्धिमन्त खान श्रीचैतन्य महाप्रभुके अति प्रिय हैं, उन्होंने जीवन पर्यन्त उनकी आज्ञाका पालन किया और वे महाप्रभुके सेवकोंमें प्रधान हैं॥ 74॥ अनुभाष्य-'बुद्धिमन्त खान'-ये नवद्वीपके एक धनवान् भक्त थे। इन्होंने राजपण्डित सनातनमिश्रकी कन्या विष्णुप्रियादेवीके साथ महाप्रभुके दूसरे विवाहका समस्त व्यय वहन किया था। महाप्रभुको वायुव्याधि होनेपर इन्होंने चिकित्सा की थी। ये महाप्रभुकी जलक्रीड़ा और कीर्तनके सङ्गी थे। श्रीचन्द्रशेखरके घरपर महाप्रभुके महालक्ष्मीके अभिनयके लिये ये वस्त्र और भूषण लाये थे। ये रथयात्राके समय नीलाचल जाते थे॥ 74॥ (37) श्रीगरुड़ पण्डित :- गरुड़ पण्डित लय श्रीनाम-मङ्गल। नाम-बले विष याँरे ना करिल बल॥ 75॥ अनुवाद-गरुड़ पण्डित सदा मङ्गलमय हरिनाम करते रहते थे। नामके प्रभावसे उनपर सर्पके विषका भी प्रभाव नहीं हुआ था॥ 75॥ अनुभाष्य-'गरुड़ पण्डित'-ये नवद्वीपमें महाप्रभुके सङ्गी थे। (चैःभाः अन्त्यखण्ड आठवाँ अध्याय)— “चलिलेन श्रीगरुड़ पण्डित हरिषे। नामबले याँरे ना लङ्घिल सर्पविषे॥ 34॥” “नामके बलपर जिनपर सर्पविषने भी प्रभाव नहीं दिखाया, वे श्रीगरुड़ पण्डित हर्षसे (रथयात्राके उपलक्ष्यमें नीलाचलकी ओर) चल पड़े।” (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 117वाँ श्लोक)— “गरुड़ः पण्डितः सोऽद्यो गरुड़ो यः पुरा श्रुतः।” “पूर्वकालके गरुड़ ही अब गरुड़ पण्डित हैं॥” 75॥ (38) श्रीगोपीनाथ सिंह :- गोपीनाथ सिंह-एक चैतन्येर दास। अक्रूर बलि' प्रभु याँरे कैला परिहास॥ 76॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुके एक दास श्रीगोपीनाथ सिंह हैं, जिन्हें महाप्रभु परिहासमें अक्रूर कहते थे॥ 76॥ 62 | श्रीचैतन्यचरितामृत