श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 599, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें10/76-79 ] अनुभाष्य–'गोपीनाथ सिंह'-(चैःभाः अन्त्यखण्ड आठवाँ अध्याय)– “चलिलेन गोपीनाथ सिंह महाशय। 'अक्रूर' करिया याँरे गौरचन्द्र कय॥35॥” “[रथयात्रामें] गोपीनाथ सिंह महाशयने प्रस्थान किया जिन्हें महाप्रभु 'अक्रूर' कहकर बुलाते थे।” (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 117वाँ श्लोक)– “पुरा योऽक्रूरनामासीत् स गोपीनाथसिंहकः।” “पूर्वकालमें जो अक्रूर थे, वे अब गोपीनाथ सिंह हैं॥” 76॥ (5क) देवानन्द पण्डित शाखा :- भागवती देवानन्द वक्रेश्वर-कृपाते। भागवतेर भक्ति-अर्थ पाइल प्रभु हैते॥77॥ अनुवाद-भागवत वाचक देवानन्द पण्डित श्रीवक्रेश्वरकी कृपासे महाप्रभुके द्वारा भागवतके भक्ति-परक अर्थको जान पाये॥77॥ अनुभाष्य-'देवानन्द'-(चैःभाः मध्यखण्ड, 21वाँ अः)- “सार्वभौम-पिता विशारद महेश्वर। ताँहार जाङ्गाले गेला प्रभु विश्वम्भर॥6॥ सेइखाने देवानन्दपण्डितेर वास।7।” “[एक दिन] भ्रमण करते-करते महाप्रभु विश्वम्भर सार्वभौमके पिता महेश्वर विशारदके घरके सामने पहुँचे। वहाँ बाढ़से घरको बचानेके लिये एक बाँध था। वहीं देवानन्द पण्डित भी रहा करते थे।” (चैःचः मध्यलीला, 1/153)- “कुलिया-ग्रामे कैल देवानन्देर प्रसाद।” “उन्होंने कुलिया ग्राममें देवानन्दपर कृपा की।” (चैःभाः मध्यखण्ड, 21वाँ अः)-ये मोक्षकी अभिलाषासे भागवतका पाठ करते थे। एक दिन इनके पाठको सुनकर भावावेशमें श्रीवास पण्डित रोने लगे। यह देखकर इनके पाषण्डी छात्रोंने श्रीवासको डाँटकर वहाँसे निकाल दिया। इसके बहुत समय बाद, एक दिन महाप्रभुने मार्गमें जाते हुए इन्हें भागवतकी व्याख्या करते देखा, तो उन्होंने क्रोधित होकर वैष्णवमें श्रद्धाहीन देवानन्दकी तीव्र भर्त्सना की। इनका महाप्रभुमें भी विश्वास नहीं था। इनके परम सौभाग्यसे एक बार वक्रेश्वर पण्डितने इनके घरमें रहते हुए श्रीकृष्ण-कीर्तन किया था। तब उनकी कृपासे ये महाप्रभुकी महिमासे अवगत हुए। तब महाप्रभुने इन्हें भविष्यमें भागवतकी भक्ति-परक व्याख्या करनेके लिये कहा। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 106ठा श्लोक)– “पुराणानामर्थवेत्ता श्रीदेवानन्दपण्डितः। पुरासीन्द्रपरिषत्पण्डितो भागुरिर्मुनिः॥” 106॥ “श्रीनन्दकी सभाके पण्डित भागुरि मुनि नामक पुरोहित अब पुराणोंके अर्थज्ञाता श्रीदेवानन्द पण्डित हैं॥” 77॥ श्रीखण्डवासी-(39) मुकुन्द, (39क) रघुनन्दन, (40) नरहरि, (41) चिरञ्जीव, (42) सुलोचन :- खण्डवासी मुकुन्ददास, श्रीरघुनन्दन। नरहरि दास, चिरञ्जीव, सुलोचन॥78॥ एइ सब महाशाखा-चैतन्य-कृपाधाम। प्रेम-फल-फूल करे याँहा ताँहा दान॥79॥ अनुवाद-खण्डवासी मुकुन्ददास, श्रीरघुनन्दन, नरहरि दास, चिरञ्जीव और सुलोचन, ये सब कृपाके धाम श्रीचैतन्य महाप्रभुकी महाशाखा हैं। ये श्रीकृष्णप्रेमके फल-फूलको जहाँ-तहाँ, सर्वत्र ही दान करते थे॥78-79॥ अनुभाष्य-'मुकुन्ददास'-ये नारायणदासके पुत्र और नरहरि सरकार ठाकुरके बड़े भाई थे। इनके मंझले भाईका नाम माधवदास था। रघुनन्दन इनके पुत्र थे। रघुनन्दनकी वंशावली आज भी कटोआसे चार मील पश्चिममें श्रीखण्ड-ग्राममें वास करती है। रघुनन्दनके पुत्र कानाइ और उनके दो पुत्र-मदनराय (नरहरि ठाकुरके शिष्य) एवं वंशीवदन थे। टीका लिखनेके समय इनके वंशके चार सौसे अधिक व्यक्ति जीवित दसवाँ अध्याय | 63