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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

[ 10/64-69

कीर्तन करते थे (चैःभाः अन्त्यखण्ड 9वाँ अः) — “मूल हजा ये कीर्तन करे प्रभुसने।” इनका घर खड़दहके दक्षिण सीमापर स्थित 'सुखचर' ग्राममें था ॥ 64 ॥

(27) श्रीविजयदास और (28) अकिञ्चन कृष्णदास :— श्रीविजयदास-नाम प्रभुर आखरिया। प्रभुरे अनेक ग्रन्थ दियाछे लिखिया ॥ 65 ॥ 'रत्नबाहु' बलि' प्रभु थुइल ताँर नाम। अकिञ्चन प्रभुर प्रिय कृष्णदास-नाम ॥ 66 ॥

अनुवाद—श्रीविजयदास महाप्रभुके ग्रन्थ-लेखक थे। इन्होंने महाप्रभुको अनेक ग्रन्थ लिखकर दिये। महाप्रभुने 'रत्नबाहु' कहकर इनको यह नाम प्रदान किया था। अकिञ्चन श्रीकृष्णदास भी महाप्रभुके परमप्रिय हैं ॥ 65-66 ॥

अनुभाष्य—'श्रीविजयदास'—नवद्वीपवासी लिपिकार हैं; ये नवनिधिमें एक मुख्य हैं। इन्होंने महाप्रभुको अनेक ग्रन्थ लिखकर दिये। इसलिये श्रीगौरहरिने इनको 'रत्नबाहु' नाम दिया था। श्रीशुक्लाम्बरके घरमें महाप्रभुने इनपर कृपा की—चैःभाः मध्यखण्ड, 25वाँ अः द्रष्टव्य है। 'अकिञ्चन श्रीकृष्णदास'—नवद्वीपवासी और प्रभुके सङ्गी थे। ये रथयात्रामें श्रीजगन्नाथ पुरी आते थे। चैःभाः अन्त्यखण्ड, 9वाँ अः द्रष्टव्य है ॥ 65-66 ॥

(29) श्रीधरकी गुणराशि :— खोला-बेचा श्रीधर प्रभुर प्रियदास। याँहा-सने प्रभु करे नित्य परिहास ॥ 67 ॥ प्रभु याँर नित्य लय थोड़-मोचा-फल। याँर फुटा-लोहपात्रे प्रभु पिला जल ॥ 68 ॥

अनुवाद—केलेके तनेको बेचने वाले श्रीधर महाप्रभुके प्रिय दास हैं, जिनके साथ महाप्रभु नित्य परिहास करते थे। महाप्रभु उनसे नित्य थोड़-मोचा-फल (केलेके वृक्षका गूदा, फूल, फल) लेते थे और जिनके लोहेके टूटे हुए बरतनमें महाप्रभुने जलपान किया था ॥ 67-68 ॥

अनुभाष्य—'श्रीधर'—नवद्वीपवासी, केलेके बागानमें उत्पन्न वस्तुओंसे ही अपना जीवन चलाने वाले एक दरिद्र ब्राह्मण थे। (चैःभाः आदिखण्ड, 8वें अः) में महाप्रभुकी इनके साथ खींचातानी, (चैःभाः मध्यखण्ड, 9वें अः) में महाप्रभुकी 'सात-पहरिया' भावमें इनके प्रति कृपा और (चैःभाः मध्यखण्ड, 23वें अः) काजीदलनके समय कीर्तन सुनकर श्रीधरके द्वारा नृत्यमें इनके छिद्रयुक्त जीर्ण लोहेके पात्रसे महाप्रभुका परमानन्दसे जल पीना तथा (चैःभाः मध्यखण्ड, 28वें अः)में महाप्रभुके संन्यास ग्रहण करनेकी पूर्व रात्रिमें इनके द्वारा दी हुई लौकी शचीमाताके द्वारा बनवाकर भोजनका प्रसङ्ग द्रष्टव्य हैं। ये रथयात्राके उपलक्ष्यमें पुरुषोत्तम धाममें गये थे। कवि कर्णपूरके मतमें ये बारह गोपालोंमें अन्यतम सखा कुसुमासव गोपाल हैं। श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 133वाँ श्लोक— “खोलाबेचातया ख्यातः पण्डितः श्रीधरो द्विजः। आसीद्व्रजे हास्यकरो यो नाम्ना कुसुमासवः ॥ 133 ॥ “व्रजमें हँसने-हँसानेवाले कुसुमासव नामक सखा अब ब्राह्मणवंशमें उत्पन्न केले बेचनेवाले श्रीधरके नामसे विख्यात हैं”॥ 67 ॥

(30) श्रीभगवान् पण्डित :— प्रभुर अतिप्रिय दास भगवान् पण्डित। याँर देहे कृष्ण पूर्वे हैल अधिष्ठित ॥ 69 ॥

अनुवाद—भगवान् पण्डित महाप्रभुके अतिप्रिय दास हैं। इनके शरीरमें पूर्वकालमें श्रीकृष्णका अधिष्ठान हुआ था ॥ 69 ॥

अनुभाष्य—'भगवान् पण्डित'—चैःभाः अन्त्यखण्ड, 9वाँ अः— “चलिलेन लेखक पण्डित भगवान्। याँर देहे कृष्ण हइयाछिला अधिष्ठान॥”

60 | श्रीचैतन्यचरितामृत

10/69-72 ] “जिनके शरीरमें श्रीकृष्णका अधिष्ठान हुआ था, वे लेखक श्रीभगवान् पण्डित चले॥” ६९॥ (31) श्रीजगदीश पण्डित और (32) हिरण्य :— जगदीश पण्डित, आर हिरण्य महाशय। यारे कृपा कैल बाल्ये प्रभु दयामय॥ ७०॥ एइ दुइ-घरे प्रभु एकादशी-दिने। विष्णुर नैवेद्य मागि' खाइल आपने॥ ७१॥ अनुवाद—जगदीश पण्डित और हिरण्य महाशय, इन दोनोंपर महाप्रभुमें अपने बाल्यकालमें कृपा की थी। इन दोनोंके घर महाप्रभुने एकादशीके दिन विष्णुके नैवेद्यको माँगकर खाया था॥ ७०-७१॥ अनुभाष्य—'जगदीश पण्डित'—श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 192वाँ श्लोक— “अपरे यज्ञपत्न्यौ श्रीजगदीश-हिरण्यकौ। एकादश्यां ययोरन्नं प्रार्थयित्वाऽघसत् प्रभुः॥” 192॥ “अन्य दो यज्ञपत्नियोंने श्रीजगदीश और श्रीहिरण्यक नाम धारणकर जन्म ग्रहण किया है, श्रीमन्महाप्रभुने एकादशीके दिन इन्हींसे अन्न माँगकर भोजन किया था।” (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 143वाँ श्लोक)— “आसीद्व्रजे चन्द्रहासो नर्त्तको रसकोविदः। सोऽयं नृत्यविनोदी श्रीजगदीशाख्य-पण्डितः॥ 143॥ “व्रजके चन्द्रहास नामक विख्यात रसज्ञ नर्त्तक अब नृत्यविनोदी श्रीजगदीश पण्डित हैं।” (चैःचः आदिलीला, 11/30, 14/39 और चैःभाः आदिखण्ड, 4था अः)—एकादशी तिथिपर महाप्रभुके द्वारा हिरण्य-जगदीशके गृहमें स्थित विष्णु भगवान्के नैवेद्यके भोजनका वर्णन है। (चैःभाः अन्त्यखण्ड, 6ठा अः)— “जगदीश पण्डित परम ज्योतिर्धाम। सपार্ষदे नित्यानन्द याँर धनप्राण॥” “जगदीश पण्डित परम ज्योतिके धाम हैं। परिकर सहित श्रीनित्यानन्द प्रभु इनके प्राणधन हैं।” 'हिरण्यपण्डित'—(चैःभाः अन्त्यखण्ड, 5वाँ अः)—नवद्वीपमें हिरण्य पण्डित नामक एक सुब्राह्मणके घरमें श्रीनित्यानन्द प्रभु एक बार बहुमूल्य अलङ्कार पहनकर विराजमान थे। एक डाकुओंके सरदारने उनके श्रीअङ्गसे उन सब अलङ्कारोंको अपहरण करनेकी बार-बार चेष्टा की, परन्तु वह इसमें सफल नहीं हुआ। तब श्रीनित्यानन्द प्रभुकी महिमाको जानकर वह उनके शरणागत हुआ॥ ७०-७१॥ (33) श्रीपुरुषोत्तम और (34) श्रीसञ्जय :— प्रभुर पड़ुया दुइ,—पुरुषोत्तम, सञ्जय। व्याकरणे दुइ शिष्य—दुइ महाशय॥ ७२॥ अनुवाद—महाप्रभुके दो व्याकरणके छात्र पुरुषोत्तम और सञ्जय थे। ये दोनों महान् व्यक्ति हैं॥ ७२॥ अनुभाष्य—'पुरुषोत्तम और सञ्जय'—ये दोनों नवद्वीपके वासी थे; पहले ये महाप्रभुके छात्र थे तथा बादमें वे महाप्रभुके कीर्त्तनके आरम्भसे उनके सङ्गी बने। (चैःभाः आदिखण्ड, 15/5-7)— “अनेक जन्मेरे भृत्य मुकुन्द सञ्जय। पुरुषोत्तम दास हेन (हन) याँहार तनय॥ ५॥ प्रतिदिन सेइ भाग्यवन्तेरे आलय। पड़ाइते गौरचन्द्र करेन विजय॥ ६॥ चण्डीगृहे गिया प्रभु वसेन प्रथमे। तबे शेषे शिष्यगण आइसेन क्रमे॥ ७॥” “मुकुन्द सञ्जय महाप्रभुके अनेक जन्मोंके सेवक हैं और पुरुषोत्तमदास उनके पुत्र हैं। प्रतिदिन महाप्रभु उनके घर पढ़ानेके लिये जाया करते थे। पहले महाप्रभु चण्डीमण्डपमें जाकर विराजमान होते, तब धीरे-धीरे उनके शिष्य वहाँ आते।” (चैःभाः अन्त्यखण्ड 8वाँ अः)— “पुरुषोत्तम सञ्जय चलिला हर्षमने। ये प्रभुर मुख्य शिष्य पूर्व अध्ययने॥” “पहले अध्ययनमें जो महाप्रभुके मुख्य शिष्य थे, वे पुरुषोत्तम सञ्जय हर्षित मनसे चले।” इसलिये श्रीचैतन्यभागवतके वर्णनके अनुसार मुकुन्द-सञ्जयके दसवाँ अध्याय | 61

[ 10/72-76 पुत्र पुरुषोत्तम सञ्जय हैं, किन्तु श्रीकविराज गोस्वामीने 'पुरुषोत्तम' और 'सञ्जय'को अलग-अलग दो व्यक्ति बतलानेके लिये इस पयारमें 'दुइ' शब्दका तीन बार प्रयोग करके श्रीचैतन्यभागवतकी धारणाको शुद्ध किया है॥ 72॥ (35) श्रीवनमाली पण्डित-शाखा :- वनमाली पण्डित शाखा विख्यात जगते। सोनार मुषल हल ये देखिल प्रभुर हाते॥ 73॥ अनुवाद-वनमाली शाखा जगत्में विख्यात है। इन्होंने महाप्रभुके हाथमें सोनेका मूसल और हल देखा था॥ 73॥ अनुभाष्य-'वनमाली पण्डित'- (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 144वाँ श्लोक)— “वेणुञ्च मुरलीं योऽधात्राग्ना मालाधरो व्रजे। सोऽधुना वनमाल्याख्यः पण्डितो गौरवल्लभः॥"144॥ “व्रजमें जो मालाधर नामक दास वेणु और मुरली धारण करते थे, वे अब गौरप्रिय श्रीवनमाली पण्डित हैं।” (चैःचः आदिलीला, 17/119) और (चैःभाः अन्त्यखण्ड 8वाँ अः)— “चलिलेन वनमाली पण्डित मङ्गल। ये देखिल सुवर्णेर श्रीहलमुषल॥” “मङ्गलमय वनमाली पण्डित चले। इन्होंने महाप्रभुके (बलदेवभावमें) उनके हाथोंमें श्रीहल और मूसलके दर्शन किये थे।” (चैःभाः मध्यखण्ड, 5वाँ अः)—परन्तु श्रीवास पण्डितके घरमें जब महाप्रभुने विष्णु सिंहासनपर चढ़कर बलदेवभाव प्रकट करते हुए श्रीनित्यानन्द प्रभुसे हल-मूसल लेकर जिस लीलाका प्रदर्शन किया था, वहाँपर श्रीवनमालीने उस दिन महाप्रभुके हाथोंमें स्वर्णके हल-मूसलको देखा था, ऐसा वर्णन नहीं है॥ 73॥ (36) श्रीबुद्धिमन्त खान :- श्रीचैतन्येर अति प्रिय बुद्धिमन्त खान। आजन्म आज्ञाकारी तैँहो सेवक-प्रधान॥ 74॥ अनुवाद-बुद्धिमन्त खान श्रीचैतन्य महाप्रभुके अति प्रिय हैं, उन्होंने जीवन पर्यन्त उनकी आज्ञाका पालन किया और वे महाप्रभुके सेवकोंमें प्रधान हैं॥ 74॥ अनुभाष्य-'बुद्धिमन्त खान'-ये नवद्वीपके एक धनवान् भक्त थे। इन्होंने राजपण्डित सनातनमिश्रकी कन्या विष्णुप्रियादेवीके साथ महाप्रभुके दूसरे विवाहका समस्त व्यय वहन किया था। महाप्रभुको वायुव्याधि होनेपर इन्होंने चिकित्सा की थी। ये महाप्रभुकी जलक्रीड़ा और कीर्तनके सङ्गी थे। श्रीचन्द्रशेखरके घरपर महाप्रभुके महालक्ष्मीके अभिनयके लिये ये वस्त्र और भूषण लाये थे। ये रथयात्राके समय नीलाचल जाते थे॥ 74॥ (37) श्रीगरुड़ पण्डित :- गरुड़ पण्डित लय श्रीनाम-मङ्गल। नाम-बले विष याँरे ना करिल बल॥ 75॥ अनुवाद-गरुड़ पण्डित सदा मङ्गलमय हरिनाम करते रहते थे। नामके प्रभावसे उनपर सर्पके विषका भी प्रभाव नहीं हुआ था॥ 75॥ अनुभाष्य-'गरुड़ पण्डित'-ये नवद्वीपमें महाप्रभुके सङ्गी थे। (चैःभाः अन्त्यखण्ड आठवाँ अध्याय)— “चलिलेन श्रीगरुड़ पण्डित हरिषे। नामबले याँरे ना लङ्घिल सर्पविषे॥ 34॥” “नामके बलपर जिनपर सर्पविषने भी प्रभाव नहीं दिखाया, वे श्रीगरुड़ पण्डित हर्षसे (रथयात्राके उपलक्ष्यमें नीलाचलकी ओर) चल पड़े।” (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 117वाँ श्लोक)— “गरुड़ः पण्डितः सोऽद्यो गरुड़ो यः पुरा श्रुतः।” “पूर्वकालके गरुड़ ही अब गरुड़ पण्डित हैं॥” 75॥ (38) श्रीगोपीनाथ सिंह :- गोपीनाथ सिंह-एक चैतन्येर दास। अक्रूर बलि' प्रभु याँरे कैला परिहास॥ 76॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुके एक दास श्रीगोपीनाथ सिंह हैं, जिन्हें महाप्रभु परिहासमें अक्रूर कहते थे॥ 76॥ 62 | श्रीचैतन्यचरितामृत

10/76-79 ] अनुभाष्य–'गोपीनाथ सिंह'-(चैःभाः अन्त्यखण्ड आठवाँ अध्याय)– “चलिलेन गोपीनाथ सिंह महाशय। 'अक्रूर' करिया याँरे गौरचन्द्र कय॥35॥” “[रथयात्रामें] गोपीनाथ सिंह महाशयने प्रस्थान किया जिन्हें महाप्रभु 'अक्रूर' कहकर बुलाते थे।” (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 117वाँ श्लोक)– “पुरा योऽक्रूरनामासीत् स गोपीनाथसिंहकः।” “पूर्वकालमें जो अक्रूर थे, वे अब गोपीनाथ सिंह हैं॥” 76॥ (5क) देवानन्द पण्डित शाखा :- भागवती देवानन्द वक्रेश्वर-कृपाते। भागवतेर भक्ति-अर्थ पाइल प्रभु हैते॥77॥ अनुवाद-भागवत वाचक देवानन्द पण्डित श्रीवक्रेश्वरकी कृपासे महाप्रभुके द्वारा भागवतके भक्ति-परक अर्थको जान पाये॥77॥ अनुभाष्य-'देवानन्द'-(चैःभाः मध्यखण्ड, 21वाँ अः)- “सार्वभौम-पिता विशारद महेश्वर। ताँहार जाङ्गाले गेला प्रभु विश्वम्भर॥6॥ सेइखाने देवानन्दपण्डितेर वास।7।” “[एक दिन] भ्रमण करते-करते महाप्रभु विश्वम्भर सार्वभौमके पिता महेश्वर विशारदके घरके सामने पहुँचे। वहाँ बाढ़से घरको बचानेके लिये एक बाँध था। वहीं देवानन्द पण्डित भी रहा करते थे।” (चैःचः मध्यलीला, 1/153)- “कुलिया-ग्रामे कैल देवानन्देर प्रसाद।” “उन्होंने कुलिया ग्राममें देवानन्दपर कृपा की।” (चैःभाः मध्यखण्ड, 21वाँ अः)-ये मोक्षकी अभिलाषासे भागवतका पाठ करते थे। एक दिन इनके पाठको सुनकर भावावेशमें श्रीवास पण्डित रोने लगे। यह देखकर इनके पाषण्डी छात्रोंने श्रीवासको डाँटकर वहाँसे निकाल दिया। इसके बहुत समय बाद, एक दिन महाप्रभुने मार्गमें जाते हुए इन्हें भागवतकी व्याख्या करते देखा, तो उन्होंने क्रोधित होकर वैष्णवमें श्रद्धाहीन देवानन्दकी तीव्र भर्त्सना की। इनका महाप्रभुमें भी विश्वास नहीं था। इनके परम सौभाग्यसे एक बार वक्रेश्वर पण्डितने इनके घरमें रहते हुए श्रीकृष्ण-कीर्तन किया था। तब उनकी कृपासे ये महाप्रभुकी महिमासे अवगत हुए। तब महाप्रभुने इन्हें भविष्यमें भागवतकी भक्ति-परक व्याख्या करनेके लिये कहा। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 106ठा श्लोक)– “पुराणानामर्थवेत्ता श्रीदेवानन्दपण्डितः। पुरासीन्द्रपरिषत्पण्डितो भागुरिर्मुनिः॥” 106॥ “श्रीनन्दकी सभाके पण्डित भागुरि मुनि नामक पुरोहित अब पुराणोंके अर्थज्ञाता श्रीदेवानन्द पण्डित हैं॥” 77॥ श्रीखण्डवासी-(39) मुकुन्द, (39क) रघुनन्दन, (40) नरहरि, (41) चिरञ्जीव, (42) सुलोचन :- खण्डवासी मुकुन्ददास, श्रीरघुनन्दन। नरहरि दास, चिरञ्जीव, सुलोचन॥78॥ एइ सब महाशाखा-चैतन्य-कृपाधाम। प्रेम-फल-फूल करे याँहा ताँहा दान॥79॥ अनुवाद-खण्डवासी मुकुन्ददास, श्रीरघुनन्दन, नरहरि दास, चिरञ्जीव और सुलोचन, ये सब कृपाके धाम श्रीचैतन्य महाप्रभुकी महाशाखा हैं। ये श्रीकृष्णप्रेमके फल-फूलको जहाँ-तहाँ, सर्वत्र ही दान करते थे॥78-79॥ अनुभाष्य-'मुकुन्ददास'-ये नारायणदासके पुत्र और नरहरि सरकार ठाकुरके बड़े भाई थे। इनके मंझले भाईका नाम माधवदास था। रघुनन्दन इनके पुत्र थे। रघुनन्दनकी वंशावली आज भी कटोआसे चार मील पश्चिममें श्रीखण्ड-ग्राममें वास करती है। रघुनन्दनके पुत्र कानाइ और उनके दो पुत्र-मदनराय (नरहरि ठाकुरके शिष्य) एवं वंशीवदन थे। टीका लिखनेके समय इनके वंशके चार सौसे अधिक व्यक्ति जीवित दसवाँ अध्याय | 63

[ 10/78-83 थे। उनकी धारावाहिक वंशप्रणाली श्रीखण्डमें है। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 175वाँ श्लोक)— “व्रजाधिकारिणी यासीद्वृन्दा देवी तु नामतः। सा श्रीमुकुन्ददासोऽद्य खण्डवासः प्रभुप्रियः॥175॥” “व्रजकी अधिकारिणी वृन्दादेवी अब श्रीमन्महाप्रभुके प्रिय खण्डग्राम-वासी श्रीमुकुन्द दास हैं।” इनके अति आश्चर्यमय श्रीकृष्णप्रेमका वर्णन (चैःचः मध्यलीला, 15/113-131)में द्रष्टव्य है। ‘रघुनन्दन’—ये श्रीगौरविग्रहकी सेवा करते थे (भक्तिरत्नाकर आठवीं तरङ्ग)। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 70वाँ श्लोक)— “व्यूहस्तृतीयः प्रद्युम्नः प्रियनर्मोसखोऽभवन्। चक्रे लीलासहायं यो राधा-माधवयोर्व्रजे। श्रीचैतन्याद्वैततनुः स एव रघुनन्दनः॥70॥” “व्रजमें जो श्रीकृष्णके प्रियनर्म सखा होकर श्रीराधा- माधवकी लीलामें सहायता करते थे तथा जो चतुर्व्यूहमें तृतीय श्रीप्रद्युम्न हैं, वे ही अब श्रीचैतन्यकी अभिन्न देह-स्वरूप श्रीरघुनन्दन हैं।” भक्तिरत्नाकर ग्रन्थकी नौवीं तरङ्गमें श्रीखण्डके महोत्सवका विवरण द्रष्टव्य है। ‘नरहरिदास सरकार ठाकुर’—(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 177वाँ श्लोक)— “पुरा मधुमती प्राणसखी वृन्दावने स्थिता। अधुना नरहर्याख्यः सरकारः प्रभोः प्रियः॥177॥ “पहले वृन्दावनमें मधुमती नामक जो प्राणसखी थीं, वे अब महाप्रभुके प्रियपात्र श्रीनरहरि सरकार हैं।” झामटपुरके निकट कोग्रामके निवासी श्रीचैतन्यमङ्गलके प्रणेता श्रीलोचनदास ठाकुर इनके शिष्य हैं। इस ग्रन्थमें श्रीगदाधर और श्रीनरहरिको महाप्रभुका अत्यन्त प्रिय बतलाया गया है। चैतन्यभागवतमें खण्डवासिसियोंका उस प्रकारसे विशेष उल्लेख नहीं मिलता। ‘चिरञ्जीव और सुलोचन’—ये दोनों खण्डवासी थे। उनका स्थान आज भी श्रीखण्डमें देखा जाता है। इनका वंश भी अभी विद्यमान है। चिरञ्जीव सेनके दो पुत्र थे। श्रीनिवासाचार्यके शिष्य और श्रीनरोत्तम ठाकुरके सङ्गी, श्रीरामचन्द्र कविराज इनके ज्येष्ठ पुत्र थे और पदकर्त्ता श्रीगोविन्ददास कविराज इनके कनिष्ठ पुत्र थे। चिरञ्जीवकी पत्नी सुनन्दा और ससुर दामोदर सेन कविराज खण्डवासी थे। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 209वाँ श्लोक)— “खण्डवासौ नरहरेः साहचर्यान्महत्तरौ। गौराङ्गैकान्तशरणौ चिरञ्जीव-सुलोचनौ॥209॥” “खण्डवासी श्रीनरहरिके सङ्ग हेतु श्रीचिरञ्जीव और सुलोचन महत्तर हैं तथा वे श्रीगौराङ्ग महाप्रभुके एकान्त आश्रित हैं॥” 78॥ कुलीनग्रामवासी—(20ख) रामानन्द, (20ग) यदुनाथ, (20घ) पुरुषोत्तम, (20ङ) शङ्कर, (20च) विद्यानन्द :— कुलीनग्रामवासी सत्यराज, रामानन्द। यदुनाथ, पुरुषोत्तम, शङ्कर, विद्यानन्द॥80॥ (20छ) वाणीनाथ बसु आदि कुलीन- ग्रामवासियोंका माहात्म्य :— वाणीनाथ बसु आदि यत ग्रामी जन। सबेइ चैतन्यभृत्य, —चैतन्य-प्राणधन॥81॥ प्रभु कहे, —‘कुलीनग्रामेर ये हय कुक्कुर। सेइ मोर प्रिय, अन्य जन बहु दूर॥82॥ कुलीनग्रामीर भाग्य कहेन ना याय। शूकर चराय डोम, सेइ कृष्ण गाय’॥83॥ अनुवाद—श्रीसत्यराज, श्रीरामानन्द, श्रीयदुनाथ, श्रीपुरुषोत्तम, श्रीशङ्कर, श्रीविद्यानन्द और श्रीवाणीनाथ बसु आदि कुलीनग्रामके वासी हैं। ये श्रीचैतन्य महाप्रभुके सेवक हैं और महाप्रभु इनके प्राणधन हैं। महाप्रभुका कहना है कि औरोंकी बात तो दूर की है, कुलीनग्रामका कुत्ता भी मुझे प्रिय है। कुलीनग्रामवासियोंके भाग्यका वर्णन नहीं किया जा सकता, वहाँके सूअर चरानेवाले डोम भी श्रीकृष्णनामका कीर्तन करते हैं॥80-83॥ अनुभाष्य—‘रामानन्द वसु’—(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 173वाँ श्लोक)— 64 | श्रीचैतन्यचरितामृत

10/80-84 ]

“कलकण्ठी-सुकण्ठ्यौ ये व्रजे गान्धर्वनाटिके। रामानन्दवसुः सत्यराजश्चापि यथायथम्॥173॥ “व्रजमें जो कलकण्ठी (कलाकण्ठी) और सुकण्ठी नामक गान्धर्व नाटिका अर्थात् नृत्य, गीत-वाद्यादि कलाओंमें निपुण थीं, वे दोनों अब यथाक्रमसे श्रीरामानन्द बसु और श्रीसत्यराज (खाँ) हैं।” श्रीयदुनाथ, श्रीपुरुषोत्तम, श्रीशङ्कर, श्रीविद्यानन्द आदि सभी बसुवंशमें ही जन्में थे। इस बसुवंशमें सभी लोग ही श्रीकृष्णभक्त और श्रीकृष्णलीलाके अभिनयमें सुदक्ष थे। अभी भी श्रीकृष्णलीला अभिनयकी स्मृति रक्षित है। ये श्रीहरिदास ठाकुरके अनुगत शुद्धभक्त थे। पूर्वोल्लिखित 48 संख्या द्रष्टव्य है ॥ 80 ॥ (43) श्रीसनातन, (44) श्रीरूप और (45) श्रीअनुपम-शाखा :- अनुपम वल्लभ, श्रीरूप, सनातन। एइ तिन शाखा वृक्षेरे पश्चिमे गणन॥84॥ अनुवाद-श्रीअनुपम वल्लभ, श्रीरूप और श्रीसनातन-इन तीन शाखाओंकी वृक्षकी पश्चिम दिशामें गणना होती है॥84॥ अनुभाष्य-‘श्रीअनुपम’-श्रीजीव गोस्वामीके पिता और श्रीसनातन एवं श्रीरूप गोस्वामीके छोटे भाई थे। पहले इनका नाम ‘श्रीवल्लभ’ था और महाप्रभुने इनको ‘अनुपम’ नाम दिया था। गौड़देशके बादशाहकी नौकरी करनेके कारण इनकी ‘मल्लिक’ उपाधि थी। चैःचः मध्यलीला 19/36- “अनुपम मल्लिक,-ताँर नाम श्रीवल्लभ। श्रीरूप गोसाञिर छोट भाई परम वैष्णव॥” भरद्वाज-गोत्रीय जगद्गुरु ‘सर्वज्ञ’-नामक एक महात्मा बारहवीं शक-शताब्दीमें कर्णाटक देशमें ब्राह्मण राजवंशमें उत्पन्न हुए। उनके पुत्र अनिरुद्धके रूपेश्वर और हरिहर नामक दो पुत्र जन्में। किन्तु ये दोनों ही राज्यसे वञ्चित हो गये और ज्येष्ठ रूपेश्वरने शिखरभूमिमें वास स्थान स्थापित किया। रूपेश्वरके पुत्र पद्मनाभके गङ्गातटपर ‘नैहाटी’ नामक ग्राममें वास करते हुए पाँच पुत्र हुए। उनमेंसे सबसे छोटे मुकुन्दके पुत्र परम सदाचारी कुमारदेव हुए। कुमारदेव-सनातन, रूप और अनुपमके पिता हैं। कुमारदेव वाक्ला-चन्द्रद्वीपमें रहते थे। उस समयके ‘यशोहर’ प्रदेशके अन्तर्गत ‘फतेहाबाद’ नामक स्थानमें उनका घर था। उनके कई पुत्रोंमेंसे तीन पुत्रोंने वैष्णव-धर्मको ग्रहण किया। बादशाहके राजपदपर कार्य करनेके कारण श्रीवल्लभ अपने ज्येष्ठ भ्राता श्रीरूप और श्रीसनातनके साथ चन्द्रद्वीपसे आकर ‘रामकेलि’ ग्राममें वास करने लगे। यहींपर ही जीव गोस्वामीका जन्म हुआ था। नवाब सरकारका कार्य करनेके कारण तीनोंको ही ‘मल्लिक’ उपाधि मिली थी। महाप्रभु जब रामकेलि ग्राममें गये थे, तब अनुपमका उनके साथ पहला साक्षात्कार हुआ। श्रीरूप गोस्वामी जब विषय-कार्योंका त्यागकर महाप्रभुके चरणाश्रय ग्रहण करनेके लिये वृन्दावन गये, तब अनुपम भी उनके साथ थे। प्रयागमें महाप्रभुसे इनके मिलनका प्रसङ्ग चैःचः मध्यलीलाके 19वें अध्यायमें द्रष्टव्य है। महाप्रभुसे भेंट करनेके बाद श्रीरूप और अनुपम वृन्दावन गये। यह महाप्रभुकी सनातन गोस्वामीके प्रति उक्तिसे जाना जाता है,-“रूप-अनुपम दुँहे वृन्दावन गेला।” उस समय सुबुद्धि राय मथुरा-नगरीमें सूखी लकड़ियाँ बेचकर अपना पोषण और अन्य वैष्णवोंकी सेवा करते थे। श्रीरूप और अनुपमके वहाँ पहुँचनेपर वे अति प्रसन्न हुए और उनको साथ लेकर वृन्दावनके बारह वनोंका भ्रमण किया। दोनों भाई वृन्दावनमें एक मास तक रहे और श्रीसनातन गोस्वामीको ढूँढनेके लिये ये गङ्गाके किनारे चलते-चलते प्रयाग पहुँचे, किन्तु श्रीसनातन राजपथसे मथुरा आ गये थे, इस कारण उनकी भेंट नहीं हो सकी। मथुरामें सुबुद्धि रायने श्रीसनातन गोस्वामीको अनुपम और श्रीरूपका समाचार दिया। श्रीरूप और अनुपम, दोनों तब काशी पहुँचे और महाप्रभुसे सारा वृत्तान्त सुनकर दस दिन बाद गौड़देशकी यात्रा की। वहाँ पहुँचकर अपनी सम्पत्तिकी व्यवस्थाका

दसवाँ अध्याय | 65

[ 10/84 समाधान करके महाप्रभुकी आज्ञानुसार वे दोनों नीलाचलमें आये। 1436 शकाब्दमें मार्गमें गङ्गातटपर अनुपमने श्रीरामचन्द्रके धामको प्राप्त किया। यह समाचार श्रीरूप गोस्वामीने नीलाचलमें महाप्रभुको दिया। श्रीवल्लभ श्रीरामचन्द्रके उपासक थे और महाप्रभुके द्वारा प्रदर्शित व्रजभजनके मार्गको वे पूर्णरूपसे ग्रहण नहीं कर पाये। वे महाप्रभुको साक्षात् श्रीरामचन्द्रके रूपमें ही जानते थे। भक्तिरत्नाकर ग्रन्थमें अनुपमके विषयमें इस प्रकार लिखा है— “अनुपम नाम थुइल श्रीगौरसुन्दर। सदा मत्त रघुनाथ-विग्रह-सेवन॥ रघुनाथ बिना येंइ अन्य नाहि जाने। साक्षात् श्रीरघुनाथ-चैतन्य गोसाञि॥” “श्रीगौरसुन्दरने उन्हें अनुपम नाम दिया। वे सदा श्रीरघुनाथके विग्रहकी सेवामें मत्त रहते थे। श्रीरघुनाथके अतिरिक्त वे किसीको नहीं जानते थे। श्रीचैतन्य गोसाञिको वे साक्षात् श्रीरघुनाथके रूपमें देखते थे।” ‘श्रीरूप गोस्वामी’—(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 180वाँ श्लोक)— “श्रीरूपमञ्जरी ख्याता यासीद् वृन्दावने पुरा। साद्य रूपाख्य-गोस्वामी भूत्वा प्रकटतामियात्॥180॥” “पहले वृन्दावनमें जो श्रीरूपमञ्जरीके नामसे विख्यात थीं, वे ही अब श्रीरूप गोस्वामीके रूपमें प्रकट हुई हैं।” भक्तिरत्नाकरकी प्रथम तरङ्गमें— “श्रीरूप गोस्वामी ग्रन्थ षोड़श करिल। (1) काव्य ‘हंसदूत’, आर (2) ‘उद्धवसन्देश’। (3) ‘कृष्णजन्मतिथिविधि’ विधान अशेष॥ (4-5) ‘गणोद्देशदीपिका’ बृहत्-लघुद्वय। (6) ‘स्तवमाला’, (7) ‘विदग्धमाधव’—रसमय॥ (8) ‘ललितमाधव’ विप्रलम्भेर अवधि। ‘दानलीला कौमुदी’ आनन्द-महोदधि॥ (9) ‘दानकेलिकौमुदी’ विदित एइ नाम। (10) ‘भक्तिरसामृतसिन्धु’ ग्रन्थ अनुपम॥ (11) ‘श्रीउज्ज्वलनीलमणि’ ग्रन्थ रसपूर। प्रयुक्ता (12) ‘आख्यातचन्द्रिका’ ग्रन्थ सुमधुर॥ (13) ‘मथुरा-महिमा’, (14) ‘पद्यावली’ ए विदित। (15) ‘नाटकचन्द्रिका’, (16) ‘लघुभागवतामृत’॥ वैष्णव-इच्छाय एकादश श्लोक कैल। कृष्णदास कविराजे विस्तारिते दिल॥ पृथक् पृथक् स्तव गोस्वामी वर्णिल। श्रीजीव-संग्रहे ‘स्तवमाला’ नाम हैल॥ संक्षेपे करिल आर विरुदलक्षण। ‘गोविन्द-विरुदावली’ ताहार लक्षण॥” “श्रीलरूप गोस्वामीने सोलह ग्रन्थोंकी रचना की। ये इस प्रकार हैं— (1) ‘हंसदूत’ (काव्य), (2) ‘उद्धवसन्देश’, (3) ‘कृष्णजन्मतिथिविधि’ (विधान), (4-5) ‘गणोद्देशदीपिका’ बृहद् और लघु, (6) ‘स्तवमाला’, (7) ‘विदग्धमाधव’ (रसमय), (8) ‘ललितमाधव’ (विप्रलम्भकी सीमा), (9) ‘दानकेलिकौमुदी’ (आनन्दका महासमुद्र), (10) ‘भक्तिरसामृतसिन्धु’ (एक अनुपम ग्रन्थ), (11) ‘श्रीउज्ज्वलनीलमणि’ (रसपूर्ण ग्रन्थ), (12) ‘आख्यातचन्द्रिका’ (सुमधुर ग्रन्थ), (13) ‘मथुरा-महिमा’, (14) ‘पद्यावली’, (15) ‘नाटकचन्द्रिका’ और (16) ‘लघुभागवतामृत’। वैष्णवोंकी इच्छासे उन्होंने ग्यारह श्लोक रचे। श्रीकृष्णदास कविराजने उनका विस्तार किया। श्रीरूप गोस्वामीने अलग-अलग स्तव लिखे, जिन्हें श्रीजीव गोस्वामीने संग्रह करके ‘स्तवमाला’ नाम दिया। संक्षेपमें विरुदलक्षणको ‘गोविन्द-विरुदावली’में लिखा।” (चैःचः मध्यलीला, 1/35-44 एवं अन्त्य, 4/219-231 संख्या द्रष्टव्य है)। चैःचः मध्यलीलाके 19वें अध्यायमें श्रीरूपका विषय-त्याग, धनका विभाग, प्रयागमें महाप्रभुसे मिलन, अनुपमके साथ वल्लभभट्टके घर प्रसाद-सेवा, प्रयागमें 66 | श्रीचैतन्यचरितामृत

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महाप्रभुसे शिक्षा ग्रहण, महाप्रभुके द्वारा उन्हें वृन्दावन जानेका आदेश वर्णित हुआ है। चैःचः अन्त्यलीलाके प्रथम अध्यायमें श्रीरूपका पुनः गौड़देशमें आगमन, अनुपमकी गङ्गा प्राप्ति, श्रीक्षेत्रमें हरिदास ठाकुरकी कुटीमें आगमन, सपरिकर महाप्रभुसे मिलन, महाप्रभुके द्वारा श्रीरूपके हस्ताक्षरकी प्रशंसा, महाप्रभुके हृदयके भावोंके अनुरूप श्लोककी रचना, ललितमाधव और विदग्धमाधवकी रचना आरम्भ, श्रीरायरामानन्दके द्वारा प्रशंसा, महाप्रभुकी भक्तिशास्त्रोंके प्रकाशकी इच्छा एवं श्रीरूपको वृन्दावन जानेकी आज्ञा, श्रीरूपका वृन्दावन गमनका वर्णन है। चैःचः अन्त्यलीला चौथे अध्यायमें सनातन गोस्वामीका वृन्दावनमें जाकर श्रीरूपके साथ मिलन, महाप्रभुकी आज्ञा पालनका वर्णन है। 'श्रीसनातन गोस्वामी'-(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 181वाँ श्लोक)- “या रूपमञ्जरीप्रेष्ठा पुरासीद्रतिमञ्जरी। सोच्यते नामभेदेन लवङ्गमञ्जरी बुधैः॥ 181 ॥ साद्य गौराभिन्नतनुः सर्वाराध्यः सनातनः। तमेव प्राविशत् कार्यान्मुनिरत्नः सनातनः॥ 182॥” “पहले जो श्रीरूपमञ्जरीकी प्रिय रतिमञ्जरी थीं और पण्डितगणोंके द्वारा नामभेदसे लवङ्गमञ्जरी कहलाती थीं, वे ही अब श्रीगौराङ्गके अभिन्न तनु, सबके आराध्य श्रीसनातन गोस्वामी हैं। मुनिरत्न सनातन भी कार्यवशतः इनमें प्रविष्ट हुए हैं।” भक्तिरत्नाकरकी प्रथम तरङ्गमें- “श्रीसनातनेर गुरु विद्यावाचस्पति। मध्ये मध्ये रामकेलि-ग्रामे ताँर स्थिति॥ सर्वशास्त्र अध्ययन करिला याँर ठाँइ। यैछे गुरुभक्ति कहि, -ऐछे साध्य नाइ॥ यवन देखिले पिता प्रायश्चित करय। हेन यवनेर सङ्ग निरन्तर हय॥ करि' मुखापेक्षा यवनेरे गृहे यान। एहेतु आपना माने म्लेच्छेरे समान॥ इथे अति दीनहीन आपना मानय॥ यबे मग्न हन दैन्य-समुद्र मझारे। म्लेच्छादिक हइते नीच माने आपनारे॥ नीचजाति-सङ्गे सदा नीच व्यवहार। एइ हेतु “नीचजात्यादिक” उक्ति ताँर॥ विप्रराज हइया महाखेदयुक्त अन्तरे। आपनाके विप्रज्ञान कभु नाहि करे॥” भक्तिरत्नाकर प्रथम तरङ्गमें- “सनातन गोस्वामीर ग्रन्थ-चतुष्टय। टीकासह 'भागवतामृत'-खण्डद्वय॥ हरिभक्तिविलास-टीका 'दिक्प्रदर्शिनी'। 'वैष्णव-तोषणी'-नाम दशम-टिप्पणी॥ 'लीलास्तव' दशम-चरित यारे कय। सनातन गोस्वामीर एइ चतुष्टय॥” “चौद्दशत सप्त छये सम्पूर्ण वृहत्। पन्नरशत चारिशके लघुतोषणी सुसम्मत॥ (महाप्रभु) रामानन्दद्वारे कन्दर्पेर दर्प नाशे। दामोदर-द्वारे नैरपेक्ष्य परकाशे॥ हरिदास-द्वारे सहिष्णुता जानाइल। सनातन-रूप-द्वारे दैन्य प्रकाशिल॥” “श्रीसनातनके गुरु विद्यावाचस्पति थे और वे कभी-कभी रामकेलि ग्राममें ठहरते थे। इन्होंने (श्रीसनातनने) उनसे सभी शास्त्रोंका अध्ययन किया था। इनकी गुरुभक्तिका वर्णन नहीं किया जा सकता है। यवनके दर्शन होनेपर प्रायश्चित करना होता है, परन्तु ये तो सदा उनका सङ्ग करते थे। ये इन नियमोंका उल्लङ्घन करके यवनोंके घर जाते थे, इस कारण वे स्वयंको मलेच्छके समान मानते थे। ये अपनेको अति दीन-हीन मानते थे और इस प्रकार ये दैन्य-समुद्रमें डूब जाते थे। इनका कहना था कि मैं म्लेच्छादिसे भी नीच हूँ, नीच जातिका सङ्ग करता हूँ और मेरा व्यवहार भी सदा नीच है। इस प्रकार ये स्वयंको नीच-जातिका कहते थे। ब्राह्मणोंमें सर्वश्रेष्ठ होकर भी कभी स्वयंको ब्राह्मण नहीं मानते थे और यवनोंकी सेवा करनेके कारण सदा इनके हृदयमें महाखेद होता था।” तथा “सनातन गोस्वामीने चार ग्रन्थोंकी रचना की। टीकासहित वृहद्भागवतामृत, हरिभक्तिविलास-टीका 'दिक्दर्शिनी', 'वैष्णव-तोषणी' नामक

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दशम स्कन्धकी टीका और 'लीलास्तव' जिसमें दशम-चरित (श्रीकृष्ण-चरित) कहा है।" 1476में वैष्णव-तोषणी और 1504में लघुतोषणी पूर्ण की। महाप्रभुने श्रीरायरामानन्दके द्वारा कामदेवके अभिमानको तोड़ा, श्रीदामोदर पण्डितके द्वारा निरपेक्षता प्रकाश की, श्रीहरिदासके द्वारा सहिष्णुता दिखलायी और श्रीसनातन-श्रीरूपके द्वारा दैन्यका प्रकाश किया।" चैःचः मध्यलीला उन्नीसवें अध्यायमें इनका विषय त्यागका चिन्तन, रोगी होनेके बहानेसे घरमें भागवत आलोचना, बादशाहका इन्हें देखने आना, बादशाहके द्वारा इन्हें बन्दी बनाना, बादशाहके साथ उड़ीसा युद्धमें जाना अस्वीकार करना, गृहत्यागके समय श्रीरूपका इनके पास कारागारमें पत्र भेजनेका वर्णन है। चैःचः मध्यलीलाके बीसवें अध्यायमें इनकी कारागार रक्षकको धन देकर मुक्ति, केवल एक सेवक ईशानके राज्यसे पलायन और आठ स्वर्ण मुद्राएँ देकर डाकुओंसे रक्षा और उनकी सहायतासे पर्वतको पार करना, ईशानको विदाकर अकेले यात्रा, हाजिपुरमें बहनोई श्रीकान्तके साथ मिलन और वहाँ रहना अस्वीकारकर केवल उनसे एक कम्बल ग्रहण करना, वाराणसीमें आगमन और चन्द्रशेखरके घर महाप्रभुसे मिलन, मुण्डन करवाकर तपनमिश्रके द्वारा प्रदत्त पुराने वस्त्रका बहिर्वास और कौपीन ग्रहण करना, महाराष्ट्र ग्रहण करना, महाप्रभुसे तत्त्वकी जिज्ञासा और महाप्रभुके द्वारा इन्हें शिक्षा प्रदान करना वर्णित है। (1) 'सम्बन्ध ज्ञान'की शिक्षा चैःचः मध्यलीलाके बीसवें और इक्कीसवें अध्यायमें वर्णित है। (2) अभिधेय-विचार-बाइसवें अध्यायमें और (3) प्रयोजन-विचार-तेइसवें अध्यायमें; महाप्रभुके द्वारा इन्हें भक्तिसिद्धान्तके ग्रन्थोंकी रचना, लुप्ततीर्थोंका उद्धार, वैष्णवस्मृति सङ्कलनके द्वारा वैष्णव-समाजका संस्थापन और भक्तिशास्त्र-प्रचारका आदेश, आशीर्वादका वर्णन है। चौबीसवें अध्यायमें इनको 'आत्माराम' श्लोककी पहले अठारह प्रकारसे और बादमें इकसठ प्रकारसे अर्थ-व्याख्या, इनका राजपयसे मथुरा गमन और सुबुद्धिरायके साथ मिलनका वर्णन है। चैःचः अन्त्यलीलाके चौथे अध्यायमें इनका झारखण्डके जङ्गलोंसे होते हुए पुनः नीलाचल आगमन, रथके पहियेके नीचे अपनी देहत्यागका सङ्कल्प, हरिदास ठाकुरसे मिलन और सपरिकर महाप्रभुके दर्शन, अनुपमकी गङ्गा-प्राप्ति और माहात्म्य श्रवण, इनके देहत्यागके सङ्कल्पमें महाप्रभुकी अस्वीकृति, इनके द्वारा महाप्रभुके प्रयोजनके अनुरूप साधनकी इच्छा, इनके द्वारा हरिदास ठाकुरकी महिमाका वर्णन, मर्यादामार्गीय श्रीजगन्नाथजीके सेवकोंको उनका स्पर्श न हो जाय, इस भयसे तप्तबालूके ऊपरसे होकर महाप्रभुके पास जाना और इनके दर्शनसे महाप्रभुकी प्रसन्नता, महाप्रभुसे जगदानन्दको वृन्दावन जानेकी आज्ञा देनेकी प्रार्थना, महाप्रभुके द्वारा इनकी स्तुति, इनकी अप्राकृत देहमें महाप्रभुकी प्रीति और आलिङ्गन, उसके फलस्वरूप दिव्यदेहकी प्राप्ति, एक वर्ष नीलाचलमें रहनेका महाप्रभुका आदेश, तत्पश्चात् इन्हें वृन्दावन भेजना, श्रीरूपके साथ बहुत समयके बाद वृन्दावनमें मिलन और महाप्रभुकी आज्ञापालनका वर्णन है। श्रीरूप और श्रीसनातन गोस्वामीका श्रीपाट श्रीरामकेलि ('गुप्त वृन्दावन') - वर्तमान शहर इंग्रेंजबाजार (मालदह) से प्राय आठ मील दक्षिणमें अवस्थित है। वहाँ निम्नलिखित देखने योग्य स्थान हैं- (1) श्रीमदनमोहन विग्रह-श्रीसनातन गोस्वामीके द्वारा प्रतिष्ठित विग्रह। (2) केलिकदम्ब वृक्ष-जिसके नीचे श्रीरूप और श्रीसनातनका महाप्रभुके साथ रात्रिमें साक्षात्कार हुआ था और सपार्षद महाप्रभुने भक्तोंको प्रेमामृतका दान किया था, ऐसा कहा जाता है। (3) रूपसागर-श्रीरूप गोस्वामीप्रभुके द्वारा प्रतिष्ठित विशाल सरोवर। इस सरोवरकी सफाई और श्रीरामकेलिपाटकी लुप्तकीर्त्ति उद्धारके लिये मालदहमें 8 जून 1924 ई० में 'रामकेलि-संस्कार-समिति' प्रतिष्ठित हुई थी ॥ 84 ॥

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10/85 ] (44क) श्रीजीव :- ताँर मध्ये रूप-सनातन—बड़ शाखा। अनुपम, जीव, राजेन्द्रादि—उपशाखा॥ 85॥ अनुवाद—इनके मध्य श्रीरूप और श्रीसनातन बड़ी शाखा हैं तथा श्रीअनुपम, श्रीजीव, श्रीराजेन्द्रादि उपशाखा हैं॥ 85॥ अनुभाष्य— 'श्रीजीव गोस्वामी'—(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 204 एवं 195 श्लोक)— "विलासमञ्जरी कामलेखा च मौनमञ्जरी॥ 195ख॥" "सुशीलः पण्डितः श्रीमान् जीवः श्रीवल्लभात्मजः। 204क।" "विलासमञ्जरी श्रीवल्लभके सुशील एवं पण्डित सुपुत्र श्रील जीव गोस्वामी हैं।" श्रीजीव बाल्यकालसे श्रीमद्भागवतके अनुरागी थे। बादमें नवद्वीपमें आकर श्रीनित्यानन्द प्रभुके आनुगत्यमें इन्होंने श्रीनवद्वीप-धामकी परिक्रमा और दर्शन किये। इन्होंने काशीमें जाकर मधुसूदन वाचस्पतिसे सभी शास्त्रोंका अध्ययन किया। उसके बाद वे वृन्दावनमें आकर श्रीरूप और श्रीसनातनके आश्रित हुए। (श्रीभक्तिरत्नाकरकी प्रथम तरङ्गमें)— “श्रीजीवेर ग्रन्थ पञ्चविंशति विदित। (1) 'हरिनाममृत व्याकरण' दिव्यरीत॥ (2) 'सूत्रमालिका' (3) 'धातुसंग्रह' सुप्रकार। (4) 'कृष्णार्च्चादीपिका'-ग्रन्थ अति चमत्कार॥ (5) 'गोपालविरुदावली' (6) 'रसामृतशेष'। (7) 'श्रीमाधव-महोत्सव' सर्वाशे विशेष॥ (8) 'श्रीसङ्कल्पकल्पवृक्ष-ग्रन्थेर प्रचार। (9) 'भावार्थसूचक'-चम्पू अति चमत्कार॥ (10) 'गोपालतापनी-टीका' (11) टीका 'ब्रह्मसंहितार'। (12) 'रसामृत-टीका' (13) 'श्रीउज्ज्वल-टीका' आर॥ (14) 'योगसारस्तवेर टीका'ते सुसङ्गति। (15) 'अग्निपुराणस्थ श्रीगायत्री-भाष्य' तथि॥ (16) पद्मपुराणोक्त 'श्रीकृष्णरे पदचिह्न'। (17) 'श्रीराधिका-कर-पदस्थित चिह्न' भिन्न॥ (18) 'गोपालचम्पू'-पूर्व-उत्तर-विभागेते। (19-25) सप्त-सन्दर्भ विख्यात भागवत-रीति। (क्रम-तत्त्व-भगवत्-परमात्म-कृष्ण-भक्ति-प्रीति)॥" “श्रीजीव गोस्वामीके द्वारा रचित पच्चीस ग्रन्थ विदित हैं। (1) 'हरिनाममृत व्याकरण', (2) 'सूत्रमालिका' (3) 'धातुसंग्रह', (4) 'कृष्णार्च्चादीपिका', (5) 'गोपालविरुदावली', (6) 'रसामृतशेष', (7) 'श्रीमाधव-महोत्सव', (8) 'श्रीसङ्कल्पकल्पवृक्ष', (9) 'भावार्थसूचक'-चम्पू, (10) 'गोपालतापनी-टीका', (11) 'ब्रह्मसंहिताकी टीका', (12) 'भक्तिरसामृतसिन्धु-टीका', (13) 'श्रीउज्ज्वलनीलमणि-टीका', (14) 'योगसार-स्तव-टीका', (15) 'अग्निपुराणके श्रीगायत्रीका भाष्य', (16) पद्मपुराणमें उक्त 'श्रीकृष्ण-पदचिह्न', (17) 'श्रीराधिका-कर-पदस्थित चिह्न', (18) 'गोपालचम्पू' पूर्व एवं उत्तर विभाग, (19-25) सप्त-सन्दर्भ (क्रम-तत्त्व-भगवत्-परमात्म- कृष्ण-भक्ति-प्रीति सन्दर्भ)। इन्होंने श्रीरूप-सनातनादिके अप्रकट होनेके बाद उत्कल-गौड़-माथुर-मण्डलके गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदायके सर्वश्रेष्ठ आचार्यपदपर अधिष्ठित होकर सबको श्रीगौरसुन्दरके द्वारा प्रचारित सत्यका प्रचारकर भजनमें लगाया। बीच-बीचमें ये भक्तोंके साथ व्रजधामकी परिक्रमा करते और मथुरामें विट्ठल-देवके दर्शन करने जाते। श्रीकविराज गोस्वामीने इनके प्रकटकालमें श्रीचैतन्यचरितामृतकी रचना की थी। इन्होंने कुछ समय बाद गौड़देशसे आये श्रीनिवास, नरोत्तम और दुःखी कृष्णदासको क्रमशः दसवाँ अध्याय | 69

[ 10/85 ‘आचार्य’, ‘ठाकुर’ और ‘श्यामानन्द’ नाम देकर सारे गोस्वामी-ग्रन्थोंके साथ गौड़देशमें नामप्रेमके प्रचारके लिये भेजा। इन्हें पहले ग्रन्थोंके अपहरणका समाचार और बादमें उनके प्राप्त होनेका समाचार मिला। इन्होंने श्रीनिवासके शिष्य रामचन्द्र सेनको और उनके छोटे भाई गोविन्दको ‘कविराज’ नाम प्रदान किया। इनके प्रकटकालमें श्रील जाह्नवा देवी कुछ भक्तोंके साथ वृन्दावनमें पधारीं। गौड़देशसे आये हुए भक्तोंके ठहरने और प्रसादकी इन्होंने व्यवस्था की। इनके शिष्य श्रीकृष्णदास अधिकारीने अपने ग्रन्थमें श्रीरूप-सनातन-जीव प्रभुओंके ग्रन्थोंकी तालिका दी है। अनभिज्ञ प्राकृत सहजिया-सम्प्रदायमें श्रीजीव गोस्वामीके विरुद्ध तीन अपवाद प्रचलित हैं, उनके द्वारा श्रीकृष्ण-विमुखताके कारण हरि-गुरु-वैष्णव-विरोध-मूलमें अवश्य ही उनके अपराध ही वर्धित हो रहे हैं। (1) जड़-प्रतिष्ठाका इच्छुक एक दिग्विजयी पण्डित निष्किञ्चन श्रीरूप-सनातनके पास आकर उन्हें शास्त्रार्थ करनेकी चुनौती देने लगा। इस चुनौतीको अपने भजनमें बाधा जानकर और तृणादपि सुनीच, अमानी-मानद व्यवहार करते हुए उन्होंने बिना शास्त्रार्थके पराजय स्वीकारकर उसे जयपत्र लिखकर दे दिया। वह उस जयपत्रको लेकर श्रीजीव गोस्वामीके पास आया और उनके गुरुवर्गको (श्रीरूप-सनातनको) मूर्ख कहकर उनको भी जयपत्र लिखनेके लिये कहने लगा। यह सुनकर जयपत्र लिखकर देनेके बदले श्रीजीव गोस्वामीने उसे शास्त्रार्थमें ललकारकर उसे पराजितकर मौन कर दिया। इस प्रकार गुरुकी निन्दा करनेवालेकी जिह्वाको स्तम्भितकर गुरुदेवके पद-नखकी शोभाकी मर्यादा प्रदर्शित करते हुए ‘गुरु-देवात्मा’के अनुरूप शिष्यके आदर्शका प्रदर्शन किया। इस घटनाके विषयमें सहजिया लोग कहते हैं,– “श्रीजीवके इस प्रकार आचरणसे तृणादपि सुनीचता और मानद-धर्मके विरोधके कारण श्रीरूप गोस्वामी प्रभुने इनकी तीव्र भर्त्सना की और इनका परित्याग कर दिया। बादमें श्रीसनातन गोस्वामी प्रभुके कहनेपर उन्होंने श्रीजीवको पुनः ग्रहण किया।” ये गुरु-वैष्णव विरोधी लोग श्रीकृष्णकी कृपासे जिस दिन अपनेको गुरु-वैष्णवका दास समझेंगे, उस दिन श्रीजीव गोस्वामीकी कृपा लाभकर वास्तविक ‘तृणादपि सुनीच’ और ‘मानद’ होकर हरिनाम-कीर्तनमें अधिकारी होंगे। (2) कोई-कोई अनभिज्ञ व्यक्ति कहते हैं– “श्रीकविराज गोस्वामी प्रभुके ‘श्रीचैतन्यचरितामृत’के रचना-सौन्दर्य और अप्राकृत व्रजरस-माहात्म्य दर्शनसे अपनी प्रतिष्ठाकी हानिकी आशङ्कासे श्रीजीव गोस्वामीके हृदयमें ईर्ष्या उदित हुई और उन्होंने मूल ‘श्रीचैतन्यचरितामृत’को कुँएमें फेंक दिया। इसे सुनकर कविराज गोस्वामीने अपने प्राण त्याग दिये। उनके मुकुन्द नामक एक शिष्यने पहलेसे मूल पाण्डुलिपिकी एक नकल करके रखी थी, इसलिये ‘श्रीचैतन्यचरितामृत’ पुनः प्रकाशित हुई, अन्यथा यह ग्रन्थ जगत्से लुप्त हो जाता।” इस प्रकारकी वैष्णव-विद्वेषमूलक कल्पना-नितान्त मिथ्या और असम्भव है। (3) अन्य कोई-कोई इन्द्रिय-भोगी व्यभिचारी लोग कहते हैं– “श्रीजीव प्रभु श्रीरूपगोस्वामीके मतानुयायी व्रजगोपियोंके ‘पारकीय’ रसको स्वीकार न करके ‘स्वकीय’ रसका अनुमोदन करते हैं। इस कारण वे रसिक भक्त नहीं थे, इसलिये उनका आदर्श ग्रहणीय नहीं है।” प्रकटकालमें अपने अनुगत लोगोंके बीच किसी-किसी भक्तकी ‘स्वकीय रस’ में रुचि देखकर उनके मङ्गलके लिये उनके अधिकारको जानकर और बादमें अनधिकारी व्यक्ति अप्राकृत परम-चमत्कारमय पारकीय-व्रजरसके सौन्दर्य एवं महिमाको न बूझकर उसका अनुकरणकर व्यभिचारमें प्रवृत्त होंगे, इसलिये वैष्णवाचार्य श्रीजीव प्रभुने स्वकीयवादको स्वीकार किया। किन्तु इस कारणसे उन्हें अप्राकृत पारकीय व्रजरसका विरोधी नहीं मानना चाहिये, क्योंकि ये स्वयं श्रीरूपानुगवर हैं और साक्षात् श्रीकविराज गोस्वामीके शिक्षागुरुवर्गके अन्यतम हैं॥85॥ 70 | श्रीचैतन्यचरितामृत

10/85 ] अमृतानुकणिका—जीव गोस्वामीने बारह कारण दिखलाकर श्रीकृष्णके साथ गोपियोंका स्वकीय भावमें सम्बन्ध स्थापित किया। लौकिक रीतिके अनुसार उपपति भाव बहुत ही निन्दनीय और अस्वर्गकर आदि है। शास्त्रोंमें भी उपपतिको घृणित बतलाया गया है। श्रीकृष्णने भी स्वयं कहा है कि कुलीन स्त्रियोंके लिये जार पुरुषकी सेवा सब प्रकारसे निन्दनीय है, उनका लोक-परलोक, दोनों ही बिगड़ता है। यह कुकर्म तो अत्यन्त तुच्छ और क्षणिक है, वर्तमानमें भी कष्टदायक है और नरकका द्वार है। परीक्षित महाराजने भी श्रीशुकदेव गोस्वामीसे प्रश्न किया कि श्रीकृष्ण तो आप्तकाम हैं, तब किसलिये उन्होंने ऐसा निन्दनीय कर्म किया? इसलिये यह निन्दनीय कर्म है। यहाँपर जानना आवश्यक है कि यह श्रीकृष्णके सम्बन्धमें नहीं, अपितु अन्य लोगोंके लिये निन्दनीय कहा गया है। श्रीकृष्णके साथ गोपियोंका नित्य दाम्पत्य सम्बन्ध है, स्त्री-पतिका सम्बन्ध है। जैसे श्रीब्रह्म-संहितामें यह बतलाया है— “आनन्दचिन्मयरसप्रतिभाविताभि- स्ताभिर्य एव निजरूपतया कलाभिः।” ह्लादिनीशक्तिकी वृत्तिरूपा प्रेयसियाँ—श्रीकृष्णके स्वरूपसे अभिन्न उन्हींकी कलाएँ हैं। शक्ति-शक्तिमान् अभेद हैं, इसलिये वे उनकी ही अपनी शक्ति हैं। गौतमीय-तन्त्रके अप्रकट-नित्यलीलाशीलन दशाक्षर मन्त्रकी व्याख्यामें भी ऐसा कहा गया है—'अनेक जन्म सिद्धानां गोपिनां पतिरेव वा' अर्थात् श्रीकृष्ण अनेक जन्मोंमें सिद्ध होनेवाली गोपियोंके पति हैं। वे समस्त विश्व-ब्रह्माण्डके पति हैं, गोपियोंके पतियोंके पति हैं, सबके पति हैं। लक्ष्मियाँ कभी भी परकीया नहीं हैं। ये लक्ष्मियोंकी भी लक्ष्मियाँ हैं, इनके लिये परकीया कैसे सम्भव है? आदि बहुतसी बातें जीव गोस्वामीजीने कही हैं और इसके अन्तमें उन्होंने लिख दिया (उज्ज्वलनीलमणि 1/21 की टीका)— “स्वेच्छया लिखितं किञ्चित् किञ्चदत्र परेच्छया। यत् पूर्वापरसम्बन्धं तत् पूर्वमपरं परम्॥” “मैंने कुछ अपनी इच्छासे लिखा है और कुछ दूसरोंके अनुरोध करनेपर लिखा है। जिसमें पूर्वापर (पहले और पीछेका) सम्बन्ध है, उसे अपनी इच्छासे लिखा है। जिसमें पूर्वापर सम्बन्ध नहीं है, उसको दूसरोंकी इच्छासे लिखा है।” अर्थात् उन्होंने कहीं पति लिखा है और कहीं उपपति—इसमें सङ्गति नहीं है, इसलिये यह उनका विचार नहीं है। यदि श्रीजीव गोस्वामी रूपानुग नहीं होते, तो वे श्रीरूप गोस्वामी रचित श्रीभक्तिरसामृतसिन्धु और उज्ज्वलनीलमणि आदि ग्रन्थोंकी टीकाओंकी रचना क्यों करते? श्रीविश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुरने भी कहा है कि श्रीजीव गोस्वामी कभी भी स्वकीयाके पक्षमें अपनी राय नहीं दे सकते हैं। उन्होंने स्वयंकी इच्छासे नहीं, अपितु दूसरोंकी इच्छासे ही ऐसी व्याख्या की है। इसलिये उन्होंने अपनी व्याख्याके उपसंहारमें स्वयं ही इस बातको स्वीकार किया है। उनकी अपनी इच्छा क्या है? जो श्रीरूप गोस्वामी और जो श्रीसनातन गोस्वामीकी इच्छा है। दूसरोंकी इच्छासे उन्होंने स्वकीयाका प्रतिपादन किया है जिससे लौकिक दृष्टिसे अनाधिकारी व्यक्ति उनमें प्रवेश न करें। विशेषकर महाप्रभुके चरणाश्रित अन्तरङ्ग भक्तोंके लिये स्वकीयाके पक्षमें व्याख्या कदापि ग्राह्य नहीं हो सकती। जीव गोस्वामीके आशयको समझना बहुत कठिन है। श्रीनिवासाचार्य, श्रीनरोत्तम ठाकुर और श्रीश्यामानन्द प्रभु—ये तीनों ही श्रीजीव गोस्वामीके शिक्षा-शिष्य हैं तथा पारकीया भावको माननेवाले हैं। इसलिये इन शिष्योंके विचारोंसे समझा जायेगा कि श्रीजीव गोस्वामीने उन्हें जो शिक्षा दी, उसीका उन्होंने प्रचार किया। श्रीनिवासाचार्य प्रभुकी ज्येष्ठ कन्या हेमलता ठाकुराणी हैं और उनके शिष्य यदुनन्दनदास ठाकुरने अपने ग्रन्थ 'कर्णानन्द'के चतुर्थ निर्यासमें लिखा है— “एइ सब निर्द्धार करि श्रीदासगोसाञि। नियम करि कुण्डतीरे बसिला तथाइ॥ दसवाँ अध्याय | 71

[ 10/85-89 ] सङ्गे कृष्णदास आर गोसाञि लोकनाथ। दिवानिशि कृष्ण कथा सदा अविरत॥ हेनइ समये ग्रन्थ गोपालचम्पू नाम। सबे मेलि आस्वादये सदा अविराम॥ आस्वादिया चित्ते अति आनन्द उल्लास। अत्यन्त दुरूह किवा श्लोकेर अभिलाष॥ बाह्यार्थे बुझाय ताहा स्वकीय बलिया। भितरेर अर्थ मात्र केवल परकीया॥ श्रीजीवेरे गम्भीर हृदय ना बुझिया। बहिलोक बाखानये स्वकीया बलिया॥ ग्रन्थेर मर्मार्थ बुझाय येन परकीया। आनन्दे निमग्न सबे ताहा आस्वादिया॥ चम्पू ग्रन्थ मर्म जानि गोसाञि कविराज। नित्यलीला स्थापन लिखिला ग्रन्थ माझ॥ श्रीगोपालचम्पू नामे ग्रन्थ महाशूर। नित्यलीला स्थापन याते व्रजरसपूर॥ रसपूर शब्दे कहि नित्य परकीया। हृदये धरह तुमि यतन कोरिया॥" महाप्रभुकी विचारधारा जिसका रूप गोस्वामीने भक्तिरसामृतसिन्धु और उज्ज्वलनीलमणि आदि ग्रन्थोंमें वर्णन किया है, उनका विचार करते हुए श्रीरघुनाथदास गोस्वामी कुण्डके तटपर रहकर नियमपूर्वक भजन करते थे। उनके साथमें श्रीकृष्णदास कविराज और श्रीलोकनाथ गोस्वामी रहते थे। श्रीकृष्णकथामें और श्रीमद्भागवतके अनुशीलनमें इनका सब समय व्यतीत होता था। उसी समय गोपालचम्पू ग्रन्थको पाकर सभी मिलकर उसका निरन्तर आस्वादन करने लगे। श्रीरघुनाथदास गोस्वामीने भी उस ग्रन्थको देखा और उसका आस्वादन किया। यदि यह स्वकीय भावका ग्रन्थ होता, तो दास गोस्वामी कभी भी उसे आँख बन्द करके भी नहीं देखते। यह उस ग्रन्थके परकीया भावका होनेका उज्ज्वल प्रमाण है। और यदुनन्दनदास ठाकुर भी असत्य बात नहीं कह सकते, क्योंकि वे हेमलता ठाकुराणीके शिष्य हैं। ग्रन्थको पढ़कर सभीको बहुत उल्लास हुआ। इसके श्लोकोंके गूढ़ अभिप्राय बड़ी कठिनतासे समझ आनेवाले हैं। ग्रन्थका इसीमें सौन्दर्य और माधुर्य है कि ऊपरसे देखनेमें एक भाव है और भीतरमें अन्य भाव है। ऊपरसे देखनेमें स्वकीय है, परन्तु भीतरसे केवल परकीया है। जीव गोस्वामीके हृदयके गम्भीर भावोंको समझ नहीं पानेके कारण विजातीय लोग इस ग्रन्थको स्वकीया भावका ग्रन्थ बतलाते हैं। ग्रन्थका जो मर्मार्थ है, वह परकीया है और सभी उसीका बड़े आनन्दसे आस्वादन करते। श्रीगोपालचम्पू ग्रन्थके वास्तविक भावको श्रीकृष्णराज गोस्वामीने भली-भाँति जानकर अपने ग्रन्थमें नित्यलीलाके रूपमें लिखा है और यह व्रजरससे परिपूर्ण है; 'रसपूर' का अर्थ है-नित्य परकीया, इसे हृदयमें यत्नपूर्वक धारण करो॥ 85॥ श्रीरूप-सनातन-शाखाका विस्तार और कार्य :- मालीर इच्छाय शाखा बहुत बाड़िल। बाड़िया पश्चिमदेशे सब आच्छादिल॥ 86॥ समस्त भारतका उद्धार :- आ-सिन्धुनदी-तीर आर हिमालय। वृन्दावन-मथुरादि यत तीर्थ हय॥ 87॥ सभीकी प्रेमोन्मत्तता :- दुइ शाखार प्रेमफले सकल भासिल। प्रेमफलास्वादे लोक उन्मत्त हइल॥ 88॥ अनुवाद-मालीकी इच्छासे शाखा बहुत बढ़ गयी और इसने पश्चिम (भारत) देशको आच्छादित कर लिया। सिन्धुनदीके तटसे लेकर हिमालय और वृन्दावन-मथुरादि जितने तीर्थ हैं, सभी दोनों शाखाओंके प्रेमफलके कारण प्रेममें डूब गये। प्रेमफलका आस्वादन करके लोग उन्मत्त हो गये॥ 86-88॥ (1) भक्ति-आचरणका प्रवर्तन :- पश्चिमेर लोक सब मूढ़ अनाचार। ताहाँ प्रचारिल दुँहे भक्ति-सदाचार॥ 89॥ अनुवाद-पश्चिम देशके लोग धर्मके विषयमें मूर्ख 72 | श्रीचैतन्यचरितामृत

और आचरण-विहीन थे। इन दो भाइयों (श्रीरूप और श्रीसनातन) ने भक्ति-सदाचारका प्रचार किया॥ 89 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-पश्चिमप्रदेशके लोग यवनोंके संसर्गसे कुछ कर्त्तव्य-विमूढ़ और बङ्गालदेशके सदाचारकी तुलनामें अनेक लोग आचार-रहित थे। वे उस समय मुसलमानादिके संसर्गसे कुछ अधिक अनाचारी हो गये थे। श्रीरूप-सनातनकी कृपासे उनकी सदाचारमें प्रवृत्ति हुई॥ 89 ॥ (2) लुप्त तीर्थोंका उद्धार और (3) श्रीमूर्त्ति-पूजा-प्रचार :- शास्त्रदृष्टे कैल लुप्ततीर्थेर उद्धार। वृन्दावने कैल श्रीमूर्त्ति-पूजार प्रचार ॥ 90 ॥ अनुवाद-शास्त्रके प्रमाणके आधारपर उन्होंने व्रजमण्डलके लुप्त तीर्थोंका उद्धार किया और वृन्दावनमें श्रीमूर्तिकी पूजाका प्रचार किया॥ 90 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'लुप्ततीर्थ' - श्रीराधाकुण्डादि लुप्ततीर्थ। 'श्रीमूर्त्ति'- श्रीमदनमोहन, श्रीगोविन्द, श्रीगोपीनाथादि सात मूर्तियोंकी पूजाका प्रचार किया॥ 90॥ (45) श्रीरघुनाथदास :- महाप्रभुर प्रिय भृत्य - रघुनाथदास । सर्व त्यजि' कैल प्रभुर पदतले वास ॥ 91 ॥ अनुवाद-महाप्रभुके प्रिय सेवक श्रीरघुनाथदास हैं, जिन्होंने सब कुछ त्यागकर उनके चरणोंमें वास किया ॥ 92 ॥ अनुभाष्य-'श्रीरघुनाथदास' - 1416 शकाब्दके लगभग हुगली जिलामें 'श्रीकृष्णपुर' ग्राममें कायस्थकुलमें इनका आविर्भाव हुआ था। इनके पिता श्रीगोवर्धन मजूमदार और इनके ताऊ श्रीहिरण्य मजूमदार थे। सप्तग्रामसे श्रील रघुनाथदास गोस्वामी प्रभुकी प्रकटभूमि 'श्रीकृष्णपुर' एक मीलसे कुछ अधिक और त्रिशबिघा-स्टेशनसे प्राय डेढ़ मीलकी दूरीपर होगी। इस स्थानपर श्रील दासगोस्वामी प्रभुके पूर्वाश्रमके पिता श्रीगोवर्धन दासके द्वारा प्रतिष्ठित प्रसिद्ध श्रीराधागोविन्दके श्रीविग्रह विराजमान हैं। मन्दिरके सामने एक विस्तृत प्राङ्गण है, कोई भी नाट्य मन्दिर नहीं है, केवल एक जगमोहन* है।' कोलकाता सिमला-निवासी श्रीयुक्त हरिचरण घोषने [टीका लिखनेके] एक वर्ष पूर्व मन्दिरका संस्कार (उद्धार) किया था। मन्दिरके प्राङ्गणके चारों ओर दीवारें हैं। जिस कक्षमें श्रीविग्रह विराजमान हैं, उसके साथवाले एक छोटेसे कक्षमें पत्थरसे बने आसनको श्रील रघुनाथदास गोस्वामी प्रभुका 'भजनासन' बतलाते हैं। यह आसन बहुत ऊँचा नहीं है (यह डेढ़ हाथ लम्बा, एक हाथ चौड़ा और पौना हाथ ऊँचा है)। ऐसा प्रसिद्ध है कि इस आसनपर बैठकर श्रील दास गोस्वामी प्रभु भजन करते थे। मन्दिरके पास बहुत ही कम पानीवाली स्रोतहीन सरस्वती नदी विराजमान है। श्रील दास गोस्वामीके पिता वैष्णवप्राय थे और वे अत्यन्त धनी थे। यदुनन्दन आचार्य श्रील दास गोस्वामीके दीक्षा गुरु थे। गृहस्थ आश्रममें प्रवेश करनेके बहुत अल्प समय बाद ही ये श्रीमन्महाप्रभुके आश्रयकी प्रार्थना करने लगे। कुछ दिन बाद ही 1439 शकाब्दमें सुयोग पाकर गृह त्यागकर पुरुषोत्तम क्षेत्र आये। वहाँ श्रीचैतन्यदेवके सुशीतल चरण लाभकर श्रीस्वरूप दामोदरके आनुगत्यमें रहने लगे। सोलह वर्ष नीलाचलमें रहनेपर महाप्रभुके अप्रकट होनेपर ये श्रीवृन्दावन आकर श्रीरूप-सनातनके पास रहने लगे। श्रीभक्तिरत्नाकरकी प्रथम तरङ्गमें- “रघुनाथदास गोस्वामीर् ग्रन्थत्रय। 'स्तवमाला' नाम 'स्तवावली' यारे कय॥ 'श्रीदान-चरित', 'मुक्ताचरित' मधुर।” “श्रीरघुनाथ गोस्वामीके तीन ग्रन्थ हैं-'स्तवमाला' या 'स्तवावली', 'श्रीदान-चरित' और 'मुक्ताचरित'।” *विग्रहके सिंहासनके सामने जो कक्ष होता है, उसे नाट्य मन्दिर कहते हैं। नाट्य मन्दिरके बाद जो कक्ष होता है, उसे जगमोहन कहते हैं।

[ 10/91-97

इनकी दीर्घ आयु थी। श्रीनिवासाचार्यने वृन्दावनसे ग्रन्थादि लेकर पुनः लौटनेसे पूर्व श्रीदास गोस्वामीकी कृपा लाभ की थी। जैसे भक्तिरत्नाकर छठी तरङ्गमें— “अतिक्षीण शरीर, दुर्बल क्षणे क्षणे। करये भक्षण किछु दुइ चारिदिने॥ दिवानिशि ना जानये श्रीनाम-ग्रहणे। नेत्रे निद्रा नाइ, अश्रुधारा दु'नयने॥ श्रीनिवास दास गोस्वामीर् सन्दर्शने। आपना मानये धन्य पड़िला चरणे॥ श्रीदास गोस्वामी श्रीनिवासे आलिङ्गिला। श्रीनिवास श्रीगौड़ गमन निवे दिला॥ शुनि' श्रीगोस्वामी मुखे अनुमति दिल।” “इनका शरीर धीरे-धीरे दुर्बल होता जा रहा था। दो-चार दिनमें ये कुछ खाते थे और दिन-रात श्रीनाम जप करते थे। इनके नेत्रोंमें निद्रा नहीं होती थी, अपितु सदा अश्रुधारा बहती रहती थी। श्रीनिवासने श्रीदास गोस्वामीके दर्शन करके अपनेको धन्य माना और उनके चरणोंमें गिर गये। श्रीदास गोस्वामीने उनका आलिङ्गन किया। श्रीनिवासने उनसे गौड़देश जानेके लिये आज्ञा माँगी। यह सुनकर श्रीदास गोस्वामीने उन्हें जानेकी अनुमति प्रदान की।” यह घटना 1512 शकाब्दके बाद की है। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 186वाँ श्लोक)— “दासश्रीरघुनाथस्य पूर्वाख्या रसमञ्जरी। अमुं केचित् प्रभाषन्ते श्रीमतीं रतिमञ्जरीम्। भानुमत्याख्यया केचिदाहुस्तं नामभेदतः॥186॥” “श्रीरघुनाथदास गोस्वामीका पूर्वनाम श्रीरसमञ्जरी है। उन्हें कोई-कोई श्रीरतिमञ्जरी भी कहते हैं। नामभेदसे कोई-कोई उन्हें भानुमति भी कहते हैं॥”91॥

श्रीस्वरूपके आनुगत्यमें श्रीरघुनाथकी श्रीगौरसेवा :— प्रभु समर्पिल ताँरे स्वरूपेर हाते। प्रभुर गुप्तसेवा कैल स्वरूपेर साथे॥92॥ श्रीगौर और श्रीस्वरूपके अप्रकटपर वृन्दावन आगमन :— षोड़श वत्सर कैल अन्तरङ्ग-सेवन। स्वरूपेर अन्तर्धाने आइला वृन्दावन॥93॥

अनुवाद—महाप्रभुने इन्हें श्रीस्वरूप दामोदरके हाथोंमें सौंप दिया। ये श्रीस्वरूप दामोदरके साथ महाप्रभुकी गुप्त रूपसे (अन्तरङ्ग) सेवा करते थे। श्रीदास गोस्वामीने सोलह वर्षतक अन्तरङ्ग सेवा की और श्रीस्वरूपके अन्तर्धान होनेपर वृन्दावन आ गये॥92-93॥

अमृतप्रवाह भाष्य— 'गुप्तसेवा'—जिन सब सेवाओंमें बाहरके लोगोंका अधिकार नहीं है। महाप्रभुका स्नान, भोजन, विश्राम, कीर्तनादिके समय जो सब अभीष्ट प्रियसेवाका प्रयोजन है, उसे ही 'अन्तरङ्ग-सेवा' कहा जाता है॥93॥

वृन्दावने दुइ भाइर चरण देखिया। गोवर्धने त्यजिब देह भृगुपात करिया॥94॥

अनुवाद—वृन्दावन आकर ये (श्रीरूप-सनातन) दोनों भाइयोंके चरणोंमें उपस्थित हुए। (महाप्रभु और श्रीस्वरूपके विरहमें इतने दुःखी थे कि) इन्होंने गोवर्धन पर्वतसे कूदकर प्राण त्यागनेका निश्चय किया था॥94॥

अमृतप्रवाह भाष्य—'भृगुपात करिया'—पर्वतके शिखरसे कूदना॥94॥

श्रीरूप-सनातनके साथ मिलन :— एइ त' निश्चय करि' आइल वृन्दावने। आसि' रूप-सनातनरे वन्दिल चरणे॥95॥ श्रीरूप-सनातनके तीसरे भाई :— तबे दुइ भाइ ताँरे मरिते ना दिल। निज तृतीय भाइ करि' निकटे राखिल॥96॥

अनुवाद—यह निश्चय करके ये वृन्दावन आये थे। वृन्दावन आकर इन्होंने श्रीरूप-सनातनके चरणोंमें गिरकर वन्दना की। तब उन दोनों भाइयोंने इन्हें ऐसे प्राण त्यागनेसे निषेध किया और अपने तीसरे भाईके समान इन्हें अपने पास प्रेमसे रखा॥95-96॥

महाप्रभुर लीला यत बाहिर-अन्तर। दुइ भाइ ताँर मुखे सुने निरन्तर॥97॥

74 | श्रीचैतन्यचरितामृत

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10/97-104 ] उनके दैनिक कृत्य :- अन्न-जल त्याग कैल अन्य-कथन। पल दुइ-तिन माठा करेन भक्षण ॥ 98 ॥ सहस्र दण्डवत् करे, लय लक्ष नाम। दुइ सहस्र वैष्णवेरे नित्य परणाम ॥ 99 ॥ अनुवाद—महाप्रभुकी जो भी बहिरङ्ग और अन्तरङ्ग लीलाएँ थीं, दोनों भाई इनके मुखसे निरन्तर सुनते थे। श्रीदास गोस्वामीने अन्न-जल और भगवद्-कथाके अतिरिक्त अन्य किसी चर्चाका त्याग कर दिया। दो-तीन पलके समयमें थोड़ासा मट्ठा पीते थे। श्रीदास गोस्वामी प्रतिदिन (लीला-स्थलियोंको) एक हजार दण्डवत् प्रणाम करते थे और वैष्णवोंको दो हजार प्रणाम निवेदन करते थे ॥ 97-99 ॥ अनुभाष्य—'माठा'—मट्ठा ॥ 98 ॥ रात्रिदिने राधाकृष्णेर मानस-सेवन। प्रहरेक महाप्रभुर चरित्र-कथन ॥ 100 ॥ तिन सन्ध्या राधाकुण्डे अपतित स्नान। व्रजवासी वैष्णवेरे आलिङ्गन दान ॥ 101 ॥ सार्द्ध सप्त प्रहर करे भक्तिर साधने। चारि दण्ड निद्रा, सेइ नहे कोनदिने ॥ 102 ॥ अनुवाद—वे रात-दिन श्रीराधा-कृष्णकी मानसिक सेवा करते थे। एक प्रहर महाप्रभुके चरित्रकी कथा करते थे। वे नियमपूर्वक दिनमें तीन बार श्रीराधाकुण्डमें स्नान करते थे और व्रजवासियोंको अपना आलिङ्गन प्रदानकर उनका सम्मान करते थे। दिनमें साढ़े सात प्रहर भक्ति-साधनमें रत रहते थे और केवल चार दण्ड* निद्रा लेते थे, किसी दिन तो वे सोते भी नहीं थे ॥ 100-102 ॥ *एक प्रहर = तीन घंटे साठ दण्ड = एक दिन एक दण्ड = चौबीस मिनट अमृतप्रवाह भाष्य—'रात्रिदिने राधाकृष्णेर मानस- सेवन'—हरिनामेके (कीर्तनके) साथ अष्टकालीन सेवाका मनन ॥ 100 ॥ श्रीरूप-रघुनाथके प्रति ग्रन्थकारका नित्यदासाभिमान :- ताँहार साधन-रीति शुनिते चमत्कार। सेइ रूप-रघुनाथ प्रभु ये आमार ॥ 103 ॥ अनुवाद—उनकी साधनकी रीति सुननेसे हृदयमें चमत्कार होता है। वे ही श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामी मेरे (कृष्णदास कविराजके) प्रभु अर्थात् शिक्षा-गुरु हैं॥ 103 ॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामी प्रभु श्रील दासगोस्वामी और श्रीरूप गोस्वामीको 'अपना प्रभु' मानते थे और उन्होंने प्रत्येक अध्यायके अन्तमें 'श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥' लिखा है। कोई-कोई 'रघुनाथ' शब्दसे श्रीरघुनाथभट्टको कहना चाहते हैं और वे उनको श्रीकविराजके पाञ्चरात्रिक दीक्षागुरु कहना चाहते हैं, परन्तु इस बातका कोई प्रमाण नहीं है। कविराज- शाखा-गुरुपरम्परामें श्रीरघुनाथभट्टका उनके दीक्षागुरुके रूपमें जो उल्लेख देखा जाता है, उसकी सत्यताका कोई विशेष परिचय नहीं मिलता है॥ 103 ॥ इँहा सबार यैछे हैल प्रभुर मिलन। आगे विस्तारिया ताहा करिब वर्णन ॥ 104 ॥ अनुवाद—ये सब अर्थात् श्रीरूप-सनातन-रघुनाथ गोस्वामी महाप्रभुसे कैसे मिले, इसका मैं बादमें विस्तारसे वर्णन करूँगा ॥ 104 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'आगे'—श्रीरघुनाथ गोस्वामीके साथ महाप्रभुके मिलनका प्रसङ्ग चैःचः अन्त्यलीला छठे अध्यायमें द्रष्टव्य है ॥ 104 ॥ अनुभाष्य—श्रीरूप गोस्वामीके साथ महाप्रभुका मिलन चैःचः मध्यलीला 19/45 संख्या, श्रीसनातनके साथ महाप्रभुका मिलन चैःचः मध्यलीला 20/51 संख्या और दसवाँ अध्याय | 75

[ 10/104-105 श्रीरघुनाथके साथ महाप्रभुका मिलन चैःचः अन्त्यलीला 6/191 संख्या द्रष्टव्य हैं॥104॥ (46) श्रीगोपाल भट्ट-शाखा :- श्रीगोपालभट्ट—एक शाखा सर्वोत्तम। रूप-सनातन-सङ्गे याँर प्रेम-आलापन ॥105॥ अनुवाद—श्रीगोपालभट्ट एक सर्वोत्तम शाखा हैं। उनका श्रीरूप-सनातनके साथ प्रेमालाप होता था॥105॥ अनुभाष्य—'श्रीगोपालभट्ट गोस्वामी'—ये श्रीरङ्गक्षेत्रके प्रवासी श्रीव्यैङ्कटभट्टके पुत्र और (पहले रामानुजीय और बादमें गौड़ीय) श्रीप्रबोधानन्दके शिष्य थे। 1433 शकाब्दमें महाप्रभुके श्रीरङ्गक्षेत्रमें 'श्री'-सम्प्रदायी व्यैङ्कटभट्टके घरपर चातुर्मास्य व्रतके उपलक्षमें अवस्थान करनेके समय इन्होंने महाप्रभुकी तन-मन-प्राणसे सेवा की। इन्होंने अपने चाचा त्रिदण्डी श्रीमत् प्रबोधानन्द सरस्वतीसे दीक्षा ग्रहण की, जैसा हरिभक्तिविलास, प्रथम विलास, द्वितीय श्लोक— “भक्तेर्विलासांश्चिनुते प्रबोधानन्दस्य शिष्यो भगवत्प्रियस्य। गोपालभट्टो रघुनाथदासं सन्तोषयन् रूप-सनातनौ च॥” “भगवान् श्रीचैतन्यदेवके प्रिय परिकर श्रीप्रबोधानन्दके शिष्य श्रीगोपालभट्ट श्रीरूप-सनातन और श्रीरघुनाथदास गोस्वामीको सन्तुष्ट करनेके लिये श्रीहरिभक्तिविलास नामक ग्रन्थका प्रणयन कर रहे हैं।” भक्तिरत्नाकरकी प्रथम तरङ्गमें— “गोपालेर माता पिता महाभाग्यवान्। श्रीचैतन्यपदे ये सौंपिल मनःप्राण॥163॥ वृन्दावने याइते पुत्रेर आज्ञा दिया। दोंहे सङ्गोपन हैला प्रभु सोडरिया॥164॥ कतदिने गोपाल गेलेन वृन्दावन। रूप-सनातन सङ्गे हइल मिलन॥165॥” (नीलाचले प्रभुके) “लिखिलेन पत्रीते श्रीरूप-सनातन। गोपालभट्टेरे वृन्दावने आगमन॥180॥” (प्रभु) “लिखये पत्रीते प्रिय रूप-सनातने। पाइल आनन्द गोपालेर आगमने॥189॥ निज-भ्राता-सम गोपाले जानिबे।190क।” “गोपालेर नामे श्रीगोस्वामी सनातन। करिल श्रीहरिभक्तिविलास-वर्णन॥198॥ श्रीरूपगोस्वामी भट्टे प्राणसम जाने। श्रीराधारमण-सेवा कराइल ताने॥200॥” (कविराज गोस्वामीके) “श्रीगोपाल भट्ट हृष्ट हैया आज्ञा दिल। ग्रन्थे निज-प्रसङ्ग वर्णिते निषेधिल॥222॥ केने निषेधिल इहा के बुझिते पारे। निरन्तर अति दीन माने आपनारे॥223॥ कविराज ताँर आज्ञा नारे लङ्घिवारे। नाम-मात्र लिखे, अन्य ना करे प्रचारे॥224॥” “प्राचीन वैष्णव-मुखे ए-सब शुनिल॥225॥” —(ग्रन्थकार घनश्यामदासेर उक्ति)। “श्रीगोपालभट्ट गोस्वामीके माता-पिता महाभाग्यवान् हैं, जिन्होंने अपने मन-प्राण श्रीचैतन्यदेवके चरणोंमें समर्पित कर दिये हैं। उन्होंने अपने पुत्रको वृन्दावन जानेकी अनुमति प्रदान की और महाप्रभुका स्मरण करते हुए अपनी देहका त्याग किया। वृन्दावन आनेके कुछ दिन बाद इनका श्रीरूप-सनातनके साथ मिलन हुआ। श्रीरूप-सनातनने इनके वृन्दावन आनेका समाचार पत्रके द्वारा महाप्रभुको नीलाचलमें भेजा। यह समाचार पाकर महाप्रभु अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने श्रीरूप-सनातनको इनको अपने छोटे भाईके समान प्रेम करनेके लिये कहा। श्रीसनातनने श्रीहरिभक्तिविलास ग्रन्थका सङ्कलनकर प्रेमवश इनके नामसे उसे प्रकाशित किया। श्रीरूप गोस्वामी भी इन्हें अपने प्राणोंके समान मानते थे। श्रीरूप-सनातनके आदेशसे इन्होंने श्रीराधारमणके विग्रहकी स्थापना की। श्रीकविराज गोस्वामीने जब श्रीचैतन्यचरितामृतके रचनाके लिये सभी वैष्णवोंसे आज्ञा ली, तो इन्होंने उस ग्रन्थमें अपने विषयमें वर्णन करनेका निषेध किया। इन्होंने क्यों निषेध किया, इसे कौन समझ सकता है? ये स्वयंको सदा अति दीन मानते थे। श्रीकविराजने इनकी आज्ञाका उल्लङ्घन नहीं किया और केवल इनका नाममात्र लिखा तथा अन्य कोई विवरण नहीं दिया। ग्रन्थकार घनश्यामदासने कहा कि यह सब उन्होंने पुराने वैष्णवोंके मुखसे सुना है।” 76 | श्रीचैतन्यचरितामृत

10/105-106 ] षट्सन्दर्भमे तत्त्व-सन्दर्भके आरम्भमें श्रीजीव गोस्वामीने श्रीरूप-सनातनको प्रणामके बाद लिखा है- “कोऽपि तद्बान्धवो भट्टो दक्षिण-द्विज-वंशजः। विविच्य व्यलिखद्-ग्रन्थं लिखिताद्वृद्धवैष्णवैः॥ तस्याद्यं ग्रन्थनालेखं क्रान्त-व्युत्क्रान्त-खण्डितम्। पर्यालोच्याथ पर्यायं कृत्वा लिखति जीवकः॥” “श्रीमध्व-श्रीरामानुज-श्रीधरस्वामी आदि प्राचीन वैष्णवाचार्योके द्वारा लिखित ग्रन्थोंके विचारादिका सङ्कलन करके श्रीरूप-सनातन, इन दोनों प्रभुओंके प्रिय सुहृद ब्राह्मणकुलमें उत्पन्न दक्षिणदेशके वासी श्रीगोपालभट्टने एक ग्रन्थ लिखा था, वह कहीं क्रमसे था और उसमें कहीं क्रम भङ्ग हुआ था तथा कहीं-कहीं खण्ड-खण्ड करके लिखा हुआ था, उसे एक क्षुद्र जीव, मैंने, पर्यालोचना करके क्रमानुसार यथायथ लिखा है।” ‘भगवत्’ आदि अन्यान्य सन्दर्भोंके आरम्भमें भी इस प्रकार वर्णन है। श्रीगोपालभट्ट ‘सत्क्रियासार-दीपिका’ के रचयिता, ‘हरिभक्तिविलास’ के सम्पादक और षट्सन्दर्भके पूर्व लेखक हैं। भक्तिरत्नाकर प्रथम तरङ्गमें— “करिलेन कृष्णकर्णामृतेर टिप्पणी। वैष्णवेर परम आनन्द याहा शुनि ॥ 228 ॥” “इन्होंने कृष्णकर्णामृत ग्रन्थकी टिप्पणी लिखी है, जिसे श्रवण करके वैष्णव परमानन्दित होते हैं।” इन्होंने श्रीराधारमण-विग्रहकी स्थापना की। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 184वाँ श्लोक)— “अनङ्गमञ्जरी यासीत् साद्य गोपालभट्टकः। भट्टगोस्वामिनं केचिदाहुः श्रीगुणमञ्जरी ॥ 184 ॥” “श्रीअनङ्गमञ्जरी ही अब श्रीगोपालभट्ट गोस्वामी हैं। कोई-कोई इन्हें गुणमञ्जरी भी कहते हैं।” श्रीनिवासाचार्य और गोपीनाथ पुजारी इनके शिष्य हैं॥105॥ (47) शङ्करारण्य-शाखा, (47क) मुकुन्द, (47ख) काशीनाथ, (47ग) रुद्र :- शङ्करारण्य-आचार्य-वृक्षेर एक शाखा। मुकुन्द, काशीनाथ, रुद्र,-उपशाखा लेखा ॥ 106 ॥ अनुवाद—शङ्करारण्य-आचार्य वृक्षकी एक और शाखा हैं और मुकुन्द, काशीनाथ और रुद्र उनकी उपशाखा हैं॥ 106 ॥ अनुभाष्य- 'शङ्करारण्य'-(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 60वाँ श्लोक)— “अस्याग्रजस्त्वकृतदारपरिग्रहः सन् सङ्कर्षणः स भगवान् भुवि विश्वरूपः। स्वीयं महः किल पुरीश्वरमापयित्वा पूर्वं परिव्रजित एव तिरोबभूव ॥” इति ॥ 60 ॥ “श्रीगौराङ्गके बड़े भाई, जो विश्वरूपके नामसे विख्यात हैं, वे भगवान् सङ्कर्षण हैं। वे विवाहसे पूर्व ही संन्यास ग्रहण करके अपने तेजको श्रीईश्वरपुरीमें स्थापित करके अन्तर्हित हो गये थे।” ये 1432 शकाब्दमें शोलापुर जिलाके अन्तर्गत पाण्डवपुर-तीर्थमें अप्रकट हुए थे-चैःचः मध्यलीला, 9/299-300 संख्या द्रष्टव्य हैं। 'मुकुन्द (मुकुन्दसञ्जय)'-इनके घरमें श्रीविश्वम्भरने पाठशाला खोली थी और इनके पुत्र पुरुषोत्तम महाप्रभुके छात्र थे। 'काशीनाथ'-ये श्रीविश्वम्भरके विवाहका संयोग करवानेवाले ब्राह्मण पण्डित थे। इन्होंने राजपण्डित सनातनको उनकी कन्या विष्णुप्रियादेवीके साथ महाप्रभुके विवाहका परामर्श दिया था। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 50वाँ श्लोक)— “यश्च सत्राजिता विप्रः प्रहितो माधवं प्रति। सत्योद्वाहाय कुलकः श्रीकाशीनाथ एव सः ॥ 50 ॥” “राजा सत्राजितने सत्यभामाके विवाहके लिये जिन कुलक नामक ब्राह्मणको श्रीमाधवके निकट भेजा था, वे ही अब काशीनाथ हैं।” 'रुद्र'-(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 135वाँ श्लोक)— “वरूथपः सखा नाम्ना कृष्णचन्द्रस्य यो व्रजे। आसीत् स एव गौराङ्गवल्लभः रुद्रपण्डितः ॥ 135 ॥” “व्रजमें वरूथप-नामक श्रीकृष्ण सखा ही अब श्रीगौराङ्ग महाप्रभुके प्रिय श्रीरुद्रपण्डित हैं।” दसवाँ अध्याय | 77

[ 10/106-108 'वल्लभपुर'-कमलाकर पिप्पलाइके श्रीपाट माहेेशके एक मील उत्तरमें है। इस स्थानपर एक विशाल मन्दिरमें काशीश्वर गोस्वामीके भाज्जे श्रीरुद्रराम पण्डितके द्वारा स्थापित श्रीराधा-वल्लभजी विराजमान हैं। रुद्रराम पण्डितके छोटे भाई यदुनन्दन बन्दोपाध्याय महाशयके वंशधर 'चक्रवर्त्तिगण' श्रीराधावल्लभजीके वर्तमान सेवायित हैं। पहले रथयात्राके समय माहेेशसे श्रीजगन्नाथदेव वल्लभपुरमें श्रीराधा-वल्लभके मन्दिरमें आते थे, किन्तु 1262 वर्षसे श्रीराधा-वल्लभजीके सेवायितोंका परस्पर मन-मलिनताके कारण यह प्रथा रुक गयी॥ 106 ॥ (48) श्रीनाथ पण्डित :- श्रीनाथ पण्डित-प्रभुर कृपार भाजन। याँर कृष्णसेवा देखि' वश त्रिभुवन॥ 107 ॥ अनुवाद-श्रीनाथ पण्डित महाप्रभुकी कृपाके विशेष पात्र हैं, जिनकी श्रीकृष्णसेवाको देखकर तीनों लोकोंके लोग आश्चर्यचकित हो जाते हैं॥ 107 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीनाथ पण्डित काँचड़ापाड़ाके निवासी थे॥ 107 ॥ अनुभाष्य-श्रीनाथ पण्डित-(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 211वाँ श्लोक)- “व्याचकार पारिपाट्यात् यो भागवत-संहिताम्। कुमारहट्टे यत्कीर्त्तिः कृष्णदेवो विराजते॥ 211॥” “ये परिपाटीके साथ भागवत-संहिताकी व्याख्या करते थे। कुमारहट्टमें इनकी कीर्त्ति श्रीकृष्णदेवके विग्रहरूपमें विराजमान है।” कुमारहट्टसे लगभग डेढ़ मीलकी दूरीपर काँचड़ापाड़ामें श्रीशिवानन्दसेनका स्थान है। उस स्थानपर शिवानन्दसेनके द्वारा प्रतिष्ठित 'श्रीगौरगोपाल' का विग्रह है और श्रीनाथ पण्डितके द्वारा प्रतिष्ठित 'श्रीकृष्णराय' नामक श्रीराधाकृष्णकी मूर्त्ति एक विशाल मन्दिरमें विराजमान है। मन्दिरके सामने बड़ा आङ्गन, भोग बनानेके लिये पाकशाला और अतिथिगृह आदि हैं। प्राङ्गणके चारों ओर ऊँची दीवारें हैं। माहेेशके मन्दिरसे भी यह मन्दिर बड़ा है। 1708 शकाब्दमें इस मन्दिरका निर्माण हुआ था। मन्दिरके सम्मुख एक अनुष्टुप श्लोकमें मन्दिरके प्रतिष्ठाताका नाम, उनके पिताका नाम, पितामहका नाम और तिथि खुदी है। कलकत्ता-पाथुरियाघाटाके निवासी परलोकगत निमाइ मल्लिक नामक एक धनी व्यक्तिने इस मन्दिरका निर्माण कराया था। श्रीनाथ पण्डित श्रीअद्वैताचार्यके शिष्य थे और शिवानन्द सेनके तीसरे पुत्र गौरगणोद्देशके लेखक परमानन्द कविकर्णपूर श्रीनाथ पण्डितके शिष्य थे। सम्भवतः कविकर्णपूरके समयमें ही श्रीकृष्णरायका विग्रह प्रकाशित हुआ था। किंवदन्तीके अनुसार श्रीवीरभद्र प्रभु एक विशाल सुरम्य पत्थर मुर्शीदाबादसे लाये थे और उस पत्थरसे वल्लभपुरके श्रीराधावल्लभ-विग्रह, खड़देहके श्रीश्यामसुन्दर विग्रह और काँचड़ापाड़ाके श्रीकृष्णरायके विग्रह प्रकाशित हुए थे। शिवानन्द सेनका प्राचीन स्थान गङ्गातटपर था और वहाँ एक टूटा-फूटा छोटासा मन्दिर था। सुना जाता है कि निमाइ मल्लिक जब काशी जा रहे थे, तब वे इस स्थानपर कुछ समय रुके थे और उन्होंने मन्दिरकी जीर्ण दशाको देखकर बादमें वहाँ एक विशाल मन्दिरका निर्माण कराया था॥ 107 ॥ (49) श्रीजगन्नाथ आचार्य :- जगन्नाथ आचार्य प्रभुर प्रिय दास। प्रभुर आज्ञाते तँहो कैल गङ्गावास॥ 108 ॥ अनुवाद-जगन्नाथ आचार्य महाप्रभुके प्रिय दास हैं। महाप्रभुकी आज्ञासे उन्होंने 'गङ्गावास' में वास किया॥ 108 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'गङ्गावास'-श्रीनवद्वीपके एक किनारे 'अलकनन्दा' नदीके तटपर 'गङ्गावास' नामक ग्राममें उन्होंने वास किया॥ 108 ॥ अनुभाष्य-(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 111वाँ श्लोक)- “आचार्यः श्रीजगन्नाथो गङ्गावासः प्रभुप्रियः। आसीत्त्रिभुवने प्राग् यो दुर्वासा गोपिकाप्रियः॥ 111 ॥” 78 | श्रीचैतन्यचरितामृत

10/108-112 ] “श्रीजगन्नाथ आचार्य और गङ्गादास, ये दोनों महाप्रभुके प्रिय थे। ये दोनों पहले श्रीनिधुवनमें गोपिकाप्रिय श्रीदुर्वासा ऋषि थे॥” 108॥ (50) कृष्णदास, (51) शेखर पण्डित, (52) कविचन्द्र, और (53) षष्ठीवर :- कृष्णदास वैद्य, आर पण्डित शेखर। कविचन्द्र, आर कीर्त्तनीया षष्ठीवर ॥ 109 ॥ (54) श्रीनाथ मिश्र, (55) शुभानन्द, (56) श्रीराम, (57) ईशान, (58) श्रीनिधि, (59) श्रीगोपीकान्त, (60) भगवान् मिश्र :- श्रीनाथ मिश्र, शुभानन्द, श्रीराम, ईशान। श्रीनिधि, श्रीगोपीकान्त, मिश्र भगवान् ॥ 110 ॥ अनुवाद—कृष्णदास वैद्य, शेखर पण्डित, कविचन्द्र, षष्ठीवर, श्रीनाथ मिश्र, शुभानन्द, श्रीराम, ईशान, श्रीनिधि, श्रीगोपीकान्त और भगवान् मिश्र अन्य शाखाएँ हैं। षष्ठीवर कीर्तनीया हैं॥ 109-110 ॥ अनुभाष्य—‘कविचन्द्र और श्रीनाथ मिश्र’— (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 171वाँ श्लोक)— “श्रीनाथमिश्रश्चित्राङ्गी कविचन्द्रो मनोहरा ॥ 171 ॥” “चित्राङ्गी सखी श्रीनाथ मिश्र और मनोहरा सखी कविचन्द्र हैं।” ‘शुभानन्द’—श्रीगौरगणोद्देश-दीपिकाके 194 और 199 श्लोकके अनुसार शुभानन्द ब्रजकी मालती हैं। ये रथके आगे नृत्यके समय सात-सम्प्रदायोंमें श्रीवास और श्रीनित्यानन्दके दलोंमें एक मुख्य गायक थे और इन्होंने भावाविष्ट महाप्रभुके मुखसे निकलती झागका पान किया था (चैःचः मध्यलीला 13/110 संख्या द्रष्टव्य है)। ‘ईशान’—(चैःभाः मध्यखण्ड आठवाँ अध्याय)— “सेविलेन सर्वकाल आइरे ईशान। चतुर्द्दशलोकमध्वे महा-भाग्यवान् ॥” “ईशानने सब समय शचीमाताकी सेवा की। चौदह लोकोंमें ये महाभाग्यवान् हैं।” वैष्णव-वन्दनामें (भक्तिरत्नाकर बारहवीं तरङ्ग)— “वन्दिब ईशानदास करयोड़ करि’। शचीठाकुराणी याँरे स्नेह कैल बड़ि॥ 94 ॥” “मैं हाथ जोड़कर ईशानदासकी वन्दना करता हूँ, जिनका स्नेहसे पालनकर शची ठाकुरानीने बड़ा किया है।” भक्तिरत्नाकरकी 12वीं तरङ्गमें— “निमाइ चाँदेर अति प्रिय से ईशान॥ 95 ॥” “ईशान निमाइ चाँदके अति प्रिय हैं॥” 109-110 ॥ (61) सुबुद्धि मिश्र, (62) हृदयानन्द, (63) कमलनयन, (64) महेश पण्डित, (65) श्रीकर, (66) मधुसूदन :- सुबुद्धि मिश्र, हृदयानन्द, कमलनयन। महेश पण्डित, श्रीकर, श्रीमघुसूदन ॥ 111 ॥ (67) पुरुषोत्तम, (68) श्रीगालीम, (69) जगन्नाथदास, (70) श्रीचन्द्रशेखर, (71) द्विज हरिदास :- पुरुषोत्तम, श्रीगालीम, जगन्नाथदास। श्रीचन्द्रशेखर वैद्य, द्विज हरिदास ॥ 112 ॥ अनुवाद—वृक्षकी अन्य शाखाएँ सुबुद्धि मिश्र, हृदयानन्द, कमलनयन, महेश पण्डित, श्रीकर, श्रीमघुसूदन, पुरुषोत्तम, श्रीगालीम, जगन्नाथदास, श्रीचन्द्रशेखर वैद्य और द्विज हरिदास हैं॥ 111-112 ॥ अनुभाष्य—‘सुबुद्धि मिश्र’—श्रीगौरगणोद्देश-दीपिकाके 194 और 201 श्लोकके अनुसार सुबुद्धि मिश्र ब्रजकी गुणचूड़ा हैं। इनका स्थान श्रीखण्डसे तीन मील पश्चिममें ‘बेलगाँ’ है। यहाँपर श्रीनिताइ-गौरका श्रीविग्रह है। टीका लिखनेके समय इनके जो वंशधर वर्तमान थे, उनका नाम श्रीगोविन्दचन्द्र गोस्वामी था। ‘कमलनयन’—श्रीगौरगणोद्देश-दीपिकाके 196 और 205 श्लोकके अनुसार कमलनयन ब्रजकी गन्धोन्मादा हैं। ‘महेश पण्डित’—चैःचः आदिलीला 11/32 संख्या द्रष्टव्य है। ‘चन्द्रशेखर वैद्य’—काशीमें रहनेके समय महाप्रभुने दसवाँ अध्याय | 79