श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 613, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें10/105-106 ] षट्सन्दर्भमे तत्त्व-सन्दर्भके आरम्भमें श्रीजीव गोस्वामीने श्रीरूप-सनातनको प्रणामके बाद लिखा है- “कोऽपि तद्बान्धवो भट्टो दक्षिण-द्विज-वंशजः। विविच्य व्यलिखद्-ग्रन्थं लिखिताद्वृद्धवैष्णवैः॥ तस्याद्यं ग्रन्थनालेखं क्रान्त-व्युत्क्रान्त-खण्डितम्। पर्यालोच्याथ पर्यायं कृत्वा लिखति जीवकः॥” “श्रीमध्व-श्रीरामानुज-श्रीधरस्वामी आदि प्राचीन वैष्णवाचार्योके द्वारा लिखित ग्रन्थोंके विचारादिका सङ्कलन करके श्रीरूप-सनातन, इन दोनों प्रभुओंके प्रिय सुहृद ब्राह्मणकुलमें उत्पन्न दक्षिणदेशके वासी श्रीगोपालभट्टने एक ग्रन्थ लिखा था, वह कहीं क्रमसे था और उसमें कहीं क्रम भङ्ग हुआ था तथा कहीं-कहीं खण्ड-खण्ड करके लिखा हुआ था, उसे एक क्षुद्र जीव, मैंने, पर्यालोचना करके क्रमानुसार यथायथ लिखा है।” ‘भगवत्’ आदि अन्यान्य सन्दर्भोंके आरम्भमें भी इस प्रकार वर्णन है। श्रीगोपालभट्ट ‘सत्क्रियासार-दीपिका’ के रचयिता, ‘हरिभक्तिविलास’ के सम्पादक और षट्सन्दर्भके पूर्व लेखक हैं। भक्तिरत्नाकर प्रथम तरङ्गमें— “करिलेन कृष्णकर्णामृतेर टिप्पणी। वैष्णवेर परम आनन्द याहा शुनि ॥ 228 ॥” “इन्होंने कृष्णकर्णामृत ग्रन्थकी टिप्पणी लिखी है, जिसे श्रवण करके वैष्णव परमानन्दित होते हैं।” इन्होंने श्रीराधारमण-विग्रहकी स्थापना की। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 184वाँ श्लोक)— “अनङ्गमञ्जरी यासीत् साद्य गोपालभट्टकः। भट्टगोस्वामिनं केचिदाहुः श्रीगुणमञ्जरी ॥ 184 ॥” “श्रीअनङ्गमञ्जरी ही अब श्रीगोपालभट्ट गोस्वामी हैं। कोई-कोई इन्हें गुणमञ्जरी भी कहते हैं।” श्रीनिवासाचार्य और गोपीनाथ पुजारी इनके शिष्य हैं॥105॥ (47) शङ्करारण्य-शाखा, (47क) मुकुन्द, (47ख) काशीनाथ, (47ग) रुद्र :- शङ्करारण्य-आचार्य-वृक्षेर एक शाखा। मुकुन्द, काशीनाथ, रुद्र,-उपशाखा लेखा ॥ 106 ॥ अनुवाद—शङ्करारण्य-आचार्य वृक्षकी एक और शाखा हैं और मुकुन्द, काशीनाथ और रुद्र उनकी उपशाखा हैं॥ 106 ॥ अनुभाष्य- 'शङ्करारण्य'-(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 60वाँ श्लोक)— “अस्याग्रजस्त्वकृतदारपरिग्रहः सन् सङ्कर्षणः स भगवान् भुवि विश्वरूपः। स्वीयं महः किल पुरीश्वरमापयित्वा पूर्वं परिव्रजित एव तिरोबभूव ॥” इति ॥ 60 ॥ “श्रीगौराङ्गके बड़े भाई, जो विश्वरूपके नामसे विख्यात हैं, वे भगवान् सङ्कर्षण हैं। वे विवाहसे पूर्व ही संन्यास ग्रहण करके अपने तेजको श्रीईश्वरपुरीमें स्थापित करके अन्तर्हित हो गये थे।” ये 1432 शकाब्दमें शोलापुर जिलाके अन्तर्गत पाण्डवपुर-तीर्थमें अप्रकट हुए थे-चैःचः मध्यलीला, 9/299-300 संख्या द्रष्टव्य हैं। 'मुकुन्द (मुकुन्दसञ्जय)'-इनके घरमें श्रीविश्वम्भरने पाठशाला खोली थी और इनके पुत्र पुरुषोत्तम महाप्रभुके छात्र थे। 'काशीनाथ'-ये श्रीविश्वम्भरके विवाहका संयोग करवानेवाले ब्राह्मण पण्डित थे। इन्होंने राजपण्डित सनातनको उनकी कन्या विष्णुप्रियादेवीके साथ महाप्रभुके विवाहका परामर्श दिया था। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 50वाँ श्लोक)— “यश्च सत्राजिता विप्रः प्रहितो माधवं प्रति। सत्योद्वाहाय कुलकः श्रीकाशीनाथ एव सः ॥ 50 ॥” “राजा सत्राजितने सत्यभामाके विवाहके लिये जिन कुलक नामक ब्राह्मणको श्रीमाधवके निकट भेजा था, वे ही अब काशीनाथ हैं।” 'रुद्र'-(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 135वाँ श्लोक)— “वरूथपः सखा नाम्ना कृष्णचन्द्रस्य यो व्रजे। आसीत् स एव गौराङ्गवल्लभः रुद्रपण्डितः ॥ 135 ॥” “व्रजमें वरूथप-नामक श्रीकृष्ण सखा ही अब श्रीगौराङ्ग महाप्रभुके प्रिय श्रीरुद्रपण्डित हैं।” दसवाँ अध्याय | 77