भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 614

[ 10/106-108 'वल्लभपुर'-कमलाकर पिप्पलाइके श्रीपाट माहेेशके एक मील उत्तरमें है। इस स्थानपर एक विशाल मन्दिरमें काशीश्वर गोस्वामीके भाज्जे श्रीरुद्रराम पण्डितके द्वारा स्थापित श्रीराधा-वल्लभजी विराजमान हैं। रुद्रराम पण्डितके छोटे भाई यदुनन्दन बन्दोपाध्याय महाशयके वंशधर 'चक्रवर्त्तिगण' श्रीराधावल्लभजीके वर्तमान सेवायित हैं। पहले रथयात्राके समय माहेेशसे श्रीजगन्नाथदेव वल्लभपुरमें श्रीराधा-वल्लभके मन्दिरमें आते थे, किन्तु 1262 वर्षसे श्रीराधा-वल्लभजीके सेवायितोंका परस्पर मन-मलिनताके कारण यह प्रथा रुक गयी॥ 106 ॥ (48) श्रीनाथ पण्डित :- श्रीनाथ पण्डित-प्रभुर कृपार भाजन। याँर कृष्णसेवा देखि' वश त्रिभुवन॥ 107 ॥ अनुवाद-श्रीनाथ पण्डित महाप्रभुकी कृपाके विशेष पात्र हैं, जिनकी श्रीकृष्णसेवाको देखकर तीनों लोकोंके लोग आश्चर्यचकित हो जाते हैं॥ 107 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीनाथ पण्डित काँचड़ापाड़ाके निवासी थे॥ 107 ॥ अनुभाष्य-श्रीनाथ पण्डित-(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 211वाँ श्लोक)- “व्याचकार पारिपाट्यात् यो भागवत-संहिताम्। कुमारहट्टे यत्कीर्त्तिः कृष्णदेवो विराजते॥ 211॥” “ये परिपाटीके साथ भागवत-संहिताकी व्याख्या करते थे। कुमारहट्टमें इनकी कीर्त्ति श्रीकृष्णदेवके विग्रहरूपमें विराजमान है।” कुमारहट्टसे लगभग डेढ़ मीलकी दूरीपर काँचड़ापाड़ामें श्रीशिवानन्दसेनका स्थान है। उस स्थानपर शिवानन्दसेनके द्वारा प्रतिष्ठित 'श्रीगौरगोपाल' का विग्रह है और श्रीनाथ पण्डितके द्वारा प्रतिष्ठित 'श्रीकृष्णराय' नामक श्रीराधाकृष्णकी मूर्त्ति एक विशाल मन्दिरमें विराजमान है। मन्दिरके सामने बड़ा आङ्गन, भोग बनानेके लिये पाकशाला और अतिथिगृह आदि हैं। प्राङ्गणके चारों ओर ऊँची दीवारें हैं। माहेेशके मन्दिरसे भी यह मन्दिर बड़ा है। 1708 शकाब्दमें इस मन्दिरका निर्माण हुआ था। मन्दिरके सम्मुख एक अनुष्टुप श्लोकमें मन्दिरके प्रतिष्ठाताका नाम, उनके पिताका नाम, पितामहका नाम और तिथि खुदी है। कलकत्ता-पाथुरियाघाटाके निवासी परलोकगत निमाइ मल्लिक नामक एक धनी व्यक्तिने इस मन्दिरका निर्माण कराया था। श्रीनाथ पण्डित श्रीअद्वैताचार्यके शिष्य थे और शिवानन्द सेनके तीसरे पुत्र गौरगणोद्देशके लेखक परमानन्द कविकर्णपूर श्रीनाथ पण्डितके शिष्य थे। सम्भवतः कविकर्णपूरके समयमें ही श्रीकृष्णरायका विग्रह प्रकाशित हुआ था। किंवदन्तीके अनुसार श्रीवीरभद्र प्रभु एक विशाल सुरम्य पत्थर मुर्शीदाबादसे लाये थे और उस पत्थरसे वल्लभपुरके श्रीराधावल्लभ-विग्रह, खड़देहके श्रीश्यामसुन्दर विग्रह और काँचड़ापाड़ाके श्रीकृष्णरायके विग्रह प्रकाशित हुए थे। शिवानन्द सेनका प्राचीन स्थान गङ्गातटपर था और वहाँ एक टूटा-फूटा छोटासा मन्दिर था। सुना जाता है कि निमाइ मल्लिक जब काशी जा रहे थे, तब वे इस स्थानपर कुछ समय रुके थे और उन्होंने मन्दिरकी जीर्ण दशाको देखकर बादमें वहाँ एक विशाल मन्दिरका निर्माण कराया था॥ 107 ॥ (49) श्रीजगन्नाथ आचार्य :- जगन्नाथ आचार्य प्रभुर प्रिय दास। प्रभुर आज्ञाते तँहो कैल गङ्गावास॥ 108 ॥ अनुवाद-जगन्नाथ आचार्य महाप्रभुके प्रिय दास हैं। महाप्रभुकी आज्ञासे उन्होंने 'गङ्गावास' में वास किया॥ 108 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'गङ्गावास'-श्रीनवद्वीपके एक किनारे 'अलकनन्दा' नदीके तटपर 'गङ्गावास' नामक ग्राममें उन्होंने वास किया॥ 108 ॥ अनुभाष्य-(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 111वाँ श्लोक)- “आचार्यः श्रीजगन्नाथो गङ्गावासः प्रभुप्रियः। आसीत्त्रिभुवने प्राग् यो दुर्वासा गोपिकाप्रियः॥ 111 ॥” 78 | श्रीचैतन्यचरितामृत