श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 615, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें10/108-112 ] “श्रीजगन्नाथ आचार्य और गङ्गादास, ये दोनों महाप्रभुके प्रिय थे। ये दोनों पहले श्रीनिधुवनमें गोपिकाप्रिय श्रीदुर्वासा ऋषि थे॥” 108॥ (50) कृष्णदास, (51) शेखर पण्डित, (52) कविचन्द्र, और (53) षष्ठीवर :- कृष्णदास वैद्य, आर पण्डित शेखर। कविचन्द्र, आर कीर्त्तनीया षष्ठीवर ॥ 109 ॥ (54) श्रीनाथ मिश्र, (55) शुभानन्द, (56) श्रीराम, (57) ईशान, (58) श्रीनिधि, (59) श्रीगोपीकान्त, (60) भगवान् मिश्र :- श्रीनाथ मिश्र, शुभानन्द, श्रीराम, ईशान। श्रीनिधि, श्रीगोपीकान्त, मिश्र भगवान् ॥ 110 ॥ अनुवाद—कृष्णदास वैद्य, शेखर पण्डित, कविचन्द्र, षष्ठीवर, श्रीनाथ मिश्र, शुभानन्द, श्रीराम, ईशान, श्रीनिधि, श्रीगोपीकान्त और भगवान् मिश्र अन्य शाखाएँ हैं। षष्ठीवर कीर्तनीया हैं॥ 109-110 ॥ अनुभाष्य—‘कविचन्द्र और श्रीनाथ मिश्र’— (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 171वाँ श्लोक)— “श्रीनाथमिश्रश्चित्राङ्गी कविचन्द्रो मनोहरा ॥ 171 ॥” “चित्राङ्गी सखी श्रीनाथ मिश्र और मनोहरा सखी कविचन्द्र हैं।” ‘शुभानन्द’—श्रीगौरगणोद्देश-दीपिकाके 194 और 199 श्लोकके अनुसार शुभानन्द ब्रजकी मालती हैं। ये रथके आगे नृत्यके समय सात-सम्प्रदायोंमें श्रीवास और श्रीनित्यानन्दके दलोंमें एक मुख्य गायक थे और इन्होंने भावाविष्ट महाप्रभुके मुखसे निकलती झागका पान किया था (चैःचः मध्यलीला 13/110 संख्या द्रष्टव्य है)। ‘ईशान’—(चैःभाः मध्यखण्ड आठवाँ अध्याय)— “सेविलेन सर्वकाल आइरे ईशान। चतुर्द्दशलोकमध्वे महा-भाग्यवान् ॥” “ईशानने सब समय शचीमाताकी सेवा की। चौदह लोकोंमें ये महाभाग्यवान् हैं।” वैष्णव-वन्दनामें (भक्तिरत्नाकर बारहवीं तरङ्ग)— “वन्दिब ईशानदास करयोड़ करि’। शचीठाकुराणी याँरे स्नेह कैल बड़ि॥ 94 ॥” “मैं हाथ जोड़कर ईशानदासकी वन्दना करता हूँ, जिनका स्नेहसे पालनकर शची ठाकुरानीने बड़ा किया है।” भक्तिरत्नाकरकी 12वीं तरङ्गमें— “निमाइ चाँदेर अति प्रिय से ईशान॥ 95 ॥” “ईशान निमाइ चाँदके अति प्रिय हैं॥” 109-110 ॥ (61) सुबुद्धि मिश्र, (62) हृदयानन्द, (63) कमलनयन, (64) महेश पण्डित, (65) श्रीकर, (66) मधुसूदन :- सुबुद्धि मिश्र, हृदयानन्द, कमलनयन। महेश पण्डित, श्रीकर, श्रीमघुसूदन ॥ 111 ॥ (67) पुरुषोत्तम, (68) श्रीगालीम, (69) जगन्नाथदास, (70) श्रीचन्द्रशेखर, (71) द्विज हरिदास :- पुरुषोत्तम, श्रीगालीम, जगन्नाथदास। श्रीचन्द्रशेखर वैद्य, द्विज हरिदास ॥ 112 ॥ अनुवाद—वृक्षकी अन्य शाखाएँ सुबुद्धि मिश्र, हृदयानन्द, कमलनयन, महेश पण्डित, श्रीकर, श्रीमघुसूदन, पुरुषोत्तम, श्रीगालीम, जगन्नाथदास, श्रीचन्द्रशेखर वैद्य और द्विज हरिदास हैं॥ 111-112 ॥ अनुभाष्य—‘सुबुद्धि मिश्र’—श्रीगौरगणोद्देश-दीपिकाके 194 और 201 श्लोकके अनुसार सुबुद्धि मिश्र ब्रजकी गुणचूड़ा हैं। इनका स्थान श्रीखण्डसे तीन मील पश्चिममें ‘बेलगाँ’ है। यहाँपर श्रीनिताइ-गौरका श्रीविग्रह है। टीका लिखनेके समय इनके जो वंशधर वर्तमान थे, उनका नाम श्रीगोविन्दचन्द्र गोस्वामी था। ‘कमलनयन’—श्रीगौरगणोद्देश-दीपिकाके 196 और 205 श्लोकके अनुसार कमलनयन ब्रजकी गन्धोन्मादा हैं। ‘महेश पण्डित’—चैःचः आदिलीला 11/32 संख्या द्रष्टव्य है। ‘चन्द्रशेखर वैद्य’—काशीमें रहनेके समय महाप्रभुने दसवाँ अध्याय | 79