श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 616, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 10/111-114 इनके घरपर वास किया था। ये लेखक थे। चैःचः “निर्मिता पुस्तिका येन 'कृष्णप्रेमतरङ्गिणी'। आदिलाीला 7/45 पयार और अनुभाष्य, 10/152, 154; श्रीमद्भागवताचार्यो गौराङ्गात्यन्तवल्लभः ॥ 203 ॥” मध्य 17/92, 19/241-243; मध्य 20/46-53, 67-71; “श्वेतमञ्जरी श्रीगौराङ्गके अत्यन्त प्रिय वही 25/62, 172 संख्या द्रष्टव्य हैं। श्रीभागवताचार्य हैं, जिन्होंने 'कृष्णप्रेमतरङ्गिणी' नामक 'द्विज हरिदास'—ये अष्टोत्तरशतनामके रचियता हैं ग्रन्थकी रचना की है।” (चैःभाः अन्त्यखण्ड पाँचवाँ अथवा नहीं, इस विषयमें संशय है। काञ्चनगड़ियाके अध्याय)— निवासी इनके दो पुत्र श्रीदाम और गोकुलानन्द श्रीनिवास “तबे प्रभु आइलेन वराहनगरे। आचार्यके शिष्य थे॥ 111-112 ॥ महाभाग्यवन्त एक ब्राह्मणेर घरे॥ 110 ॥ सेइ विप्र बड़ सुशिक्षित भागवते। (72) रामदास, (73) कविदत्त, (74) गोपालदास, प्रभु देखि' भागवत लागिल पड़िते॥ 111 ॥ (75) रघुनाथ, (76) शार्ङ्गठाकुर :— शुनिया তাহার भक्तियोगेर पठन। रामदास, कविदत्त, श्रीगोपालदास। आविष्ट हइला गौरचन्द्र नारायण॥ 112 ॥ भागवताचार्य, ठाकुर सारङ्गदास ॥ 113 ॥ प्रभु बले, भागवत एमत पड़िते। (77) जगन्नाथतीर्थ, (78) जानकीनाथ, कभु नाहि शुनि आर काहारो मुखेते॥ 119 ॥ (79) गोपाल आचार्य, (80) द्विज वाणीनाथ :— एतेके तोमार नाम 'भागवताचार्य'। जगन्नाथ तीर्थ, विप्र श्रीजानकीनाथ। इहा बइ आर कोन ना करिह कार्य॥” 120 ॥ गोपाल आचार्य आर विप्र वाणीनाथ ॥ 114 ॥ “तब महाप्रभु महाभाग्यवान् एक ब्राह्मणके घर वराहनगर आये। वे ब्राह्मण भागवतमें बड़े सुशिक्षित थे। अनुवाद—रामदास, कविदत्त, श्रीगोपालदास, भागवताचार्य, महाप्रभुको देखकर वे भागवत पढ़ने लगे। उनका ठाकुर सारङ्गदास, जगन्नाथ तीर्थ, विप्र श्रीजानकीनाथ, भक्तियोगका पाठ सुनकर महाप्रभु भावमें आविष्ट हो गोपाल आचार्य और विप्र वाणीनाथ, भक्तिवृक्षकी अन्य गये और बोले—'मैंने इस प्रकार भागवतका पाठ किसी शाखाएँ हैं॥ 113-114 ॥ औरके मुखसे कभी नहीं सुना है, इसलिये तुम्हारा नाम अमृतप्रवाह भाष्य—भागवताचार्य वराहनगरके निवासी 'भागवताचार्य' है। अब तुम भागवत पाठके अतिरिक्त थे। अभी भी उनके आश्रमको 'भागवताचार्यका पाट' कोई और कार्य नहीं करना।” इनका नाम 'रघुनाथ' भी कहते हैं। ठाकुर सारङ्ग दास मामगाछीके निवासी थे। कहते हैं। इनका पाट वराहनगर-मालिपाड़ामें गङ्गाके विप्र वाणीनाथ चम्पाहार्टीके निवासी थे॥ 113-114 ॥ तटपर है। अनुभाष्य—'श्रीगोपाल दास'—(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 'ठाकुर सारङ्गदास'—इनका एक और नाम शार्ङ्ग 158वाँ श्लोक)— ठाकुर भी है। इनको कोई-कोई शार्ङ्गपाणि या शार्ङ्गधर “पुरा श्रीतारका-पाल्यौ ये स्थिते व्रजमण्डले। भी कहते हैं। ये नवद्वीपके अन्तर्गत मोद्रुमद्वीपमें वास ते साम्प्रतं जगन्नाथ-श्रीगोपालौ प्रभोः प्रियौ॥ 158 ॥” करते हुए गङ्गातटपर निर्जनमें भजन करते थे। भगवान्के “व्रजमण्डलमें जो पहले श्रीतारका और पाली पुनः पुनः प्रेरणा देनेपर ही ये किसीको शिष्य बनानेके नामक गोपियाँ थीं, वे दोनों ही अब महाप्रभुके प्रिय लिये बाध्य हुए। तब इन्होंने निश्चय किया कि आगामी श्रीजगन्नाथ और श्रीगोपाल हैं।” दिवस प्रातःकालमें जिसे सबसे पहले देखेंगे, उसीको 'भागवताचार्य'—(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 203रा श्लोक)— अपना शिष्य बनायेंगे। घटनावश अगले दिन प्रातःकालमें 80 | श्रीचैतन्यचरितामृत