भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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[ 10/104-105 श्रीरघुनाथके साथ महाप्रभुका मिलन चैःचः अन्त्यलीला 6/191 संख्या द्रष्टव्य हैं॥104॥ (46) श्रीगोपाल भट्ट-शाखा :- श्रीगोपालभट्ट—एक शाखा सर्वोत्तम। रूप-सनातन-सङ्गे याँर प्रेम-आलापन ॥105॥ अनुवाद—श्रीगोपालभट्ट एक सर्वोत्तम शाखा हैं। उनका श्रीरूप-सनातनके साथ प्रेमालाप होता था॥105॥ अनुभाष्य—'श्रीगोपालभट्ट गोस्वामी'—ये श्रीरङ्गक्षेत्रके प्रवासी श्रीव्यैङ्कटभट्टके पुत्र और (पहले रामानुजीय और बादमें गौड़ीय) श्रीप्रबोधानन्दके शिष्य थे। 1433 शकाब्दमें महाप्रभुके श्रीरङ्गक्षेत्रमें 'श्री'-सम्प्रदायी व्यैङ्कटभट्टके घरपर चातुर्मास्य व्रतके उपलक्षमें अवस्थान करनेके समय इन्होंने महाप्रभुकी तन-मन-प्राणसे सेवा की। इन्होंने अपने चाचा त्रिदण्डी श्रीमत् प्रबोधानन्द सरस्वतीसे दीक्षा ग्रहण की, जैसा हरिभक्तिविलास, प्रथम विलास, द्वितीय श्लोक— “भक्तेर्विलासांश्चिनुते प्रबोधानन्दस्य शिष्यो भगवत्प्रियस्य। गोपालभट्टो रघुनाथदासं सन्तोषयन् रूप-सनातनौ च॥” “भगवान् श्रीचैतन्यदेवके प्रिय परिकर श्रीप्रबोधानन्दके शिष्य श्रीगोपालभट्ट श्रीरूप-सनातन और श्रीरघुनाथदास गोस्वामीको सन्तुष्ट करनेके लिये श्रीहरिभक्तिविलास नामक ग्रन्थका प्रणयन कर रहे हैं।” भक्तिरत्नाकरकी प्रथम तरङ्गमें— “गोपालेर माता पिता महाभाग्यवान्। श्रीचैतन्यपदे ये सौंपिल मनःप्राण॥163॥ वृन्दावने याइते पुत्रेर आज्ञा दिया। दोंहे सङ्गोपन हैला प्रभु सोडरिया॥164॥ कतदिने गोपाल गेलेन वृन्दावन। रूप-सनातन सङ्गे हइल मिलन॥165॥” (नीलाचले प्रभुके) “लिखिलेन पत्रीते श्रीरूप-सनातन। गोपालभट्टेरे वृन्दावने आगमन॥180॥” (प्रभु) “लिखये पत्रीते प्रिय रूप-सनातने। पाइल आनन्द गोपालेर आगमने॥189॥ निज-भ्राता-सम गोपाले जानिबे।190क।” “गोपालेर नामे श्रीगोस्वामी सनातन। करिल श्रीहरिभक्तिविलास-वर्णन॥198॥ श्रीरूपगोस्वामी भट्टे प्राणसम जाने। श्रीराधारमण-सेवा कराइल ताने॥200॥” (कविराज गोस्वामीके) “श्रीगोपाल भट्ट हृष्ट हैया आज्ञा दिल। ग्रन्थे निज-प्रसङ्ग वर्णिते निषेधिल॥222॥ केने निषेधिल इहा के बुझिते पारे। निरन्तर अति दीन माने आपनारे॥223॥ कविराज ताँर आज्ञा नारे लङ्घिवारे। नाम-मात्र लिखे, अन्य ना करे प्रचारे॥224॥” “प्राचीन वैष्णव-मुखे ए-सब शुनिल॥225॥” —(ग्रन्थकार घनश्यामदासेर उक्ति)। “श्रीगोपालभट्ट गोस्वामीके माता-पिता महाभाग्यवान् हैं, जिन्होंने अपने मन-प्राण श्रीचैतन्यदेवके चरणोंमें समर्पित कर दिये हैं। उन्होंने अपने पुत्रको वृन्दावन जानेकी अनुमति प्रदान की और महाप्रभुका स्मरण करते हुए अपनी देहका त्याग किया। वृन्दावन आनेके कुछ दिन बाद इनका श्रीरूप-सनातनके साथ मिलन हुआ। श्रीरूप-सनातनने इनके वृन्दावन आनेका समाचार पत्रके द्वारा महाप्रभुको नीलाचलमें भेजा। यह समाचार पाकर महाप्रभु अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने श्रीरूप-सनातनको इनको अपने छोटे भाईके समान प्रेम करनेके लिये कहा। श्रीसनातनने श्रीहरिभक्तिविलास ग्रन्थका सङ्कलनकर प्रेमवश इनके नामसे उसे प्रकाशित किया। श्रीरूप गोस्वामी भी इन्हें अपने प्राणोंके समान मानते थे। श्रीरूप-सनातनके आदेशसे इन्होंने श्रीराधारमणके विग्रहकी स्थापना की। श्रीकविराज गोस्वामीने जब श्रीचैतन्यचरितामृतके रचनाके लिये सभी वैष्णवोंसे आज्ञा ली, तो इन्होंने उस ग्रन्थमें अपने विषयमें वर्णन करनेका निषेध किया। इन्होंने क्यों निषेध किया, इसे कौन समझ सकता है? ये स्वयंको सदा अति दीन मानते थे। श्रीकविराजने इनकी आज्ञाका उल्लङ्घन नहीं किया और केवल इनका नाममात्र लिखा तथा अन्य कोई विवरण नहीं दिया। ग्रन्थकार घनश्यामदासने कहा कि यह सब उन्होंने पुराने वैष्णवोंके मुखसे सुना है।” 76 | श्रीचैतन्यचरितामृत