श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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10/97-104 ] उनके दैनिक कृत्य :- अन्न-जल त्याग कैल अन्य-कथन। पल दुइ-तिन माठा करेन भक्षण ॥ 98 ॥ सहस्र दण्डवत् करे, लय लक्ष नाम। दुइ सहस्र वैष्णवेरे नित्य परणाम ॥ 99 ॥ अनुवाद—महाप्रभुकी जो भी बहिरङ्ग और अन्तरङ्ग लीलाएँ थीं, दोनों भाई इनके मुखसे निरन्तर सुनते थे। श्रीदास गोस्वामीने अन्न-जल और भगवद्-कथाके अतिरिक्त अन्य किसी चर्चाका त्याग कर दिया। दो-तीन पलके समयमें थोड़ासा मट्ठा पीते थे। श्रीदास गोस्वामी प्रतिदिन (लीला-स्थलियोंको) एक हजार दण्डवत् प्रणाम करते थे और वैष्णवोंको दो हजार प्रणाम निवेदन करते थे ॥ 97-99 ॥ अनुभाष्य—'माठा'—मट्ठा ॥ 98 ॥ रात्रिदिने राधाकृष्णेर मानस-सेवन। प्रहरेक महाप्रभुर चरित्र-कथन ॥ 100 ॥ तिन सन्ध्या राधाकुण्डे अपतित स्नान। व्रजवासी वैष्णवेरे आलिङ्गन दान ॥ 101 ॥ सार्द्ध सप्त प्रहर करे भक्तिर साधने। चारि दण्ड निद्रा, सेइ नहे कोनदिने ॥ 102 ॥ अनुवाद—वे रात-दिन श्रीराधा-कृष्णकी मानसिक सेवा करते थे। एक प्रहर महाप्रभुके चरित्रकी कथा करते थे। वे नियमपूर्वक दिनमें तीन बार श्रीराधाकुण्डमें स्नान करते थे और व्रजवासियोंको अपना आलिङ्गन प्रदानकर उनका सम्मान करते थे। दिनमें साढ़े सात प्रहर भक्ति-साधनमें रत रहते थे और केवल चार दण्ड* निद्रा लेते थे, किसी दिन तो वे सोते भी नहीं थे ॥ 100-102 ॥ *एक प्रहर = तीन घंटे साठ दण्ड = एक दिन एक दण्ड = चौबीस मिनट अमृतप्रवाह भाष्य—'रात्रिदिने राधाकृष्णेर मानस- सेवन'—हरिनामेके (कीर्तनके) साथ अष्टकालीन सेवाका मनन ॥ 100 ॥ श्रीरूप-रघुनाथके प्रति ग्रन्थकारका नित्यदासाभिमान :- ताँहार साधन-रीति शुनिते चमत्कार। सेइ रूप-रघुनाथ प्रभु ये आमार ॥ 103 ॥ अनुवाद—उनकी साधनकी रीति सुननेसे हृदयमें चमत्कार होता है। वे ही श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामी मेरे (कृष्णदास कविराजके) प्रभु अर्थात् शिक्षा-गुरु हैं॥ 103 ॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामी प्रभु श्रील दासगोस्वामी और श्रीरूप गोस्वामीको 'अपना प्रभु' मानते थे और उन्होंने प्रत्येक अध्यायके अन्तमें 'श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥' लिखा है। कोई-कोई 'रघुनाथ' शब्दसे श्रीरघुनाथभट्टको कहना चाहते हैं और वे उनको श्रीकविराजके पाञ्चरात्रिक दीक्षागुरु कहना चाहते हैं, परन्तु इस बातका कोई प्रमाण नहीं है। कविराज- शाखा-गुरुपरम्परामें श्रीरघुनाथभट्टका उनके दीक्षागुरुके रूपमें जो उल्लेख देखा जाता है, उसकी सत्यताका कोई विशेष परिचय नहीं मिलता है॥ 103 ॥ इँहा सबार यैछे हैल प्रभुर मिलन। आगे विस्तारिया ताहा करिब वर्णन ॥ 104 ॥ अनुवाद—ये सब अर्थात् श्रीरूप-सनातन-रघुनाथ गोस्वामी महाप्रभुसे कैसे मिले, इसका मैं बादमें विस्तारसे वर्णन करूँगा ॥ 104 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'आगे'—श्रीरघुनाथ गोस्वामीके साथ महाप्रभुके मिलनका प्रसङ्ग चैःचः अन्त्यलीला छठे अध्यायमें द्रष्टव्य है ॥ 104 ॥ अनुभाष्य—श्रीरूप गोस्वामीके साथ महाप्रभुका मिलन चैःचः मध्यलीला 19/45 संख्या, श्रीसनातनके साथ महाप्रभुका मिलन चैःचः मध्यलीला 20/51 संख्या और दसवाँ अध्याय | 75