श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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इनकी दीर्घ आयु थी। श्रीनिवासाचार्यने वृन्दावनसे ग्रन्थादि लेकर पुनः लौटनेसे पूर्व श्रीदास गोस्वामीकी कृपा लाभ की थी। जैसे भक्तिरत्नाकर छठी तरङ्गमें— “अतिक्षीण शरीर, दुर्बल क्षणे क्षणे। करये भक्षण किछु दुइ चारिदिने॥ दिवानिशि ना जानये श्रीनाम-ग्रहणे। नेत्रे निद्रा नाइ, अश्रुधारा दु'नयने॥ श्रीनिवास दास गोस्वामीर् सन्दर्शने। आपना मानये धन्य पड़िला चरणे॥ श्रीदास गोस्वामी श्रीनिवासे आलिङ्गिला। श्रीनिवास श्रीगौड़ गमन निवे दिला॥ शुनि' श्रीगोस्वामी मुखे अनुमति दिल।” “इनका शरीर धीरे-धीरे दुर्बल होता जा रहा था। दो-चार दिनमें ये कुछ खाते थे और दिन-रात श्रीनाम जप करते थे। इनके नेत्रोंमें निद्रा नहीं होती थी, अपितु सदा अश्रुधारा बहती रहती थी। श्रीनिवासने श्रीदास गोस्वामीके दर्शन करके अपनेको धन्य माना और उनके चरणोंमें गिर गये। श्रीदास गोस्वामीने उनका आलिङ्गन किया। श्रीनिवासने उनसे गौड़देश जानेके लिये आज्ञा माँगी। यह सुनकर श्रीदास गोस्वामीने उन्हें जानेकी अनुमति प्रदान की।” यह घटना 1512 शकाब्दके बाद की है। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 186वाँ श्लोक)— “दासश्रीरघुनाथस्य पूर्वाख्या रसमञ्जरी। अमुं केचित् प्रभाषन्ते श्रीमतीं रतिमञ्जरीम्। भानुमत्याख्यया केचिदाहुस्तं नामभेदतः॥186॥” “श्रीरघुनाथदास गोस्वामीका पूर्वनाम श्रीरसमञ्जरी है। उन्हें कोई-कोई श्रीरतिमञ्जरी भी कहते हैं। नामभेदसे कोई-कोई उन्हें भानुमति भी कहते हैं॥”91॥
श्रीस्वरूपके आनुगत्यमें श्रीरघुनाथकी श्रीगौरसेवा :— प्रभु समर्पिल ताँरे स्वरूपेर हाते। प्रभुर गुप्तसेवा कैल स्वरूपेर साथे॥92॥ श्रीगौर और श्रीस्वरूपके अप्रकटपर वृन्दावन आगमन :— षोड़श वत्सर कैल अन्तरङ्ग-सेवन। स्वरूपेर अन्तर्धाने आइला वृन्दावन॥93॥
अनुवाद—महाप्रभुने इन्हें श्रीस्वरूप दामोदरके हाथोंमें सौंप दिया। ये श्रीस्वरूप दामोदरके साथ महाप्रभुकी गुप्त रूपसे (अन्तरङ्ग) सेवा करते थे। श्रीदास गोस्वामीने सोलह वर्षतक अन्तरङ्ग सेवा की और श्रीस्वरूपके अन्तर्धान होनेपर वृन्दावन आ गये॥92-93॥
अमृतप्रवाह भाष्य— 'गुप्तसेवा'—जिन सब सेवाओंमें बाहरके लोगोंका अधिकार नहीं है। महाप्रभुका स्नान, भोजन, विश्राम, कीर्तनादिके समय जो सब अभीष्ट प्रियसेवाका प्रयोजन है, उसे ही 'अन्तरङ्ग-सेवा' कहा जाता है॥93॥
वृन्दावने दुइ भाइर चरण देखिया। गोवर्धने त्यजिब देह भृगुपात करिया॥94॥
अनुवाद—वृन्दावन आकर ये (श्रीरूप-सनातन) दोनों भाइयोंके चरणोंमें उपस्थित हुए। (महाप्रभु और श्रीस्वरूपके विरहमें इतने दुःखी थे कि) इन्होंने गोवर्धन पर्वतसे कूदकर प्राण त्यागनेका निश्चय किया था॥94॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'भृगुपात करिया'—पर्वतके शिखरसे कूदना॥94॥
श्रीरूप-सनातनके साथ मिलन :— एइ त' निश्चय करि' आइल वृन्दावने। आसि' रूप-सनातनरे वन्दिल चरणे॥95॥ श्रीरूप-सनातनके तीसरे भाई :— तबे दुइ भाइ ताँरे मरिते ना दिल। निज तृतीय भाइ करि' निकटे राखिल॥96॥
अनुवाद—यह निश्चय करके ये वृन्दावन आये थे। वृन्दावन आकर इन्होंने श्रीरूप-सनातनके चरणोंमें गिरकर वन्दना की। तब उन दोनों भाइयोंने इन्हें ऐसे प्राण त्यागनेसे निषेध किया और अपने तीसरे भाईके समान इन्हें अपने पास प्रेमसे रखा॥95-96॥
महाप्रभुर लीला यत बाहिर-अन्तर। दुइ भाइ ताँर मुखे सुने निरन्तर॥97॥
74 | श्रीचैतन्यचरितामृत