श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऔर आचरण-विहीन थे। इन दो भाइयों (श्रीरूप और श्रीसनातन) ने भक्ति-सदाचारका प्रचार किया॥ 89 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-पश्चिमप्रदेशके लोग यवनोंके संसर्गसे कुछ कर्त्तव्य-विमूढ़ और बङ्गालदेशके सदाचारकी तुलनामें अनेक लोग आचार-रहित थे। वे उस समय मुसलमानादिके संसर्गसे कुछ अधिक अनाचारी हो गये थे। श्रीरूप-सनातनकी कृपासे उनकी सदाचारमें प्रवृत्ति हुई॥ 89 ॥ (2) लुप्त तीर्थोंका उद्धार और (3) श्रीमूर्त्ति-पूजा-प्रचार :- शास्त्रदृष्टे कैल लुप्ततीर्थेर उद्धार। वृन्दावने कैल श्रीमूर्त्ति-पूजार प्रचार ॥ 90 ॥ अनुवाद-शास्त्रके प्रमाणके आधारपर उन्होंने व्रजमण्डलके लुप्त तीर्थोंका उद्धार किया और वृन्दावनमें श्रीमूर्तिकी पूजाका प्रचार किया॥ 90 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'लुप्ततीर्थ' - श्रीराधाकुण्डादि लुप्ततीर्थ। 'श्रीमूर्त्ति'- श्रीमदनमोहन, श्रीगोविन्द, श्रीगोपीनाथादि सात मूर्तियोंकी पूजाका प्रचार किया॥ 90॥ (45) श्रीरघुनाथदास :- महाप्रभुर प्रिय भृत्य - रघुनाथदास । सर्व त्यजि' कैल प्रभुर पदतले वास ॥ 91 ॥ अनुवाद-महाप्रभुके प्रिय सेवक श्रीरघुनाथदास हैं, जिन्होंने सब कुछ त्यागकर उनके चरणोंमें वास किया ॥ 92 ॥ अनुभाष्य-'श्रीरघुनाथदास' - 1416 शकाब्दके लगभग हुगली जिलामें 'श्रीकृष्णपुर' ग्राममें कायस्थकुलमें इनका आविर्भाव हुआ था। इनके पिता श्रीगोवर्धन मजूमदार और इनके ताऊ श्रीहिरण्य मजूमदार थे। सप्तग्रामसे श्रील रघुनाथदास गोस्वामी प्रभुकी प्रकटभूमि 'श्रीकृष्णपुर' एक मीलसे कुछ अधिक और त्रिशबिघा-स्टेशनसे प्राय डेढ़ मीलकी दूरीपर होगी। इस स्थानपर श्रील दासगोस्वामी प्रभुके पूर्वाश्रमके पिता श्रीगोवर्धन दासके द्वारा प्रतिष्ठित प्रसिद्ध श्रीराधागोविन्दके श्रीविग्रह विराजमान हैं। मन्दिरके सामने एक विस्तृत प्राङ्गण है, कोई भी नाट्य मन्दिर नहीं है, केवल एक जगमोहन* है।' कोलकाता सिमला-निवासी श्रीयुक्त हरिचरण घोषने [टीका लिखनेके] एक वर्ष पूर्व मन्दिरका संस्कार (उद्धार) किया था। मन्दिरके प्राङ्गणके चारों ओर दीवारें हैं। जिस कक्षमें श्रीविग्रह विराजमान हैं, उसके साथवाले एक छोटेसे कक्षमें पत्थरसे बने आसनको श्रील रघुनाथदास गोस्वामी प्रभुका 'भजनासन' बतलाते हैं। यह आसन बहुत ऊँचा नहीं है (यह डेढ़ हाथ लम्बा, एक हाथ चौड़ा और पौना हाथ ऊँचा है)। ऐसा प्रसिद्ध है कि इस आसनपर बैठकर श्रील दास गोस्वामी प्रभु भजन करते थे। मन्दिरके पास बहुत ही कम पानीवाली स्रोतहीन सरस्वती नदी विराजमान है। श्रील दास गोस्वामीके पिता वैष्णवप्राय थे और वे अत्यन्त धनी थे। यदुनन्दन आचार्य श्रील दास गोस्वामीके दीक्षा गुरु थे। गृहस्थ आश्रममें प्रवेश करनेके बहुत अल्प समय बाद ही ये श्रीमन्महाप्रभुके आश्रयकी प्रार्थना करने लगे। कुछ दिन बाद ही 1439 शकाब्दमें सुयोग पाकर गृह त्यागकर पुरुषोत्तम क्षेत्र आये। वहाँ श्रीचैतन्यदेवके सुशीतल चरण लाभकर श्रीस्वरूप दामोदरके आनुगत्यमें रहने लगे। सोलह वर्ष नीलाचलमें रहनेपर महाप्रभुके अप्रकट होनेपर ये श्रीवृन्दावन आकर श्रीरूप-सनातनके पास रहने लगे। श्रीभक्तिरत्नाकरकी प्रथम तरङ्गमें- “रघुनाथदास गोस्वामीर् ग्रन्थत्रय। 'स्तवमाला' नाम 'स्तवावली' यारे कय॥ 'श्रीदान-चरित', 'मुक्ताचरित' मधुर।” “श्रीरघुनाथ गोस्वामीके तीन ग्रन्थ हैं-'स्तवमाला' या 'स्तवावली', 'श्रीदान-चरित' और 'मुक्ताचरित'।” *विग्रहके सिंहासनके सामने जो कक्ष होता है, उसे नाट्य मन्दिर कहते हैं। नाट्य मन्दिरके बाद जो कक्ष होता है, उसे जगमोहन कहते हैं।