भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 608

[ 10/85-89 ] सङ्गे कृष्णदास आर गोसाञि लोकनाथ। दिवानिशि कृष्ण कथा सदा अविरत॥ हेनइ समये ग्रन्थ गोपालचम्पू नाम। सबे मेलि आस्वादये सदा अविराम॥ आस्वादिया चित्ते अति आनन्द उल्लास। अत्यन्त दुरूह किवा श्लोकेर अभिलाष॥ बाह्यार्थे बुझाय ताहा स्वकीय बलिया। भितरेर अर्थ मात्र केवल परकीया॥ श्रीजीवेरे गम्भीर हृदय ना बुझिया। बहिलोक बाखानये स्वकीया बलिया॥ ग्रन्थेर मर्मार्थ बुझाय येन परकीया। आनन्दे निमग्न सबे ताहा आस्वादिया॥ चम्पू ग्रन्थ मर्म जानि गोसाञि कविराज। नित्यलीला स्थापन लिखिला ग्रन्थ माझ॥ श्रीगोपालचम्पू नामे ग्रन्थ महाशूर। नित्यलीला स्थापन याते व्रजरसपूर॥ रसपूर शब्दे कहि नित्य परकीया। हृदये धरह तुमि यतन कोरिया॥" महाप्रभुकी विचारधारा जिसका रूप गोस्वामीने भक्तिरसामृतसिन्धु और उज्ज्वलनीलमणि आदि ग्रन्थोंमें वर्णन किया है, उनका विचार करते हुए श्रीरघुनाथदास गोस्वामी कुण्डके तटपर रहकर नियमपूर्वक भजन करते थे। उनके साथमें श्रीकृष्णदास कविराज और श्रीलोकनाथ गोस्वामी रहते थे। श्रीकृष्णकथामें और श्रीमद्भागवतके अनुशीलनमें इनका सब समय व्यतीत होता था। उसी समय गोपालचम्पू ग्रन्थको पाकर सभी मिलकर उसका निरन्तर आस्वादन करने लगे। श्रीरघुनाथदास गोस्वामीने भी उस ग्रन्थको देखा और उसका आस्वादन किया। यदि यह स्वकीय भावका ग्रन्थ होता, तो दास गोस्वामी कभी भी उसे आँख बन्द करके भी नहीं देखते। यह उस ग्रन्थके परकीया भावका होनेका उज्ज्वल प्रमाण है। और यदुनन्दनदास ठाकुर भी असत्य बात नहीं कह सकते, क्योंकि वे हेमलता ठाकुराणीके शिष्य हैं। ग्रन्थको पढ़कर सभीको बहुत उल्लास हुआ। इसके श्लोकोंके गूढ़ अभिप्राय बड़ी कठिनतासे समझ आनेवाले हैं। ग्रन्थका इसीमें सौन्दर्य और माधुर्य है कि ऊपरसे देखनेमें एक भाव है और भीतरमें अन्य भाव है। ऊपरसे देखनेमें स्वकीय है, परन्तु भीतरसे केवल परकीया है। जीव गोस्वामीके हृदयके गम्भीर भावोंको समझ नहीं पानेके कारण विजातीय लोग इस ग्रन्थको स्वकीया भावका ग्रन्थ बतलाते हैं। ग्रन्थका जो मर्मार्थ है, वह परकीया है और सभी उसीका बड़े आनन्दसे आस्वादन करते। श्रीगोपालचम्पू ग्रन्थके वास्तविक भावको श्रीकृष्णराज गोस्वामीने भली-भाँति जानकर अपने ग्रन्थमें नित्यलीलाके रूपमें लिखा है और यह व्रजरससे परिपूर्ण है; 'रसपूर' का अर्थ है-नित्य परकीया, इसे हृदयमें यत्नपूर्वक धारण करो॥ 85॥ श्रीरूप-सनातन-शाखाका विस्तार और कार्य :- मालीर इच्छाय शाखा बहुत बाड़िल। बाड़िया पश्चिमदेशे सब आच्छादिल॥ 86॥ समस्त भारतका उद्धार :- आ-सिन्धुनदी-तीर आर हिमालय। वृन्दावन-मथुरादि यत तीर्थ हय॥ 87॥ सभीकी प्रेमोन्मत्तता :- दुइ शाखार प्रेमफले सकल भासिल। प्रेमफलास्वादे लोक उन्मत्त हइल॥ 88॥ अनुवाद-मालीकी इच्छासे शाखा बहुत बढ़ गयी और इसने पश्चिम (भारत) देशको आच्छादित कर लिया। सिन्धुनदीके तटसे लेकर हिमालय और वृन्दावन-मथुरादि जितने तीर्थ हैं, सभी दोनों शाखाओंके प्रेमफलके कारण प्रेममें डूब गये। प्रेमफलका आस्वादन करके लोग उन्मत्त हो गये॥ 86-88॥ (1) भक्ति-आचरणका प्रवर्तन :- पश्चिमेर लोक सब मूढ़ अनाचार। ताहाँ प्रचारिल दुँहे भक्ति-सदाचार॥ 89॥ अनुवाद-पश्चिम देशके लोग धर्मके विषयमें मूर्ख 72 | श्रीचैतन्यचरितामृत