भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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महाप्रभुसे शिक्षा ग्रहण, महाप्रभुके द्वारा उन्हें वृन्दावन जानेका आदेश वर्णित हुआ है। चैःचः अन्त्यलीलाके प्रथम अध्यायमें श्रीरूपका पुनः गौड़देशमें आगमन, अनुपमकी गङ्गा प्राप्ति, श्रीक्षेत्रमें हरिदास ठाकुरकी कुटीमें आगमन, सपरिकर महाप्रभुसे मिलन, महाप्रभुके द्वारा श्रीरूपके हस्ताक्षरकी प्रशंसा, महाप्रभुके हृदयके भावोंके अनुरूप श्लोककी रचना, ललितमाधव और विदग्धमाधवकी रचना आरम्भ, श्रीरायरामानन्दके द्वारा प्रशंसा, महाप्रभुकी भक्तिशास्त्रोंके प्रकाशकी इच्छा एवं श्रीरूपको वृन्दावन जानेकी आज्ञा, श्रीरूपका वृन्दावन गमनका वर्णन है। चैःचः अन्त्यलीला चौथे अध्यायमें सनातन गोस्वामीका वृन्दावनमें जाकर श्रीरूपके साथ मिलन, महाप्रभुकी आज्ञा पालनका वर्णन है। 'श्रीसनातन गोस्वामी'-(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 181वाँ श्लोक)- “या रूपमञ्जरीप्रेष्ठा पुरासीद्रतिमञ्जरी। सोच्यते नामभेदेन लवङ्गमञ्जरी बुधैः॥ 181 ॥ साद्य गौराभिन्नतनुः सर्वाराध्यः सनातनः। तमेव प्राविशत् कार्यान्मुनिरत्नः सनातनः॥ 182॥” “पहले जो श्रीरूपमञ्जरीकी प्रिय रतिमञ्जरी थीं और पण्डितगणोंके द्वारा नामभेदसे लवङ्गमञ्जरी कहलाती थीं, वे ही अब श्रीगौराङ्गके अभिन्न तनु, सबके आराध्य श्रीसनातन गोस्वामी हैं। मुनिरत्न सनातन भी कार्यवशतः इनमें प्रविष्ट हुए हैं।” भक्तिरत्नाकरकी प्रथम तरङ्गमें- “श्रीसनातनेर गुरु विद्यावाचस्पति। मध्ये मध्ये रामकेलि-ग्रामे ताँर स्थिति॥ सर्वशास्त्र अध्ययन करिला याँर ठाँइ। यैछे गुरुभक्ति कहि, -ऐछे साध्य नाइ॥ यवन देखिले पिता प्रायश्चित करय। हेन यवनेर सङ्ग निरन्तर हय॥ करि' मुखापेक्षा यवनेरे गृहे यान। एहेतु आपना माने म्लेच्छेरे समान॥ इथे अति दीनहीन आपना मानय॥ यबे मग्न हन दैन्य-समुद्र मझारे। म्लेच्छादिक हइते नीच माने आपनारे॥ नीचजाति-सङ्गे सदा नीच व्यवहार। एइ हेतु “नीचजात्यादिक” उक्ति ताँर॥ विप्रराज हइया महाखेदयुक्त अन्तरे। आपनाके विप्रज्ञान कभु नाहि करे॥” भक्तिरत्नाकर प्रथम तरङ्गमें- “सनातन गोस्वामीर ग्रन्थ-चतुष्टय। टीकासह 'भागवतामृत'-खण्डद्वय॥ हरिभक्तिविलास-टीका 'दिक्प्रदर्शिनी'। 'वैष्णव-तोषणी'-नाम दशम-टिप्पणी॥ 'लीलास्तव' दशम-चरित यारे कय। सनातन गोस्वामीर एइ चतुष्टय॥” “चौद्दशत सप्त छये सम्पूर्ण वृहत्। पन्नरशत चारिशके लघुतोषणी सुसम्मत॥ (महाप्रभु) रामानन्दद्वारे कन्दर्पेर दर्प नाशे। दामोदर-द्वारे नैरपेक्ष्य परकाशे॥ हरिदास-द्वारे सहिष्णुता जानाइल। सनातन-रूप-द्वारे दैन्य प्रकाशिल॥” “श्रीसनातनके गुरु विद्यावाचस्पति थे और वे कभी-कभी रामकेलि ग्राममें ठहरते थे। इन्होंने (श्रीसनातनने) उनसे सभी शास्त्रोंका अध्ययन किया था। इनकी गुरुभक्तिका वर्णन नहीं किया जा सकता है। यवनके दर्शन होनेपर प्रायश्चित करना होता है, परन्तु ये तो सदा उनका सङ्ग करते थे। ये इन नियमोंका उल्लङ्घन करके यवनोंके घर जाते थे, इस कारण वे स्वयंको मलेच्छके समान मानते थे। ये अपनेको अति दीन-हीन मानते थे और इस प्रकार ये दैन्य-समुद्रमें डूब जाते थे। इनका कहना था कि मैं म्लेच्छादिसे भी नीच हूँ, नीच जातिका सङ्ग करता हूँ और मेरा व्यवहार भी सदा नीच है। इस प्रकार ये स्वयंको नीच-जातिका कहते थे। ब्राह्मणोंमें सर्वश्रेष्ठ होकर भी कभी स्वयंको ब्राह्मण नहीं मानते थे और यवनोंकी सेवा करनेके कारण सदा इनके हृदयमें महाखेद होता था।” तथा “सनातन गोस्वामीने चार ग्रन्थोंकी रचना की। टीकासहित वृहद्भागवतामृत, हरिभक्तिविलास-टीका 'दिक्दर्शिनी', 'वैष्णव-तोषणी' नामक

दसवाँ अध्याय | 67