श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 602, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 10/84 समाधान करके महाप्रभुकी आज्ञानुसार वे दोनों नीलाचलमें आये। 1436 शकाब्दमें मार्गमें गङ्गातटपर अनुपमने श्रीरामचन्द्रके धामको प्राप्त किया। यह समाचार श्रीरूप गोस्वामीने नीलाचलमें महाप्रभुको दिया। श्रीवल्लभ श्रीरामचन्द्रके उपासक थे और महाप्रभुके द्वारा प्रदर्शित व्रजभजनके मार्गको वे पूर्णरूपसे ग्रहण नहीं कर पाये। वे महाप्रभुको साक्षात् श्रीरामचन्द्रके रूपमें ही जानते थे। भक्तिरत्नाकर ग्रन्थमें अनुपमके विषयमें इस प्रकार लिखा है— “अनुपम नाम थुइल श्रीगौरसुन्दर। सदा मत्त रघुनाथ-विग्रह-सेवन॥ रघुनाथ बिना येंइ अन्य नाहि जाने। साक्षात् श्रीरघुनाथ-चैतन्य गोसाञि॥” “श्रीगौरसुन्दरने उन्हें अनुपम नाम दिया। वे सदा श्रीरघुनाथके विग्रहकी सेवामें मत्त रहते थे। श्रीरघुनाथके अतिरिक्त वे किसीको नहीं जानते थे। श्रीचैतन्य गोसाञिको वे साक्षात् श्रीरघुनाथके रूपमें देखते थे।” ‘श्रीरूप गोस्वामी’—(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 180वाँ श्लोक)— “श्रीरूपमञ्जरी ख्याता यासीद् वृन्दावने पुरा। साद्य रूपाख्य-गोस्वामी भूत्वा प्रकटतामियात्॥180॥” “पहले वृन्दावनमें जो श्रीरूपमञ्जरीके नामसे विख्यात थीं, वे ही अब श्रीरूप गोस्वामीके रूपमें प्रकट हुई हैं।” भक्तिरत्नाकरकी प्रथम तरङ्गमें— “श्रीरूप गोस्वामी ग्रन्थ षोड़श करिल। (1) काव्य ‘हंसदूत’, आर (2) ‘उद्धवसन्देश’। (3) ‘कृष्णजन्मतिथिविधि’ विधान अशेष॥ (4-5) ‘गणोद्देशदीपिका’ बृहत्-लघुद्वय। (6) ‘स्तवमाला’, (7) ‘विदग्धमाधव’—रसमय॥ (8) ‘ललितमाधव’ विप्रलम्भेर अवधि। ‘दानलीला कौमुदी’ आनन्द-महोदधि॥ (9) ‘दानकेलिकौमुदी’ विदित एइ नाम। (10) ‘भक्तिरसामृतसिन्धु’ ग्रन्थ अनुपम॥ (11) ‘श्रीउज्ज्वलनीलमणि’ ग्रन्थ रसपूर। प्रयुक्ता (12) ‘आख्यातचन्द्रिका’ ग्रन्थ सुमधुर॥ (13) ‘मथुरा-महिमा’, (14) ‘पद्यावली’ ए विदित। (15) ‘नाटकचन्द्रिका’, (16) ‘लघुभागवतामृत’॥ वैष्णव-इच्छाय एकादश श्लोक कैल। कृष्णदास कविराजे विस्तारिते दिल॥ पृथक् पृथक् स्तव गोस्वामी वर्णिल। श्रीजीव-संग्रहे ‘स्तवमाला’ नाम हैल॥ संक्षेपे करिल आर विरुदलक्षण। ‘गोविन्द-विरुदावली’ ताहार लक्षण॥” “श्रीलरूप गोस्वामीने सोलह ग्रन्थोंकी रचना की। ये इस प्रकार हैं— (1) ‘हंसदूत’ (काव्य), (2) ‘उद्धवसन्देश’, (3) ‘कृष्णजन्मतिथिविधि’ (विधान), (4-5) ‘गणोद्देशदीपिका’ बृहद् और लघु, (6) ‘स्तवमाला’, (7) ‘विदग्धमाधव’ (रसमय), (8) ‘ललितमाधव’ (विप्रलम्भकी सीमा), (9) ‘दानकेलिकौमुदी’ (आनन्दका महासमुद्र), (10) ‘भक्तिरसामृतसिन्धु’ (एक अनुपम ग्रन्थ), (11) ‘श्रीउज्ज्वलनीलमणि’ (रसपूर्ण ग्रन्थ), (12) ‘आख्यातचन्द्रिका’ (सुमधुर ग्रन्थ), (13) ‘मथुरा-महिमा’, (14) ‘पद्यावली’, (15) ‘नाटकचन्द्रिका’ और (16) ‘लघुभागवतामृत’। वैष्णवोंकी इच्छासे उन्होंने ग्यारह श्लोक रचे। श्रीकृष्णदास कविराजने उनका विस्तार किया। श्रीरूप गोस्वामीने अलग-अलग स्तव लिखे, जिन्हें श्रीजीव गोस्वामीने संग्रह करके ‘स्तवमाला’ नाम दिया। संक्षेपमें विरुदलक्षणको ‘गोविन्द-विरुदावली’में लिखा।” (चैःचः मध्यलीला, 1/35-44 एवं अन्त्य, 4/219-231 संख्या द्रष्टव्य है)। चैःचः मध्यलीलाके 19वें अध्यायमें श्रीरूपका विषय-त्याग, धनका विभाग, प्रयागमें महाप्रभुसे मिलन, अनुपमके साथ वल्लभभट्टके घर प्रसाद-सेवा, प्रयागमें 66 | श्रीचैतन्यचरितामृत