श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें10/80-84 ]
“कलकण्ठी-सुकण्ठ्यौ ये व्रजे गान्धर्वनाटिके। रामानन्दवसुः सत्यराजश्चापि यथायथम्॥173॥ “व्रजमें जो कलकण्ठी (कलाकण्ठी) और सुकण्ठी नामक गान्धर्व नाटिका अर्थात् नृत्य, गीत-वाद्यादि कलाओंमें निपुण थीं, वे दोनों अब यथाक्रमसे श्रीरामानन्द बसु और श्रीसत्यराज (खाँ) हैं।” श्रीयदुनाथ, श्रीपुरुषोत्तम, श्रीशङ्कर, श्रीविद्यानन्द आदि सभी बसुवंशमें ही जन्में थे। इस बसुवंशमें सभी लोग ही श्रीकृष्णभक्त और श्रीकृष्णलीलाके अभिनयमें सुदक्ष थे। अभी भी श्रीकृष्णलीला अभिनयकी स्मृति रक्षित है। ये श्रीहरिदास ठाकुरके अनुगत शुद्धभक्त थे। पूर्वोल्लिखित 48 संख्या द्रष्टव्य है ॥ 80 ॥ (43) श्रीसनातन, (44) श्रीरूप और (45) श्रीअनुपम-शाखा :- अनुपम वल्लभ, श्रीरूप, सनातन। एइ तिन शाखा वृक्षेरे पश्चिमे गणन॥84॥ अनुवाद-श्रीअनुपम वल्लभ, श्रीरूप और श्रीसनातन-इन तीन शाखाओंकी वृक्षकी पश्चिम दिशामें गणना होती है॥84॥ अनुभाष्य-‘श्रीअनुपम’-श्रीजीव गोस्वामीके पिता और श्रीसनातन एवं श्रीरूप गोस्वामीके छोटे भाई थे। पहले इनका नाम ‘श्रीवल्लभ’ था और महाप्रभुने इनको ‘अनुपम’ नाम दिया था। गौड़देशके बादशाहकी नौकरी करनेके कारण इनकी ‘मल्लिक’ उपाधि थी। चैःचः मध्यलीला 19/36- “अनुपम मल्लिक,-ताँर नाम श्रीवल्लभ। श्रीरूप गोसाञिर छोट भाई परम वैष्णव॥” भरद्वाज-गोत्रीय जगद्गुरु ‘सर्वज्ञ’-नामक एक महात्मा बारहवीं शक-शताब्दीमें कर्णाटक देशमें ब्राह्मण राजवंशमें उत्पन्न हुए। उनके पुत्र अनिरुद्धके रूपेश्वर और हरिहर नामक दो पुत्र जन्में। किन्तु ये दोनों ही राज्यसे वञ्चित हो गये और ज्येष्ठ रूपेश्वरने शिखरभूमिमें वास स्थान स्थापित किया। रूपेश्वरके पुत्र पद्मनाभके गङ्गातटपर ‘नैहाटी’ नामक ग्राममें वास करते हुए पाँच पुत्र हुए। उनमेंसे सबसे छोटे मुकुन्दके पुत्र परम सदाचारी कुमारदेव हुए। कुमारदेव-सनातन, रूप और अनुपमके पिता हैं। कुमारदेव वाक्ला-चन्द्रद्वीपमें रहते थे। उस समयके ‘यशोहर’ प्रदेशके अन्तर्गत ‘फतेहाबाद’ नामक स्थानमें उनका घर था। उनके कई पुत्रोंमेंसे तीन पुत्रोंने वैष्णव-धर्मको ग्रहण किया। बादशाहके राजपदपर कार्य करनेके कारण श्रीवल्लभ अपने ज्येष्ठ भ्राता श्रीरूप और श्रीसनातनके साथ चन्द्रद्वीपसे आकर ‘रामकेलि’ ग्राममें वास करने लगे। यहींपर ही जीव गोस्वामीका जन्म हुआ था। नवाब सरकारका कार्य करनेके कारण तीनोंको ही ‘मल्लिक’ उपाधि मिली थी। महाप्रभु जब रामकेलि ग्राममें गये थे, तब अनुपमका उनके साथ पहला साक्षात्कार हुआ। श्रीरूप गोस्वामी जब विषय-कार्योंका त्यागकर महाप्रभुके चरणाश्रय ग्रहण करनेके लिये वृन्दावन गये, तब अनुपम भी उनके साथ थे। प्रयागमें महाप्रभुसे इनके मिलनका प्रसङ्ग चैःचः मध्यलीलाके 19वें अध्यायमें द्रष्टव्य है। महाप्रभुसे भेंट करनेके बाद श्रीरूप और अनुपम वृन्दावन गये। यह महाप्रभुकी सनातन गोस्वामीके प्रति उक्तिसे जाना जाता है,-“रूप-अनुपम दुँहे वृन्दावन गेला।” उस समय सुबुद्धि राय मथुरा-नगरीमें सूखी लकड़ियाँ बेचकर अपना पोषण और अन्य वैष्णवोंकी सेवा करते थे। श्रीरूप और अनुपमके वहाँ पहुँचनेपर वे अति प्रसन्न हुए और उनको साथ लेकर वृन्दावनके बारह वनोंका भ्रमण किया। दोनों भाई वृन्दावनमें एक मास तक रहे और श्रीसनातन गोस्वामीको ढूँढनेके लिये ये गङ्गाके किनारे चलते-चलते प्रयाग पहुँचे, किन्तु श्रीसनातन राजपथसे मथुरा आ गये थे, इस कारण उनकी भेंट नहीं हो सकी। मथुरामें सुबुद्धि रायने श्रीसनातन गोस्वामीको अनुपम और श्रीरूपका समाचार दिया। श्रीरूप और अनुपम, दोनों तब काशी पहुँचे और महाप्रभुसे सारा वृत्तान्त सुनकर दस दिन बाद गौड़देशकी यात्रा की। वहाँ पहुँचकर अपनी सम्पत्तिकी व्यवस्थाका
दसवाँ अध्याय | 65