श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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दशम स्कन्धकी टीका और 'लीलास्तव' जिसमें दशम-चरित (श्रीकृष्ण-चरित) कहा है।" 1476में वैष्णव-तोषणी और 1504में लघुतोषणी पूर्ण की। महाप्रभुने श्रीरायरामानन्दके द्वारा कामदेवके अभिमानको तोड़ा, श्रीदामोदर पण्डितके द्वारा निरपेक्षता प्रकाश की, श्रीहरिदासके द्वारा सहिष्णुता दिखलायी और श्रीसनातन-श्रीरूपके द्वारा दैन्यका प्रकाश किया।" चैःचः मध्यलीला उन्नीसवें अध्यायमें इनका विषय त्यागका चिन्तन, रोगी होनेके बहानेसे घरमें भागवत आलोचना, बादशाहका इन्हें देखने आना, बादशाहके द्वारा इन्हें बन्दी बनाना, बादशाहके साथ उड़ीसा युद्धमें जाना अस्वीकार करना, गृहत्यागके समय श्रीरूपका इनके पास कारागारमें पत्र भेजनेका वर्णन है। चैःचः मध्यलीलाके बीसवें अध्यायमें इनकी कारागार रक्षकको धन देकर मुक्ति, केवल एक सेवक ईशानके राज्यसे पलायन और आठ स्वर्ण मुद्राएँ देकर डाकुओंसे रक्षा और उनकी सहायतासे पर्वतको पार करना, ईशानको विदाकर अकेले यात्रा, हाजिपुरमें बहनोई श्रीकान्तके साथ मिलन और वहाँ रहना अस्वीकारकर केवल उनसे एक कम्बल ग्रहण करना, वाराणसीमें आगमन और चन्द्रशेखरके घर महाप्रभुसे मिलन, मुण्डन करवाकर तपनमिश्रके द्वारा प्रदत्त पुराने वस्त्रका बहिर्वास और कौपीन ग्रहण करना, महाराष्ट्र ग्रहण करना, महाप्रभुसे तत्त्वकी जिज्ञासा और महाप्रभुके द्वारा इन्हें शिक्षा प्रदान करना वर्णित है। (1) 'सम्बन्ध ज्ञान'की शिक्षा चैःचः मध्यलीलाके बीसवें और इक्कीसवें अध्यायमें वर्णित है। (2) अभिधेय-विचार-बाइसवें अध्यायमें और (3) प्रयोजन-विचार-तेइसवें अध्यायमें; महाप्रभुके द्वारा इन्हें भक्तिसिद्धान्तके ग्रन्थोंकी रचना, लुप्ततीर्थोंका उद्धार, वैष्णवस्मृति सङ्कलनके द्वारा वैष्णव-समाजका संस्थापन और भक्तिशास्त्र-प्रचारका आदेश, आशीर्वादका वर्णन है। चौबीसवें अध्यायमें इनको 'आत्माराम' श्लोककी पहले अठारह प्रकारसे और बादमें इकसठ प्रकारसे अर्थ-व्याख्या, इनका राजपयसे मथुरा गमन और सुबुद्धिरायके साथ मिलनका वर्णन है। चैःचः अन्त्यलीलाके चौथे अध्यायमें इनका झारखण्डके जङ्गलोंसे होते हुए पुनः नीलाचल आगमन, रथके पहियेके नीचे अपनी देहत्यागका सङ्कल्प, हरिदास ठाकुरसे मिलन और सपरिकर महाप्रभुके दर्शन, अनुपमकी गङ्गा-प्राप्ति और माहात्म्य श्रवण, इनके देहत्यागके सङ्कल्पमें महाप्रभुकी अस्वीकृति, इनके द्वारा महाप्रभुके प्रयोजनके अनुरूप साधनकी इच्छा, इनके द्वारा हरिदास ठाकुरकी महिमाका वर्णन, मर्यादामार्गीय श्रीजगन्नाथजीके सेवकोंको उनका स्पर्श न हो जाय, इस भयसे तप्तबालूके ऊपरसे होकर महाप्रभुके पास जाना और इनके दर्शनसे महाप्रभुकी प्रसन्नता, महाप्रभुसे जगदानन्दको वृन्दावन जानेकी आज्ञा देनेकी प्रार्थना, महाप्रभुके द्वारा इनकी स्तुति, इनकी अप्राकृत देहमें महाप्रभुकी प्रीति और आलिङ्गन, उसके फलस्वरूप दिव्यदेहकी प्राप्ति, एक वर्ष नीलाचलमें रहनेका महाप्रभुका आदेश, तत्पश्चात् इन्हें वृन्दावन भेजना, श्रीरूपके साथ बहुत समयके बाद वृन्दावनमें मिलन और महाप्रभुकी आज्ञापालनका वर्णन है। श्रीरूप और श्रीसनातन गोस्वामीका श्रीपाट श्रीरामकेलि ('गुप्त वृन्दावन') - वर्तमान शहर इंग्रेंजबाजार (मालदह) से प्राय आठ मील दक्षिणमें अवस्थित है। वहाँ निम्नलिखित देखने योग्य स्थान हैं- (1) श्रीमदनमोहन विग्रह-श्रीसनातन गोस्वामीके द्वारा प्रतिष्ठित विग्रह। (2) केलिकदम्ब वृक्ष-जिसके नीचे श्रीरूप और श्रीसनातनका महाप्रभुके साथ रात्रिमें साक्षात्कार हुआ था और सपार्षद महाप्रभुने भक्तोंको प्रेमामृतका दान किया था, ऐसा कहा जाता है। (3) रूपसागर-श्रीरूप गोस्वामीप्रभुके द्वारा प्रतिष्ठित विशाल सरोवर। इस सरोवरकी सफाई और श्रीरामकेलिपाटकी लुप्तकीर्त्ति उद्धारके लिये मालदहमें 8 जून 1924 ई० में 'रामकेलि-संस्कार-समिति' प्रतिष्ठित हुई थी ॥ 84 ॥
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