श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें10/85 ] (44क) श्रीजीव :- ताँर मध्ये रूप-सनातन—बड़ शाखा। अनुपम, जीव, राजेन्द्रादि—उपशाखा॥ 85॥ अनुवाद—इनके मध्य श्रीरूप और श्रीसनातन बड़ी शाखा हैं तथा श्रीअनुपम, श्रीजीव, श्रीराजेन्द्रादि उपशाखा हैं॥ 85॥ अनुभाष्य— 'श्रीजीव गोस्वामी'—(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 204 एवं 195 श्लोक)— "विलासमञ्जरी कामलेखा च मौनमञ्जरी॥ 195ख॥" "सुशीलः पण्डितः श्रीमान् जीवः श्रीवल्लभात्मजः। 204क।" "विलासमञ्जरी श्रीवल्लभके सुशील एवं पण्डित सुपुत्र श्रील जीव गोस्वामी हैं।" श्रीजीव बाल्यकालसे श्रीमद्भागवतके अनुरागी थे। बादमें नवद्वीपमें आकर श्रीनित्यानन्द प्रभुके आनुगत्यमें इन्होंने श्रीनवद्वीप-धामकी परिक्रमा और दर्शन किये। इन्होंने काशीमें जाकर मधुसूदन वाचस्पतिसे सभी शास्त्रोंका अध्ययन किया। उसके बाद वे वृन्दावनमें आकर श्रीरूप और श्रीसनातनके आश्रित हुए। (श्रीभक्तिरत्नाकरकी प्रथम तरङ्गमें)— “श्रीजीवेर ग्रन्थ पञ्चविंशति विदित। (1) 'हरिनाममृत व्याकरण' दिव्यरीत॥ (2) 'सूत्रमालिका' (3) 'धातुसंग्रह' सुप्रकार। (4) 'कृष्णार्च्चादीपिका'-ग्रन्थ अति चमत्कार॥ (5) 'गोपालविरुदावली' (6) 'रसामृतशेष'। (7) 'श्रीमाधव-महोत्सव' सर्वाशे विशेष॥ (8) 'श्रीसङ्कल्पकल्पवृक्ष-ग्रन्थेर प्रचार। (9) 'भावार्थसूचक'-चम्पू अति चमत्कार॥ (10) 'गोपालतापनी-टीका' (11) टीका 'ब्रह्मसंहितार'। (12) 'रसामृत-टीका' (13) 'श्रीउज्ज्वल-टीका' आर॥ (14) 'योगसारस्तवेर टीका'ते सुसङ्गति। (15) 'अग्निपुराणस्थ श्रीगायत्री-भाष्य' तथि॥ (16) पद्मपुराणोक्त 'श्रीकृष्णरे पदचिह्न'। (17) 'श्रीराधिका-कर-पदस्थित चिह्न' भिन्न॥ (18) 'गोपालचम्पू'-पूर्व-उत्तर-विभागेते। (19-25) सप्त-सन्दर्भ विख्यात भागवत-रीति। (क्रम-तत्त्व-भगवत्-परमात्म-कृष्ण-भक्ति-प्रीति)॥" “श्रीजीव गोस्वामीके द्वारा रचित पच्चीस ग्रन्थ विदित हैं। (1) 'हरिनाममृत व्याकरण', (2) 'सूत्रमालिका' (3) 'धातुसंग्रह', (4) 'कृष्णार्च्चादीपिका', (5) 'गोपालविरुदावली', (6) 'रसामृतशेष', (7) 'श्रीमाधव-महोत्सव', (8) 'श्रीसङ्कल्पकल्पवृक्ष', (9) 'भावार्थसूचक'-चम्पू, (10) 'गोपालतापनी-टीका', (11) 'ब्रह्मसंहिताकी टीका', (12) 'भक्तिरसामृतसिन्धु-टीका', (13) 'श्रीउज्ज्वलनीलमणि-टीका', (14) 'योगसार-स्तव-टीका', (15) 'अग्निपुराणके श्रीगायत्रीका भाष्य', (16) पद्मपुराणमें उक्त 'श्रीकृष्ण-पदचिह्न', (17) 'श्रीराधिका-कर-पदस्थित चिह्न', (18) 'गोपालचम्पू' पूर्व एवं उत्तर विभाग, (19-25) सप्त-सन्दर्भ (क्रम-तत्त्व-भगवत्-परमात्म- कृष्ण-भक्ति-प्रीति सन्दर्भ)। इन्होंने श्रीरूप-सनातनादिके अप्रकट होनेके बाद उत्कल-गौड़-माथुर-मण्डलके गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदायके सर्वश्रेष्ठ आचार्यपदपर अधिष्ठित होकर सबको श्रीगौरसुन्दरके द्वारा प्रचारित सत्यका प्रचारकर भजनमें लगाया। बीच-बीचमें ये भक्तोंके साथ व्रजधामकी परिक्रमा करते और मथुरामें विट्ठल-देवके दर्शन करने जाते। श्रीकविराज गोस्वामीने इनके प्रकटकालमें श्रीचैतन्यचरितामृतकी रचना की थी। इन्होंने कुछ समय बाद गौड़देशसे आये श्रीनिवास, नरोत्तम और दुःखी कृष्णदासको क्रमशः दसवाँ अध्याय | 69