भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 590

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अमृतप्रवाह भाष्य—'अपतित' अर्थात् विधिभङ्ग किये बिना॥ 43 ॥ अनुभाष्य—(चैःभाः आदिखण्ड, द्वितीय अध्याय)— “बूढ़ने हइला अवतीर्ण हरिदास॥” 37॥ (चैःभाः आदिखण्ड, सोलहवाँ अध्याय)— “कतदिन थाकि' आइला गङ्गातीरे। आसिया रहिल फुलियाय शान्तिपुरे॥” 19॥ “इनका आविर्भाव 'बूढ़ने' ग्राममें हुआ था। कुछ समयके बाद वे शान्तिपुरमें गङ्गातटपर फुलिया ग्राममें रहने लगे।” यवनोंके द्वारा अत्याचारका प्रसङ्ग (चैःभाः आदिखण्ड 16वें अध्याय) में वर्णित है। श्रीहरिदासकी दैन्योक्ति और महाप्रभुकी कृपा (चैःभाः मध्यखण्ड, 10वाँ अध्याय); द्वार-द्वारपर नाम प्रचार (चैःचः मध्यलीला, 13वाँ अध्याय); चन्द्रशेखर-भवनमें अभिनयके समय श्रीहरिदासका कोतवालवेष (चैःभाः मध्यखण्ड, 18वाँ अध्याय); बेनोपोलमें हरिनाम-भजन और परीक्षा (चैःचः अन्त्यलीला, 3रा अध्याय) और श्रीहरिदास ठाकुरका निर्याण—(चैःचः अन्त्यलीला, 11वाँ अध्याय) द्रष्टव्य हैं॥ 43-47 ॥ (20क) हरिदास-शिष्य सत्यराज खाँ (बसु) आदि :- ताँर उपशाखा,—यत कुलीनग्रामी जन। सत्यराज आदि—ताँर कृपार भाजन॥ 48 ॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरकी एक उपशाखा सभी कुलीन ग्रामके निवासी हैं, जिनमें सत्यराज खान आदि उनके कृपाके विशेष पात्र हैं॥ 48॥ अनुभाष्य—सत्यराज खान कुलीन ग्रामके गुणराज खानके पुत्र और रामानन्द बसुके पिता हैं। एक समय श्रीहरिदास ठाकुरने चातुर्मास्यके समय कुलीन ग्राममें रहकर भजन किया था और बसु-वंशजनोंको कृपा प्रदान की थी। कुलीन ग्रामवासियोंको श्रीमन्महाप्रभुने प्रतिवर्ष रथयात्राके समय श्रीजगन्नाथदेवके लिये रेशमी डोरी लानेके लिये आदेश दिया था (चैःचः मध्यलीला, 14वाँ अध्याय)। इन्होंने श्रीमन्महाप्रभुसे गृहस्थ-भक्तोंके कर्त्तव्यके विषयमें जिज्ञासा की और उनसे वैष्णव (कनिष्ठ), वैष्णवतर (मध्यम) और वैष्णवतम (उत्तम) के अधिकार-तारतम्य और उनके लक्षणोंका श्रवण किया था (चैःचः मध्यलीला 15/102-109, 16/67-75 संख्या द्रष्टव्य है)। इनकी भजनस्थलीपर आज भी श्रीमन्महाप्रभुका विग्रह विराजमान है। कुलीनग्रामके माहात्म्यके सम्बन्धमें महाप्रभुकी उक्तिके लिये चैःचः आदिलीला 10/82-83, मध्यलीला 10/100-101 संख्या द्रष्टव्य है॥ 48॥ (21) श्रीमुरारि गुप्त-महिमा और शाखा :- श्रीमुरारि गुप्त-शाखा—प्रेमेर भाण्डार। प्रभुर हृदय द्रवे शुनि' दैन्य याँर॥ 49 ॥ प्रतिग्रह नाहि करे, ना लय कार धन। आत्मवृत्ति करि' करे कुटुम्ब भरण॥ 50 ॥ चिकित्सा करेन यारे हइया सदय। देहरोग, भवरोग,—दुइ तार क्षय॥ 51 ॥ अनुवाद—श्रीमुरारी गुप्त नामक शाखा प्रेमका भण्डार है। इनकी दीनताको सुनकर महाप्रभुका हृदय द्रवित हो जाता था। वे किसीसे भी दान ग्रहण नहीं करते थे और न ही किसीसे धन लेते थे। केवल चिकित्सा व्यवसायसे अपने कुटुम्बका पालन करते। वे दयापूर्वक जिसकी भी चिकित्सा करते, उसका शरीरका रोग और भवरोग (संसार-बन्धन) दोनों ही दूर हो जाते थे॥ 49-51 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'आत्मवृत्ति'—स्व-वर्णवृत्ति, श्रीमुरारीगुप्तका व्यवसाय कविराजी (चिकित्सा) था॥ 50॥ अनुभाष्य—श्रीमुरारीगुप्त 'श्रीचैतन्यचरित' ग्रन्थके लेखक हैं। इनका जन्म श्रीहट्टके वैद्यवंशमें हुआ था और बादमें ये नवद्वीपमें आकर रहने लगे। वे आयुमें महाप्रभुसे बड़े थे। इनके घरमें महाप्रभुने अपना वराह रूप दिखाया था (चैःभाः मध्यखण्ड, तीसरा अध्याय) और महाप्रकाशके समय महाप्रभुने इन्हें श्रीरामरूपके

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