श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें10/41-47 ] (19) श्रीवासुदेवदत्त ठाकुरकी गुणराशि :- वासुदेव दत्त—प्रभुर भृत्य महाशय। सहस्र-मुखे याँर गुण कहिले ना हय॥ 41 ॥ अनुवाद—श्रीवासुदेव दत्त महाप्रभुके सेवक हैं। हजार मुखोंके द्वारा भी उनके गुणोंको कहा नहीं जा सकता॥ 41 ॥ अनुभाष्य—श्रीवासुदेव दत्तका जन्म चट्टग्राममें हुआ था और ये श्रीमुकुन्द दत्तके भाई हैं। (चैःभाः अन्त्यखण्ड, 8/14)— “याँर स्थाने कृष्ण हय आपने विक्रय।” “जिनके प्रेमके कारण श्रीकृष्ण उनके हाथों बिक गये हैं।” (चैःभाः अन्त्यखण्ड, 5वाँ अः)— “हेन से प्रभुर प्रीति दत्तेर विषय। प्रभु बले,—“आमि वासुदेवेर निश्चय॥” 26 ॥ आपने श्रीगौरचन्द्र बले बार बार। “ए शरीर वासुदेव दत्तेर आमार॥ 27 ॥ दत्त आमा' यथा बेचे, तथाइ बिकाइ। सत्य, सत्य, इहाते अन्यथा किछु नाइ॥ 28 ॥ सत्य आमि कहि, शुन, वैष्णवमण्डल। ए देह आमार वासुदेवेरे केवल॥” “वासुदेव दत्तसे महाप्रभुकी इतनी प्रीति थी कि महाप्रभु कहने लगे—“मैं निश्चित रूपसे वासुदेवका हूँ। मेरा यह शरीर वासुदेवका है। दत्त मुझे जहाँ बेचता है, मैं वहीं बिक जाता हूँ। यही सत्य है, सत्य है, इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं है। हे वैष्णव मण्डली! सुनिये, मैं सत्य कह रहा हूँ कि मेरा यह शरीर केवल वासुदेवका है।” इनके ही अनुगृहीत श्रीरघुनाथदास गोस्वामीके दीक्षा गुरु श्रीयदुनन्दन आचार्य थे (चैःचः अन्त्यलीला, 6/161)। इनमें प्रचुर धन व्यय करनेकी प्रवृत्तिको देखकर महाप्रभुने श्रीशिवानन्द सेनको इनका 'सरखेल' (प्रबन्धक) बनाकर व्ययके समाधानके लिये आदेश दिया (चैःचः मध्यलीला, 15/93-96)। जीवोंके दुःखोंको देखकर महाप्रभुसे इनकी प्रार्थनाके लिये (चैःचः मध्यलीला, 15/159-180) द्रष्टव्य है॥ 41 ॥ जगते यतेक जीव, तार पाप लञा। नरक भुञ्जिते चाहे जीव छाड़ाइया॥ 42 ॥ अनुवाद—(वासुदेव दत्तने महाप्रभुसे प्रार्थना की)— “जगत्के समस्त लोगोंके पापोंको लेकर मैं स्वयं नरक भोग करूँ और वे सब पाप-बन्धनसे मुक्त होकर सुखको प्राप्त करें॥” 42 ॥ (20) नामाचार्य ठाकुर हरिदासकी गुणराशि और उनकी शाखा :- हरिदास ठाकुर—शाखार अद्भुत चरित। तिनलक्ष नाम तेंहो लयेन अप्रतित॥ 43 ॥ ताँहार अनन्त गुण,—करि दिङ्मात्र। आचार्य गोसाञि याँरे भुआय श्राद्धपात्र॥ 44 ॥ प्रह्लाद-समान ताँर गुणेर तरङ्ग। यवन-ताड़नेओ याँर नाहिक भ्रूभङ्ग॥ 45 ॥ तेंहो सिद्धि पाइले ताँर देह लञा कोले। नाचिल चैतन्यप्रभु महाकुतूहले॥ 46 ॥ ताँर लीला वर्णियाछेन वृन्दावनदास। येबा अवशिष्ट, आगे करिब प्रकाश॥ 47 ॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुर नामक शाखाका अद्भुत चरित्र है। वे नित्य ही नियमपूर्वक तीन लाख नाम करते थे। इनके अनन्त गुण हैं, किन्तु मैं उनका केवल दिग्दर्शन करा रहा हूँ। श्रीअद्वैताचार्यने सर्वप्रथम इन्हें अपने पिताके श्राद्धपात्रका अन्न भोजन कराया। इनमें प्रह्लादके समान गुण हैं, यवनोंके द्वारा अत्याचार किये जानेपर भी इनकी भृकुटि जरा भी टेढ़ी नहीं हुई। इनके तिरोभावपर महाप्रभुने स्वयं इनकी चिन्मय देहको गोदमें लेकर महा-आनन्द सहित नृत्य किया था। श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने इनकी लीलाओंका वर्णन अपने ग्रन्थ श्रीचैतन्यभागवतमें किया है। जो कुछ शेष रह गया है, उसका आगे विस्तारपूर्वक वर्णन करूँगा॥ 43-47 ॥ दसवाँ अध्याय | 53