श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 591, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें10/49-53 ] दर्शन कराये थे (चैःभाः मध्यखण्ड, दसवाँ अध्याय)। श्रीवासके घरमें श्रीनित्यानन्द प्रभुके साथ बैठे हुए श्रीगौरसुन्दरको देखकर इन्होंने सर्वप्रथम श्रीगौरको प्रणाम निवेदन किया और तत्पश्चात् श्रीनित्यानन्द प्रभुको दण्डवत् किया। यह देखकर महाप्रभुने मुरारीगुप्तसे कहा- “तुमने व्यवहारका व्यतिक्रम करके नमस्कार किया है" और महाप्रभुने रातमें स्वप्नमें इनको श्रीनित्यानन्द-तत्त्वकी महिमा बतलायी। तब अगले दिन प्रातःकाल इन्होंने पहले श्रीनित्यानन्द प्रभुके और उसके बाद महाप्रभुके चरणोंकी वन्दना की। यह देखकर महाप्रभुने प्रसन्न होकर अपना चर्वित ताम्बुल इन्हें प्रदान किया। एक दिन इन्होंने महाप्रभुको अधिक घीमें निर्मित अन्न खिलाया। अधिक मात्रामें अन्न खाकर महाप्रभुको अगले दिन अपच हो गया और चिकित्साके लिये वे इनके पास आये। 'मुरारीके जलपात्रका जल ही उसकी औषधि है', यह कहकर इन्होंने महाप्रभुको जल पीनेके लिये दिया, जिससे महाप्रभु स्वस्थ हो गये। एक दिन श्रीवास-भवनमें महाप्रभुने चतुर्भुज रूप धारण किया, तब इन्होंने गरुड़ भावका प्रदर्शन करते हुए महाप्रभुको अपने कन्धोंपर चढ़ाया। 'महाप्रभुके अप्रकटका विरह असहनीय होगा', ऐसा सोचकर महाप्रभुके प्रकटकालमें ही इन्होंने देहत्यागका सङ्कल्प किया और अन्तर्यामी महाप्रभुने उनके सङ्कल्पका निवारण किया (चैःभाः मध्यखण्ड, 20वाँ अः)। एक दिन इनके घरपर महाप्रभुने भावावेशमें अपनी वराह-मूर्ति प्रकट की और उसे देखकर इन्होंने उनकी स्तुति की (चैःभाः मध्यखण्ड, 3रा अः)। इनकी दैन्योक्ति (चैःचः मध्यलीला 11/152-158) और इनकी श्रीरामनिष्ठा (चैःचः मध्यलीला 15/137-157 द्रष्टव्य है) ॥ 49 ॥ (22) श्रीमान् सेन :- श्रीमान् सेन प्रभुर सेवक प्रधान। चैतन्य-चरण बिनु नाहि जाने आन ॥ 52 ॥ अनुवाद-श्रीमान् सेन महाप्रभुके एक और प्रधान सेवक हैं, जो श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणकमलोंके अतिरिक्त और कुछ नहीं जानते हैं॥ 52 ॥ अनुभाष्य-श्रीमान् सेन नवद्वीपवासी और महाप्रभुके सङ्गी थे॥ 52 ॥ (23) श्रीगदाधरदास-शाखा :- श्रीगदाधरदास-शाखा सर्वोपरि। काजीगणेर मुखे येंह बोलाइल हरि ॥ 53 ॥ अनुवाद-श्रीगदाधरदास नामक शाखा सर्वप्रधान है। इन्होंने काजीके मुखसे भी हरिनाम उच्चारण कराया था॥ 53 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीगदाधरदास ऐँड़ियादहवासी थे ॥ 53 ॥ अनुभाष्य-कोलकातासे चार कोस उत्तरमें 'ऐँड़ियादह' ग्राम है। श्रीगदाधरदास महाप्रभुके अप्रकट होनेके पश्चात् नवद्वीपसे कटोआमें आ गये (भक्तिरत्नाकर 7वीं तरङ्ग) और उसके बाद ऐँड़ियादह ग्राममें रहने लगे। जिस प्रकार श्रीगदाधर पण्डित श्रीमती वृषभानुनन्दिनीरूपा हैं, श्रीगदाधरदास भी उसी प्रकार ही श्रीमतीकी अङ्गशोभा हैं। ये 'श्रीराधाभावद्युति-सुवलित' श्रीगौराङ्गकी द्युति स्वरूप हैं। श्रीगौरगणोद्देश-दीपिकामें इन्हें श्रीवृषभानुनन्दिनीकी विभूतिरूप कहकर निर्देश किया है। इनकी श्रीगौर और श्रीनित्यानन्द, दोनोंके परिकरोंमें गणना होती है। श्रीगौराङ्ग महाप्रभुके जन सभी व्रजके मधुररसके रसिक हैं और श्रीनित्यानन्द प्रभुके जन शुद्ध-भक्ति प्रधान सख्यादि रसके रसिक हैं। श्रीगदाधर दास श्रीनित्यानन्दके जन होते हुए भी सख्यभाव गोपाल न होकर मधुर रसिक हैं। कटोआमें इनके पास श्रीगौरसुन्दरका अर्चा-विग्रह था। 1434 शकाब्दमें जब श्रीनित्यानन्द प्रभु महाप्रभुके अनुरोधपर भक्ति-प्रचारके लिये नीलाचलसे गौड़देश गये, तब श्रीगदाधर दास उनके प्रचार कार्यमें एक प्रधान दसवाँ अध्याय | 55