श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 592, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 10/53-55 सहायक बने (चैःचः आदिलीला 11/13-14)। ये सबको हरिनाम करनेका उपदेश देते थे, किन्तु वहाँका काजी कीर्तन-विरोधी था। एक दिन रातके समय कीर्तन करते-करते ये काजीके घर उसके उद्धारके उद्देश्यसे जा पहुँचे और उससे हरिनामका उच्चारण करनेके लिये अनुरोध करने लगे। यह सुनकर काजी कहने लगा—“मैं कल हरि बोलूँगा।” ऐसा सुनकर श्रीगदाधरदास प्रेमसुखपूर्ण होकर बोले-“कल क्यों? अभी तो तुमने अपने मुखसे हरि कहा है।” (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 154-155वें श्लोकमें)— “राधाविभूतिरूपा या चन्द्रकान्तिः पुरा व्रजे। सः श्रीगौराङ्ग-निकटे दासवंशयो-गदाधरः ॥ 154 ॥ पूर्णानन्दा सद्य व्रजे यासीत् बलदेवप्रियाग्रणीः। सापि कार्यवशादेव प्राविशत्तं गदाधरम् ॥ ”155 ॥ “जो पहले राधिकाकी विभूति स्वरूपा अर्थात् श्रीमतीकी अङ्गशोभा चन्द्रकान्ति थीं, वे अब श्रीगौराङ्गके निकट दासवंशके गदाधर अर्थात् श्रीगदाधर दास हैं। व्रजमें श्रीबलरामकी प्रियाओंमें श्रेष्ठ पूर्णानन्दा भी किसी कारणवश इन्हीं श्रीगदाधर दासमें प्रविष्ट हुई हैं।” नीलाचलसे गौड़देश आते हुए श्रीनित्यानन्द प्रभुने देखा कि श्रीगदाधरदास श्रीराधाभावमें जोरसे अट्टहास करते हुए स्वयंको दही बेचनेवाली समझकर अपना बाहिरी परिचय भूल गये। कभी ये गोपीभावमें विभोर होकर गङ्गाजलसे भरे घड़ेको सिरपर लेकर दूध बेचने लगते। (चैःभाः अन्त्यखण्ड 5वाँ अः)—श्रीमन्महाप्रभु गौड़देशसे वृन्दावन जाते हुए जब पाणिहाटीमें श्रीराघव-भवनमें आये थे— “राघव-मन्दिरे शुनि’ श्रीगौरसुन्दर। गदाधरदास धाइ’ आइला सत्वर ॥ 92 ॥ प्रभुओ देखिया गदाधर सुकृतिरे। श्रीचरण तुलिया दिलेन ताँर शिरे ॥ ”94 ॥ “तब उनके आगमनका समाचार सुनकर श्रीगदाधर दास भागकर वहाँ पहुँचे। महाप्रभुने इनकी सुकृतिको देखकर अपने चरणकमल इनके मस्तकपर स्थापित किये थे।” ऐँड़ियादहमें इनके घरमें इनके प्रकटकालमें ‘बाल-गोपाल’ की मूर्ति थी। श्रीमाधव घोषने गोपाल-विग्रहके सामने श्रीनित्यानन्द प्रभु और श्रीदास गदाधरके साथ ‘दानखण्ड’ (दानकेलि-लीलाके) अभिनयके द्वारा नृत्य किया था (चैःभाः अन्त्यखण्ड 5/378)। श्रीगदाधरके तिरोभावके पश्चात् उनको उसी गाँवमें समाधि दी गयी। यह समाधि संयोगि-वैष्णवोंके अधिकारमें थी। कालनाके सिद्ध श्रीभगवान् दास बाबाजीने कोलकाताके नारिकेलडाङ्गाके निवासी मधुसूदन मल्लिकके द्वारा सिंहासन-भवन स्थापित करवाकर 1256 सालमें ‘श्रीराधाकान्त’की विग्रह-सेवाकी व्यवस्था की और उनके पुत्र बलाइ मल्लिकने 1312 सालमें ‘श्रीगौर-नित्यानन्द’की एक सेवा प्रतिष्ठित की। मन्दिरके सिंहासनपर श्रीगौर-नित्यानन्द-विग्रह और श्रीराधाकृष्णकी मूर्ति विराजमान है, सिंहासनके नीचे एक संस्कृत श्लोक खुदा है। एक गोपेश्वर शिवलिङ्ग भी वहाँ प्रतिष्ठित है। मन्दिरके द्वारके पास एक पत्थरके पटलपर उपरोक्त कथा खुदी है। वैष्णव- मञ्जूषा-समाहृति (प्रथम संख्या) द्रष्टव्य है॥ 53 ॥ (24) श्रीशिवानन्द सेन-शाखा :— शिवानन्द सेन—प्रभुर भृत्य अन्तरङ्ग। प्रभुस्थाने याइते सबे लयेन याँर सङ्ग ॥ 54 ॥ प्रति वर्षे प्रभुर गण सङ्गेते लइया। नीलाचले चलेन पथे पालन करिया ॥ 55 ॥ अनुवाद—श्रीशिवानन्दसेन महाप्रभुके अन्तरङ्ग सेवक हैं। ये महाप्रभुसे मिलनेके लिये उनके स्थान नीलाचल सब भक्तोंको साथ लेकर जाते थे। प्रत्येक वर्ष भक्तोंको साथ लेकर गौड़देशसे नीलाचल जाते समय मार्गमें उन सबके भोजन-निवासादिका प्रबन्ध अपने धनके द्वारा करते थे ॥ 54-55 ॥ 56 | श्रीचैतन्यचरितामृत