भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 620

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[बायाँ स्तम्भ / Left Column]

“रघुनाथ वैद्य उपाध्याय महामति। याँर दृष्टिपाते कृष्णे हय रति मति॥ 726॥” “उन्हें देखने मात्रसे ही देखनेवालेका चित्त श्रीकृष्णमें लग जाता था।” चैःचः आदिलीला, 11/22 संख्या द्रष्टव्य है। ये पुरीमें समुद्र तटपर रहते थे और इन्होंने वहाँके ‘स्थान-निरूपण’ नामक ग्रन्थकी रचना की थी॥ 126॥

आर यत भक्तगण गौड़देशवासी। प्रत्यब्दे प्रभुरे देखे नीलाचले आसि’॥ 128॥

**अनुवाद—**और जितने भी गौड़देशके भक्त, जिनका नाम पहले उल्लेख किया है, वे प्रतिवर्ष महाप्रभुसे मिलने नीलाचल आते थे॥ 128॥

नीलाचले प्रभुसह प्रथम मिलन। सेइ भक्तगणेर एबे करिये गणन॥ 129॥

**अनुवाद—**नीलाचलमें महाप्रभुसे जिनका प्रथम मिलन हुआ था, उन भक्तोंकी गणना अब मैं करूँगा॥ 129॥

(3) सार्वभौम शाखा, (4) गोपीनाथाचार्य :— बड़शाखा एक,—सार्वभौम भट्टाचार्य। ताँर भगनीपति श्रीगोपीनाथाचार्य॥ 130॥

**अनुवाद—**सार्वभौम भट्टाचार्य एक बड़ी शाखा हैं, श्रीगोपीनाथाचार्य उनके बहनोई हैं॥ 130॥

अनुभाष्य—‘सार्वभौम भट्टाचार्य’—इनका नाम पहले वासुदेव भट्टाचार्य था। ये वर्तमान नवद्वीप अथवा चाँपाहाटीसे दो मील दूर ‘विद्यानगर’ नामक पल्लीके प्रसिद्ध महेश्वर विशारदके पुत्र थे। कहा जाता है कि ये उस समय भारतके सर्वप्रधान नैयायिक थे। इन्होंने मिथिलाके सुविख्यात न्याय-विद्यालयके प्रधान अध्यापक पक्षधर मिश्रसे समस्त न्यायशास्त्रको कण्ठस्थ करके नवद्वीपमें न्यायविद्यालयकी स्थापना करके वहाँ अध्यापन कार्य आरम्भ किया। न्याय-शास्त्रके इतिहासमें इन्होंने नये युगका आरम्भ किया। तबसे नवद्वीप


[दायाँ स्तम्भ / Right Column]

मिथिलाको गौरवहीन करके आज भी समस्त भारतमें सर्वप्रधान न्याय-विद्यापीठके रूपमें परिचित है। किसी-किसीके मतानुसार ‘दीधिति’ ग्रन्थोंके रचयिता सुविख्यात नैयायिक रघुनाथ शिरोमणि इनके ही छात्र हैं। जैसा भी हो, (सार्वभौम) न्याय और वेदान्तशास्त्रके प्रकाण्ड पण्डित थे। वे गृहस्थाश्रममें रहकर भी क्षेत्र-संन्यास ग्रहणकर नीलाचलमें वेदान्त पढ़ाया करते थे। इन्होंने श्रीमन्महाप्रभुको शाङ्कर-भाष्यानुमोदित वेदान्त सुनाया। बादमें महाप्रभुसे श्रवण करके ये वेदान्तके वास्तविक अर्थसे अवगत हुए। इन्होंने महाप्रभुकी षड्भुज-मूर्तिका दर्शन किया। इनके द्वारा रचित ‘चैतन्यशतक’ में गौरभक्ति प्रकटित है; विशेषतः “वैराग्यविद्यानिजभक्ति योग’ दो श्लोक सार्वभौमके पाण्डित्यकी सीमा है। महाप्रभुका सार्वभौमके साथ मिलन और इनके साथ विचार और उद्धारके वृत्तान्तके लिये मध्यलीलाका छठा अध्याय द्रष्टव्य है। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 119वाँ श्लोक)— “भट्टाचार्यः सार्वभौमः पुरासीद्गीष्पतिर्दिवि॥ 119॥” “देवलोकके बृहस्पति अब सार्वभौम भट्टाचार्य हैं।” ‘गोपीनाथ आचार्य’—ये नवद्वीपवासी और महाप्रभुके सङ्गी ब्राह्मण हैं। ये सार्वभौम भट्टाचार्यके बहनोई हैं। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 178वाँ श्लोक)— “पुरा प्राणसखी यासीन्नाम्ना रत्नावली व्रजे। गोपीनाथाख्यकाचार्यो निर्मलत्वेन विश्रुतः॥ 178॥” “पहले जो व्रजमें रत्नावली नामक प्राणसखी थीं, वे ही अब श्रीगोपीनाथाचार्यके नामसे विख्यात हैं।” किसी-किसी के मतानुसार, ये ब्रह्मा हैं। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 75वाँ श्लोक)— “गोपीनाथाचार्यनाम्ना ब्रह्मा ज्ञेयो जगत्पतिः। नवव्यूहे तु गणितो यस्तन्त्रे तन्त्रवेदिभिः॥ 75॥” “तन्त्रवादी लोग जिनकी तन्त्रमें वर्णित नवव्यूहके अन्तर्गत गणना करते हैं, उन्हीं जगत्पति ब्रह्माको श्रीगोपीनाथाचार्य जानना होगा॥” 130॥


84 | श्रीचैतन्यचरितामृत