श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 624, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 10/135-136 इच्छानुसार कविकर्णपूरने 'चैतन्यचन्द्रोदय' नाटक लिखा है। 'परमानन्द महापात्र'—(चैःभाः अन्त्यखण्ड पाँचवाँ अध्याय)— “उत्कले जन्मियाछिल यत अनुचर। सबे चिनिलेन निज प्राणेर ईश्वर॥210॥ श्रीपरमानन्द महापात्र महाशय। याँर तनु श्रीचैतन्य, –भक्तिरसमय॥212॥” “नीलाचलमें महाप्रभुके जितने भी अनुचरोंका जन्म हुआ था, उन्होंने महाप्रभुको देखते ही पहचान लिया कि वे उनके प्राणेश्वर हैं। श्रीपरमानन्द महापात्रका शरीर ही श्रीचैतन्य-भक्तिरससे बना है॥” 135॥ (13) भगवान् आचार्य, (14) ब्रह्मानन्द भारती, (15) शिखि और (16) मुरारि माहिति :- भगवान् आचार्य, ब्रह्मानन्दाख्य भारती। श्रीशिखि माहिति, आर मुरारि माहिति॥136॥ अनुवाद—भगवान् आचार्य, ब्रह्मानन्द भारती, शिखि माहिति और मुरारि माहिति, महाप्रभुके अन्य प्रिय परिकर हैं॥ 136 ॥ अनुभाष्य—'भगवान् आचार्य'—ये हालिसहरके वासी थे, इनके पुत्रका नाम रघुनाथ था (भक्तिरत्नाकर)। ये पङ्गु थे। चैःचः मध्यलीला, 10/184 संख्यामें— “रामभद्राचार्य आर भगवान् आचार्य। प्रभु-पदे रहिला दुँहे छाड़ि' सर्व कार्य॥184॥” “ये सब कुछ छोड़कर महाप्रभुके पास जगन्नाथपुरी आ गये।” चैःचः अन्त्यलीला, दूसरा अध्याय— “पुरुषोत्तमे प्रभुपाशे भगवान् आचार्य। परम पण्डित तँहो सुपण्डित आर्य॥ सख्यभावाक्रान्त-चित्त गोप-अवतार। स्वरूप गोसाञिसह सख्य-व्यवहार॥ एकान्तभावे आश्रियाछे चैतन्य-चरण। मध्ये मध्ये प्रभुर तेंहो करे निमन्त्रण॥” “भगवान् आचार्य परम पण्डित थे। सख्यभावसे इनका चित आक्रान्त रहता था। ये व्रजके गोपके अवतार थे। स्वरूप गोस्वामीके साथ इनका सखा जैसे व्यवहार था। महाप्रभुके चरणोंमें इनकी ऐकान्तिक भक्ति थी। कभी-कभी ये महाप्रभुको अपने घर निमन्त्रित करते थे।” इन्हींके घरपर जब महाप्रभु भिक्षा करने आये थे, तब उन्होंने छोटे हरिदासको माधवीदेवीसे चावलकी भिक्षाके बहाने उनसे वार्तालाप करनेके कारण उसका परित्याग किया था (चैःचः अन्त्यलीला, 2/101-166 संख्या द्रष्टव्य है)। ये अत्यन्त उदार और सरल थे, परन्तु इनके पिता शतानन्द खाँ जैसे घोर विषयी थे, इनके अनुज गोपाल भट्टाचार्य भी वैसे ही कट्टर मायावादी थे। गोपाल भट्टाचार्य काशीमें मायावाद-भाष्यका अध्ययन करके पुरीमें अपने बड़े भाई भगवान् आचार्यके पास आये थे, यद्यपि भगवान् आचार्य स्नेहवश इनसे मायावाद सुननेको सहमत हो गये थे, किन्तु मायावाद-भाष्यके भक्ति विरोधी होनेके कारण श्रीस्वरूप दामोदरने इन्हें सुननेके लिये मना किया (चैःचः अन्त्यलीला, 2/89-100 संख्या द्रष्टव्य हैं)। एक दिन इनके पूर्व-परिचित बङ्गालका 'जैसा-तैसा' (जो रसतत्त्व और वैष्णवसिद्धान्तको ठीकसे नहीं जानता) एक कवि एक भक्तिसिद्धान्त-विरोधी नाटककी रचना करके इनके घर आकर ठहरा और उसने महाप्रभुको उस नाटकको सुनानेकी इच्छा प्रकट की। श्रीस्वरूप दामोदरको उनके नाटकपर सन्देह होनेपर भी उस नाटकको सुननेके लिये इनके बहुत अनुरोध करनेपर उसने पहले नान्दी-श्लोकका पाठ किया। उसे सुनते ही श्रीस्वरूप दामोदरने नाटकमें अनेक भक्तिसिद्धान्त-विरोध दिखलाये। अन्तमें उस कविने भक्तोंके चरणोंमें शरण ग्रहण की (चैःचः अन्त्यलीला, 5/91-156 संख्या)। चैःभाः अन्त्यखण्ड, तीसरा अध्याय द्रष्टव्य है। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 74वाँ श्लोक)— “आचार्यों भगवान् खञ्जः कला गौरस्य कथ्यते॥74(ख)॥” “भगवान् आचार्य खञ्ज (पङ्गु) को श्रीगौराङ्गदेवकी कला कहा जाता है।” 88 | श्रीचैतन्यचरितामृत