भारतकोश
संग्रह पर लौटें

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

[ 10/135-136 इच्छानुसार कविकर्णपूरने 'चैतन्यचन्द्रोदय' नाटक लिखा है। 'परमानन्द महापात्र'—(चैःभाः अन्त्यखण्ड पाँचवाँ अध्याय)— “उत्कले जन्मियाछिल यत अनुचर। सबे चिनिलेन निज प्राणेर ईश्वर॥210॥ श्रीपरमानन्द महापात्र महाशय। याँर तनु श्रीचैतन्य, –भक्तिरसमय॥212॥” “नीलाचलमें महाप्रभुके जितने भी अनुचरोंका जन्म हुआ था, उन्होंने महाप्रभुको देखते ही पहचान लिया कि वे उनके प्राणेश्वर हैं। श्रीपरमानन्द महापात्रका शरीर ही श्रीचैतन्य-भक्तिरससे बना है॥” 135॥ (13) भगवान् आचार्य, (14) ब्रह्मानन्द भारती, (15) शिखि और (16) मुरारि माहिति :- भगवान् आचार्य, ब्रह्मानन्दाख्य भारती। श्रीशिखि माहिति, आर मुरारि माहिति॥136॥ अनुवाद—भगवान् आचार्य, ब्रह्मानन्द भारती, शिखि माहिति और मुरारि माहिति, महाप्रभुके अन्य प्रिय परिकर हैं॥ 136 ॥ अनुभाष्य—'भगवान् आचार्य'—ये हालिसहरके वासी थे, इनके पुत्रका नाम रघुनाथ था (भक्तिरत्नाकर)। ये पङ्गु थे। चैःचः मध्यलीला, 10/184 संख्यामें— “रामभद्राचार्य आर भगवान् आचार्य। प्रभु-पदे रहिला दुँहे छाड़ि' सर्व कार्य॥184॥” “ये सब कुछ छोड़कर महाप्रभुके पास जगन्नाथपुरी आ गये।” चैःचः अन्त्यलीला, दूसरा अध्याय— “पुरुषोत्तमे प्रभुपाशे भगवान् आचार्य। परम पण्डित तँहो सुपण्डित आर्य॥ सख्यभावाक्रान्त-चित्त गोप-अवतार। स्वरूप गोसाञिसह सख्य-व्यवहार॥ एकान्तभावे आश्रियाछे चैतन्य-चरण। मध्ये मध्ये प्रभुर तेंहो करे निमन्त्रण॥” “भगवान् आचार्य परम पण्डित थे। सख्यभावसे इनका चित आक्रान्त रहता था। ये व्रजके गोपके अवतार थे। स्वरूप गोस्वामीके साथ इनका सखा जैसे व्यवहार था। महाप्रभुके चरणोंमें इनकी ऐकान्तिक भक्ति थी। कभी-कभी ये महाप्रभुको अपने घर निमन्त्रित करते थे।” इन्हींके घरपर जब महाप्रभु भिक्षा करने आये थे, तब उन्होंने छोटे हरिदासको माधवीदेवीसे चावलकी भिक्षाके बहाने उनसे वार्तालाप करनेके कारण उसका परित्याग किया था (चैःचः अन्त्यलीला, 2/101-166 संख्या द्रष्टव्य है)। ये अत्यन्त उदार और सरल थे, परन्तु इनके पिता शतानन्द खाँ जैसे घोर विषयी थे, इनके अनुज गोपाल भट्टाचार्य भी वैसे ही कट्टर मायावादी थे। गोपाल भट्टाचार्य काशीमें मायावाद-भाष्यका अध्ययन करके पुरीमें अपने बड़े भाई भगवान् आचार्यके पास आये थे, यद्यपि भगवान् आचार्य स्नेहवश इनसे मायावाद सुननेको सहमत हो गये थे, किन्तु मायावाद-भाष्यके भक्ति विरोधी होनेके कारण श्रीस्वरूप दामोदरने इन्हें सुननेके लिये मना किया (चैःचः अन्त्यलीला, 2/89-100 संख्या द्रष्टव्य हैं)। एक दिन इनके पूर्व-परिचित बङ्गालका 'जैसा-तैसा' (जो रसतत्त्व और वैष्णवसिद्धान्तको ठीकसे नहीं जानता) एक कवि एक भक्तिसिद्धान्त-विरोधी नाटककी रचना करके इनके घर आकर ठहरा और उसने महाप्रभुको उस नाटकको सुनानेकी इच्छा प्रकट की। श्रीस्वरूप दामोदरको उनके नाटकपर सन्देह होनेपर भी उस नाटकको सुननेके लिये इनके बहुत अनुरोध करनेपर उसने पहले नान्दी-श्लोकका पाठ किया। उसे सुनते ही श्रीस्वरूप दामोदरने नाटकमें अनेक भक्तिसिद्धान्त-विरोध दिखलाये। अन्तमें उस कविने भक्तोंके चरणोंमें शरण ग्रहण की (चैःचः अन्त्यलीला, 5/91-156 संख्या)। चैःभाः अन्त्यखण्ड, तीसरा अध्याय द्रष्टव्य है। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 74वाँ श्लोक)— “आचार्यों भगवान् खञ्जः कला गौरस्य कथ्यते॥74(ख)॥” “भगवान् आचार्य खञ्ज (पङ्गु) को श्रीगौराङ्गदेवकी कला कहा जाता है।” 88 | श्रीचैतन्यचरितामृत

10/136 ] 'शिखि माहिति' - (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 189वाँ श्लोक) - "रागलेखा-कलाकेल्यौ राधादास्यौ पुरा स्थिते। ते ज्ञेये शिखिमाहिती तत्स्वसा माधवी-क्रमात् ॥ 189 ॥" “पहले रागलेखा और कलाकेलि नामक जो दो श्रीराधादासी थीं, उन्हें ही अब क्रमशः शिखिमाहिति और उनकी बहन माधवी जानना होगा।" ये और उनकी बहन, दोनों ही महाप्रभुके उत्कलवासी अन्तरङ्ग अधिकारी भक्त हैं। जैसे- श्रीचैतन्यचरित-महाकाव्य (13 सर्ग 89-109) में इस प्रकार वर्णन है - "पुरुषोत्तमक्षेत्रमें शिखि माहिति (हान्ति) नामक एक निर्मल हृदयवाले करुणाशील महात्मा वास करते थे। वे नीलाचल-तिलक श्रीजगन्नाथदेवके दास स्वरूप थे। 'मुरारि माहिति' इनके छोटे भाई थे और इनकी छोटी बहन शुद्ध बुद्धिवाली माधवी देवी थीं। इनके प्रिय भाई और बहन, दोनों ही श्रीगौरसुन्दरमें अनुरक्त थे। उनकी बुद्धि सहज ही निश्चल थी, इसलिये उन्हें कभी भी श्रीगौरसुन्दरकी विस्मृति नहीं होती थी। इस समय वृन्दावनचन्द्र श्रीकृष्ण ही श्रीगौरचन्द्रके रूपमें इस धराधामपर प्रकट हुए हैं, इस भावने भाई-बहनके श्रीगौरस्नेहको और दृढ़ किया। नीलाचलेन्द्र श्रीजगन्नाथके प्रेमी सेवक अपने बड़े भाई शिखि माहितिको श्रीगौरसुन्दरके भजनमें लगानेका दोनों भाई-बहनने बहुत प्रयास किया, किन्तु शिखि माहिति श्रीगौरभजनमें रत नहीं हुए। एक दिन अपने छोटे भाईके उपदेश सुनकर और उनकी बहुत प्रकारसे आलोचना करते-करते वे सो गये। रात्रिके आखिरी प्रहरमें उन्होंने चकित होकर 'श्रीगौर-चरणकमलोंके दर्शन करते हुए उनके भाई-बहन उन्हें उठा रहे हैं' इस प्रकार एक स्वप्न देखा। आश्चर्यमय स्वप्नको देखकर उनके शरीरमें पुलक हो गया और आनन्दके कारण उनका आश्चर्य दो गुणा बढ़ गया। आँख खोलते ही उन्होंने अपने भाई-बहनको सामने खड़ा पाया। उन्होंने उन दोनोंको अपने गले लगा लिया। इससे सभी आश्चर्यचकित हो गये। शिखि माहिति उनसे कहने लगे, - "भाई! मैंने जो स्वप्न देखा, उसे सुनो, वह बहुत ही विचित्र है। श्रीशचीनन्दनकी महिमा जो असीम है, उसका मैंने आज ही अनुभव किया। मैंने देखा कि श्रीगौरसुन्दर नीलाचलेन्द्रके दर्शनकर बारम्बार उनमें प्रवेश कर रहे हैं और बाहर आ रहे हैं, एवं पुनः पुनः श्रीजगन्नाथदेवका अवलोकन कर रहे हैं- उन्होंने इस प्रकार लीलाका विस्तार किया। क्या आश्चर्य है? मैं अभी भी परमेश्वर श्रीगौरसुन्दरको उसी अवस्थामें देख रहा हूँ, क्या मेरे नेत्र भ्रमित हो रहे हैं? हाय! उन असीम कृपासिन्धु श्रीगौरसुन्दरने मुझे जगन्नाथदेवके समीप देखकर मुझे नाम लेकर बुलाया और अपनी सुन्दर लम्बी भुजाओंके द्वारा मेरा आलिङ्गन किया।" इस प्रकार पुलकित शरीर और अश्रुपूरित नेत्रोंके साथ प्रेमसे गद्गद् वाणीसे यह सब बतलाते हुए वे बाहर आये। मुरारि और माधवीने उनकी यह बात सुनकर उन्हें महाप्रभुके दर्शनके लिये श्रीजगन्नाथजीके दर्शनके लिये जानेको कहा। तब तीनों ही इस बातके लिये सहमत होकर श्रीजगन्नाथजीके दर्शनके लिये गये। मुरारि और माधवी महाप्रभुके जगमोहनमें दर्शन करके आनन्द-अश्रु बहाने लगे, किन्तु उनके बड़े भाई शिखि माहितिने महाप्रभुको जैसा स्वप्नमें देखा था, चारों ओर श्रीगौरसुन्दरको ठीक उसी प्रकार प्रभावसे युक्त देखा और उनके हृदयमें प्रेम उदित हो गया। महावदान्य महाप्रभुने भी 'तुम मुरारिके अग्रज हो' यह कहकर अपनी दोनों भुजाओंसे उनका आलिङ्गन किया। तब शिखि माहितिने श्रीगौरसेवामय बुद्धिसे युक्त होकर परम सुखका अनुभव किया। तबसे शिखि माहिति श्रीगौरसुन्दरके चरणकमलोंकी गन्धसे सब कुछ भूल गये और अपने अभीष्टदेव श्रीगौरकी सेवा करने लगे। 'मुरारि माहिति' - (चैःचः मध्यलीला, 10/44 संख्यामें) - “मुरारि माहिति इहाँ शिखि-माहितिर भाइ। तोमार चरण बिना अन्य गति नाइ॥” दसवाँ अध्याय | 89

[ 10/136-141 “मुरारि माहित—ये शिखि माहितिके छोटे भाई हैं और श्रीगौरसुन्दरके चरणोंके अतिरिक्त इनकी कोई गति नहीं है॥”136॥ (17) माधवीदेवी :— माधवीदेवी—शिखि माहितिर भगिनी। श्रीराधार दासीमध्ये याँर नाम गणि॥ 137 ॥ अनुवाद—माधवी देवी शिखि माहितिकी बहन हैं और उनकी गणना श्रीमती राधिकाकी दासियोंमें होती है॥137॥ अनुभाष्य—‘माधवी देवी’—(चैःचः अन्त्यलीला, 2/104-106)— “प्रभु लेखा करे याँरे राधिकार गण। जगतेर मध्ये पात्र—साड़े तिनजन॥ स्वरूप गोसाञि, आर राय रामानन्द। शिखि माहिति—तिन, ताँर भगिनी—अर्द्धजन॥” “महाप्रभु माधवीदेवीको श्रीमती राधिकाके गणोंमें मानते हैं। महाप्रभुके साढ़े तीन लोग अन्तरङ्ग भक्त हैं। श्रीस्वरूप दामोदर, श्रीराय रामानन्द और शिखि माहिति, ये तीन लोग हैं और शिखि माहितिकी बहन माधवी देवी आधा-जन हैं॥”137॥ (18) काशीश्वर, (19) गोविन्द :— ईश्वरपुरीर शिष्य—ब्रह्मचारी काशीश्वर। श्रीगोविन्द-नाम ताँर प्रिय अनुचर॥ 138 ॥ ताँर सिद्धिकाले दोँहे ताँर आज्ञा पाञा। नीलाचले प्रभुस्थाने मिलिल आसिया॥ 139 ॥ अनुवाद—ब्रह्मचारी काशीश्वर श्रीईश्वरपुरीके शिष्य और श्रीगोविन्द उनके प्रिय सेवक थे। श्रीईश्वरपुरीके सिद्धिकालमें (अप्रकट होनेके समय) उनसे आज्ञा प्राप्तकर, ये दोनों नीलाचलमें आकर महाप्रभुसे मिले॥138-139॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘श्रीगोविन्द और काशीश्वर’—ये दोनों श्रीईश्वरपुरीके शिष्य थे। ईश्वरपुरीके सिद्धिप्राप्तिके समय उनकी आज्ञासे ये नीलाचलमें महाप्रभुके पास आये थे॥138॥ अनुभाष्य—‘श्रीगोविन्द’—महाप्रभुके निज सेवक थे। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 137वाँ श्लोक)— “पुरा वृन्दावने चेटौ स्थितौ भृङ्गार-भङ्गुरौ। श्रीकाशीश्वर-गोविन्दौ तौ जातौ प्रभु-सेवकौ॥ 137॥” “जो पहले वृन्दावनमें भृङ्गार और भङ्गुर नामके दो ‘चेट’ थे, वे ही श्रीगौरसेवक काशीश्वर और गोविन्द हैं।” महाप्रभुके साथ ईश्वरपुरीके शिष्य गोविन्दके मिलनके वर्णनके लिये चैःचः मध्यलीला, 10/131-148 द्रष्टव्य है। गोविन्दके शुद्धदास्यरसके वशीभूत महाप्रभु—(चैःचः मध्यलीला, 2/78)। महाप्रभुकी सेवाके लिये उनकी देहके ऊपरसे लांघकर जानेमें भी गोविन्दको कोई दुविधा नहीं होती थी, किन्तु अपने लिये ऐसा करनेमें उन्हें अपराधका भय रहता था— “गोविन्द कहे, आमार सेवा से नियम। अपराध हउक् किंवा नरके गमन॥” “गोविन्द कहते थे—मेरा सेवाका यह नियम है, इसके द्वारा अपराध हो अथवा नरकमें जाना पड़े, कोई बात नहीं।” चैःचः मध्यलीला 10/82-100 संख्या द्रष्टव्य है॥139॥ गोविन्द और काशीश्वरकी श्रीगौर-सेवा :— गुरुर सम्बन्धे मान्य कैल दुँहाकारे। ताँर आज्ञा मानि’ सेवा दिलेन दोँहारे॥ 140 ॥ अनुवाद—अपने गुरु श्रीईश्वरपुरीसे सम्बन्धित होनेके कारण महाप्रभु इन दोनोंका सम्मान करते थे, किन्तु गुरुकी आज्ञा मानकर महाप्रभुने इन दोनोंको अपनी सेवा प्रदान की॥140॥ अङ्गसेवा गोविन्देर दिलेन ईश्वर। जगन्नाथ देखिते आगे चले काशीश्वर॥ 141 ॥ 90 | श्रीचैतन्यचरितामृत

10/141-147 ] अपर्श याय गोसाञि मनुष्य-गहने। मनुष्य ठेलि' पथ करे काशी बलवाने॥142॥ अनुवाद—महाप्रभुने गोविन्दको अपनी देहकी सेवा प्रदान की। काशीश्वर बहुत बलवान थे और जब महाप्रभु जगन्नाथजीके दर्शनके लिये जाते, तब काशीश्वर महाप्रभु के आगे-आगे चलकर लोगोंको हटाकर मार्ग बनाते, जिससे भीड़में कोई उनको स्पर्श न कर पाये॥141-142॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘अपर्श’—बिना स्पर्श किये॥142॥ इति अमृतप्रवाह-भाष्ये दशम परिच्छेद। दसवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। (20) रामाइ, (21) नन्दाइ :- रामाइ-नन्दाइ—दोँहे प्रभुर किङ्कर। गोविन्देर सङ्गे सेवा करे निरन्तर॥143॥ बाइश घड़ा जल दिने भरेन रामाइ। गोविन्देर आज्ञाय सेवा करेन नन्दाइ॥144॥ अनुवाद—रामाइ और नन्दाइ, ये दोनों महाप्रभुके सेवक हैं और दोनों गोविन्दके साथ मिलकर निरन्तर महाप्रभुकी सेवा करते थे। रामाइ दिनमें बाइस घड़े जल भरते और नन्दाइ गोविन्दकी आज्ञानुसार महाप्रभुकी सेवा करते॥143-144॥ अनुभाष्य—‘रामाइ और नन्दाइ’—(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 139वाँ श्लोक)— “पयोद-वारिदौ प्राग् यौ नीरसंस्कारकारिणौ। तावद्य भृत्यौ रामायिर्नन्दायिश्चेति विश्रुतौ॥139॥” “पहले जो जलसंस्कारकारी (गोचारणके समय श्रीकृष्णके व्यवहारके लिये जलसे परिपूर्ण पात्रोंको उठाकर ले जानेवाले) पयोद और वारिद नामक श्रीकृष्णके सेवक थे, वे ही अब रामाइ और नन्दाइके नामसे प्रसिद्ध हैं।” ये गोविन्दके आनुगत्यमें महाप्रभुकी सेवा करते थे॥143॥ (22) कालाकृष्णदास विप्र :- कृष्णदास-नाम शुद्ध कुलीन ब्राह्मण। यारे सङ्गे लैया कैल दक्षिण गमन॥145॥ अनुवाद—कृष्णदास नामक एक शुद्ध कुलीन ब्राह्मण थे, जिन्हें महाप्रभु अपने साथ लेकर दक्षिण भारतकी यात्रापर गये थे॥145॥ अनुभाष्य—‘कृष्णदास’—चैःचः मध्यलीला, सातवें और नौवें अध्यायमें इनका प्रसङ्ग वर्णित है। जलपात्रको उठाकर चलनेके लिये ये सरल ब्राह्मण महाप्रभुके साथ दक्षिण भारत गये। महाप्रभुने मालाबार देशमें भटथारियोंके द्वारा इनको स्त्रीरूपसे मोहित करके आबद्ध करनेकी चेष्टाको देखकर इनका उद्धार किया और इनको नीलाचलकी ओर लौटनेके लिये विदा किया॥145॥ (23) बलभद्र भट्ट :- बलभद्र भट्टाचार्य—भक्ति-अधिकारी। मथुरा-गमने प्रभुर यँहो ब्रह्मचारी॥146॥ अनुवाद—बलभद्र भट्टाचार्य भक्तिके योग्य अधिकारी हैं। ये ब्रह्मचारी महाप्रभुके साथ मथुरा गये थे॥146॥ अनुभाष्य—‘बलभद्र भट्टाचार्य’—व्रजकी मधुरेक्षणा हैं। संन्यासियोंके लिये भोजन बनाना आदि व्यवहारिक कर्म-काण्ड निषिद्ध हैं। वे गृहस्थियोंसे यह सब ग्रहण और स्वीकार करते हैं। संन्यासीगण-गुरु हैं और ब्रह्मचारीगण शिष्य हैं। बलभद्र महाप्रभुके साथ जब वृन्दावन गये, तब उन्होंने ब्रह्मचारीका कार्य किया॥146॥ (24) बड़े हरिदास, (25) छोटा हरिदास :- बड़ हरिदास, आर छोट हरिदास। दुइ कीर्त्तनीया रहे महाप्रभुर पाश॥147॥ अनुवाद—बड़े हरिदास और छोटे हरिदास, ये दो कीर्तनीया महाप्रभुके पास रहते थे॥147॥ अनुभाष्य—‘छोट हरिदास’—इनका प्रसङ्ग चैःचः अन्त्यलीला, दूसरे अध्यायमें द्रष्टव्य है॥147॥ दसवाँ अध्याय | 91

[ 10/148-158 (26) रामभद्र, (27) सिंहेश्वर, (28) तपनाचार्य, (29) रघुनाथ, (30) नीलाम्बर :- रामभद्राचार्य, आर ओढ़ तपन आचार्य, आर रघु, नीलाम्बर ॥ 148 ॥ (31) सिङ्गाभट्ट, (32) कामाभट्ट, (33) शिवानन्द, (34) कमलानन्द :- सिङ्गाभट्ट, कामाभट्ट, दस्तुर शिवानन्द। गौड़े पूर्वे भृत्य प्रभुर प्रिय कमलानन्द ॥ 149 ॥ अनुवाद-रामभद्राचार्य, उड़ीसावासी सिंहेश्वर, तपन आचार्य, रघु, नीलाम्बर, सिङ्गाभट्ट, कामाभट्ट, शिवानन्द दस्तुर और कमलानन्द महाप्रभुके प्रिय भक्त हैं। कमलानन्द पहले महाप्रभुके साथ गौड़देशमें थे और बादमें नीलाचलमें उनके पास आ गये॥ 148-149 ॥ (35) अच्युतानन्द :- अच्युतानन्द-अद्वैत-आचार्य तनय। नीलाचले रहे प्रभुर चरण आश्रय ॥ 150 ॥ अनुवाद-अच्युतानन्द श्रीअद्वैताचार्यके पुत्र हैं। वे नीलाचलमें महाप्रभुके चरणाश्रयमें रहे॥ 150 ॥ अनुभाष्य-'अच्युतानन्द'-चैःचः आदिलाीला, 12/13 संख्या द्रष्टव्य है॥ 150 ॥ (36) गङ्गादास, (37) विष्णुदास :- निर्लोम गङ्गादास, आर विष्णुदास। एइ सबेर प्रभुसङ्गे नीलाचले वास ॥ 151 ॥ अनुवाद-निर्लोम गङ्गादास और विष्णुदास महाप्रभुके अन्य भक्त थे। ये सब भक्त महाप्रभुके साथ नीलाचलमें रहे ॥ 151 ॥ काशीप्रवासी—(1) चन्द्रशेखर, (2) तपनमिश्र, (3) श्रीरघुनाथ भट्ट :- वाराणसी-मध्ये प्रभुर भक्त तिनजन। चन्द्रशेखर वैद्य, आर मिश्र तपन ॥ 152 ॥ रघुनाथ भट्टाचार्य-मिश्रेर नन्दन। प्रभु यबे काशी आइला देखि' वृन्दावन ॥ 153 ॥ चन्द्रशेखर-गृहे कैल दुइमास वास। तपन-मिश्रेर घरे भिक्षा दुइ मास ॥ 154 ॥ अनुवाद-चन्द्रशेखर वैद्य, तपन मिश्र और उनके पुत्र रघुनाथ भट्टाचार्य, वाराणसीमें महाप्रभुके ये तीन भक्त थे। महाप्रभु वृन्दावनके दर्शनके पश्चात् जब काशी आये थे, तब वे चन्द्रशेखरके घरमें दो महीने तक रहे और उस कालमें वे तपन मिश्रके घर भिक्षा (प्रसाद) ग्रहण करते थे ॥ 152-154 ॥ अनुभाष्य-'तपनमिश्र'-महाप्रभु जब (पूर्व) बङ्गाल (वर्तमान बङ्गलादेश) में गये थे, तब इन्होंने उनसे साधन और साध्यतत्त्वके विषयमें जिज्ञासा की और महाप्रभुसे हरिनाम ग्रहण किया। बादमें महाप्रभुकी आज्ञासे ये काशीमें वास करने लगे। महाप्रभुने काशीवासकालमें इनके घर भिक्षा करना (प्रसाद सेवन) स्वीकार किया था ॥ 152 ॥ श्रीरघुनाथ भट्टका विवरण :- रघुनाथ बाल्ये कैल प्रभुर सेवन। उच्छिष्ट-मार्जन आर पाद-सम्वाहन ॥ 155 ॥ बड़ हैले नीलाचले गेला प्रभुर स्थाने। अष्टमास रहिल भिक्षा देन कोन दिने ॥ 156 ॥ प्रभुर आज्ञा पाञा वृन्दावनरे आइला। आसिया श्रीरूप-गोसाञिर निकटे रहिला ॥ 157 ॥ ताँर स्थाने रूप-गोसाञि शुनेन भागवत। प्रभुर कृपाय तें'हो कृष्णप्रेमे मत्त ॥ 158 ॥ अनुवाद-जब महाप्रभु तपन मिश्रके घरमें रहे थे, तब रघुनाथ भट्ट छोटे बालक थे। उन्होंने महाप्रभुके बर्तन माँजने और उनके पाद सम्वाहन करनेकी सेवा की थी। बड़े होनेपर वे महाप्रभुके पास नीलाचल गये और वहाँ आठ महीने रहे। इस समयमें वे कभी-कभी 92 | श्रीचैतन्यचरितामृत

10/155-158 ] महाप्रभुको प्रसाद निवेदन करते थे। महाप्रभुकी आज्ञा पाकर वे वृन्दावन आ गये। श्रीरूप गोस्वामी उनके स्थानपर आकर उनसे भागवत सुनते थे। महाप्रभुकी कृपासे वे सदा कृष्णप्रेममें मत्त रहते थे॥155-158॥

ग्राम्यवार्त्ता ना सुने, ना कहे जिह्वाय। कृष्णकथा-पूजादिते अष्टप्रहर याय॥ वैष्णवेर निन्द्यकर्म नाहि पाड़े काणे। सबे कृष्णभजन करे, -एइमात्र जाने॥”

अनुभाष्य-‘रघुनाथ भट्टाचार्य'–ये छह गोस्वामियोंमें अन्यतम और तपन मिश्रके पुत्र थे। लगभग 1425 शकाब्दमें इनका जन्म हुआ था। भागवत शास्त्रमें इनकी विशेष निपुणता थी। (चैःचः अन्त्यलीला, तेरहवाँ परिच्छेद)-

“रघुनाथ भट्ट पाके अति सुनिपुण। येइ रान्धे सेइ हय अमृत-समान॥ परम सन्तोषे प्रभु करेन भोजन। प्रभुर अवशिष्ट पात्र भट्टेर भक्षण॥ अष्टमास रहिं' प्रभु भट्टे विदाय दिल। 'विवाह ना करिह' बलि' निषेध करिल॥ 'वृद्ध मातापिता याइ' करह सेवन। वैष्णव-पाश भागवत कर अध्ययन॥ पुनरपि एकबार आसिह नीलाचले।' एत बलि' कण्ठमाला दिल ताँर गले॥” “चारि वत्सर घरे पिता-मातार सेवा कैल। वैष्णव-पण्डित-ठाँइ भागवत पड़िल॥ पिता-माताय काशी पाइले उदासीन हञा। पुनः प्रभुर ठाँइ आइला गृहादि छाड़िया॥” “आमार आज्ञाय, रघुनाथ, याह वृन्दावने। ताँहा याजा रह रूप-सनातन-स्थाने॥ भागवत पड़, सदा लह कृष्णनाम। अचिरे करिबेन कृपा कृष्ण भगवान्॥ एत बलि' प्रभु ताँरे आलिङ्गन कैला। प्रभुर कृपाते कृष्णप्रेममत्त हैला॥ चौद्दहात जगन्नाथेर तुलसीर माला। सेइ माला, छुटापान प्रभु ताँरे दिला॥” “रूप-गोसाञिर सभाय करे भागवत पठन। भागवत पड़िते आउलाय ताँर मन॥ पिकस्वर कण्ठ, ताते रागेर विभाग। एक श्लोक पड़िते फिराय चारि राग॥ निज-शिष्ये कहिं' गोविन्देर मन्दिर कराइल। वंशी-मकर-कुण्डलादि भूषण करि' दिल॥

“रघुनाथ भट्ट भोजन बनानेमें अति निपुण थे। ये जो कुछ भी बनाते थे, वह अमृतके समान होता था। महाप्रभु परम सन्तोषके साथ इनका बनाया भोजन करते थे और उनका उच्छिष्ट प्रसाद ये पाते थे। आठ महीने नीलाचलमें रहनेके बाद महाप्रभुने इन्हें वहाँसे विदा किया और विवाह करनेसे निषेध किया। महाप्रभुने इन्हें वृद्ध माता-पिताके पास रहकर उनकी सेवा करने और वैष्णवोंसे भागवत श्रवण करने तथा पुनः एक बार नीलाचल आनेकी आज्ञा दी। यह कहकर महाप्रभुने अपने गलेकी माला उनके गलेमें डाल दी।” “घर जाकर इन्होंने चार वर्ष माता-पिताकी सेवा की और वैष्णव-पण्डितसे भागवत पढ़ी। माता-पिताके देहावसानके बाद ये जगत्के प्रति उदासीन हो गये और घर छोड़कर पुनः महाप्रभुके पास नीलाचल आये।” “(महाप्रभुने कहा-) मेरी आज्ञा है कि तुम वृन्दावन जाओ और वहाँ रूप-सनातनके पास रहो। वहाँ भागवतका पाठ करना और सदा कृष्णनाम करना। इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण तुमपर शीघ्र ही कृपा करेंगे। यह कहकर महाप्रभुने इनका आलिङ्गन किया। महाप्रभुकी कृपासे ये कृष्णप्रेममें मत्त हो गये। महाप्रभुने इनको जगन्नाथजीके पान-सुपारी और चौदह हाथ लम्बी तुलसीकी माला दी।” “ये रूप गोस्वामीकी सभामें भागवतका पाठ करते थे और पाठ करते समय इनका हृदय विगलित हो जाता था। इनका कण्ठ बहुत मधुर था और इनको रागोंकी विशेष जानकारी थी। वे एक श्लोकको चार विभिन्न रागोंमें गाते थे। इन्होंने अपने एक शिष्यको आज्ञा देकर उनके द्वारा श्रीगोविन्ददेवजीके मन्दिरका निर्माण करवाया था। श्रीगोविन्ददेवकी वंशी, मकर-कुण्डलादि आभूषणादि इन्होंने अर्पित किये थे। वे कभी भी ग्राम्यवार्त्ता न करते थे और न ही सुनते थे। कृष्णकथा

दसवाँ अध्याय | 93

[ 10/153–164 और पूजा आदिमें इनके आठों प्रहर व्यतीत होते थे। ये कभी भी वैष्णवकी निन्दा नहीं सुनते थे और इनकी उत्तम भागवतकी दृष्टि थी, जिस कारण ये सभीको श्रीकृष्णका ही भजन करते हुए देखते थे। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 185वाँ श्लोक)— “रघुनाथाख्यको भट्टः पुरा या रागमञ्जरी।।185(क)।” “पूर्वकालकी रागमञ्जरी ही रघुनाथ भट्ट कहलाते हैं।” ॥ 153-158 ॥ इति अनुभाष्ये दशम परिच्छेद। दसवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। शाखा-प्रशाखाओंके क्रमसे असंख्य गौरभक्तोंके द्वारा त्रिभुवनका उद्धार :— एइमत संख्यातीत चैतन्य-भक्तगण। दिङ्मात्र लिखि, सम्यक् ना याय कथन ॥ 159 ॥ एकैक-शाखाते लागे कोटि कोटि डाल। तार शिष्य-उपशिष्य, तार उपडाल ॥ 160 ॥ सकल भरिया आछे प्रेम-फूल-फले। भासाइल त्रिजगत् कृष्णप्रेम-जले ॥ 161 ॥ एक एक शाखार शक्ति अनन्त महिमा। 'सहस्र वदने' यार दिते नारे सीमा ॥ 162 ॥ संक्षेपे कहिल महाप्रभुर भक्तगण। समग्र बलिते नारे 'सहस्र-वदन' ॥ 163 ॥ अनुवाद—इस प्रकार श्रीचैतन्य महाप्रभुके भक्तोंकी संख्या अनन्त है। मैंने केवल उनका दिग्दर्शनमात्र करवाया है, सम्पूर्ण रूपसे तो उनका वर्णन करना सम्भव ही नहीं है। एक-एक शाखापर करोड़ों-करोड़ों डालें हैं और उनके शिष्य-उपशिष्य उनकी उपडालें हैं। सभी शाखाएँ, डालें और उपडालें प्रेमरूप फूल और फलोंसे लदी हैं, जिन्होंने त्रिभुवनको कृष्णप्रेमके जलमें डुबो दिया है। एक-एक शाखाकी शक्तिकी महिमा अनन्त है, सैकड़ों मुखोंसे भी जिनका गान नहीं किया जा सकता है। संक्षेपमें मैंने महाप्रभुके भक्तोंका वर्णन किया है, सम्पूर्ण वर्णन तो (अनन्त शेष) अपने सैकड़ों मुखोंसे भी नहीं कर सकते ॥ 159-163 ॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 164 ॥ इति श्रीश्रीचैतन्यचरितामृते आदिलीलायां मूलस्कन्ध-शाखावर्णनं नाम दशम परिच्छेदः। अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है ॥ 164 ॥ श्रीश्रीचैतन्यचरितामृतमें आदिलीलाका 'मूलस्कन्धकी शाखाका वर्णन' नामक दसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।

ग्यारहवाँ अध्याय

चित्र 4

ग्यारहवाँ अध्याय ग्यारहवें अध्यायका कथासार—इस अध्यायमें श्रीनित्यानन्द प्रभुके परिकरोंका वर्णन है। (अमृतप्रवाह भाष्य) श्रीनित्यानन्द प्रभुके गणोंके प्रति नमस्कार :- नित्यानन्द-पदाम्भोज-भृङ्गान् प्रेममधून्मदान्। नत्वाखिलान् तेषु मुख्या लिख्यन्ते कतिचिन्मया ॥ 1 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ 1 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—प्रेमरूप मधुपानमें उन्मत्त श्रीनित्यानन्द प्रभुके चरणकमलोंके समस्त भ्रमरोंको नमस्कार करके उनमेंसे कुछ मुख्य भक्तोंके नाम उल्लेख कर रहा हूँ॥ 1 ॥ अनुभाष्य—प्रेममधून्मदान् (प्रेम एव मधु तेन उन्मदान्) अखिलान् (सर्वान्) नित्यानन्दपदाम्भोजभृङ्गान् (प्रभुपदपद्मभ्रमवान्) नत्वा (प्रणम्य) तेषु (भक्तेषु) कतिचित् मुख्याः [भक्ताः] मया लिख्यन्ते। श्लोक भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ 1 ॥ जय जय महाप्रभु श्रीकृष्णचैतन्य। ताँहार चरणाश्रित येइ, सेइ धन्य॥ 2 ॥ जय जय श्रीअद्वैत, जय नित्यानन्द। जय जय महाप्रभुर सर्वभक्तवृन्द॥ 3 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुकी जय हो। जिन्होंने उनके चरणोंका आश्रय ग्रहण किया है, वे धन्य हैं। श्रीअद्वैताचार्यकी जय हो, श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। महाप्रभुके सभी भक्तोंकी जय हो॥ 2-3 ॥ नित्यानन्द-स्कन्धकी शाखाका वर्णन :- तस्य श्रीकृष्णचैतन्य-सत्प्रेमामरशाखिनः। ऊर्ध्वस्कन्धावधूतेन्दोः शाखारूपान् गणान्नुमः ॥ 4 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ 4 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्णचैतन्यरूप प्रेम कल्पवृक्षके ऊपरी स्कन्धरूप श्रीअवधूत नित्यानन्दचन्द्रकी शाखारूप सभी भक्तोंको मैं नमस्कार करता हूँ॥ 4 ॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्णचैतन्यसत्प्रेमामरशाखिनः (श्रीकृष्णचैतन्य एव सतः नित्यस्थितस्य प्रेमामरवृक्षस्य गौरनामधेयस्य अविनाशिनस्तरोः तस्य) ऊर्ध्वस्कन्धावधूतोन्दोः (उर्ध्वस्कन्धरूपः नित्यानन्दप्रभु एव इन्दु चन्द्र तस्य) शाखारूपान् गणान् (शाखारूपगणान्) नुमः (नमस्कुर्मः)। श्लोक भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ 4 ॥ श्रीनित्यानन्द-वृक्षेरे स्कन्ध-गुरुतर। ताहाते जन्मिल शाखा-प्रशाखा विस्तर॥ 5 ॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभु भक्तिवृक्षके दो स्कन्धों (श्रीनित्यानन्द और श्रीअद्वैताचार्य) में प्रधान स्कन्ध हैं। उनसे बहुतसी शाखाएँ और उपशाखाएँ निकलीं॥ 5 ॥ महाप्रभुकी इच्छासे नित्यानन्द-शाखाकी वृद्धि और प्रधानता :- मालाकारेर इच्छा-जले बाड़े शाखागण। प्रेम-फूल-फले भरि' छाइल भुवन॥ 6 ॥ अनुवाद—माली (श्रीचैतन्य महाप्रभु) के इच्छारूपी जलसे ये शाखाएँ-उपशाखाएँ बढ़कर असीम हो गयीं और इन्होंने प्रेमरूपी फलों-फूलोंसे सारे जगत्को ढक लिया॥ 6 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'मालाकारेर'—श्रीमहाप्रभुकी॥ 6 ॥ असंख्य अनन्त गण के करु गणन। आपना शोधिते कहि मुख्य मुख्य जन॥ 7 ॥ अनुवाद—शाखा-उपशाखारूपी भक्त असंख्य हैं,

[ 11/7-12 जिनकी गणना कौन कर सकता है? अपना शोधन करनेके लिये उनमेंसे मुख्य-मुख्य भक्तोंके विषयमें कह रहा हूँ॥ ७॥ (1) श्रीवीरचन्द्र गोसाईं-शाखा :- श्रीवीरभद्र गोसाञि—स्कन्ध-महाशाखा। ताँर उपशाखा यत, असंख्य तार लेखा॥ ८॥ अनुवाद—नित्यानन्दप्रभु रूपी स्कन्धकी महाशाखा श्रीवीरभद्र गोसाईं हैं, जिनकी असंख्य उपशाखाएँ हैं, उन सबका वर्णन करना सम्भव नहीं है॥ ८॥ अनुभाष्य—'श्रीवीरभद्र गोसाञि'—ये श्रीनित्यानन्द प्रभुके पुत्र थे, जिन्होंने वसुधाके गर्भसे जन्म ग्रहण किया और जाह्नवा-माताके शिष्य थे। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 67वाँ श्लोक)— “सङ्कर्षणस्य यो व्यूहः पयोब्धिशायिनामकः। स एव वीरचन्द्रोऽभूच्चैतन्याभिन्नविग्रहः॥ 67॥” “श्रीसङ्कर्षणके अंशरूप जो क्षीरोदशायी विष्णु हैं, वे ही अब श्रीचैतन्य-अभिन्न विग्रह श्रीवीरचन्द्र हैं।” श्रीवीरभद्रने हुगली जिलाके अन्तर्गत झामटपुर ग्रामके निवासी अपने शिष्य यदुनाथाचार्यकी पत्नी विद्युन्माला (लक्ष्मी) के गर्भसे जन्मीं श्रीमतीसे और उनकी पालित कन्या नारायणीसे विवाह किया (भक्तिरत्नाकरकी 13वीं तरङ्ग द्रष्टव्य है)। इनके तीन शिष्य—गोपीजनवल्लभ, रामकृष्ण और रामचन्द्र इनके पुत्र कहे जाते हैं, ऐसी प्रसिद्धि है। सबसे छोटे रामचन्द्र खड़दहमें वास करते थे। वे शाण्डिल्य-गोत्रिय शुद्धश्रोत्रिय 'वटव्याल' थे। सबसे बड़े गोपीजनवल्लभ वर्धमान जिलामें मानकरके पास 'लता' ग्राममें और मझले रामकृष्ण मालदहके पास गयेधपुरमें वास करते थे। यदि इन तीनोंका गोत्र और ग्राम एक ही होता, तो इन्हें वीरभद्रके निज पुत्र माननेमें कोई भी सन्देह नहीं करता। रामचन्द्रके चार पुत्र थे; ज्येष्ठ पुत्र राधामाधवके तीसरे पुत्र यादवेन्द्र थे और उनके पुत्र नन्दकिशोर, उनके पुत्र निधिकृष्ण, उनके पुत्र चैतन्यचाँद, उनके पुत्र कृष्णमोहन, उनके पुत्र जगन्मोहन, उनके पुत्र व्रजनाथ और उनके पुत्र परलोकगत श्यामलाल गोस्वामी थे॥ ८॥ उनकी महिमा—स्वयं विष्णु होते हुए भी वैष्णवके समान चेष्टा :- ईश्वर हइया कहाय महाभागवत। वेदधर्मातीत हञा वेदधर्मे रत॥ ९॥ अनुवाद—यद्यपि श्रीवीरभद्र स्वयं ईश्वर हैं, तथापि वे स्वयंको महाभागवत कहते थे। ईश्वर वेदोंके नियमोंसे अतीत हैं, तो भी वे वेदधर्मका दृढ़तासे पालन करते थे॥ ९॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'वीरचन्द्र प्रभु'—श्रीसङ्कर्षणके जो पयोब्धिशायी व्यूह हैं, उसीके ही स्वरूप साक्षात् ईश्वर होकर भी अपनेमें वैष्णव अभिमान रखते थे॥ ९॥ अन्तरे ईश्वर-चेष्टा, बाहिरे निर्दम्भ। चैतन्यभक्ति-मण्डपे तेंहों मूलस्तम्भ॥ १०॥ अद्यापि याँहार कृपा-महिमा हइते। चैतन्य-नित्यानन्द गाय सकल जगते॥ ११॥ सेइ वीरभद्र-गोसाञिर चरण-शरण। याँहार प्रसादे इय अभीष्ट-पूरण॥ १२॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुके द्वारा स्थापित भक्तिमण्डपके वे मुख्य स्तम्भ हैं। भीतर उन्हें ईश्वर होनेका ज्ञान था और उसके अनुरूप उनकी चेष्टाएँ भी थीं, परन्तु उनके बाह्य आचरणमें ऐसा कोई अभिमान नहीं था। यह उनकी कृपाकी ही महिमा है, जिसके कारण आज समस्त जगत् श्रीचैतन्य-नित्यानन्दके नामोंका कीर्तन कर रहा है। मैं उन श्रीवीरभद्र गोसाईंके चरणकमलोंकी शरण ग्रहण करता हूँ, जिनकी कृपासे सभी मनोभीष्ट पूर्ण होते हैं। (इसलिये श्रीचैतन्यचरितामृतकी रचनारूपी मनोभीष्ट भी अवश्य पूर्ण होगा)॥ १२॥ 98 | श्रीचैतन्यचरितामृत

11/13 ] (2) ठाकुर अभिराम (गोपाल-1), (3) दास गदाधर :- श्रीरामदास आर, गदाधर दास। चैतन्य-गोसाञिर भक्त रहे ताँर पाश ॥ 13 ॥ अनुवाद-श्रीरामदास और श्रीगदाधर दास, ये दोनों ही चैतन्य महाप्रभुके भक्त थे और वे उनके पास (नीलाचलमें) रहते थे ॥ 13 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'रामदास' - अभिराम दास ॥ 13 ॥ अनुभाष्य-'गदाधर दास'-चैःचः आदिलीला, 10/53 संख्या द्रष्टव्य है। 'श्रीरामदास (अभिराम)'-ठाकुर अभिराम, श्रीनित्यानन्द प्रभु जिनके प्राण हैं, बारह गोपालोंमें अन्यतम व्रजके 'श्रीदाम' सखा हैं। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 126वाँ श्लोक)- “पुरा श्रीदाम-नामासीदभिरामोऽधुना महान्। द्वात्रिंशता जनैरैव वाह्यं काष्ठमुवाह यः ॥ 126 ॥" “पूर्वकालमें जो महात्मा श्रीदाम थे, वे ही अब अभिराम हुए हैं। ये बत्तीस लोगोंके द्वारा वहनयोग्य लकड़ीको अकेले ही उठाकर (वंशीके जैसे) धारण कर लेते थे।” चैःचः आदिलीला, 10/116-118 संख्या द्रष्टव्य है। भक्तिरत्नाकरकी चौथी तरङ्गमें श्रील अभिराम ठाकुरकी कथाका वर्णन है। अभिराम ठाकुर पाखण्डियोंका दलन करनेवाले श्रीनित्यानन्दके आदेशसे आचार्य और भक्तिधर्म-प्रचारक बने। “अभिराम गोस्वामीर प्रताप प्रचण्ड। याँरे देखि' काँपे सदा दुर्जय पाषण्ड ॥ नित्यानन्द-आवेशे उन्मत्त निरन्तर। जगते विदित याँर कृपा मनोहर ॥” “अभिराम ठाकुरका ऐसा प्रचण्ड प्रताप था जिसके कारण इन्हें देखते ही दुर्जय पाषण्डी भी थर-थर काँपते थे। ये श्रीनित्यानन्दके आवेशमें सदा उन्मत्त रहते थे। इनकी मनोहर कृपा समस्त जगत्में विदित है।” इनके प्रणाम करने मात्रसे विष्णुशिला अथवा विष्णु-विग्रहके अतिरिक्त अन्य सभी शिलाएँ अथवा मूर्तियाँ टुकड़े-टुकड़े होकर चूर्ण-विचूर्ण हो जाती थीं, ऐसी मान्यता अभी भी प्रचलित है। खाना अथवा द्वारकेश्वर नदीके तटपर स्थित कृष्णनगर जिसे 'खानाकुल कृष्णनगर' कहते हैं, वहाँ अभिराम ठाकुरका श्रीपाट है। मन्दिरके बाहरी द्वारके निकट एक बकुलका वृक्ष है, इसलिये इस स्थानको 'सिद्धबकुलकुञ्ज' कहते हैं। ऐसा सुना जाता है कि अभिराम ठाकुर यहाँ आकर इस स्थानपर सबसे पहले बैठे थे। श्रीमन्दिरमें अर्चाविग्रहके रूपमें श्रीबलदेव, श्रीमदनमोहन (अकेले श्रीकृष्ण) और एक सवा हाथ ऊँचा और एक हाथ चौड़ा कसौटी पत्थर है, जिसपर वस्त्रहरणलीला, कदम्ब वृक्ष, यमुना और बछड़ोंके साथ श्रीगोपीनाथका विग्रह खुदा हुआ है। इसके अतिरिक्त नृत्यवेशमें अभिराम ठाकुरकी एक मूर्ति और श्रीव्रजवल्लभ (युगल)-मूर्ति सिंहासनपर विराजमान है। इसके अतिरिक्त श्रीशालग्राम और श्रीगोपालमूर्ति भी है। यह किवदन्ती प्रचलित है कि इस मन्दिरके सामने स्थित कुण्डको खोदते समय इन श्रीगोपीनाथका विग्रह मिला था। तबसे उस कुण्डका नाम 'अभिरामकुण्ड' है। मन्दिरमें जहाँ श्रीविग्रह विराजमान हैं, उसके ठीक दक्षिणमें एक पुरातन नवरत्न-मन्दिर है। मन्दिरके उच्च स्थानमें एक पत्थरके पटलपर खुदा हुआ है कि इस मन्दिरका निर्माण 1181 सालमें हुआ था। इसमें मन्दिर निर्माताके नामका कोई उल्लेख नहीं है। सुना जाता है कि निकटके गाँवके परलोकगत 'नछिरामसिंह गइला' नामक एक व्यक्तिने इस मन्दिरका निर्माण कराया था। मन्दिर निर्माणसे पूर्व श्रीविग्रह विराजमान थे और उनकी सेवा-पूजा इस स्थानपर फूसके बने घरमें होती थी। श्रीगोपीनाथजीके मन्दिरके उत्तरमें स्थानीय कायस्थ चौधुरी लोगोंके द्वारा प्रतिष्ठित श्रीराधावल्लभजीका प्राचीन मन्दिर है। ग्यारहवाँ अध्याय | 99

[ 11/13 वर्तमान मन्दिरके पत्थर-पटलपर खुदा है— “श्रीश्रीगोपीनाथजीका सन 1219 वर्ष माघ मासमें मन्दिर तैयार। सन 1308 वर्ष वैशाख मासमें मरम्मत।” सुना जाता है, हुगली जिलाके आरामबाग थानाके माधवपुरवासी परलोकगत पुण्डरीकाक्ष राय-नामक एक व्यक्तिने वह निर्माण करवाया था। पुराने मन्दिरके सामने एक विशाल पक्का नाट्य मन्दिर है। मेदिनीपुर जिलाके धीरव लोगोंने 1263 सालमें इस नाट्य मन्दिरका निर्माण करवाया, समयसे उसके टूटनेपर 1320 सालमें पुनः उसका संस्कार करवाया। सेवाइतोंसे प्राप्त जानकारीके अनुसार श्रील अभिराम ठाकुरके समयसे ही यहाँ पके चावलोंका भोग लगाया जाता है, यहाँ तक कि मूड़ीका भी भोग लगाया जाता है। और एक नयी प्रथा यह है कि ठाकुरको शयन देते समय मन्दिरके पट खुले रहते हैं और सबके सामने शयन दिया जाता है। आजकल प्रातःकालमें ठाकुरकी मङ्गल-आरती करनेकी यहाँ प्रथा नहीं है। यह भी कहा जाता है कि मन्दिरके भीतर एक लोहेके सन्दूकमें श्रील अभिराम ठाकुरका प्रसिद्ध ‘श्रीजयमङ्गल’ चाबुक है। सभी सेवाइतोंने उस सन्दूकमें अपना ताला लगा रखा है। वह चाबुक दो हाथ लम्बा और जरीसे जड़ा हुआ है। सभी सेवाइतोंकी सहमतिसे ही महोत्सवोंपर चाबुक बाहर निकाला जाता है। ‘श्रीजयमङ्गल’ चाबुकके विषयमें भक्तिरत्नाकर ग्रन्थकी चौथी तरङ्गमें लिखा है कि अभिराम ठाकुर इस चाबुकसे जिसे भी मारते थे, उसमें श्रीकृष्णप्रेम उदित हो जाता था। एक बार श्रीनिवासाचार्य जब अभिराम-भवनमें आये, तब अभिराम ठाकुरने उनके शरीरसे तीन बार चाबुकका स्पर्श करवाया। उस समय अभिराम ठाकुरकी पत्नी मालिनी देवीने हँसते हुए उनका हाथ पकड़कर कहा— “ठाकुर ! धैर्य रखो। श्रीनिवास अभी बालक है, आपके चाबुकके स्पर्शसे यह अधीर हो जायेगा।” हुगली जिलाके अन्तर्गत कृष्णनगर, आमता और बाँकुड़ा जिलाके अन्तर्गत विष्णुपुर, कोतलपुर आदि ग्रामोंमें इनके वंशज (शौक्र या शिष्य-शाखागत ?) विद्यमान हैं। रत्नेश्वरके शिष्य 'अभिरामदास' नामक किसी एक व्यक्तिने 'शाखा-निर्णय' ग्रन्थमें 'ठाकुर अभिराम' के शिष्योंके नामों और स्थानोंका विवरण इस प्रकार दिया है—(1) खानाकुलमें कृष्णदास ठाकुरका निवास; (वंश लुप्त है)। (2) कैयड़ नामक ग्राममें (वर्धमानसे 10 मील दक्षिण-पश्चिमकी ओर) वेदगर्भ नामक भक्तका वास; इनके वंशधर अभी विग्रह सेवा कर रहे हैं। (3) बूडन ग्राममें हरिदासका वास; (अन्य कोई विशेष जानकारी नहीं है)। (4) हेलाल (?) ग्राममें (खानाकुलसे लगभग दो मील उत्तर दिशाकी ओर, खानानदीके तटपर) पाखिया-गोपालदासका वास; अब वहाँ उनके समाजके नामसे एक छोटा टूटा हुआ मन्दिर है, परन्तु कोई विग्रह नहीं हैं। (5) मेदिनीपुर जिलाके रामजीवनपुरके निकट पाइकमालिटा (?) ग्राममें 'गुम्फ-नारायण' का वास; इनके वंशधर अभी विद्यमान हैं। (6) सीतानगरमें दाड़िया मोहनका वास; (स्थान और पात्र, दोनोंके विषयमें कोई जानकारी नहीं है)। (7) मयनामुड़िमें (बाँकुड़ामें) सत्यराघवका वास; (इनके वंशधरोंकी भी कोई जानकारी नहीं है)। (8) सालिखाय (हावड़ाके निकट ?) रजनी पण्डितका वास; (इनके वंशधरोंकी भी कोई जानकारी नहीं है)। (9) भाङ्गामोड़ामें (तारकेश्वरसे लगभग चार मील उत्तर-पश्चिममें) सुन्दरानन्दका वास; इनके वंशधर अभी भी हैं। (10) द्वीपग्राममें कृष्णानन्द अवधूतका वास; इनका कोई वंश था अथवा नहीं, इसमें सन्देह है। (11) सोनातला (ली) ग्राममें (हुगली अथवा हावड़ा जिलामें ?) रङ्गण-कृष्णदासका वास (वंश लुप्त है)। (12) मालदहमें मुरारि-दासका निवास; (इनके वंशधरोंका निवास अज्ञात है)। (13) पाणिहाटीमें मोहन ठाकुरका वास; (इनकी वंशावली अज्ञात है)। (14) राधानगरमें (खानाकुल-कृष्णनगरके दक्षिणमें) यदु हालदारका वास; इनका वंश लुप्त हो जानेके कारण इनके द्वारा प्रतिष्ठित श्रीबलरामकी सेवा अब श्रीगोपीनाथजीके 100 | श्रीचैतन्यचरितामृत

11/13-16 ] साथ हो रही है। (15) अनन्तनगरमें (खानाकुलके निकट) हरिमाधवका वास; वंश लुप्त है। (16) माहेशमें (श्रीरामपुरके निकट ?) गोपालदासका वास; (वंश अज्ञात है)। (17) कोटरामें (खानाकुलके निकट) अच्युत पण्डितका वास; (इनके वंशधर वर्तमान हैं)। (18) पाटला ग्राममें लक्ष्मी-नारायणका वास; (वंश लुप्त है)। (19) पुरीमें गोपीनाथदासका वास (और कोई समाचार नहीं है)। (20) चूणाखालि परगणामें (माहेशके निकट) नन्दकिशोरका वास; (वंश अज्ञात है)। (21) पाता ग्राममें (वर्धमान जिलाके पाटुली ?) विदुर ब्रह्मचारीका वास; वंश वर्तमान है। (22) बिनुपाड़ामें रामकृष्णका वास (स्थान और पात्र, दोनों अज्ञात हैं)। (23) गौराङ्गपुरमं (श्रीपाटसे लगभग चार मील उत्तर दिशामें) कमलाकरका वास, सामने निकट ही उनका समाज है और इनके वंशधर श्रीनिताइ-गौर विग्रहके सेवक हैं। (24) विश्वग्राममें बलराम ठाकुरका वास (स्थान और पात्र, दोनों अज्ञात हैं)। (24 1/2) श्रीनिवास आचार्यप्रभु (अभिराम ठाकुरके अति प्रिय और स्नेह कृपापात्र थे, तो भी उनको आधा शिष्य कहा गया है, इससे यह बोध होता है कि वे उनके दीक्षित शिष्य नहीं थे)। चैत्र-कृष्ण सप्तमी तिथिमें महोत्सवके उपलक्ष्यमें उस स्थानपर बहुत लोग एकत्रित होते हैं॥ 13॥ अनुवाद—इसलिये इन दोनोंकी गणना महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभुके गणोंमें होती है। माधव और वासुदेव घोषके सम्बन्धमें भी यही कहा जाता है॥ 15 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—ये दोनों (रामदास और श्रीगदाधरदास) श्रीनित्यानन्द प्रभुके पार्षद स्वरूप हैं। जिस समय महाप्रभुने श्रीनित्यानन्द प्रभुको गौड़देश जानेकी आज्ञा दी थी, तब रामदास और श्रीगदाधर दासको भी साथ जानेके लिये कहा था। इसलिये इन दोनोंकी गणना एक बार महाप्रभुके गणोंमें हुई और फिर श्रीनित्यानन्द प्रभुके गणोंमें भी हुई। इसी प्रकार माधव और वासुघोषकी गणना भी दोनोंके गणोंमें होती है॥ 14-15॥ अनुभाष्य—'गोविन्दघोष'—गोविन्दघोष-ठाकुरके अति प्रियतम विग्रह श्रीगोपीनाथ अभी भी वर्धमान जिलाके अन्तर्गत दाँइहाट और पाटुलीके निकट अग्रद्वीपमें विराजमान हैं। पितृश्राद्धमें पुत्रके समान भक्तकी अप्रकट तिथिपर पिण्ड प्रदान करते हैं। नदिया कृष्णनगरके राजवंशके तत्त्वाधानमें श्रीगोपीनाथजीकी सेवा हो रही है। प्रतिवर्ष कृष्णनगरमें वैशाखेके महीनेमें 'बारदोल' के समय अन्य ग्यारह श्रीविग्रहोंके साथ श्रीगोपीनाथको भी राजधानीमें लाया जाता है और दोलके बाद पुनः अग्रद्वीपमें ले जाया जाता है। 'वासुघोष'—वासुघोषकी पदावलीमें प्राकृत-सहजियोंके इन्द्रिय-तृप्तिकर बहुतसे गौरनागरीपद प्रक्षिप्त हुए हैं (बादमें जोड़े गये हैं)। वास्तवमें ये पद विप्रलम्भरसिक गौरभक्त वासुघोषके पद नहीं हैं और हो भी नहीं सकते। साधकोंको अपने कल्याणके लिये इन (प्रक्षिप्त) पदोंका सावधानीपूर्वक वर्जन करना चाहिये। (चैःचः आदिलीला 10/115 संख्या द्रष्टव्य है)॥15॥ श्रीनिताइके साथ दोनोंका गौड़देशमें प्रचार :- नित्यानन्दे आज्ञा दिल यबे गौड़े याइते। महाप्रभु एइ दुइ दिला ताँर साथे ॥ 14 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने जब श्रीनित्यानन्द प्रभुको गौड़देश जानेकी आज्ञा दी, तब इन दोनोंको उनके साथ भेजा था॥ 14 ॥ (4) माधव और (5) वासुघोष ठाकुर :- अतएव दुइगणे दुँहार गणन। माधव, वासुदेव घोषेर एइ विवरण ॥ 15 ॥ अभिरामकी लीला :- रामदास-मुख्यशाखा, सख्य-प्रेमराशि। षोलसाङ्गेर काष्ठ ये तुलि' कैल वाँशी ॥ 16 ॥ ग्यारहवाँ अध्याय | 101

[ 11/16-20 अनुवाद—रामदास मुख्य शाखा थे और वे सख्यप्रेमकी निधि थे। वे बत्तीस लोगोंके द्वारा उठाये जानेवाले बाँसको वंशीकी भाँति उठाकर चलते थे॥16॥ दास-गदाधरकी अलौकिक चेष्टाएँ :— गदाधर दास गोपीभावे पूर्णानन्द। याँर घरे दानकेलि कैल नित्यानन्द॥17॥ अनुवाद—श्रीगदाधर दास गोपीभावमें पूर्ण आनन्दमें डूबे रहते थे। इनके घरमें श्रीनित्यानन्द प्रभुने दानकेलि लीलामें अभिनयके द्वारा नृत्य किया था॥17॥ माधवघोषका कीर्तन :— श्रीमाधव घोष—मुख्य कीर्त्तनीयागणे। नित्यानन्दप्रभु नृत्य करे याँर गाने॥18॥ अनुवाद—श्रीमाधवघोष कीर्तनीयोंमें प्रमुख थे। इनके गानपर श्रीनित्यानन्द प्रभु नृत्य करते थे॥18॥ वासुघोषका कीर्तन :— वासुदेव-गीते करे प्रभुर वर्णने। काष्ठ-पाषाण द्रवे याहार श्रवणे॥19॥ अनुवाद—वासुदेव घोष अपने गीतोंमें महाप्रभुकी महिमाका गान करते थे, जिसे सुनकर काष्ठ-पत्थर भी पिघल जाते थे॥19॥ (6) मुरारि-चैतन्यदास :— मुरारि-चैतन्यदासेर अलौकिक-लीला। व्याघ्र-गाले चड़ मारे, सर्प-सने खेला॥20॥ अनुवाद—मुरारि-चैतन्यदासकी लीलाएँ अलौकिक थीं, वे कभी बाघके गालपर थप्पड़ मारते थे और कभी साँपके साथ खेलते थे॥20॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'मुरारि-चैतन्यदास'—इनका जन्म वर्धमान जिलेमें सर-वृन्दावनपुर ग्राममें हुआ था। नवद्वीप-धामके अन्तर्गत मोदद्रुम या माउगाछि-ग्राममें आकर इनका नाम 'शार्ङ्ग' (सारङ्ग) मुरारिचैतन्यदास हुआ था। इनकी वंशावली अभी भी 'सर' के पाटपर निवास करती है॥20॥ अनुभाष्य—'मुरारिचैतन्यदास'—(चैःभाः अन्त्यखण्ड, पाँचवाँ अध्याय)— “बाह्य नाहि श्रीचैतन्यदासेर शरीरे। व्याघ्र ताड़ाइया यान वनेर भितरे॥426॥ कखन चढ़ेन सेइ व्याघ्रेर उपरे। कृष्णेर प्रसादे व्याघ्र लङ्घिते ना पारे॥427॥ महा-अजगर सर्प लइ' निजकोले। निर्भये चैतन्यदास थाके कुतुहले॥428॥ व्याघ्रेर सहित खेला खेलेन निर्भय। हेन कृपा करे अवधूत महाशय॥429॥ चैतन्यदासेरे आत्मविस्मृति सर्वथा। निरन्तर कहेन आनन्दे मनःकथा॥431॥ दुइ तिन दिन मज्जि' जलेर भितरे। थाकेन, कोथाओ दुःख ना हय शरीरे॥432॥ जड़प्राय अलक्षित वेश-व्यवहार। परम उद्दाम सिंह-विक्रम अपार॥433॥ चैतन्यदासेरे यत भक्तिर विकार। कत वा कहिते पारि,—सकलि अपार॥434॥ योग्य श्रीचैतन्यदास मुरारि पण्डित। याँर बातासेओ कृष्ण पाइये निश्चित॥435॥ “श्रीचैतन्यदासको शरीरकी बाह्य सुध-बुध नहीं रहती थी। वे कभी वनमें जाकर बाघका पीछा करते थे और कभी उसके ऊपर चढ़ जाते थे। श्रीकृष्णकी कृपासे वे बाघ कभी भी उनका कुछ भी अनिष्ट नहीं कर पाते थे। कभी वे निर्भीक होकर महा-विषधर सर्पको अपनी गोदमें ले लेते थे। वे निर्भीक होकर बाघोंके साथ खेलते थे। इस प्रकार अवधूत महाशय (श्रीनित्यानन्द प्रभु) उनपर कृपा करते थे। उन्हें अपनी स्मृति भी नहीं रहती थी और सदा आनन्दसे अपने मनकी कथा कहते थे। कभी वे दो-तीन दिन तक जलके भीतर डूबकर रहते थे, तो भी उनके शरीरमें कोई भी कष्ट नहीं होता था। वे जड़की भाँति अलक्षित रूपसे ये सब व्यवहार करते थे, उनपर किसीका नियन्त्रण नहीं था और सिंहके समान उनका 102 | श्रीचैतन्यचरितामृत

11/20-23 ] अपार विक्रम था। चैतन्यदासमें जो भक्तिके जो विकार उदित होते थे, वे अपार हैं, कितनोंका वर्णन करूँ? श्रीचैतन्यदास मुरारि पण्डित ऐसे योग्य थे कि उनको स्पर्शकर आ रही वायुके स्पर्शसे ही जीवोंको श्रीकृष्णप्रेमकी निश्चित ही प्राप्ति हो जाती थी॥"20॥ शुद्धभक्त व्रजसखा ही श्रीनिताइके गण :- नित्यानन्देर गण यत, — सब व्रजसखा। शृङ्ग-वेत्र-गोपवेश, शिरे शिखिपाखा॥ 21 ॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुके सभी भक्त व्रजलीलाके सखा हैं। वे हाथमें शृङ्ग, वेत्र (छड़ी) और सिरपर मोरपंख धारणकर गोपवेशमें रहते थे॥ 21 ॥ अनुभाष्य—श्रीनित्यानन्द प्रभुके आश्रित जो भी भक्त थे, वे सभी व्रजके सख्यरसके आश्रित हैं। उन सबका ही गोपाल-वेश था। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी पत्नी श्रीमती जाह्नवा-माता व्रजकी अनङ्गमञ्जरी हैं और वे श्रीमती राधिकाकी छोटी बहन हैं। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 66वाँ श्लोक)— “केचित् श्रीवसुधादेवीं कलावपि विवृण्वते। अनङ्गमञ्जरीं केचिज्जाह्नवीञ्च प्रचक्षते। उभयन्तु समीचीनं पूर्वन्यायात् सतां मतम्॥ 66 ॥” “कलियुगमें कोई-कोई व्यक्ति श्रीवसुधादेवीको और कोई-कोई श्रीजाह्नवादेवीको अनङ्गमञ्जरी कहते हैं। महात्माओंके मतसे पूर्वकथित न्याय अर्थात् प्रकाश भेदके अनुसार दोनों विचार ही उचित हैं।” जाह्नवा-माताके आश्रित भक्तोंकी गणना श्रीनित्यानन्दके गणोंमें ही होती है॥ 21 ॥ (7) रघुनाथ वैद्य :- रघुनाथ वैद्य उपाध्याय महाशय। याँहार दर्शने कृष्णप्रेमभक्ति हय॥ 22 ॥ अनुवाद—रघुनाथ वैद्य एक महान भक्त थे, जिनके दर्शनसे ही श्रीकृष्णमें प्रेमाभक्ति जाग्रत होती थी॥ 22 ॥ (8) सुन्दरानन्द (गोपाल-2) :- सुन्दरानन्द-नित्यानन्देर शाखा, भृत्य मर्म। याँर सङ्गे नित्यानन्द करे व्रजनर्म॥ 23 ॥ अनुवाद—सुन्दरानन्द श्रीनित्यानन्द प्रभुके अन्तरङ्ग सेवक थे, जिनके साथ श्रीनित्यानन्द प्रभु व्रजभावमें हास-परिहास करते थे॥ 23 ॥ अनुभाष्य—(चैःभाः अन्त्यखण्ड, पाँचवाँ अध्याय)— “प्रेमरससमुद्र सुन्दरानन्द नाम। नित्यानन्दस्वरूपेर पार्षद-प्रधान॥ 728 ॥” “सुन्दरानन्द प्रेमरसके समुद्र हैं और श्रीनित्यानन्द प्रभुके प्रधान पार्षद हैं।” (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 127वाँ श्लोक)— “पुरा सुदामनामासीदद्य ठक्कुरसुन्दरः॥ 127 (क) ॥” “पूर्वकालके 'सुदाम' नामक गोपाल अब सुन्दर ठाकुर हैं।” ये बारह गोपालोंमें अन्यतम 'सुदाम' हैं। इनका श्रीपाट यशोहर जिलाके महेशपुर ग्राममें है। इस स्थानपर प्राचीन स्मृतिचिह्न-स्वरूप केवल सुन्दरानन्दकी जन्मस्थलीके अतिरिक्त और कुछ नहीं है। श्रीमन्दिर और श्रीविग्रहादि लगभग सौ वर्ष पूर्व ही प्रतिष्ठित हुए हैं। यहाँ श्रीश्रीराधावल्लभ और श्रीश्रीराधारमणजीकी सेवा होती है। सुन्दरानन्द ठाकुर आजीवन अविवाहित रहे, इसलिये उनका कोई वंशज नहीं है। उनके जातिभ्राता और सेवायतके शिष्यवंश अभी वर्तमान हैं। वीरभूम जिलामें मङ्गलडिहि-ग्राममें सुन्दरानन्दके जाति-वंशज हैं। वहाँ श्रीश्रीबलरामजीकी सेवा होती है। सुन्दरानन्द ठाकुरके द्वारा प्रतिष्ठित श्रीश्रीराधावल्लभ-विग्रहको बहरमपुरके सैदाबाद गोस्वामी लोग ले गये थे, बादमें वर्तमान विग्रहकी प्रतिष्ठा हुई थी। अब महेशपुरके जमीन्दार महाशय लोग इनके सेवायत हैं। माघी-पूर्णिमाके दिन सुन्दरानन्द ठाकुरका तिरोभाव उत्सव मनाया जाता है॥ 23 ॥ ग्यारहवाँ अध्याय | 103

[ 11/24-25 (9) कमलाकर पिप्पलाइ (गोपाल-3) :- कमलाकर पिप्पलाइ—अलौकिक रीत। अलौकिक प्रेम ताँर भुवने विदित ॥ 24 ॥ अनुवाद—कमलाकर पिप्पलाइके प्रेमकी रीत अलौकिक थी। उनका अलौकिक प्रेम सम्पूर्ण जगत्में प्रसिद्ध है॥ 24 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—कमलाकर पिप्पलाइके वंशज माहेशके श्रीजगन्नाथदेवके सेवक हैं॥ 24 ॥ अनुभाष्य—'कमलाकर पिप्पलाई'—(श्रीगौरगणोद्देश- दीपिका 128वाँ श्लोक)— “कमलाकरः पिप्पलाइनाम्नासीद्यो महाबलः ॥ 128 ॥” “महाबल नामक सखा अब कमलाकर पिप्पलाइ हैं।" इन्होंने माहेशमें श्रीजगन्नाथके विग्रहको प्रतिष्ठित किया था। इनके पुत्रका नाम चतुर्भुज था और उनके नारायण और जगन्नाथ दो पुत्र थे। नारायणके पुत्र जगदानन्द और उनके पुत्र राजीवलोचन थे। उस समय जगन्नाथदेवकी सेवाके लिये धनकी कमी रहती थी। 1060 बङ्गाब्दमें ढाकाके नवाब ओयालिश सा (सुजा?) ने श्रीजगन्नाथदेवको 1185 बीघा जमीन प्रदान की। माहेशके डेढ़ कोस पश्चिममें जगन्नाथपुर ग्राममें यह जमीन है और श्रीजगन्नाथदेवके नामपर ही उस जमीनका नाम 'जगन्नाथपुर' हुआ है। ऐसी मान्यता है कि कमलाकरके छोटे भाई निधिपति पिप्पलाइ अपने बड़े भाईको खोजते हुए माहेश आये और उन्होंने कमलाकरको वहाँ देखा। वे किसी भी प्रकारसे उन्हें वापिस अपने घर लौटा ले जानेमें जब सफल नहीं हुए, तो वे अपने और अपने भाईके परिवारके साथ आकर माहेशमें ही रहने लगे। एक किवदन्ती है—"ध्रुवानन्द नामक एक उदासीन वैष्णवने पुरुषोत्तम-क्षेत्रमें श्रीजगन्नाथदेवको अपने हाथोंसे भोजन बनाकर भोग लगानेकी प्रबल इच्छा की। रात्रिमें उन्होंने स्वप्नमें देखा कि श्रीजगन्नाथदेवने उनके सामने आविर्भूत होकर उनको गङ्गाके तटपर माहेश-ग्राममें जाकर अपने विग्रहकी प्रतिष्ठा करके प्रतिदिन अपने हाथोंसे भोग लगानेकी सेवा करके मनोकामना पूर्ण करनेके लिये कहा। ध्रुवानन्द जब माहेश आये, तो उन्होंने श्रीजगन्नाथ, श्रीबलराम और सुभद्रादेवीको जलमें डूबते हुए देखा। उन्होंने तुरन्त ही उन तीनों विग्रहोंको जलसे निकालकर एक कुटीका निर्माणकर वहाँ रहकर उनकी सेवा करने लगे। कुछ समय बाद उनके मनमें एक चिन्ता होने लगी कि उनके अप्रकट होनेके बाद श्रीजगन्नाथजीका उपयुक्त सेवक कौन होगा? रात्रिमें श्रीजगन्नाथदेवने उनको स्वप्नमें आदेश दिया कि सुन्दरवनके निकट 'खालिजुलि'-ग्रामनिवासी 'कमलाकर पिप्पलाइ' नामक एक मेरे परम भक्तके अगले दिन प्रातःकालमें माहेशमें आनेपर उसे ही मेरा सेवाभार सौंप देना। अगले दिन ध्रुवानन्द जब कमलाकरसे मिले, तो उन्होंने उन्हें श्रीजगन्नाथजीकी सेवाका भार सौंप दिया। श्रीजगन्नाथदेवकी सेवाका अधिकार प्राप्त करनेसे कमलाकरकी 'अधिकारी' उपाधि हो गयी। राढ़ीयश्रेणीके शौक्रब्राह्मणोंमें पचपन ग्रामिणोंमें 'पिप्पलाइ' अन्यतम हैं॥ 24 ॥ (10) सूर्यदास और (11) कृष्णदास सरखेल :- सूर्यदास सरखेल, ताँर भाइ कृष्णदास। नित्यानन्दे दृढ़ विश्वास, प्रेमेर निवास ॥ 25 ॥ अनुवाद—सूर्यदास सरखेल और उनके भाई कृष्णदास प्रेमके भण्डार स्वरूप थे और उनका श्रीनित्यानन्द प्रभुमें दृढ़ विश्वास था॥ 25 ॥ अनुभाष्य—'सूर्यदास सरखेल'—भक्तिरत्नाकरकी बारहवीं तरङ्गमें कहा गया है— “नवद्वीप हइते अल्पदूर 'शालिग्राम'। तथा वैसे पण्डित सूर्यदास नाम॥ गौड़े राजा यवनेर कार्ये सुसमर्थ। 'सरखेल ख्याति, उपार्जिल बहु अर्थ॥ सूर्यदास—चारिभ्राता अति शुद्धाचार। वसुधा-जाह्रवा-नामे ताँर कन्याद्वय ॥” 104 | श्रीचैतन्यचरितामृत

11/25–26 ]

[बायाँ स्तम्भ]

“नवद्वीपसे थोड़ी दूरीपर 'शालिग्राम' है। वहाँ पण्डित सूर्यदास रहते थे। वे गौड़देशके यवन राजाके यहाँ कार्य करते थे और उसमें अति दक्ष थे। वे 'सरखेल' नामसे विख्यात थे और उन्होंने बहुत धन अर्जित किया। सूर्यदास चार भाई थे और चारोंका आचरण परम शुद्ध था। वसुधा और जाह्नवा नामकी इनकी दो पुत्रियाँ थीं।” (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 65वाँ श्लोक)—

“श्रीवारुणी-रेवत-वंशसम्भवे, तस्य प्रिये द्वे वसुधा च जाह्नवी। श्रीसूर्यदासस्य महात्मनः सुते, ककुद्मिरूपस्य च सूर्यतेजसः॥65॥”

“श्रीबलदेवकी पत्नियाँ श्रीवारुणीदेवी और रेवतवंशमें उत्पन्न रेवतीदेवी अब श्रीनित्यानन्द प्रभुकी पत्नियाँ श्रीवसुधा और श्रीजाह्नवा हैं। ये दोनों सूर्यके समान तेजस्वी महात्मा श्रीसूर्यदास (सरखेल) की कन्याएँ हैं। ये सूर्यदास पहले रेवतीके पिता कुकुद्मी थे।”

बड़गाछि-धर्मदह-ग्रामके उस पार 'गुड़गुड़े' नहरके तटपर। इसके पास ही शालिग्राम और रुकुणपुर है।

'कृष्णदास सरखेल'—ये गौरीदास पण्डित और सूर्यदास सरखेलके छोटे भाई हैं। ये श्रीनित्यानन्दके विवाहके पूर्व दिन बड़गाछिसे शालिग्राम आये थे। 'भक्तिरत्नाकर' बारहवीं तरङ्गमें कहा है—

“नाना द्रव्य लैया विप्रगणेर सहिते। कृष्णदास पण्डित आइला वाटी हइते॥”

“ब्राह्मणोंके साथ नाना प्रकारकी वस्तुओंको लेकर कृष्णदास पण्डित घरसे आये॥” 25 ॥


(12) गौरीदास पण्डित (गोपाल-4) श्रीगौरीदास पण्डिते प्रेमोद्दण्ड-भक्ति। कृष्णप्रेमा दिते, निते, धरे महाशक्ति॥26॥

अनुवाद— श्रीगौरीदास पण्डितमें उन्नत प्रेमाभक्ति थी। उनमें श्रीकृष्णप्रेम ग्रहण करनेकी और इस कारण देनेकी महाशक्ति थी॥26॥

अनुभाष्य— 'श्रीगौरीदास पण्डित'—हरिहोड़के पुत्र राजा


[दायाँ स्तम्भ]

कृष्णदासकी इनपर विशेष कृपा थी। ये व्रजके बारह गोपालोंमें अन्यतम 'सुबलसखा' हैं। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 128वाँ श्लोक)—

“सुबलो यः प्रियश्रेष्ठः स गौरीदासपण्डितः॥128(क)॥”

“श्रीकृष्णचन्द्रके अति प्रिय सखा सुबल अब श्रीगौरीदास पण्डित हैं।” (चैःभाः अन्त्यखण्ड, पाँचवाँ अध्याय)—

“गौरीदास पण्डित परम भाग्यवान्। कायमनोवाक्ये नित्यानन्द याँर प्राण॥730॥” “सरखेल सूर्यदास पण्डित उदार। ताँर भ्राता गौरीदास पण्डित प्रचार॥ शालिग्राम हैते ज्येष्ठ भ्रातारे कहिया। गङ्गातीरे कैला वास 'अम्बिका' आसिया॥”

“गौरीदास पण्डित महाभाग्यवान् हैं, क्योंकि श्रीनित्यानन्द प्रभु इनके प्राण हैं और इन्होंने अपना तन, मन और वाणीको उन्हें समर्पित कर दिया है।” “सूर्यदास पण्डित सरखेल बहुत उदार हैं और गौरीदास पण्डित उनके भाईके रूपमें प्रसिद्ध हैं। गौरीदास पण्डित पहले शालिग्राममें रहते थे और बादमें अपने ज्येष्ठ भाई श्रीसूर्यदासके कहनेसे ये गङ्गाके किनारे अम्बिका-कालनामें आ गये।”

गौरीदास पण्डितकी साढ़े बाइस शाखाएँ हैं। (1) श्रीनृसिंहचैतन्य, (2) कृष्णदास, (3) विष्णुदास, (4) बड़े बलरामदास, (5) गोविन्द, (6) रघुनाथ, (7) बडू गङ्गादास, (8) आउलिया गङ्गाराम, (9) यादवाचार्य, (10) हृदयचैतन्य, (11) चाँद हालदार, (12) महेश पण्डित, (13) मुकुट राय, (14) भातुया गङ्गाराम (15) आउलिया चैतन्य, (16) कालिया कृष्णदास, (17) पातुया गोपाल, (18) बड़े जगन्नाथ, (19) नित्यानन्द (20) भावि, (21) जगदीश, (22) राइया कृष्णदास और (22½) अन्नपूर्णा। गौरीदास पण्डितके ज्येष्ठ पुत्र (बड़े) बलराम और कनिष्ठ पुत्र रघुनाथ हैं और अन्नपूर्णा उनकी पुत्री हैं।

शालिग्रामवासी श्रीकंसारि मिश्रके छह पुत्र थे—


ग्यारहवाँ अध्याय | 105

[ 11/26-28 (1) दामोदर, (2) जगन्नाथ, (3) सूर्यदास सरखेल (वसुधा-जाह्नवाके पिता), (4) गौरीदास, (5) कृष्णदास सरखेल और (6) नृसिंह चैतन्य। गौरीदास पण्डित या हृदयचैतन्यका वंश नहीं है। कोई कोई कहते हैं कि जो स्वयंको उनका वंशज कहते हैं, वे सब गौरीदास पण्डित अथवा हृदयचैतन्यके शिष्य-शाखाके वंशज हैं। भक्तिरत्नाकरकी ग्यारहवीं तरङ्गमें कहा है— “गौरीदास पण्डितेर समाधि देखिते। बहे वारिधारा नेत्रे, नारे निवारिते॥” “जाह्नवादेवीने वृन्दावनमें जब गौरीदास पण्डितकी समाधिका दर्शन किया, तो उनके नेत्रोंसे अविरल अश्रुधारा प्रवाहित होने लगी, जिसे वे रोक नहीं पायीं।” गौरीदासके शिष्य हृदयचैतन्य थे और हृदयचैतन्यके शिष्य अन्नपूर्णादेवीके पुत्र गोपीरमण थे। इनकी वंशावली ही अब कालनामें महाप्रभुके अधिकारी व्यक्ति हैं। शान्तिपुरके दूसरे पार गङ्गा तटपर वर्धमान जिलामें श्रीपाट अम्बिका-कालना है। यह जिलाका उपखण्ड और एक छोटासा शहर है। गौरीदासके देवालयके प्रवेश-मार्गमें एक अपूर्व इमलीका वृक्ष है। ऐसा कहा जाता है कि इसी इमलीके वृक्षके नीचे महाप्रभु और गौरीदास पण्डितका मिलन हुआ था। देवालयमें सफेद पत्थर लगा है और गृहके भीतर तीन प्रकोष्ठोंमें श्रीविग्रह इस प्रकार हैं,— (1) श्रीगौरीदास, (2) श्रीराधाकृष्ण, (3) श्रीगौर-नित्यानन्द, (4) श्रीजगन्नाथ, (5) श्रीबलराम और (6) श्रीसीताराम। पण्डित गौरीदासके भवनकी पश्चिम दिशाकी ओर श्रीसूर्यदास पण्डितका देवालय और कुछ ही दूरीपर सिद्ध श्रीभगवानदास बाबाजीका आश्रम है। जिस स्थानपर वर्तमान देवालय है, उसे 'अम्बिका' कहते हैं और उसकी उत्तर दिशामें 'कालना' है। इसलिये इन दोनोंका मिलित नाम 'अम्बिका-कालना' है। ऐसा सुना जाता है कि इस मन्दिरमें अभी भी श्रीमन्महाप्रभुके श्रीहस्तसे चलाया गया चप्पू और उनकी श्रीहस्तलिखित श्रीगीता वर्तमान है (भक्तिरत्नाकर 7वीं तरङ्ग द्रष्टव्य है) ॥ 26 ॥ गौरीदास पण्डितके प्राण श्रीगौर-निताइ :— नित्यानन्दे समर्पिल जाति-कुल-पाँति। श्रीचैतन्य-नित्यानन्दे करि' प्राणपति ॥ 27 ॥ अनुवाद—इन्होंने श्रीचैतन्य-श्रीनित्यानन्द प्रभुको प्राणोंसे प्रिय स्वामी मानकर अपनी जाति, कुल और पाँति, सब कुछ श्रीनित्यानन्द प्रभुके चरणोंमें समर्पित कर दिया॥ 27॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'पाँति'—पंक्ति-भोजन ॥ 27 ॥ इति अमृतप्रवाहभाष्ये एकादश परिच्छेद। ग्यारहवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। (13) पुरन्दर पण्डित :— नित्यानन्द प्रभुर प्रिय—पण्डित पुरन्दर। प्रेमार्णव-मध्ये फिरे यैछन मन्दर ॥ 28 ॥ अनुवाद—पुरन्दर पण्डित श्रीनित्यानन्द प्रभुके अत्यन्त प्रिय थे। वे प्रेम समुद्रमें मन्दराचल पर्वतके समान घूमते रहते थे॥ 28 ॥ अनुभाष्य—'पुरन्दर पण्डित'—(चैःभाः अन्त्यखण्ड, पाँचवाँ अध्याय)— “पुरन्दर पण्डित परम शान्त दान्त। नित्यानन्दस्वरूपेर वल्लभ एकान्त ॥ 731 ॥” “पुरन्दर पण्डित परम शान्त और संयमी हैं और श्रीनित्यानन्द प्रभुके ऐकान्तिक प्रिय हैं।” (चैःभाः अन्त्यखण्ड, पाँचवाँ अध्याय)— “तबे आइलेन प्रभु खड़दह-ग्रामे। पुरन्दर पण्डितेर देवालय स्थाने ॥ 423 ॥ खड़दह-ग्रामे प्रभु नित्यानन्द राय। यत नृत्य करिलेन कथन ना याय ॥ 424 ॥ पुरन्दर पण्डितेर परम उन्माद। वृक्षेर उपरि चड़ि' करे सिंहनाद ॥ 425 ॥ मुञि रे 'अङ्गद' बलि' लम्फ दिया पड़े ॥ 241 ॥” “तब श्रीनित्यानन्द प्रभु खड़दह-ग्राममें पुरन्दर पण्डितके 106 | श्रीचैतन्यचरितामृत

text 11/28-29 ] देवालय-स्थानपर आये। वहाँ श्रीनित्यानन्द प्रभुने जैसा अद्भुत नृत्य किया, उसका वर्णन करना सम्भव नहीं है। पुरन्दर पण्डित वृक्षके ऊपर चढ़कर उस नृत्यको देख रहे थे और उसे देखकर उन्हें उन्माद हो गया। वे सिंहके समान गरजते हुए और 'मैं अङ्गद हूँ', ऐसा कहकर वे वृक्षसे कूद पड़े॥"28॥ (14) परमेश्वरीदास (गोपाल-5) परमेश्वरदास—नित्यानन्दैक-शरण। कृष्णभक्ति पाय, तारे ये करे स्मरण॥ 29 ॥ अनुवाद- परमेश्वरदास श्रीनित्यानन्द प्रभुके ऐकान्तिक शरणागत थे। जो व्यक्ति इनका स्मरण करता है, उसे श्रीकृष्णप्रेमकी अवश्य ही प्राप्ति होती है॥ 29॥ अनुभाष्य-'परमेश्वर अथवा परमेश्वरी-दास'- (चैःभाः अन्त्यखण्ड पाँचवाँ अध्याय)— “नित्यानन्द-जीवन परमेश्वरदास। याँहार विग्रहे नित्यनन्देर विलास॥ 732 ॥” “परमेश्वरदास श्रीनित्यानन्द प्रभुके जीवनस्वरूप थे और उनके विग्रहमें श्रीनित्यानन्द प्रभु विलास करते थे।” (चैःभाः अन्त्यखण्ड, पाँचवाँ अध्याय)— “कृष्णदास, परमेश्वर दास, -दुइजन। गोपभावे है है करे सर्वक्षण॥ 240 ॥ पुरन्दर पण्डित, परमेश्वरीदास। याँहार विग्रहे गौरचन्द्रेर प्रकाश ॥ 95 ॥ सत्वरे धाइया आइलेन सेइक्षणे। प्रभु देखि' प्रेमयोगे कान्दे दुइजने ॥ 96 ॥ “कृष्णदास और परमेश्वरदास, दोनोंमें जब भी गोपभाव उदित होता, वे सदा 'है है' करके हँसते रहते। पुरन्दर पण्डित और परमेश्वरीदास, इन दोनोंके शरीरमें श्रीगौरचन्द्रका प्रकाश है। महाप्रभुके आनेका समाचार सुनते ही ये दोनों दौड़ते हुए आये और महाप्रभुको देखते ही प्रेमके कारण क्रन्दन करने लगे॥” ये कुछ समय तक खड़दहमें रहे थे। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 132वाँ श्लोक)— “नाम्नार्जुनः सखा प्राग् यो दासः श्रीपरमेश्वरः ॥ 132(क) ॥” “पूर्वके अर्जुन नामक सखा अब श्रीपरमेश्वर दास हैं।” ये बारह गोपालोंमें अन्यतम 'अर्जुन' सखा हैं। भक्तिरत्नाकरकी दसवीं तरङ्गमें कहा गया है कि श्रीजाह्नवा-देवीके खेतुरि-महोत्सव जानेके समय ये उनके साथ थे। भक्तिरत्नाकरकी तेरहवीं तरङ्गके अनुसार इन्होंने आटपुरमें जाह्नवा-माताके आदेशसे 'श्रीराधा-गोपीनाथ'के विग्रहोंकी प्रतिष्ठा की थी। श्रीवैष्णव-वन्दनामें— “परमेश्वर-दास ठाकुर वन्दिब सावधाने। शृगाले लओयान नाम सङ्कीर्त्तन-स्थाने ॥” भक्तिरत्नाकरकी तेरहवीं तरङ्गमें परमेश्वरी-ठाकुरका वर्णन है। परमेश्वरी ठाकुरका श्रीपाट आटपुरमें है, इसका पूर्व नाम 'विशखाला' था। मन्दिरके बाहर बड़े छायादार साथ-साथ दो बकुल वृक्ष और पृथक् एक कदम्बका वृक्ष है तथा उनके बीचमें परमेश्वरी ठाकुरकी समाधि है और उसके ऊपर तुलसीमञ्च सुशोभित है। जो दो बकुल वृक्ष श्रील परमेश्वरी ठाकुरके समयमें थे, उनकी शाखासे वर्तमान दो वृक्ष उत्पन्न हुए हैं, ऐसा कहा जाता है। कदम्ब वृक्षपर प्रति वर्ष एक ही फूल लगता है और उसके द्वारा श्रीविग्रहके श्रीचरणोंकी पूजा होती है। परमेश्वरी ठाकुरका जन्म वैद्यकुलमें हुआ था। उनके भाईके वंशज अब श्रीपाटके वर्तमान सेवायत हैं। हुगली जिलाके चण्डीतला-डाकघरके अन्तर्गत गरलगाछा-ग्राममें भी इनमेंसे कुछ वर्तमान हैं। कुछ समय पूर्वतक इनके अनेक शौक्रब्राह्मण-शिष्य थे, परन्तु कालके प्रभावसे सांसारिक लोगोंके समान इनके द्वारा वैद्यके व्यवसायको अपनानेपर उन ब्राह्मण-वंशियोंने धीरे-धीरे इनके शिष्यत्वका त्याग कर दिया। इनकी उपाधि 'अधिकारी' थी। ये स्वयंको साधारण 'वैद्य' मानकर देवल ब्राह्मणके द्वारा श्रीविग्रहोंकी सेवा करवाते थे। पहले मन्दिरकी व्यवस्थाके लिये प्रचुर भूमि थी, किन्तु अब वह भूमि ग्यारहवाँ अध्याय | 107