भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 642, कुल 2549 में से

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[ 11/26-28 (1) दामोदर, (2) जगन्नाथ, (3) सूर्यदास सरखेल (वसुधा-जाह्नवाके पिता), (4) गौरीदास, (5) कृष्णदास सरखेल और (6) नृसिंह चैतन्य। गौरीदास पण्डित या हृदयचैतन्यका वंश नहीं है। कोई कोई कहते हैं कि जो स्वयंको उनका वंशज कहते हैं, वे सब गौरीदास पण्डित अथवा हृदयचैतन्यके शिष्य-शाखाके वंशज हैं। भक्तिरत्नाकरकी ग्यारहवीं तरङ्गमें कहा है— “गौरीदास पण्डितेर समाधि देखिते। बहे वारिधारा नेत्रे, नारे निवारिते॥” “जाह्नवादेवीने वृन्दावनमें जब गौरीदास पण्डितकी समाधिका दर्शन किया, तो उनके नेत्रोंसे अविरल अश्रुधारा प्रवाहित होने लगी, जिसे वे रोक नहीं पायीं।” गौरीदासके शिष्य हृदयचैतन्य थे और हृदयचैतन्यके शिष्य अन्नपूर्णादेवीके पुत्र गोपीरमण थे। इनकी वंशावली ही अब कालनामें महाप्रभुके अधिकारी व्यक्ति हैं। शान्तिपुरके दूसरे पार गङ्गा तटपर वर्धमान जिलामें श्रीपाट अम्बिका-कालना है। यह जिलाका उपखण्ड और एक छोटासा शहर है। गौरीदासके देवालयके प्रवेश-मार्गमें एक अपूर्व इमलीका वृक्ष है। ऐसा कहा जाता है कि इसी इमलीके वृक्षके नीचे महाप्रभु और गौरीदास पण्डितका मिलन हुआ था। देवालयमें सफेद पत्थर लगा है और गृहके भीतर तीन प्रकोष्ठोंमें श्रीविग्रह इस प्रकार हैं,— (1) श्रीगौरीदास, (2) श्रीराधाकृष्ण, (3) श्रीगौर-नित्यानन्द, (4) श्रीजगन्नाथ, (5) श्रीबलराम और (6) श्रीसीताराम। पण्डित गौरीदासके भवनकी पश्चिम दिशाकी ओर श्रीसूर्यदास पण्डितका देवालय और कुछ ही दूरीपर सिद्ध श्रीभगवानदास बाबाजीका आश्रम है। जिस स्थानपर वर्तमान देवालय है, उसे 'अम्बिका' कहते हैं और उसकी उत्तर दिशामें 'कालना' है। इसलिये इन दोनोंका मिलित नाम 'अम्बिका-कालना' है। ऐसा सुना जाता है कि इस मन्दिरमें अभी भी श्रीमन्महाप्रभुके श्रीहस्तसे चलाया गया चप्पू और उनकी श्रीहस्तलिखित श्रीगीता वर्तमान है (भक्तिरत्नाकर 7वीं तरङ्ग द्रष्टव्य है) ॥ 26 ॥ गौरीदास पण्डितके प्राण श्रीगौर-निताइ :— नित्यानन्दे समर्पिल जाति-कुल-पाँति। श्रीचैतन्य-नित्यानन्दे करि' प्राणपति ॥ 27 ॥ अनुवाद—इन्होंने श्रीचैतन्य-श्रीनित्यानन्द प्रभुको प्राणोंसे प्रिय स्वामी मानकर अपनी जाति, कुल और पाँति, सब कुछ श्रीनित्यानन्द प्रभुके चरणोंमें समर्पित कर दिया॥ 27॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'पाँति'—पंक्ति-भोजन ॥ 27 ॥ इति अमृतप्रवाहभाष्ये एकादश परिच्छेद। ग्यारहवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। (13) पुरन्दर पण्डित :— नित्यानन्द प्रभुर प्रिय—पण्डित पुरन्दर। प्रेमार्णव-मध्ये फिरे यैछन मन्दर ॥ 28 ॥ अनुवाद—पुरन्दर पण्डित श्रीनित्यानन्द प्रभुके अत्यन्त प्रिय थे। वे प्रेम समुद्रमें मन्दराचल पर्वतके समान घूमते रहते थे॥ 28 ॥ अनुभाष्य—'पुरन्दर पण्डित'—(चैःभाः अन्त्यखण्ड, पाँचवाँ अध्याय)— “पुरन्दर पण्डित परम शान्त दान्त। नित्यानन्दस्वरूपेर वल्लभ एकान्त ॥ 731 ॥” “पुरन्दर पण्डित परम शान्त और संयमी हैं और श्रीनित्यानन्द प्रभुके ऐकान्तिक प्रिय हैं।” (चैःभाः अन्त्यखण्ड, पाँचवाँ अध्याय)— “तबे आइलेन प्रभु खड़दह-ग्रामे। पुरन्दर पण्डितेर देवालय स्थाने ॥ 423 ॥ खड़दह-ग्रामे प्रभु नित्यानन्द राय। यत नृत्य करिलेन कथन ना याय ॥ 424 ॥ पुरन्दर पण्डितेर परम उन्माद। वृक्षेर उपरि चड़ि' करे सिंहनाद ॥ 425 ॥ मुञि रे 'अङ्गद' बलि' लम्फ दिया पड़े ॥ 241 ॥” “तब श्रीनित्यानन्द प्रभु खड़दह-ग्राममें पुरन्दर पण्डितके 106 | श्रीचैतन्यचरितामृत