भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 643

text 11/28-29 ] देवालय-स्थानपर आये। वहाँ श्रीनित्यानन्द प्रभुने जैसा अद्भुत नृत्य किया, उसका वर्णन करना सम्भव नहीं है। पुरन्दर पण्डित वृक्षके ऊपर चढ़कर उस नृत्यको देख रहे थे और उसे देखकर उन्हें उन्माद हो गया। वे सिंहके समान गरजते हुए और 'मैं अङ्गद हूँ', ऐसा कहकर वे वृक्षसे कूद पड़े॥"28॥ (14) परमेश्वरीदास (गोपाल-5) परमेश्वरदास—नित्यानन्दैक-शरण। कृष्णभक्ति पाय, तारे ये करे स्मरण॥ 29 ॥ अनुवाद- परमेश्वरदास श्रीनित्यानन्द प्रभुके ऐकान्तिक शरणागत थे। जो व्यक्ति इनका स्मरण करता है, उसे श्रीकृष्णप्रेमकी अवश्य ही प्राप्ति होती है॥ 29॥ अनुभाष्य-'परमेश्वर अथवा परमेश्वरी-दास'- (चैःभाः अन्त्यखण्ड पाँचवाँ अध्याय)— “नित्यानन्द-जीवन परमेश्वरदास। याँहार विग्रहे नित्यनन्देर विलास॥ 732 ॥” “परमेश्वरदास श्रीनित्यानन्द प्रभुके जीवनस्वरूप थे और उनके विग्रहमें श्रीनित्यानन्द प्रभु विलास करते थे।” (चैःभाः अन्त्यखण्ड, पाँचवाँ अध्याय)— “कृष्णदास, परमेश्वर दास, -दुइजन। गोपभावे है है करे सर्वक्षण॥ 240 ॥ पुरन्दर पण्डित, परमेश्वरीदास। याँहार विग्रहे गौरचन्द्रेर प्रकाश ॥ 95 ॥ सत्वरे धाइया आइलेन सेइक्षणे। प्रभु देखि' प्रेमयोगे कान्दे दुइजने ॥ 96 ॥ “कृष्णदास और परमेश्वरदास, दोनोंमें जब भी गोपभाव उदित होता, वे सदा 'है है' करके हँसते रहते। पुरन्दर पण्डित और परमेश्वरीदास, इन दोनोंके शरीरमें श्रीगौरचन्द्रका प्रकाश है। महाप्रभुके आनेका समाचार सुनते ही ये दोनों दौड़ते हुए आये और महाप्रभुको देखते ही प्रेमके कारण क्रन्दन करने लगे॥” ये कुछ समय तक खड़दहमें रहे थे। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 132वाँ श्लोक)— “नाम्नार्जुनः सखा प्राग् यो दासः श्रीपरमेश्वरः ॥ 132(क) ॥” “पूर्वके अर्जुन नामक सखा अब श्रीपरमेश्वर दास हैं।” ये बारह गोपालोंमें अन्यतम 'अर्जुन' सखा हैं। भक्तिरत्नाकरकी दसवीं तरङ्गमें कहा गया है कि श्रीजाह्नवा-देवीके खेतुरि-महोत्सव जानेके समय ये उनके साथ थे। भक्तिरत्नाकरकी तेरहवीं तरङ्गके अनुसार इन्होंने आटपुरमें जाह्नवा-माताके आदेशसे 'श्रीराधा-गोपीनाथ'के विग्रहोंकी प्रतिष्ठा की थी। श्रीवैष्णव-वन्दनामें— “परमेश्वर-दास ठाकुर वन्दिब सावधाने। शृगाले लओयान नाम सङ्कीर्त्तन-स्थाने ॥” भक्तिरत्नाकरकी तेरहवीं तरङ्गमें परमेश्वरी-ठाकुरका वर्णन है। परमेश्वरी ठाकुरका श्रीपाट आटपुरमें है, इसका पूर्व नाम 'विशखाला' था। मन्दिरके बाहर बड़े छायादार साथ-साथ दो बकुल वृक्ष और पृथक् एक कदम्बका वृक्ष है तथा उनके बीचमें परमेश्वरी ठाकुरकी समाधि है और उसके ऊपर तुलसीमञ्च सुशोभित है। जो दो बकुल वृक्ष श्रील परमेश्वरी ठाकुरके समयमें थे, उनकी शाखासे वर्तमान दो वृक्ष उत्पन्न हुए हैं, ऐसा कहा जाता है। कदम्ब वृक्षपर प्रति वर्ष एक ही फूल लगता है और उसके द्वारा श्रीविग्रहके श्रीचरणोंकी पूजा होती है। परमेश्वरी ठाकुरका जन्म वैद्यकुलमें हुआ था। उनके भाईके वंशज अब श्रीपाटके वर्तमान सेवायत हैं। हुगली जिलाके चण्डीतला-डाकघरके अन्तर्गत गरलगाछा-ग्राममें भी इनमेंसे कुछ वर्तमान हैं। कुछ समय पूर्वतक इनके अनेक शौक्रब्राह्मण-शिष्य थे, परन्तु कालके प्रभावसे सांसारिक लोगोंके समान इनके द्वारा वैद्यके व्यवसायको अपनानेपर उन ब्राह्मण-वंशियोंने धीरे-धीरे इनके शिष्यत्वका त्याग कर दिया। इनकी उपाधि 'अधिकारी' थी। ये स्वयंको साधारण 'वैद्य' मानकर देवल ब्राह्मणके द्वारा श्रीविग्रहोंकी सेवा करवाते थे। पहले मन्दिरकी व्यवस्थाके लिये प्रचुर भूमि थी, किन्तु अब वह भूमि ग्यारहवाँ अध्याय | 107