श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 644, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 11/29-30
इनके अधिकारसे चली गयी है। अब कुछ शेष सम्पत्तिसे बड़े कष्टसे श्रीविग्रहकी सेवा चल रही है। देखा जाता है कि मन्दिरमें एक ही सिंहासनपर श्रीबलदेव और श्रीराधागोपीनाथ श्रीविग्रह विराजमान हैं। सम्भवतः सिंहासनपर श्रीबलदेव-विग्रह बादमें प्रतिष्ठित किया गये होंगे, क्योंकि एक ही सिंहासनपर श्रीबलदेव और श्रीमतीके साथ श्रीकृष्णके विग्रहका अवस्थान- तत्त्वविरोधपूर्ण बात है अर्थात् यह रसाभास दोष है। वैशाखी-पूर्णिमाके दिन परमेश्वरी-ठाकुरका तिरोभाव उत्सव होता है॥29॥
(15) जगदीश पण्डित :- श्रीजगदीश पण्डित हय जगतपावन। कृष्णप्रेमामृत वर्षे, ये वर्षा घन॥30॥
अनुवाद—श्रीजगदीश पण्डित जगत्को पवित्र करनेवाले थे। ये जलधर मेघोंके समान श्रीकृष्णप्रेमरूपी अमृतकी घनघोर वर्षा करते थे॥30॥
अनुभाष्य—श्रीजगदीश पण्डितका श्रीपाट यशड़ा-ग्राममें है। चैःभाः आदिखण्ड छठा अध्याय और चैःचः आदिलीला 14/39 संख्या द्रष्टव्य है। इनके श्रीपाटके विवरणसे यह जाना जाता है कि इनका जन्म गोहाटी-अञ्चलमें हुआ था। इनके पिता कमलाक्ष-गयघर बन्द्यघटीय भट्टनारायणके पुत्र थे। जगदीशके माता-पिता दोनों ही परम विष्णुभक्तिपरायण गृहस्थ थे। माता-पिताके अप्रकट होनेपर अपनी जन्मभूमि त्यागकर ये अपनी पत्नी 'दुःखिनी' और भाई महेशको लेकर गङ्गाके तटपर चले आये और वैष्णवसङ्गकी अभिलाषासे श्रीमायापुरमें श्रीजगन्नाथ मिश्रके घरके निकट आकर वास करने लगे। श्रीगौरसुन्दरने जगदीशको नाम प्रचारके लिये नीलाचल जानेका आदेश किया। जगदीश पण्डित महाप्रभुके आदेशानुसार नीलाचलमें नाम प्रचारके लिये आये और उनको श्रीजगन्नाथजीसे प्रार्थना करनेपर एक श्रीजगन्नाथजीकी मूर्ति प्राप्त हुई, जिसे इन्होंने चाकदह-थानाके अन्तर्गत गङ्गाके तटपर स्थित यशड़ा-ग्राममें प्रतिष्ठित किया। ऐसा कहा जाता है कि जगदीश पण्डित पुरुषोत्तम क्षेत्रसे इस श्रीजगन्नाथ-मूर्तिको एक छड़ीमें बाँधकर यशड़ा-ग्राममें लाये थे। अभी भी एक छड़ीको जगदीश पण्डितकी 'जगन्नाथविग्रह लानेवाली छड़ी' कहकर मन्दिरके सेवायत उसके दर्शन करवाते हैं। ऐसा कहा जाता है कि श्रीगौर-नित्यानन्दप्रभु पार्षदों सहित दो बार यशड़ा-ग्राममें आये थे और उन्होंने वहाँ सङ्कीर्तनविहार, हरिकथा-कीर्तन और महामहोत्सव मनाया था। जगदीश पण्डितने गृहस्थकी लीलाका अभिनय किया था। उनके एकमात्र पुत्रका नाम 'रामभद्र गोस्वामी' था। पहले श्रीजगन्नाथजीकी मूर्ति गङ्गाके तटपर एक वटवृक्षके नीचे प्रतिष्ठित थी, बादमें गोयाड़ी-कृष्णनगरके राजा कृष्णचन्द्रने मन्दिरका निर्माण करवाया। उस मन्दिरके जीर्ण होनेपर स्थानीय उमेशचन्द्र मजूमदारकी सहधर्मिणी मोक्षदा दासीने 1324 वर्षमें वर्तमान मन्दिरका संस्कार किया था, ऐसा वहाँ एक पत्थरके पटलपर अंकित है। मन्दिर एक साधारण घरके आकारका है और मन्दिरपर कोई चूड़ा नहीं है। मन्दिरमें श्रीजगन्नाथदेव, श्रीराधावल्लभजी और जगदीशकी पत्नी दुःखिनी-माताके द्वारा स्थापित श्रीगौरगोपालकी मूर्ति विराजमान है। महाप्रभु जब यशड़ामें जगदीशके घरको पवित्र करके नीलाचल जानेके लिये तत्पर हुए, तब दुःखिनी श्रीगौरसुन्दरके विरहमें अत्यन्त कातर हो गयीं। यह देखकर महाप्रभुने गौरगोपाल-विग्रहरूपमें यशड़ा-ग्राममें उनकी सेवा स्वीकार की। तबसे श्रीगौरगोपाल-विग्रह (पीतवर्णकी लकड़ीकी गोपाल-मूर्ति) वहाँ सेवित हो रहे हैं। कालनाके सिद्ध भगवान् दास बाबाजी महाराजने कुछ समय यशड़ा-ग्राममें भजन किया था। बादमें वे कालना चले गये, परन्तु वे कालनासे बीच-बीचमें यशड़ा आया करते थे। तब विजयचन्द्र गोस्वामी श्रीजगन्नाथदेवके सेवायत थे। श्रीगदाधर नामक एक वैष्णव कविके द्वारा रचित जगदीश पण्डित गोस्वामीका
108 | श्रीचैतन्यचरितामृत