श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 645, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूचक-गान अभी भी यशड़ा ग्राममें गाया जाता है। इस गीतमें अल्प अक्षरोंमें जगदीश पण्डितका जीवन-वृत्तान्त कहा गया है। खज्ज-भगवानके पुत्र रघुनाथाचार्य जगदीश पण्डित गोस्वामीके शिष्य थे। पौषी शुक्ला तृतीयाको श्रीजगदीश पण्डितका तिरोभाव दिवस है। प्रति वर्ष पौषी शुक्ला द्वादशीको इनका जन्मोत्सव होता है और स्नानयात्राके उपलक्ष्यमें अनेक लोग यहाँ एकत्रित होते हैं॥ ३०॥ (16) धनञ्जय पण्डित (गोपाल-6) :- नित्यानन्द-प्रियभृत्य पण्डित धनञ्जय। अत्यन्त विरक्त, सदा कृष्णप्रेममय ॥31॥ अनुवाद-धनञ्जय पण्डित श्रीनित्यानन्द प्रभुके प्रिय सेवक थे। वे परम विरक्त और सदा श्रीकृष्णप्रेममें डूबे रहते थे॥31॥ अनुभाष्य-‘पण्डित धनञ्जय'-इनका निवास कटोआके निकट शीतल ग्राममें था। ये बारह गोपालोंमें 'वसुदाम' सखा हैं। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 127वाँ श्लोक)— “वसुदामसखायश्च पण्डितः श्रीधनञ्जयः ॥ 127 (ख)॥” “पूर्वकालके वसुदाम नामक सखा अब श्रीधनञ्जय पण्डित हैं।” (चैःभाः अन्त्यखण्ड, पाँचवाँ अध्याय)— “धनञ्जय पण्डित महान्त विलक्षण। याँहार हृदये नित्यानन्द अनुक्षण॥ 733॥” “धनञ्जय पण्डित विलक्षण महात्मा हैं, श्रीनित्यानन्द प्रभु उनके हृदयमें प्रतिक्षण विराजते हैं।” शीतलग्राम बर्द्धमान जिलाके अन्तर्गत है। देवालय चारों ओर मिट्टीकी दीवारके ऊपर फूसकी छतसे बना हुआ है। बहुत वर्ष पहले 'बाजारवन कावाशी' गाँवके मल्लिक महोदयने श्रीविग्रहके लिये एक पक्के घरका निर्माण किया था। परन्तु वह मन्दिर अब टूट गया है। प्राचीन मन्दिरकी नींव अभी भी वर्तमान है। प्रवेशपथके बायीं ओर एक तुलसीकी बेदी है,-वही धनञ्जय पण्डितकी समाधि-बेदी है। घरका द्वार पश्चिमकी ओर है और घरमें श्रीधनञ्जयके द्वारा सेवित श्रीगोपीनाथ, श्रीश्रीनिताइ-गौर और श्रीदामोदर-विग्रह विराजमान हैं। देवालयसे थोड़ी दूर एक बगीचेमें श्रीविग्रहको ले जाकर प्रत्येक वर्ष माघ मासके मध्यमें तिरोभाव-उत्सव होता है। किसी-किसी का कहना है कि धनञ्जय पण्डितकी वास्तविक जन्मभूमि चट्टग्राम जिला (वर्तमान बङ्गलादेश) के 'जाड़' ग्राममें है। वहाँसे आकर इन्होंने शीतलग्राम और साँचड़ा-पाँचड़ा ग्राममें श्रीविग्रह-सेवाको प्रकाशित किया था। कहा जाता है कि ये कुछ दिन नवद्वीपमें महाप्रभुके साथ सङ्कीर्तन करके शीतलग्राम लौट आये थे और वहाँसे श्रीवृन्दावन-धामके दर्शनको चले गये। वृन्दावन जानेसे पहले साँचड़ा-पाँचड़ा ग्राममें कुछ समय रहकर वहाँ अपने सहयात्री शिष्यको श्रीसेवा प्रकाश करनेकी अनुमति देकर वृन्दावनके लिये प्रस्थान किया। इसलिये साँचड़ा-पाँचड़ा ग्रामको भी लोग “धनञ्जयका पाट' कहते हैं। आजकल इस गाँवमें धनञ्जय पण्डितके वहाँ पूर्वकालमें रहनेका कोई भी प्रमाण नहीं है, परन्तु शीतलग्राममें ही उनका प्रधान श्रीपाट है। वृन्दावनसे लौटकर इन्होंने जलन्दि-ग्राममें देवसेवाकी और वहाँसे पुनः शीतलग्राम आकर श्रीगौराङ्गदेवकी सेवाको प्रकट किया। सुना जाता है कि धनञ्जय पण्डितका कोई वंश नहीं था। सञ्जय नामके उनके एक भाई थे, जिनके पुत्रका नाम रामकानाइ ठाकुर था। सञ्जयका श्रीपाट वर्द्धमान जिलाके 4-5 कोस पूर्व जलन्दि-ग्राममें है। सञ्जयके वंशधरोंमें कुछ लोग जलन्दि-ग्राममें वास करते हैं। इस स्थानपर श्रीराधागोविन्दकी सेवा है। वर्तमान बोलपुरके अति निकट मुलुक-ग्राममें उक्त रामकानाइका श्रीपाट है। किसी-किसीका कहना है कि सञ्जय धनञ्जयके शिष्य थे। शीतलग्राममें अब जो सेवायत हैं, वे सब धनञ्जय पण्डितके शिष्यके वंशधर हैं। धनञ्जयके शिष्य जीवनकृष्णके द्वारा स्थापित प्राचीन विग्रह श्रीश्यामसुन्दरजी अब गोपाल राय-चौधुरीके भवनमें विराजमान हैं॥31॥