भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 646, कुल 2549 में से

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(17) महेश पण्डित (गोपाल-7) :- महेश पण्डित-व्रजेर उदार गोपाल। ढक्कावाद्ये नृत्य करे प्रेमे मातोयाल ॥ 32 ॥ अनुवाद-महेश पण्डित व्रजके बारह गोपालोंमेंसे एक हैं, जो बहुत उदार थे। वे ढोल-नगाड़े आदि वाद्योंके साथ प्रेममें मत्त होकर नृत्य करने लगते थे॥ 32 ॥ अनुभाष्य- 'महेश पण्डित'-इनका श्रीपाट बङ्गाब्द 1334 वर्षके प्रथम कुछेक महीनोंतक पालपाड़ामें स्थित था। बादमें चाकदहके निकट काठालपुलि-ग्राममें स्थानान्तरित हो गया था (गौड़ीय पत्रिका, षष्ठ वर्ष (खण्ड), 13 संख्यामें 'प्राप्तपत्र' द्रष्टव्य है)। ये द्वादश-गोपालमें अन्यतम 'महाबाहु' सखा हैं। (गौरगणोद्देशदीपिका 129 श्लोकमें)- “महेशपण्डितः श्रीमन्महाबाहुर्व्रजे सखा ॥ 129(ख) ॥ ” “व्रजके महाबाहु सखा अब महेश पण्डित हैं।” चैःभाः अन्त्यखण्ड छठा अः- “महेश पण्डित अति परम महान्त॥ ” “महेश पण्डित परम महात्मा हैं।” 'पालपाड़ा'-नदिया जिलामें चाकदह स्टेशन से एक मील दक्षिणमें जङ्गलमें स्थित है। गङ्गा यहाँसे दूर है। महेश पण्डित पहले जिराटके पूर्वतट पर मसिपुर या यशीपुर(?) नामक स्थानमें रहते थे। परन्तु मसीपुर गङ्गाके गर्भमें समाहित हो जानेके कारण उस स्थानसे सुखसागरके निकटवर्ती बेलेडाङ्गामें महेश पण्डितके द्वारा प्रतिष्ठित श्रीविग्रह कुछ समयके लिये थे, बादमें गङ्गाके कटावके कारण वेलेडाङ्गा भी ध्वंस हो जानेसे पालपाड़ाके जमीन्दार नवकुमार चट्टोपाध्याय उन श्रीविग्रहको उस समयके सेवायेत बाबाजी रामकृष्णदाससे पूछकर पालपाड़ा ले आये और वहाँ एक मन्दिरका निर्माण करवाया। नवकुमार बाबूके पुत्र रजनीबाबूने 1883 ईसवीमें मन्दिरकी जमीन हरेकृष्णदास बाबाजीके हाथों रजिस्ट्र दी। तबसे उसका नाम 'पालपाड़ा-पाट' चला आ रहा है। पालपाड़ा पाँचनगर-परगणाके अन्तर्गत है। बेलेडाङ्गा, बेरिग्राम, सुखसागर, चान्दुड़े, मनसापोता, पालपाड़ा आदि चौदह मौजा पाँचनगरमें रहनेके कारण कोई-कोई उसे 'नगरदेश' कहते हैं। किसी-किसीके मतानुसार, महेश पण्डित यशड़ा-श्रीपाटके जगदीश पण्डितके छोटे भाई हैं। उनके अनुसार जगदीश, हिरण्य और महेश पण्डित-तीन भाई थे। जगदीश-बड़े, हिरण्य-मँझले और महेश-छोटे हैं। ये महेश पण्डित ही जगदीशके भाई हैं अथवा नहीं, इस विषयमें प्रामाणिक ग्रन्थोंमें उल्लेख न रहनेके कारण इसकी सत्यता सन्देहकी सीमामें है। श्रीमहेश पण्डित श्रीनित्यानन्द प्रभुके साथ पाणिहाटीके महोत्सवमें उपस्थित थे और उत्सवके उपरान्त श्रीनित्यानन्द प्रभुके साथ सप्तग्राम गये थे। भक्तिरत्नाकरकी आठवीं तरङ्गमें लिखा है कि श्रीनरोत्तम ठाकुर जब खड़दहमें आये थे, तब महेश पण्डित भी वहाँ उपस्थित थे। श्रीपाटका मन्दिर सामान्य घर जैसा है। जीर्ण मन्दिरमें श्रीगौरनित्यानन्द-श्रीमूर्ति, श्रीगोपीनाथ, श्रीमदनमोहन, श्रीराधागोविन्द और शालग्राम विराजित हैं। मन्दिरके सामने महेश पण्डितकी फूलसमाज-बेदी है। अब भिक्षाके द्वारा ही सेवाका निर्वाह होता है। श्रीमहेश पण्डितकी कोई वंशावली वर्तमान नहीं है॥ 32 ॥ (18) पुरुषोत्तम पण्डित (गोपाल-8) :- नवद्वीपे पुरुषोत्तम पण्डित महाशय। नित्यानन्द-नामे याँर महोन्माद हय ॥ 33 ॥ अनुवाद-नवद्वीपके वासी पुरुषोत्तम पण्डित महाशयको श्रीनित्यानन्द प्रभुका नाम सुनते ही महा-उन्माद हो जाता था ॥ 33 ॥ अनुभाष्य- 'पुरुषोत्तम पण्डित'- (चैःभाः अन्त्यखण्ड पाँचवाँ अध्याय) - “पण्डित पुरुषोत्तम नवद्वीपे जन्म। नित्यानन्दस्वरूपेर महाभृत्य मर्म ॥ 737 ॥ ” “नवद्वीपमें जन्में पुरुषोत्तम पण्डित श्रीनित्यानन्दस्वरूपके

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