भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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महान् सेवकोंमें अन्यतम थे।” (गौरगणोद्देशदीपिका श्लोक 130)— “स्तोककृष्णं सखा प्राग् यो दासः श्रीपुरुषोत्तमः ॥ 130 ॥” “स्तोककृष्ण नामक श्रीकृष्णके सखा अब श्रीपुरुषोत्तम दास हैं।” किसी-किसीका कहना है कि इनका श्रीपाट सुखसागरमें है॥ 33 ॥ (19) बलरामदास :- बलराम दास—कृष्णप्रेमरसास्वादी। नित्यानन्द-नामे हय परम उन्मादी ॥ 34 ॥ अनुवाद—बलराम दास श्रीकृष्णप्रेमका रसास्वादन करनेवाले थे। श्रीनित्यानन्द प्रभुके नामसे ही वे परम उन्मादी हो जाते थे॥ 34 ॥ अनुभाष्य—'बलरामदास'—(चैःभाः पाँचवाँ अध्याय)— “प्रेमरसे महामत्त बलरामदास। याँहार वातासे सब पाप याय नाश ॥ 734 ॥” “बलरामदास प्रेमरसमें महामत्त रहते थे। उनके अङ्गके स्पर्श करके आ रही वायुके स्पर्शसे सभी पापोंका नाश हो जाता है॥” 34 ॥ (20) यदुनाथ कविचन्द्र :- महाभागवत यदुनाथ कविचन्द्र। याँहार हृदये नृत्य करे नित्यानन्द ॥ 35 ॥ अनुवाद—यदुनाथ कविचन्द्र महाभागवत थे, जिनके हृदयमें सदा श्रीनित्यानन्द प्रभु नृत्य करते रहते थे॥ 35 ॥ अनुभाष्य—'यदुनाथ कविचन्द्र'—(चैःभाः अन्त्यखण्ड पाँचवाँ अध्याय)— “यदुनाथ कविचन्द्र—प्रेमरसमय। निरवधि नित्यानन्द याँहार हृदय ॥ 735 ॥” “यदुनाथ कविचन्द्र प्रेमरसमय हैं। उनके हृदयमें श्रीनित्यानन्द प्रभु सदा वास करते हैं।” (चैःभाः मध्यखण्ड प्रथम अध्याय)— “रत्नगर्भ आचार्य विख्यात याँर नाम। नित्यानन्द-प्रभुर बापेर सङ्गी, जन्म—एकग्राम ॥ 296 ॥ 11/33–37 ] तिन पुत्र—ताँर कृष्णपद-मकरन्द। कृष्णानन्द, जीव, यदुनाथ कविचन्द्र ॥ 297 ॥” “एक महाभाग्यवान् ब्राह्मण थे, जिनका नाम रत्न-आचार्य था। वे श्रीनित्यानन्द प्रभुके पिताजीके सङ्गी थे और उन दोनोंका जन्म एकचक्र ग्राममें ही हुआ था। रत्न-आचार्यके तीन पुत्र थे,—कृष्णानन्द, जीव और यदुनाथ कविचन्द्र। तीनों ही सदा श्रीकृष्णके चरणकमलोंके मकरन्दका पान करते रहते थे॥” 35 ॥ (21) द्विज कृष्णदास :- राढ़े याँर जन्म कृष्णदास द्विजवर। श्रीनित्यानन्देर तैं हो परम किङ्कर ॥ 36 ॥ अनुवाद—कृष्णदासका जन्म राढ़देशमें हुआ था। वे श्रेष्ठ ब्राह्मण और श्रीनित्यानन्द प्रभुके परम सेवक थे॥ 36 ॥ अनुभाष्य—'कृष्णदास'—चैःभाः अन्त्यखण्ड पाँचवाँ अध्याय— “राढ़े जन्म महाशय विप्र कृष्णदास। नित्यानन्द-परिषदे याँहार विलास ॥ 739 ॥” “ब्राह्मण कृष्णदासका जन्म राढ़देशमें हुआ था और श्रीनित्यानन्द प्रभुके परिकरोंमें वे अन्यतम थे॥” 36 ॥ (22) कालाकृष्णदास (गोपाल-9) काला-कृष्णदास बड़ वैष्णवप्रधान। नित्यानन्द-चन्द्र बिना नाहि जाने आन ॥ 37 ॥ अनुवाद—कालाकृष्णदास श्रेष्ठ वैष्णवोंमें प्रधान थे। वे श्रीनित्यानन्द प्रभुके अतिरिक्त किसी औरको नहीं जानते थे॥ 37 ॥ अनुभाष्य—'कालाकृष्णदास'—चैःभाः अन्त्यखण्ड पाँचवाँ अध्याय— “प्रसिद्ध कालिया कृष्णदास त्रिभुवने। गौरचन्द्र लभ्य हय याँहार स्मरणे॥ 740 ॥” “कालाकृष्णदासकी ख्याति तीनों लोकोंमें है। उनके स्मरणमात्रसे ही श्रीगौरचन्द्रकी प्राप्ति हो जाती है।” ग्यारहवाँ अध्याय | 111