भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 641, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 641

11/25–26 ]

[बायाँ स्तम्भ]

“नवद्वीपसे थोड़ी दूरीपर 'शालिग्राम' है। वहाँ पण्डित सूर्यदास रहते थे। वे गौड़देशके यवन राजाके यहाँ कार्य करते थे और उसमें अति दक्ष थे। वे 'सरखेल' नामसे विख्यात थे और उन्होंने बहुत धन अर्जित किया। सूर्यदास चार भाई थे और चारोंका आचरण परम शुद्ध था। वसुधा और जाह्नवा नामकी इनकी दो पुत्रियाँ थीं।” (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 65वाँ श्लोक)—

“श्रीवारुणी-रेवत-वंशसम्भवे, तस्य प्रिये द्वे वसुधा च जाह्नवी। श्रीसूर्यदासस्य महात्मनः सुते, ककुद्मिरूपस्य च सूर्यतेजसः॥65॥”

“श्रीबलदेवकी पत्नियाँ श्रीवारुणीदेवी और रेवतवंशमें उत्पन्न रेवतीदेवी अब श्रीनित्यानन्द प्रभुकी पत्नियाँ श्रीवसुधा और श्रीजाह्नवा हैं। ये दोनों सूर्यके समान तेजस्वी महात्मा श्रीसूर्यदास (सरखेल) की कन्याएँ हैं। ये सूर्यदास पहले रेवतीके पिता कुकुद्मी थे।”

बड़गाछि-धर्मदह-ग्रामके उस पार 'गुड़गुड़े' नहरके तटपर। इसके पास ही शालिग्राम और रुकुणपुर है।

'कृष्णदास सरखेल'—ये गौरीदास पण्डित और सूर्यदास सरखेलके छोटे भाई हैं। ये श्रीनित्यानन्दके विवाहके पूर्व दिन बड़गाछिसे शालिग्राम आये थे। 'भक्तिरत्नाकर' बारहवीं तरङ्गमें कहा है—

“नाना द्रव्य लैया विप्रगणेर सहिते। कृष्णदास पण्डित आइला वाटी हइते॥”

“ब्राह्मणोंके साथ नाना प्रकारकी वस्तुओंको लेकर कृष्णदास पण्डित घरसे आये॥” 25 ॥


(12) गौरीदास पण्डित (गोपाल-4) श्रीगौरीदास पण्डिते प्रेमोद्दण्ड-भक्ति। कृष्णप्रेमा दिते, निते, धरे महाशक्ति॥26॥

अनुवाद— श्रीगौरीदास पण्डितमें उन्नत प्रेमाभक्ति थी। उनमें श्रीकृष्णप्रेम ग्रहण करनेकी और इस कारण देनेकी महाशक्ति थी॥26॥

अनुभाष्य— 'श्रीगौरीदास पण्डित'—हरिहोड़के पुत्र राजा


[दायाँ स्तम्भ]

कृष्णदासकी इनपर विशेष कृपा थी। ये व्रजके बारह गोपालोंमें अन्यतम 'सुबलसखा' हैं। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 128वाँ श्लोक)—

“सुबलो यः प्रियश्रेष्ठः स गौरीदासपण्डितः॥128(क)॥”

“श्रीकृष्णचन्द्रके अति प्रिय सखा सुबल अब श्रीगौरीदास पण्डित हैं।” (चैःभाः अन्त्यखण्ड, पाँचवाँ अध्याय)—

“गौरीदास पण्डित परम भाग्यवान्। कायमनोवाक्ये नित्यानन्द याँर प्राण॥730॥” “सरखेल सूर्यदास पण्डित उदार। ताँर भ्राता गौरीदास पण्डित प्रचार॥ शालिग्राम हैते ज्येष्ठ भ्रातारे कहिया। गङ्गातीरे कैला वास 'अम्बिका' आसिया॥”

“गौरीदास पण्डित महाभाग्यवान् हैं, क्योंकि श्रीनित्यानन्द प्रभु इनके प्राण हैं और इन्होंने अपना तन, मन और वाणीको उन्हें समर्पित कर दिया है।” “सूर्यदास पण्डित सरखेल बहुत उदार हैं और गौरीदास पण्डित उनके भाईके रूपमें प्रसिद्ध हैं। गौरीदास पण्डित पहले शालिग्राममें रहते थे और बादमें अपने ज्येष्ठ भाई श्रीसूर्यदासके कहनेसे ये गङ्गाके किनारे अम्बिका-कालनामें आ गये।”

गौरीदास पण्डितकी साढ़े बाइस शाखाएँ हैं। (1) श्रीनृसिंहचैतन्य, (2) कृष्णदास, (3) विष्णुदास, (4) बड़े बलरामदास, (5) गोविन्द, (6) रघुनाथ, (7) बडू गङ्गादास, (8) आउलिया गङ्गाराम, (9) यादवाचार्य, (10) हृदयचैतन्य, (11) चाँद हालदार, (12) महेश पण्डित, (13) मुकुट राय, (14) भातुया गङ्गाराम (15) आउलिया चैतन्य, (16) कालिया कृष्णदास, (17) पातुया गोपाल, (18) बड़े जगन्नाथ, (19) नित्यानन्द (20) भावि, (21) जगदीश, (22) राइया कृष्णदास और (22½) अन्नपूर्णा। गौरीदास पण्डितके ज्येष्ठ पुत्र (बड़े) बलराम और कनिष्ठ पुत्र रघुनाथ हैं और अन्नपूर्णा उनकी पुत्री हैं।

शालिग्रामवासी श्रीकंसारि मिश्रके छह पुत्र थे—


ग्यारहवाँ अध्याय | 105