श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 640, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 11/24-25 (9) कमलाकर पिप्पलाइ (गोपाल-3) :- कमलाकर पिप्पलाइ—अलौकिक रीत। अलौकिक प्रेम ताँर भुवने विदित ॥ 24 ॥ अनुवाद—कमलाकर पिप्पलाइके प्रेमकी रीत अलौकिक थी। उनका अलौकिक प्रेम सम्पूर्ण जगत्में प्रसिद्ध है॥ 24 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—कमलाकर पिप्पलाइके वंशज माहेशके श्रीजगन्नाथदेवके सेवक हैं॥ 24 ॥ अनुभाष्य—'कमलाकर पिप्पलाई'—(श्रीगौरगणोद्देश- दीपिका 128वाँ श्लोक)— “कमलाकरः पिप्पलाइनाम्नासीद्यो महाबलः ॥ 128 ॥” “महाबल नामक सखा अब कमलाकर पिप्पलाइ हैं।" इन्होंने माहेशमें श्रीजगन्नाथके विग्रहको प्रतिष्ठित किया था। इनके पुत्रका नाम चतुर्भुज था और उनके नारायण और जगन्नाथ दो पुत्र थे। नारायणके पुत्र जगदानन्द और उनके पुत्र राजीवलोचन थे। उस समय जगन्नाथदेवकी सेवाके लिये धनकी कमी रहती थी। 1060 बङ्गाब्दमें ढाकाके नवाब ओयालिश सा (सुजा?) ने श्रीजगन्नाथदेवको 1185 बीघा जमीन प्रदान की। माहेशके डेढ़ कोस पश्चिममें जगन्नाथपुर ग्राममें यह जमीन है और श्रीजगन्नाथदेवके नामपर ही उस जमीनका नाम 'जगन्नाथपुर' हुआ है। ऐसी मान्यता है कि कमलाकरके छोटे भाई निधिपति पिप्पलाइ अपने बड़े भाईको खोजते हुए माहेश आये और उन्होंने कमलाकरको वहाँ देखा। वे किसी भी प्रकारसे उन्हें वापिस अपने घर लौटा ले जानेमें जब सफल नहीं हुए, तो वे अपने और अपने भाईके परिवारके साथ आकर माहेशमें ही रहने लगे। एक किवदन्ती है—"ध्रुवानन्द नामक एक उदासीन वैष्णवने पुरुषोत्तम-क्षेत्रमें श्रीजगन्नाथदेवको अपने हाथोंसे भोजन बनाकर भोग लगानेकी प्रबल इच्छा की। रात्रिमें उन्होंने स्वप्नमें देखा कि श्रीजगन्नाथदेवने उनके सामने आविर्भूत होकर उनको गङ्गाके तटपर माहेश-ग्राममें जाकर अपने विग्रहकी प्रतिष्ठा करके प्रतिदिन अपने हाथोंसे भोग लगानेकी सेवा करके मनोकामना पूर्ण करनेके लिये कहा। ध्रुवानन्द जब माहेश आये, तो उन्होंने श्रीजगन्नाथ, श्रीबलराम और सुभद्रादेवीको जलमें डूबते हुए देखा। उन्होंने तुरन्त ही उन तीनों विग्रहोंको जलसे निकालकर एक कुटीका निर्माणकर वहाँ रहकर उनकी सेवा करने लगे। कुछ समय बाद उनके मनमें एक चिन्ता होने लगी कि उनके अप्रकट होनेके बाद श्रीजगन्नाथजीका उपयुक्त सेवक कौन होगा? रात्रिमें श्रीजगन्नाथदेवने उनको स्वप्नमें आदेश दिया कि सुन्दरवनके निकट 'खालिजुलि'-ग्रामनिवासी 'कमलाकर पिप्पलाइ' नामक एक मेरे परम भक्तके अगले दिन प्रातःकालमें माहेशमें आनेपर उसे ही मेरा सेवाभार सौंप देना। अगले दिन ध्रुवानन्द जब कमलाकरसे मिले, तो उन्होंने उन्हें श्रीजगन्नाथजीकी सेवाका भार सौंप दिया। श्रीजगन्नाथदेवकी सेवाका अधिकार प्राप्त करनेसे कमलाकरकी 'अधिकारी' उपाधि हो गयी। राढ़ीयश्रेणीके शौक्रब्राह्मणोंमें पचपन ग्रामिणोंमें 'पिप्पलाइ' अन्यतम हैं॥ 24 ॥ (10) सूर्यदास और (11) कृष्णदास सरखेल :- सूर्यदास सरखेल, ताँर भाइ कृष्णदास। नित्यानन्दे दृढ़ विश्वास, प्रेमेर निवास ॥ 25 ॥ अनुवाद—सूर्यदास सरखेल और उनके भाई कृष्णदास प्रेमके भण्डार स्वरूप थे और उनका श्रीनित्यानन्द प्रभुमें दृढ़ विश्वास था॥ 25 ॥ अनुभाष्य—'सूर्यदास सरखेल'—भक्तिरत्नाकरकी बारहवीं तरङ्गमें कहा गया है— “नवद्वीप हइते अल्पदूर 'शालिग्राम'। तथा वैसे पण्डित सूर्यदास नाम॥ गौड़े राजा यवनेर कार्ये सुसमर्थ। 'सरखेल ख्याति, उपार्जिल बहु अर्थ॥ सूर्यदास—चारिभ्राता अति शुद्धाचार। वसुधा-जाह्रवा-नामे ताँर कन्याद्वय ॥” 104 | श्रीचैतन्यचरितामृत