भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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[ 11/7-12 जिनकी गणना कौन कर सकता है? अपना शोधन करनेके लिये उनमेंसे मुख्य-मुख्य भक्तोंके विषयमें कह रहा हूँ॥ ७॥ (1) श्रीवीरचन्द्र गोसाईं-शाखा :- श्रीवीरभद्र गोसाञि—स्कन्ध-महाशाखा। ताँर उपशाखा यत, असंख्य तार लेखा॥ ८॥ अनुवाद—नित्यानन्दप्रभु रूपी स्कन्धकी महाशाखा श्रीवीरभद्र गोसाईं हैं, जिनकी असंख्य उपशाखाएँ हैं, उन सबका वर्णन करना सम्भव नहीं है॥ ८॥ अनुभाष्य—'श्रीवीरभद्र गोसाञि'—ये श्रीनित्यानन्द प्रभुके पुत्र थे, जिन्होंने वसुधाके गर्भसे जन्म ग्रहण किया और जाह्नवा-माताके शिष्य थे। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 67वाँ श्लोक)— “सङ्कर्षणस्य यो व्यूहः पयोब्धिशायिनामकः। स एव वीरचन्द्रोऽभूच्चैतन्याभिन्नविग्रहः॥ 67॥” “श्रीसङ्कर्षणके अंशरूप जो क्षीरोदशायी विष्णु हैं, वे ही अब श्रीचैतन्य-अभिन्न विग्रह श्रीवीरचन्द्र हैं।” श्रीवीरभद्रने हुगली जिलाके अन्तर्गत झामटपुर ग्रामके निवासी अपने शिष्य यदुनाथाचार्यकी पत्नी विद्युन्माला (लक्ष्मी) के गर्भसे जन्मीं श्रीमतीसे और उनकी पालित कन्या नारायणीसे विवाह किया (भक्तिरत्नाकरकी 13वीं तरङ्ग द्रष्टव्य है)। इनके तीन शिष्य—गोपीजनवल्लभ, रामकृष्ण और रामचन्द्र इनके पुत्र कहे जाते हैं, ऐसी प्रसिद्धि है। सबसे छोटे रामचन्द्र खड़दहमें वास करते थे। वे शाण्डिल्य-गोत्रिय शुद्धश्रोत्रिय 'वटव्याल' थे। सबसे बड़े गोपीजनवल्लभ वर्धमान जिलामें मानकरके पास 'लता' ग्राममें और मझले रामकृष्ण मालदहके पास गयेधपुरमें वास करते थे। यदि इन तीनोंका गोत्र और ग्राम एक ही होता, तो इन्हें वीरभद्रके निज पुत्र माननेमें कोई भी सन्देह नहीं करता। रामचन्द्रके चार पुत्र थे; ज्येष्ठ पुत्र राधामाधवके तीसरे पुत्र यादवेन्द्र थे और उनके पुत्र नन्दकिशोर, उनके पुत्र निधिकृष्ण, उनके पुत्र चैतन्यचाँद, उनके पुत्र कृष्णमोहन, उनके पुत्र जगन्मोहन, उनके पुत्र व्रजनाथ और उनके पुत्र परलोकगत श्यामलाल गोस्वामी थे॥ ८॥ उनकी महिमा—स्वयं विष्णु होते हुए भी वैष्णवके समान चेष्टा :- ईश्वर हइया कहाय महाभागवत। वेदधर्मातीत हञा वेदधर्मे रत॥ ९॥ अनुवाद—यद्यपि श्रीवीरभद्र स्वयं ईश्वर हैं, तथापि वे स्वयंको महाभागवत कहते थे। ईश्वर वेदोंके नियमोंसे अतीत हैं, तो भी वे वेदधर्मका दृढ़तासे पालन करते थे॥ ९॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'वीरचन्द्र प्रभु'—श्रीसङ्कर्षणके जो पयोब्धिशायी व्यूह हैं, उसीके ही स्वरूप साक्षात् ईश्वर होकर भी अपनेमें वैष्णव अभिमान रखते थे॥ ९॥ अन्तरे ईश्वर-चेष्टा, बाहिरे निर्दम्भ। चैतन्यभक्ति-मण्डपे तेंहों मूलस्तम्भ॥ १०॥ अद्यापि याँहार कृपा-महिमा हइते। चैतन्य-नित्यानन्द गाय सकल जगते॥ ११॥ सेइ वीरभद्र-गोसाञिर चरण-शरण। याँहार प्रसादे इय अभीष्ट-पूरण॥ १२॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुके द्वारा स्थापित भक्तिमण्डपके वे मुख्य स्तम्भ हैं। भीतर उन्हें ईश्वर होनेका ज्ञान था और उसके अनुरूप उनकी चेष्टाएँ भी थीं, परन्तु उनके बाह्य आचरणमें ऐसा कोई अभिमान नहीं था। यह उनकी कृपाकी ही महिमा है, जिसके कारण आज समस्त जगत् श्रीचैतन्य-नित्यानन्दके नामोंका कीर्तन कर रहा है। मैं उन श्रीवीरभद्र गोसाईंके चरणकमलोंकी शरण ग्रहण करता हूँ, जिनकी कृपासे सभी मनोभीष्ट पूर्ण होते हैं। (इसलिये श्रीचैतन्यचरितामृतकी रचनारूपी मनोभीष्ट भी अवश्य पूर्ण होगा)॥ १२॥ 98 | श्रीचैतन्यचरितामृत