श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें11/13 ] (2) ठाकुर अभिराम (गोपाल-1), (3) दास गदाधर :- श्रीरामदास आर, गदाधर दास। चैतन्य-गोसाञिर भक्त रहे ताँर पाश ॥ 13 ॥ अनुवाद-श्रीरामदास और श्रीगदाधर दास, ये दोनों ही चैतन्य महाप्रभुके भक्त थे और वे उनके पास (नीलाचलमें) रहते थे ॥ 13 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'रामदास' - अभिराम दास ॥ 13 ॥ अनुभाष्य-'गदाधर दास'-चैःचः आदिलीला, 10/53 संख्या द्रष्टव्य है। 'श्रीरामदास (अभिराम)'-ठाकुर अभिराम, श्रीनित्यानन्द प्रभु जिनके प्राण हैं, बारह गोपालोंमें अन्यतम व्रजके 'श्रीदाम' सखा हैं। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 126वाँ श्लोक)- “पुरा श्रीदाम-नामासीदभिरामोऽधुना महान्। द्वात्रिंशता जनैरैव वाह्यं काष्ठमुवाह यः ॥ 126 ॥" “पूर्वकालमें जो महात्मा श्रीदाम थे, वे ही अब अभिराम हुए हैं। ये बत्तीस लोगोंके द्वारा वहनयोग्य लकड़ीको अकेले ही उठाकर (वंशीके जैसे) धारण कर लेते थे।” चैःचः आदिलीला, 10/116-118 संख्या द्रष्टव्य है। भक्तिरत्नाकरकी चौथी तरङ्गमें श्रील अभिराम ठाकुरकी कथाका वर्णन है। अभिराम ठाकुर पाखण्डियोंका दलन करनेवाले श्रीनित्यानन्दके आदेशसे आचार्य और भक्तिधर्म-प्रचारक बने। “अभिराम गोस्वामीर प्रताप प्रचण्ड। याँरे देखि' काँपे सदा दुर्जय पाषण्ड ॥ नित्यानन्द-आवेशे उन्मत्त निरन्तर। जगते विदित याँर कृपा मनोहर ॥” “अभिराम ठाकुरका ऐसा प्रचण्ड प्रताप था जिसके कारण इन्हें देखते ही दुर्जय पाषण्डी भी थर-थर काँपते थे। ये श्रीनित्यानन्दके आवेशमें सदा उन्मत्त रहते थे। इनकी मनोहर कृपा समस्त जगत्में विदित है।” इनके प्रणाम करने मात्रसे विष्णुशिला अथवा विष्णु-विग्रहके अतिरिक्त अन्य सभी शिलाएँ अथवा मूर्तियाँ टुकड़े-टुकड़े होकर चूर्ण-विचूर्ण हो जाती थीं, ऐसी मान्यता अभी भी प्रचलित है। खाना अथवा द्वारकेश्वर नदीके तटपर स्थित कृष्णनगर जिसे 'खानाकुल कृष्णनगर' कहते हैं, वहाँ अभिराम ठाकुरका श्रीपाट है। मन्दिरके बाहरी द्वारके निकट एक बकुलका वृक्ष है, इसलिये इस स्थानको 'सिद्धबकुलकुञ्ज' कहते हैं। ऐसा सुना जाता है कि अभिराम ठाकुर यहाँ आकर इस स्थानपर सबसे पहले बैठे थे। श्रीमन्दिरमें अर्चाविग्रहके रूपमें श्रीबलदेव, श्रीमदनमोहन (अकेले श्रीकृष्ण) और एक सवा हाथ ऊँचा और एक हाथ चौड़ा कसौटी पत्थर है, जिसपर वस्त्रहरणलीला, कदम्ब वृक्ष, यमुना और बछड़ोंके साथ श्रीगोपीनाथका विग्रह खुदा हुआ है। इसके अतिरिक्त नृत्यवेशमें अभिराम ठाकुरकी एक मूर्ति और श्रीव्रजवल्लभ (युगल)-मूर्ति सिंहासनपर विराजमान है। इसके अतिरिक्त श्रीशालग्राम और श्रीगोपालमूर्ति भी है। यह किवदन्ती प्रचलित है कि इस मन्दिरके सामने स्थित कुण्डको खोदते समय इन श्रीगोपीनाथका विग्रह मिला था। तबसे उस कुण्डका नाम 'अभिरामकुण्ड' है। मन्दिरमें जहाँ श्रीविग्रह विराजमान हैं, उसके ठीक दक्षिणमें एक पुरातन नवरत्न-मन्दिर है। मन्दिरके उच्च स्थानमें एक पत्थरके पटलपर खुदा हुआ है कि इस मन्दिरका निर्माण 1181 सालमें हुआ था। इसमें मन्दिर निर्माताके नामका कोई उल्लेख नहीं है। सुना जाता है कि निकटके गाँवके परलोकगत 'नछिरामसिंह गइला' नामक एक व्यक्तिने इस मन्दिरका निर्माण कराया था। मन्दिर निर्माणसे पूर्व श्रीविग्रह विराजमान थे और उनकी सेवा-पूजा इस स्थानपर फूसके बने घरमें होती थी। श्रीगोपीनाथजीके मन्दिरके उत्तरमें स्थानीय कायस्थ चौधुरी लोगोंके द्वारा प्रतिष्ठित श्रीराधावल्लभजीका प्राचीन मन्दिर है। ग्यारहवाँ अध्याय | 99