भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 636

[ 11/13 वर्तमान मन्दिरके पत्थर-पटलपर खुदा है— “श्रीश्रीगोपीनाथजीका सन 1219 वर्ष माघ मासमें मन्दिर तैयार। सन 1308 वर्ष वैशाख मासमें मरम्मत।” सुना जाता है, हुगली जिलाके आरामबाग थानाके माधवपुरवासी परलोकगत पुण्डरीकाक्ष राय-नामक एक व्यक्तिने वह निर्माण करवाया था। पुराने मन्दिरके सामने एक विशाल पक्का नाट्य मन्दिर है। मेदिनीपुर जिलाके धीरव लोगोंने 1263 सालमें इस नाट्य मन्दिरका निर्माण करवाया, समयसे उसके टूटनेपर 1320 सालमें पुनः उसका संस्कार करवाया। सेवाइतोंसे प्राप्त जानकारीके अनुसार श्रील अभिराम ठाकुरके समयसे ही यहाँ पके चावलोंका भोग लगाया जाता है, यहाँ तक कि मूड़ीका भी भोग लगाया जाता है। और एक नयी प्रथा यह है कि ठाकुरको शयन देते समय मन्दिरके पट खुले रहते हैं और सबके सामने शयन दिया जाता है। आजकल प्रातःकालमें ठाकुरकी मङ्गल-आरती करनेकी यहाँ प्रथा नहीं है। यह भी कहा जाता है कि मन्दिरके भीतर एक लोहेके सन्दूकमें श्रील अभिराम ठाकुरका प्रसिद्ध ‘श्रीजयमङ्गल’ चाबुक है। सभी सेवाइतोंने उस सन्दूकमें अपना ताला लगा रखा है। वह चाबुक दो हाथ लम्बा और जरीसे जड़ा हुआ है। सभी सेवाइतोंकी सहमतिसे ही महोत्सवोंपर चाबुक बाहर निकाला जाता है। ‘श्रीजयमङ्गल’ चाबुकके विषयमें भक्तिरत्नाकर ग्रन्थकी चौथी तरङ्गमें लिखा है कि अभिराम ठाकुर इस चाबुकसे जिसे भी मारते थे, उसमें श्रीकृष्णप्रेम उदित हो जाता था। एक बार श्रीनिवासाचार्य जब अभिराम-भवनमें आये, तब अभिराम ठाकुरने उनके शरीरसे तीन बार चाबुकका स्पर्श करवाया। उस समय अभिराम ठाकुरकी पत्नी मालिनी देवीने हँसते हुए उनका हाथ पकड़कर कहा— “ठाकुर ! धैर्य रखो। श्रीनिवास अभी बालक है, आपके चाबुकके स्पर्शसे यह अधीर हो जायेगा।” हुगली जिलाके अन्तर्गत कृष्णनगर, आमता और बाँकुड़ा जिलाके अन्तर्गत विष्णुपुर, कोतलपुर आदि ग्रामोंमें इनके वंशज (शौक्र या शिष्य-शाखागत ?) विद्यमान हैं। रत्नेश्वरके शिष्य 'अभिरामदास' नामक किसी एक व्यक्तिने 'शाखा-निर्णय' ग्रन्थमें 'ठाकुर अभिराम' के शिष्योंके नामों और स्थानोंका विवरण इस प्रकार दिया है—(1) खानाकुलमें कृष्णदास ठाकुरका निवास; (वंश लुप्त है)। (2) कैयड़ नामक ग्राममें (वर्धमानसे 10 मील दक्षिण-पश्चिमकी ओर) वेदगर्भ नामक भक्तका वास; इनके वंशधर अभी विग्रह सेवा कर रहे हैं। (3) बूडन ग्राममें हरिदासका वास; (अन्य कोई विशेष जानकारी नहीं है)। (4) हेलाल (?) ग्राममें (खानाकुलसे लगभग दो मील उत्तर दिशाकी ओर, खानानदीके तटपर) पाखिया-गोपालदासका वास; अब वहाँ उनके समाजके नामसे एक छोटा टूटा हुआ मन्दिर है, परन्तु कोई विग्रह नहीं हैं। (5) मेदिनीपुर जिलाके रामजीवनपुरके निकट पाइकमालिटा (?) ग्राममें 'गुम्फ-नारायण' का वास; इनके वंशधर अभी विद्यमान हैं। (6) सीतानगरमें दाड़िया मोहनका वास; (स्थान और पात्र, दोनोंके विषयमें कोई जानकारी नहीं है)। (7) मयनामुड़िमें (बाँकुड़ामें) सत्यराघवका वास; (इनके वंशधरोंकी भी कोई जानकारी नहीं है)। (8) सालिखाय (हावड़ाके निकट ?) रजनी पण्डितका वास; (इनके वंशधरोंकी भी कोई जानकारी नहीं है)। (9) भाङ्गामोड़ामें (तारकेश्वरसे लगभग चार मील उत्तर-पश्चिममें) सुन्दरानन्दका वास; इनके वंशधर अभी भी हैं। (10) द्वीपग्राममें कृष्णानन्द अवधूतका वास; इनका कोई वंश था अथवा नहीं, इसमें सन्देह है। (11) सोनातला (ली) ग्राममें (हुगली अथवा हावड़ा जिलामें ?) रङ्गण-कृष्णदासका वास (वंश लुप्त है)। (12) मालदहमें मुरारि-दासका निवास; (इनके वंशधरोंका निवास अज्ञात है)। (13) पाणिहाटीमें मोहन ठाकुरका वास; (इनकी वंशावली अज्ञात है)। (14) राधानगरमें (खानाकुल-कृष्णनगरके दक्षिणमें) यदु हालदारका वास; इनका वंश लुप्त हो जानेके कारण इनके द्वारा प्रतिष्ठित श्रीबलरामकी सेवा अब श्रीगोपीनाथजीके 100 | श्रीचैतन्यचरितामृत