भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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11/13-16 ] साथ हो रही है। (15) अनन्तनगरमें (खानाकुलके निकट) हरिमाधवका वास; वंश लुप्त है। (16) माहेशमें (श्रीरामपुरके निकट ?) गोपालदासका वास; (वंश अज्ञात है)। (17) कोटरामें (खानाकुलके निकट) अच्युत पण्डितका वास; (इनके वंशधर वर्तमान हैं)। (18) पाटला ग्राममें लक्ष्मी-नारायणका वास; (वंश लुप्त है)। (19) पुरीमें गोपीनाथदासका वास (और कोई समाचार नहीं है)। (20) चूणाखालि परगणामें (माहेशके निकट) नन्दकिशोरका वास; (वंश अज्ञात है)। (21) पाता ग्राममें (वर्धमान जिलाके पाटुली ?) विदुर ब्रह्मचारीका वास; वंश वर्तमान है। (22) बिनुपाड़ामें रामकृष्णका वास (स्थान और पात्र, दोनों अज्ञात हैं)। (23) गौराङ्गपुरमं (श्रीपाटसे लगभग चार मील उत्तर दिशामें) कमलाकरका वास, सामने निकट ही उनका समाज है और इनके वंशधर श्रीनिताइ-गौर विग्रहके सेवक हैं। (24) विश्वग्राममें बलराम ठाकुरका वास (स्थान और पात्र, दोनों अज्ञात हैं)। (24 1/2) श्रीनिवास आचार्यप्रभु (अभिराम ठाकुरके अति प्रिय और स्नेह कृपापात्र थे, तो भी उनको आधा शिष्य कहा गया है, इससे यह बोध होता है कि वे उनके दीक्षित शिष्य नहीं थे)। चैत्र-कृष्ण सप्तमी तिथिमें महोत्सवके उपलक्ष्यमें उस स्थानपर बहुत लोग एकत्रित होते हैं॥ 13॥ अनुवाद—इसलिये इन दोनोंकी गणना महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभुके गणोंमें होती है। माधव और वासुदेव घोषके सम्बन्धमें भी यही कहा जाता है॥ 15 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—ये दोनों (रामदास और श्रीगदाधरदास) श्रीनित्यानन्द प्रभुके पार्षद स्वरूप हैं। जिस समय महाप्रभुने श्रीनित्यानन्द प्रभुको गौड़देश जानेकी आज्ञा दी थी, तब रामदास और श्रीगदाधर दासको भी साथ जानेके लिये कहा था। इसलिये इन दोनोंकी गणना एक बार महाप्रभुके गणोंमें हुई और फिर श्रीनित्यानन्द प्रभुके गणोंमें भी हुई। इसी प्रकार माधव और वासुघोषकी गणना भी दोनोंके गणोंमें होती है॥ 14-15॥ अनुभाष्य—'गोविन्दघोष'—गोविन्दघोष-ठाकुरके अति प्रियतम विग्रह श्रीगोपीनाथ अभी भी वर्धमान जिलाके अन्तर्गत दाँइहाट और पाटुलीके निकट अग्रद्वीपमें विराजमान हैं। पितृश्राद्धमें पुत्रके समान भक्तकी अप्रकट तिथिपर पिण्ड प्रदान करते हैं। नदिया कृष्णनगरके राजवंशके तत्त्वाधानमें श्रीगोपीनाथजीकी सेवा हो रही है। प्रतिवर्ष कृष्णनगरमें वैशाखेके महीनेमें 'बारदोल' के समय अन्य ग्यारह श्रीविग्रहोंके साथ श्रीगोपीनाथको भी राजधानीमें लाया जाता है और दोलके बाद पुनः अग्रद्वीपमें ले जाया जाता है। 'वासुघोष'—वासुघोषकी पदावलीमें प्राकृत-सहजियोंके इन्द्रिय-तृप्तिकर बहुतसे गौरनागरीपद प्रक्षिप्त हुए हैं (बादमें जोड़े गये हैं)। वास्तवमें ये पद विप्रलम्भरसिक गौरभक्त वासुघोषके पद नहीं हैं और हो भी नहीं सकते। साधकोंको अपने कल्याणके लिये इन (प्रक्षिप्त) पदोंका सावधानीपूर्वक वर्जन करना चाहिये। (चैःचः आदिलीला 10/115 संख्या द्रष्टव्य है)॥15॥ श्रीनिताइके साथ दोनोंका गौड़देशमें प्रचार :- नित्यानन्दे आज्ञा दिल यबे गौड़े याइते। महाप्रभु एइ दुइ दिला ताँर साथे ॥ 14 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने जब श्रीनित्यानन्द प्रभुको गौड़देश जानेकी आज्ञा दी, तब इन दोनोंको उनके साथ भेजा था॥ 14 ॥ (4) माधव और (5) वासुघोष ठाकुर :- अतएव दुइगणे दुँहार गणन। माधव, वासुदेव घोषेर एइ विवरण ॥ 15 ॥ अभिरामकी लीला :- रामदास-मुख्यशाखा, सख्य-प्रेमराशि। षोलसाङ्गेर काष्ठ ये तुलि' कैल वाँशी ॥ 16 ॥ ग्यारहवाँ अध्याय | 101