श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 638, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 11/16-20 अनुवाद—रामदास मुख्य शाखा थे और वे सख्यप्रेमकी निधि थे। वे बत्तीस लोगोंके द्वारा उठाये जानेवाले बाँसको वंशीकी भाँति उठाकर चलते थे॥16॥ दास-गदाधरकी अलौकिक चेष्टाएँ :— गदाधर दास गोपीभावे पूर्णानन्द। याँर घरे दानकेलि कैल नित्यानन्द॥17॥ अनुवाद—श्रीगदाधर दास गोपीभावमें पूर्ण आनन्दमें डूबे रहते थे। इनके घरमें श्रीनित्यानन्द प्रभुने दानकेलि लीलामें अभिनयके द्वारा नृत्य किया था॥17॥ माधवघोषका कीर्तन :— श्रीमाधव घोष—मुख्य कीर्त्तनीयागणे। नित्यानन्दप्रभु नृत्य करे याँर गाने॥18॥ अनुवाद—श्रीमाधवघोष कीर्तनीयोंमें प्रमुख थे। इनके गानपर श्रीनित्यानन्द प्रभु नृत्य करते थे॥18॥ वासुघोषका कीर्तन :— वासुदेव-गीते करे प्रभुर वर्णने। काष्ठ-पाषाण द्रवे याहार श्रवणे॥19॥ अनुवाद—वासुदेव घोष अपने गीतोंमें महाप्रभुकी महिमाका गान करते थे, जिसे सुनकर काष्ठ-पत्थर भी पिघल जाते थे॥19॥ (6) मुरारि-चैतन्यदास :— मुरारि-चैतन्यदासेर अलौकिक-लीला। व्याघ्र-गाले चड़ मारे, सर्प-सने खेला॥20॥ अनुवाद—मुरारि-चैतन्यदासकी लीलाएँ अलौकिक थीं, वे कभी बाघके गालपर थप्पड़ मारते थे और कभी साँपके साथ खेलते थे॥20॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'मुरारि-चैतन्यदास'—इनका जन्म वर्धमान जिलेमें सर-वृन्दावनपुर ग्राममें हुआ था। नवद्वीप-धामके अन्तर्गत मोदद्रुम या माउगाछि-ग्राममें आकर इनका नाम 'शार्ङ्ग' (सारङ्ग) मुरारिचैतन्यदास हुआ था। इनकी वंशावली अभी भी 'सर' के पाटपर निवास करती है॥20॥ अनुभाष्य—'मुरारिचैतन्यदास'—(चैःभाः अन्त्यखण्ड, पाँचवाँ अध्याय)— “बाह्य नाहि श्रीचैतन्यदासेर शरीरे। व्याघ्र ताड़ाइया यान वनेर भितरे॥426॥ कखन चढ़ेन सेइ व्याघ्रेर उपरे। कृष्णेर प्रसादे व्याघ्र लङ्घिते ना पारे॥427॥ महा-अजगर सर्प लइ' निजकोले। निर्भये चैतन्यदास थाके कुतुहले॥428॥ व्याघ्रेर सहित खेला खेलेन निर्भय। हेन कृपा करे अवधूत महाशय॥429॥ चैतन्यदासेरे आत्मविस्मृति सर्वथा। निरन्तर कहेन आनन्दे मनःकथा॥431॥ दुइ तिन दिन मज्जि' जलेर भितरे। थाकेन, कोथाओ दुःख ना हय शरीरे॥432॥ जड़प्राय अलक्षित वेश-व्यवहार। परम उद्दाम सिंह-विक्रम अपार॥433॥ चैतन्यदासेरे यत भक्तिर विकार। कत वा कहिते पारि,—सकलि अपार॥434॥ योग्य श्रीचैतन्यदास मुरारि पण्डित। याँर बातासेओ कृष्ण पाइये निश्चित॥435॥ “श्रीचैतन्यदासको शरीरकी बाह्य सुध-बुध नहीं रहती थी। वे कभी वनमें जाकर बाघका पीछा करते थे और कभी उसके ऊपर चढ़ जाते थे। श्रीकृष्णकी कृपासे वे बाघ कभी भी उनका कुछ भी अनिष्ट नहीं कर पाते थे। कभी वे निर्भीक होकर महा-विषधर सर्पको अपनी गोदमें ले लेते थे। वे निर्भीक होकर बाघोंके साथ खेलते थे। इस प्रकार अवधूत महाशय (श्रीनित्यानन्द प्रभु) उनपर कृपा करते थे। उन्हें अपनी स्मृति भी नहीं रहती थी और सदा आनन्दसे अपने मनकी कथा कहते थे। कभी वे दो-तीन दिन तक जलके भीतर डूबकर रहते थे, तो भी उनके शरीरमें कोई भी कष्ट नहीं होता था। वे जड़की भाँति अलक्षित रूपसे ये सब व्यवहार करते थे, उनपर किसीका नियन्त्रण नहीं था और सिंहके समान उनका 102 | श्रीचैतन्यचरितामृत