श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 629, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें10/155-158 ] महाप्रभुको प्रसाद निवेदन करते थे। महाप्रभुकी आज्ञा पाकर वे वृन्दावन आ गये। श्रीरूप गोस्वामी उनके स्थानपर आकर उनसे भागवत सुनते थे। महाप्रभुकी कृपासे वे सदा कृष्णप्रेममें मत्त रहते थे॥155-158॥
ग्राम्यवार्त्ता ना सुने, ना कहे जिह्वाय। कृष्णकथा-पूजादिते अष्टप्रहर याय॥ वैष्णवेर निन्द्यकर्म नाहि पाड़े काणे। सबे कृष्णभजन करे, -एइमात्र जाने॥”
अनुभाष्य-‘रघुनाथ भट्टाचार्य'–ये छह गोस्वामियोंमें अन्यतम और तपन मिश्रके पुत्र थे। लगभग 1425 शकाब्दमें इनका जन्म हुआ था। भागवत शास्त्रमें इनकी विशेष निपुणता थी। (चैःचः अन्त्यलीला, तेरहवाँ परिच्छेद)-
“रघुनाथ भट्ट पाके अति सुनिपुण। येइ रान्धे सेइ हय अमृत-समान॥ परम सन्तोषे प्रभु करेन भोजन। प्रभुर अवशिष्ट पात्र भट्टेर भक्षण॥ अष्टमास रहिं' प्रभु भट्टे विदाय दिल। 'विवाह ना करिह' बलि' निषेध करिल॥ 'वृद्ध मातापिता याइ' करह सेवन। वैष्णव-पाश भागवत कर अध्ययन॥ पुनरपि एकबार आसिह नीलाचले।' एत बलि' कण्ठमाला दिल ताँर गले॥” “चारि वत्सर घरे पिता-मातार सेवा कैल। वैष्णव-पण्डित-ठाँइ भागवत पड़िल॥ पिता-माताय काशी पाइले उदासीन हञा। पुनः प्रभुर ठाँइ आइला गृहादि छाड़िया॥” “आमार आज्ञाय, रघुनाथ, याह वृन्दावने। ताँहा याजा रह रूप-सनातन-स्थाने॥ भागवत पड़, सदा लह कृष्णनाम। अचिरे करिबेन कृपा कृष्ण भगवान्॥ एत बलि' प्रभु ताँरे आलिङ्गन कैला। प्रभुर कृपाते कृष्णप्रेममत्त हैला॥ चौद्दहात जगन्नाथेर तुलसीर माला। सेइ माला, छुटापान प्रभु ताँरे दिला॥” “रूप-गोसाञिर सभाय करे भागवत पठन। भागवत पड़िते आउलाय ताँर मन॥ पिकस्वर कण्ठ, ताते रागेर विभाग। एक श्लोक पड़िते फिराय चारि राग॥ निज-शिष्ये कहिं' गोविन्देर मन्दिर कराइल। वंशी-मकर-कुण्डलादि भूषण करि' दिल॥
“रघुनाथ भट्ट भोजन बनानेमें अति निपुण थे। ये जो कुछ भी बनाते थे, वह अमृतके समान होता था। महाप्रभु परम सन्तोषके साथ इनका बनाया भोजन करते थे और उनका उच्छिष्ट प्रसाद ये पाते थे। आठ महीने नीलाचलमें रहनेके बाद महाप्रभुने इन्हें वहाँसे विदा किया और विवाह करनेसे निषेध किया। महाप्रभुने इन्हें वृद्ध माता-पिताके पास रहकर उनकी सेवा करने और वैष्णवोंसे भागवत श्रवण करने तथा पुनः एक बार नीलाचल आनेकी आज्ञा दी। यह कहकर महाप्रभुने अपने गलेकी माला उनके गलेमें डाल दी।” “घर जाकर इन्होंने चार वर्ष माता-पिताकी सेवा की और वैष्णव-पण्डितसे भागवत पढ़ी। माता-पिताके देहावसानके बाद ये जगत्के प्रति उदासीन हो गये और घर छोड़कर पुनः महाप्रभुके पास नीलाचल आये।” “(महाप्रभुने कहा-) मेरी आज्ञा है कि तुम वृन्दावन जाओ और वहाँ रूप-सनातनके पास रहो। वहाँ भागवतका पाठ करना और सदा कृष्णनाम करना। इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण तुमपर शीघ्र ही कृपा करेंगे। यह कहकर महाप्रभुने इनका आलिङ्गन किया। महाप्रभुकी कृपासे ये कृष्णप्रेममें मत्त हो गये। महाप्रभुने इनको जगन्नाथजीके पान-सुपारी और चौदह हाथ लम्बी तुलसीकी माला दी।” “ये रूप गोस्वामीकी सभामें भागवतका पाठ करते थे और पाठ करते समय इनका हृदय विगलित हो जाता था। इनका कण्ठ बहुत मधुर था और इनको रागोंकी विशेष जानकारी थी। वे एक श्लोकको चार विभिन्न रागोंमें गाते थे। इन्होंने अपने एक शिष्यको आज्ञा देकर उनके द्वारा श्रीगोविन्ददेवजीके मन्दिरका निर्माण करवाया था। श्रीगोविन्ददेवकी वंशी, मकर-कुण्डलादि आभूषणादि इन्होंने अर्पित किये थे। वे कभी भी ग्राम्यवार्त्ता न करते थे और न ही सुनते थे। कृष्णकथा
दसवाँ अध्याय | 93