भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 630

[ 10/153–164 और पूजा आदिमें इनके आठों प्रहर व्यतीत होते थे। ये कभी भी वैष्णवकी निन्दा नहीं सुनते थे और इनकी उत्तम भागवतकी दृष्टि थी, जिस कारण ये सभीको श्रीकृष्णका ही भजन करते हुए देखते थे। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 185वाँ श्लोक)— “रघुनाथाख्यको भट्टः पुरा या रागमञ्जरी।।185(क)।” “पूर्वकालकी रागमञ्जरी ही रघुनाथ भट्ट कहलाते हैं।” ॥ 153-158 ॥ इति अनुभाष्ये दशम परिच्छेद। दसवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। शाखा-प्रशाखाओंके क्रमसे असंख्य गौरभक्तोंके द्वारा त्रिभुवनका उद्धार :— एइमत संख्यातीत चैतन्य-भक्तगण। दिङ्मात्र लिखि, सम्यक् ना याय कथन ॥ 159 ॥ एकैक-शाखाते लागे कोटि कोटि डाल। तार शिष्य-उपशिष्य, तार उपडाल ॥ 160 ॥ सकल भरिया आछे प्रेम-फूल-फले। भासाइल त्रिजगत् कृष्णप्रेम-जले ॥ 161 ॥ एक एक शाखार शक्ति अनन्त महिमा। 'सहस्र वदने' यार दिते नारे सीमा ॥ 162 ॥ संक्षेपे कहिल महाप्रभुर भक्तगण। समग्र बलिते नारे 'सहस्र-वदन' ॥ 163 ॥ अनुवाद—इस प्रकार श्रीचैतन्य महाप्रभुके भक्तोंकी संख्या अनन्त है। मैंने केवल उनका दिग्दर्शनमात्र करवाया है, सम्पूर्ण रूपसे तो उनका वर्णन करना सम्भव ही नहीं है। एक-एक शाखापर करोड़ों-करोड़ों डालें हैं और उनके शिष्य-उपशिष्य उनकी उपडालें हैं। सभी शाखाएँ, डालें और उपडालें प्रेमरूप फूल और फलोंसे लदी हैं, जिन्होंने त्रिभुवनको कृष्णप्रेमके जलमें डुबो दिया है। एक-एक शाखाकी शक्तिकी महिमा अनन्त है, सैकड़ों मुखोंसे भी जिनका गान नहीं किया जा सकता है। संक्षेपमें मैंने महाप्रभुके भक्तोंका वर्णन किया है, सम्पूर्ण वर्णन तो (अनन्त शेष) अपने सैकड़ों मुखोंसे भी नहीं कर सकते ॥ 159-163 ॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 164 ॥ इति श्रीश्रीचैतन्यचरितामृते आदिलीलायां मूलस्कन्ध-शाखावर्णनं नाम दशम परिच्छेदः। अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है ॥ 164 ॥ श्रीश्रीचैतन्यचरितामृतमें आदिलीलाका 'मूलस्कन्धकी शाखाका वर्णन' नामक दसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।