श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 627, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें10/141-147 ] अपर्श याय गोसाञि मनुष्य-गहने। मनुष्य ठेलि' पथ करे काशी बलवाने॥142॥ अनुवाद—महाप्रभुने गोविन्दको अपनी देहकी सेवा प्रदान की। काशीश्वर बहुत बलवान थे और जब महाप्रभु जगन्नाथजीके दर्शनके लिये जाते, तब काशीश्वर महाप्रभु के आगे-आगे चलकर लोगोंको हटाकर मार्ग बनाते, जिससे भीड़में कोई उनको स्पर्श न कर पाये॥141-142॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘अपर्श’—बिना स्पर्श किये॥142॥ इति अमृतप्रवाह-भाष्ये दशम परिच्छेद। दसवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। (20) रामाइ, (21) नन्दाइ :- रामाइ-नन्दाइ—दोँहे प्रभुर किङ्कर। गोविन्देर सङ्गे सेवा करे निरन्तर॥143॥ बाइश घड़ा जल दिने भरेन रामाइ। गोविन्देर आज्ञाय सेवा करेन नन्दाइ॥144॥ अनुवाद—रामाइ और नन्दाइ, ये दोनों महाप्रभुके सेवक हैं और दोनों गोविन्दके साथ मिलकर निरन्तर महाप्रभुकी सेवा करते थे। रामाइ दिनमें बाइस घड़े जल भरते और नन्दाइ गोविन्दकी आज्ञानुसार महाप्रभुकी सेवा करते॥143-144॥ अनुभाष्य—‘रामाइ और नन्दाइ’—(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 139वाँ श्लोक)— “पयोद-वारिदौ प्राग् यौ नीरसंस्कारकारिणौ। तावद्य भृत्यौ रामायिर्नन्दायिश्चेति विश्रुतौ॥139॥” “पहले जो जलसंस्कारकारी (गोचारणके समय श्रीकृष्णके व्यवहारके लिये जलसे परिपूर्ण पात्रोंको उठाकर ले जानेवाले) पयोद और वारिद नामक श्रीकृष्णके सेवक थे, वे ही अब रामाइ और नन्दाइके नामसे प्रसिद्ध हैं।” ये गोविन्दके आनुगत्यमें महाप्रभुकी सेवा करते थे॥143॥ (22) कालाकृष्णदास विप्र :- कृष्णदास-नाम शुद्ध कुलीन ब्राह्मण। यारे सङ्गे लैया कैल दक्षिण गमन॥145॥ अनुवाद—कृष्णदास नामक एक शुद्ध कुलीन ब्राह्मण थे, जिन्हें महाप्रभु अपने साथ लेकर दक्षिण भारतकी यात्रापर गये थे॥145॥ अनुभाष्य—‘कृष्णदास’—चैःचः मध्यलीला, सातवें और नौवें अध्यायमें इनका प्रसङ्ग वर्णित है। जलपात्रको उठाकर चलनेके लिये ये सरल ब्राह्मण महाप्रभुके साथ दक्षिण भारत गये। महाप्रभुने मालाबार देशमें भटथारियोंके द्वारा इनको स्त्रीरूपसे मोहित करके आबद्ध करनेकी चेष्टाको देखकर इनका उद्धार किया और इनको नीलाचलकी ओर लौटनेके लिये विदा किया॥145॥ (23) बलभद्र भट्ट :- बलभद्र भट्टाचार्य—भक्ति-अधिकारी। मथुरा-गमने प्रभुर यँहो ब्रह्मचारी॥146॥ अनुवाद—बलभद्र भट्टाचार्य भक्तिके योग्य अधिकारी हैं। ये ब्रह्मचारी महाप्रभुके साथ मथुरा गये थे॥146॥ अनुभाष्य—‘बलभद्र भट्टाचार्य’—व्रजकी मधुरेक्षणा हैं। संन्यासियोंके लिये भोजन बनाना आदि व्यवहारिक कर्म-काण्ड निषिद्ध हैं। वे गृहस्थियोंसे यह सब ग्रहण और स्वीकार करते हैं। संन्यासीगण-गुरु हैं और ब्रह्मचारीगण शिष्य हैं। बलभद्र महाप्रभुके साथ जब वृन्दावन गये, तब उन्होंने ब्रह्मचारीका कार्य किया॥146॥ (24) बड़े हरिदास, (25) छोटा हरिदास :- बड़ हरिदास, आर छोट हरिदास। दुइ कीर्त्तनीया रहे महाप्रभुर पाश॥147॥ अनुवाद—बड़े हरिदास और छोटे हरिदास, ये दो कीर्तनीया महाप्रभुके पास रहते थे॥147॥ अनुभाष्य—‘छोट हरिदास’—इनका प्रसङ्ग चैःचः अन्त्यलीला, दूसरे अध्यायमें द्रष्टव्य है॥147॥ दसवाँ अध्याय | 91