भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 626

[ 10/136-141 “मुरारि माहित—ये शिखि माहितिके छोटे भाई हैं और श्रीगौरसुन्दरके चरणोंके अतिरिक्त इनकी कोई गति नहीं है॥”136॥ (17) माधवीदेवी :— माधवीदेवी—शिखि माहितिर भगिनी। श्रीराधार दासीमध्ये याँर नाम गणि॥ 137 ॥ अनुवाद—माधवी देवी शिखि माहितिकी बहन हैं और उनकी गणना श्रीमती राधिकाकी दासियोंमें होती है॥137॥ अनुभाष्य—‘माधवी देवी’—(चैःचः अन्त्यलीला, 2/104-106)— “प्रभु लेखा करे याँरे राधिकार गण। जगतेर मध्ये पात्र—साड़े तिनजन॥ स्वरूप गोसाञि, आर राय रामानन्द। शिखि माहिति—तिन, ताँर भगिनी—अर्द्धजन॥” “महाप्रभु माधवीदेवीको श्रीमती राधिकाके गणोंमें मानते हैं। महाप्रभुके साढ़े तीन लोग अन्तरङ्ग भक्त हैं। श्रीस्वरूप दामोदर, श्रीराय रामानन्द और शिखि माहिति, ये तीन लोग हैं और शिखि माहितिकी बहन माधवी देवी आधा-जन हैं॥”137॥ (18) काशीश्वर, (19) गोविन्द :— ईश्वरपुरीर शिष्य—ब्रह्मचारी काशीश्वर। श्रीगोविन्द-नाम ताँर प्रिय अनुचर॥ 138 ॥ ताँर सिद्धिकाले दोँहे ताँर आज्ञा पाञा। नीलाचले प्रभुस्थाने मिलिल आसिया॥ 139 ॥ अनुवाद—ब्रह्मचारी काशीश्वर श्रीईश्वरपुरीके शिष्य और श्रीगोविन्द उनके प्रिय सेवक थे। श्रीईश्वरपुरीके सिद्धिकालमें (अप्रकट होनेके समय) उनसे आज्ञा प्राप्तकर, ये दोनों नीलाचलमें आकर महाप्रभुसे मिले॥138-139॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘श्रीगोविन्द और काशीश्वर’—ये दोनों श्रीईश्वरपुरीके शिष्य थे। ईश्वरपुरीके सिद्धिप्राप्तिके समय उनकी आज्ञासे ये नीलाचलमें महाप्रभुके पास आये थे॥138॥ अनुभाष्य—‘श्रीगोविन्द’—महाप्रभुके निज सेवक थे। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 137वाँ श्लोक)— “पुरा वृन्दावने चेटौ स्थितौ भृङ्गार-भङ्गुरौ। श्रीकाशीश्वर-गोविन्दौ तौ जातौ प्रभु-सेवकौ॥ 137॥” “जो पहले वृन्दावनमें भृङ्गार और भङ्गुर नामके दो ‘चेट’ थे, वे ही श्रीगौरसेवक काशीश्वर और गोविन्द हैं।” महाप्रभुके साथ ईश्वरपुरीके शिष्य गोविन्दके मिलनके वर्णनके लिये चैःचः मध्यलीला, 10/131-148 द्रष्टव्य है। गोविन्दके शुद्धदास्यरसके वशीभूत महाप्रभु—(चैःचः मध्यलीला, 2/78)। महाप्रभुकी सेवाके लिये उनकी देहके ऊपरसे लांघकर जानेमें भी गोविन्दको कोई दुविधा नहीं होती थी, किन्तु अपने लिये ऐसा करनेमें उन्हें अपराधका भय रहता था— “गोविन्द कहे, आमार सेवा से नियम। अपराध हउक् किंवा नरके गमन॥” “गोविन्द कहते थे—मेरा सेवाका यह नियम है, इसके द्वारा अपराध हो अथवा नरकमें जाना पड़े, कोई बात नहीं।” चैःचः मध्यलीला 10/82-100 संख्या द्रष्टव्य है॥139॥ गोविन्द और काशीश्वरकी श्रीगौर-सेवा :— गुरुर सम्बन्धे मान्य कैल दुँहाकारे। ताँर आज्ञा मानि’ सेवा दिलेन दोँहारे॥ 140 ॥ अनुवाद—अपने गुरु श्रीईश्वरपुरीसे सम्बन्धित होनेके कारण महाप्रभु इन दोनोंका सम्मान करते थे, किन्तु गुरुकी आज्ञा मानकर महाप्रभुने इन दोनोंको अपनी सेवा प्रदान की॥140॥ अङ्गसेवा गोविन्देर दिलेन ईश्वर। जगन्नाथ देखिते आगे चले काशीश्वर॥ 141 ॥ 90 | श्रीचैतन्यचरितामृत